हरभजन के घर से निकलते ही सुहानी सुबह डरावनी दुपहरी में बदल गयी। बिंदिया को
ऐसा लगने लगा, जैसे खाट की बान टूट गयी
हो और वह पल-पल नीचे धँसती जा रही हो। उसके चेहरे के चौबीस कैरेट सोने के रंग में
चाँदी की सफ़ेदी मिलने लगी। फिर भी, वह करवट लेटी, चुपचाप उस पाँच फ़ुट ऊँचे दरवाजे़ को एकटक देखती रही, जिसकी चौखट ने अभी-अभी हरभजन के कपाल की मज़बूती आज़मा
कर बिंदिया के कमज़ोर कलेजे में एक तीखी-सी बर्छी घोंप दी थी। काश, वह बिंदिया की ओर न देख रहा होता - भुला न दिया होता
उसने दरवाज़े के ठिगनेपन को, उसके कठोर अस्तित्व को।
कुछेक पल बाद बिंदिया की दृष्टि दरवाज़े से हटी और जा पहुँची
दीवार के उस हिस्से पर, जहाँ से मिट्टी की ऊपरी, लगभग दो इंच मोटी, पर्त के एक बड़े-से चप्पे ने अवकाश ग्रहण कर कारबंकल
घाव का-सा वीभत्स चित्र बना दिया था - बीस-पच्चीस खपरे के लाल-लाल टुकड़े साँप-जैसे
झाँक रहे थे अन्दर से। बिंदिया ने उधर से भी दृष्टि फेर ली। वह सीधी लेट गयी।
अब उसकी आँखों के सामने लटक रहा था धुएँ से काला हुआ बदशक़्ल
छप्पर, जिससे छोटी-बड़ी, सड़ी हुई, अनगिनत रस्सियाँ लटक रही थीं। ’’इन जर्जर रस्सियों पर टिकी है छप्पर की ज़िन्दगी।’’ एक विद्रूप-भरी मुस्कान उभर आयी
बिंदिया के काग़ज़ी सफ़ेद होंठों पर। तभी अचानक ऊपर खपरों की खटर-पटर होने लगी। शायद
कोई बिल्ली अपने विवशता-भरे कुकृत्य पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही थी। अभी अगर
पचकौड़ी होता, तो झट से गली या आँगन में
निकल कर पत्थर फेंकने की मुद्रा में हाथ घुमा-घुमा कर, ’’धात्, धात्’’ और कुछ गालियों का उच्चारण करके, भगाता बिल्ली को। पर बिंदिया लेटी रही चुपचाप। अब तो, ख़ैर, मजबूरी थी, पर पहले भी, जब वह नीरोग थी, ऐसे मौक़ों पर उसने कभी भाग-दौड़ नहीं की थी। उसे कोई
रुचि ही नहीं थी इन बातों में!
लेकिन अब बर्दाश्त कर सकना बिंदिया के वश से बाहर की बात
थी। सिर की ऊँचाई पर, गली में ख़ुलनेवाली, कमरे की दो फ़ुट लम्बी और डेढ़ फ़ुट चौड़ी एकमात्र खिड़की
से होकर आनेवाले एक गीत के बोल उसके कानों को भेदने लगे थे। उसने पूरी ताक़त लगा कर
पुकारा - ’’मैया री!’’ और इसके साथ ही ख़ाँसी के आठ-दस
मेहराये हुए फटाके फूट गये।
’’आयी, बिटिया!’’ - जवाब मिला। पर मैया के दौड़ कर आने तक बिंदिया का कमरा उस
गीत के बोलों से भर गया था। गली-पार के मकान में मिसराइन अपना प्रिय गीत गा रही थीं
ः
जे दियरा जरे भिनसार
बटोहिया का करिहे।
मोर रजवा भये दरबेस
कँगनवा का करिहे।
अरे दियरा जरे ...
’’बन्द कर दे, मैया, बन्द कर दे यह झरोखा!’’ - मैया के कमरे में घुसते ही बिंदिया ने
विह्वलतापूर्वक अपनी दुर्बल वाणी में कहा और ’’अब्बे हंसा उड़ेगो अकास ...’’ के आगे के बोल गलियारे में
दिग्भ्रमित-से मँडराने लगे ... बिंदिया बक्से में बन्द हो गयी थी।
मिसराइन को कितना प्रिय है यह गीत! दूसरी बड़ी लड़ाई में मारे
गये सूबेदार मिसिरजी के शोक से उबरने के बाद से ही यह गीत उनके मिस्सी से काले हुए
दातों के पर्दों पर चढ़ा हुआ है। बड़े दर्द से गाती हैं वे यह गीत। उस समय ऐसा लगता
है, जैसे वे बहुत ही दीन हैं
और उनके सीने में दर्द के सिवा कुछ है ही नहीं। हाँलाकि मिसिरजी इतना-कुछ छोड़ गये
हैं अपने पीछे कि मिसराइन हाथ-पर-हाथ धरे पचास साल तक मज़े से खा-पी सकती हैं, फिर भी न-जाने कौन-सी भूख सताती है उन्हें। यह शरीर
की भूख, निश्चय ही, नहीं है, क्योंकि इसकी शांति की कला चुस्त-चतुर मिसराइन ने तभी
सीख ली थी, जब मिसिरजी पहली बार लाम
पर गये थे। और, उनके वे पुराने मीतगण अब
तक अपनी मैत्री निभा रहे हैं। सन्तान का भी अभाव नहीं है उन्हें - उनका बेटा अब आठ
साल का हो रहा है। फिर भी, वे अकेली और अभावग्रस्त क्यों अनुभव करती हैं? कौन-सा संताप दाहता है उन्हें कि गेहूँ पीसते, चावल फटकते और सिलाई-बुनाई करते समय यह गीत छेड़ बैठती
हैं, और बिंदिया के सीने में
सोयी कोई कसक जाग उठती है - उसका अपने पर क़ाबू नहीं रह जाता? इस एक गीत के ही चलते बिंदिया अपने कमरे का यह बेडौल
झरोखा हमेशा बन्द रखती है। पर हरभजन की तो जैसे जान ही बसती है इसमें। मकान का
एकमात्र झरोखेवाला कमरा होने के ही कारण वह बिंदिया को यहाँ ले आया है, और कहता है, चौबीसों घंटे झरोखा ख़ुला रहना चाहिए। उसका दम घुटने
लगता है इसे मुँदा देख कर, और नज़र पड़ते ही वह इस तरह फटाफट ख़ोल देता है इसे, जैसे इसी राह से बिंदिया की तपेदिक के कीड़े उड़ कर
भागेंगे - नहीं सोचता वह कि इससे होकर आनेवाले विषैलै वाण उसके जर्जर फेफड़ों को
क्षत-विक्षत कर डालेंगे। दुनिया-भर में झरोखे आशा-प्रदायिनी रवि-रश्मियाँ और शीतल
बयार लाते हैं, पर यहाँ रही-सही आशा की
ज्योति को भी ढँक लेनेवाला धुआँ आ घुसता है। बिंदिया नाराज़ भी तो नहीं कर सकती
हरभजन को, अन्यथा उसने अपना कमरा
कभी का बदल लिया होता।
किसी को नाराज़ न करने की इस नीति ने ही तो बिंदिया की यह दशा
की है। कब हुई है उसके मन की? सदा ही किसी-न-किसी की इच्छा ने उसकी अपनी इच्छा को कुचला
है। क्या-क्या सोचा था उसने अपनी ज़िन्दगी के बारे में - प्रोफ़ेसर बनने की कितनी
साध थी उसे। पर हुआ क्या? जब वह आठवीं कक्षा में थी, तभी उसकी माँ ने वर की खोज शुरू की और दसवीं में
पहुँचते-पहुँचते उसकी शादी हो गयी पचकौड़ी से। कितना चीखी-चिल्लायी थी वह इस शादी
की बात पर, लेकिन सब व्यर्थ। एक
प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका, उसकी विधवा माँ ने आँखों में आँसू भर कर जब उससे कहा कि
ग़रीबी प्रोफ़ेसर बनने से कहीं पहले उसे निरावरण करके बाज़ार में खड़ा कर देगी, तब वह निरुत्तर हो गयी और अपने से तिगुनी वय के
पचकौड़ी की तीसरी बहू बन कर उसे इस मकान में आना पड़ा, जहाँ उसकी अपनी किराने की दुकान थी, चार-चार किरायेदार थे, फिर भी पचकौड़ी ग़रीब था, अकेला था - अपना बच्चा गोद खिलाने की कितनी उत्कट अभिलाषा
थी उसकी। दो-दो स्त्रियों के चरण दाबे थे उसने सिर्फ़ इस एक कामना की पूर्ति के
लिए, पर भगवान् की वे बेटियाँ
भी अपने पिता की ही तरह निर्दय थीं - उसे भूखा-प्यासा छोड़ कर पीहर चली गयीं। ’’सब साली बंजर-वीरान ही पड़े हैं मेरे गले। देखूँ, अब यह पंखरू-अलबेली भी कुछ उगले है कि बालू बन कर
मेरी कमाई ही पिए है!’’- बिंदिया से विवाह निश्चित
हो जाने के बाद, एक दिन नमक की पुड़िया
बाँधते-बाँधते, पचकौड़ी ने बूढ़े कलुआ तेली
से कहा था।
केवल भूमि ही फ़सल नहीं देती, बीज का भी कुछ मोल होता है - यह बेचारे पचकौड़ी को
क्या मालूम! उसने ज़मीन रेहन रख कर लोगों को कर्ज़े दिये थे, और फिर दूसरों के खेतों में उपजी फ़सलों का सौदा किया
था - जुताई-बुवाई से नाता ही क्या था उसका। वह तो, बस, यह जानता था कि जैसे दो दूने चार होते हैं, वैसे ही मर्द गुने औरत बराबर बच्चा होता है, और अगर बच्चा न हो, तो इसमें ’घी के लड्डू’ मर्द बच्चे का कोई कसूर! अपने पिछले जन्म के पापों के ही
चलते औरत बाँझ होती है - कोई मर्द भी बंझा हुआ है आज तक? और फिर, पचकौड़ी के तो बंझा होने का कोई सवाल ही नहीं हो सकता
था - उसका हर रुपया साल में एक-दो नये रुपयों को जन्म दे देता था। अगर उसके रुपयों
को उसकी बहुएँ हाथ लगा देतीं, तो, पचकौड़ी को पूरा विश्वास था, वे भी बाँझ हो जाते। ’’काश, औरतों के बिना ही बच्चे भी पैदा किये जा सकते।’’ - पचकौड़ी कभी-कभी मन-ही-मन बुदबुदाता और
फिर स्वयं ही विहँस भी पड़ता - ’’तब पूछता कौन उन्हें? कौन देता खाने को? भूख-प्यास से तड़फड़ा कर राम नाम सत्य नहीं हो जातीं?’’ दरअसल, बचपन से ही उसे केवल पैसे को महत्व देना सिखाया गया
था। पैसे के अलावा न कहीं उसकी दृष्टि जाती थी और न मन दौड़ता था। पैसों को ही उसने
सृष्टि की धुरी मान लिया था।
बिंदिया को आज भी याद है सुहागरात का वह दृश्य, जब पचकौड़ी आकर खाट पर, उसके पास, बैठ गया था और उसका घूँघट उठाने की कोई कोशिश किये
बिना ही बोलने लगा था - ’’तू नहीं समझ सके है कि मेरे कलेजे में कैसी आग जले है। परमू
ने सब-कुछ दिया, लेकिन एक औलाद नहीं दी।
औलाद खटरस भोजन का सुआद होय है, री भागवान - कौन जाने, तुझे पता होय भी कि नहीं। कहीं किताब-उताब में पढ़ा
होय, तो पढ़ा होय। ... बस, अब तेरो भरोसा है। बड़ी उमीद लेकर आये हैं तेरो पास।
अगर साध पूरन कर दे हमारी, तो सच्छात लक्ष्मी मान के पूजा करूँ तेरी। ... तो चल, शुरू करें आज से ही ओनामासी ...।’’ और पचकौड़ी ने बिना किसी प्यार-उपचार
के बिंदिया को बिस्तर पर पटक दिया था। बिंदिया का घूँघट अब तक पड़ा था अपनी जगह।
पटकने के बाद ही पचकौड़ी ने थर-थर काँपती बिंदिया के चेहरे पर से घूँघट उठाया था, और तब उसके मुँह के निकट आते ही दुर्गन्ध के मारे
बिंदिया को उबकायी आने लगी थी। उसने पूरी ताक़त लगा कर अपने चेहरे को कपड़े से ढँक
लिया था - बाक़ी शरीर की उसे कोई परवाह नहीं रही थी। और, इतने से ही पचकौड़ी का काम चल गया था।
वस्तुतः यह काम चलना ही मुख्य बात थी पचकौड़ी के जीवन में।
उसकी हर गतिविधि किसी-न-किसी काम से सम्बद्ध होती थी - सोद्देश्य होती थी। हर चीज़
का अधिक-से-अधिक लाभ उठाने में ही वह बुद्धिमानी समझता था। तभी तो, शहर के एक छोर पर बसे इस मुहल्ले में, जो शहर से अधिक गाँव था, वह अपने मकान का भी भरपूर लाभ उठाता था। उसके मकान
में कुल चार कमरे थे और उसके पिता के समय तक उनसे एक पैसा भी किराया नहीं आता था।
उसके पिता ने एक कमरे में दुकान ख़ोल रखी थी, दूसरे में वह सपत्नीक रहता था, तीसरा उसने पचकौड़ी और उसकी पत्नी को दे रखा था और चौथे में रसोई बनती थी।
लेकिन ज्यों ही बूढ़े ने आँखें मूँदीं, पचकौड़ी ने बाहरी बरामदे को दो दुकानी कमरों में बदल
दिया और एक में स्वयं अपनी दुकान रख कर दूसरा एक दर्ज़ी को दे दिया। अन्दर भी उसने
कुछ उलट-फेर किये - एक कमरा अपने और अपनी पत्नी के लिए रखा और दूसरा विधवा माँ को
दे दिया। रसोई की व्यवस्था माँ के ही कमरे में कर दी गयी। इस तरह, अन्दर के दोनों कमरे किराये पर उठा दिये गये। और, जब माँ भी स्वर्ग सिधार गयी, तब दूसरे किरायेदारों की तरह उसने अपनी भी रसोई की
व्यवस्था भीतरी बरामदे में ही कर ली और वह कमरा किराये पर उठा दिया। तब से यही
व्यवस्था चलती रही थी और महीने में पच्चीस-तीस रुपये उसे बिना किसी परिश्रम के मिल
जाते थे।
ऐसे पचकौड़ी से भला कैसे पटती बिंदिया की। विवाह से पहले ही
पचकौड़ी पसन्द नहीं था उसे - उसने अपना विवाह नहीं, बलिदान किया था माँ की इच्छा पर। और अब, पास आकर उसने जो रंग-ढंग देखे पचकौड़ी के, तो उसकी नापसन्दगी के नफ़रत में बदलने के सिवा कोई
चारा न रहा। लेकिन इस नफ़रत को व्यक्त कर सकना सम्भव नहीं था उसके लिए। माँ के कठोर
नियन्त्रण में बीते बचपन, और किताबों तथा समय-समय पर माँ द्वारा दिये जानेवाले
उपदेशों ने नैतिकता के एक ऐसे जाल में उलझा दिया था उसे कि भीतर-ही-भीतर छटपटाने
के अलावा वह कुछ नहीं कर सकती थी। किरायेदारिनें कभी-कभी पचकौड़ी की निन्दा करने
लगतीं, तो उनसे सहमत होने के
बावजूद वह रोष दिखा कर वहाँ से हट जाती। जब वे सहानुभूति दिखातीं उसके प्रति, तब सुख मिलने पर भी वह उन्हें नारी के त्याग-उत्सर्ग
की धार्मिक कहानियाँ सुना देती। किरायेदार और पास-पड़ोस के छोकरे कभी-कभी छेड़खानी
कर देते उससे और उसमें उसे एक अजीब मधुरता अनुभव होती, पर अगले ही क्षण वह खीझ उठती उन पर और उपचेतन में
बैठे आदर्शों की तुला पर तौल कर उन्हें आवारा-गुंडा मान लेती - उनसे बचने का अपना निश्चय
और दृढ़ कर लेती। ऐसे आवारों-गुंडों से उसे बेहद नफ़रत थी। नफ़रत उसे पचकौड़ी से भी थी, पर उसकी हर इच्छा पर वह आत्मसमर्पण कर देती - अपनी
इच्छाओं को वह धीरे-धीरे विष खिला कर सुला रही थी।
लेकिन उसकी अपनी इच्छाओं की हत्या से क्या होने वाला था।
जीवन-मरण तो उसका माना जाता है, जिसका अस्तित्व स्वीकार किया जाए। कितने ही कीटाणु हवा में
तैरते हैं और कितने ही हमारी श्वास-क्रिया के अनन्तर समाप्त हो जाते हैं, पर उन पर किसी ने ध्यान दिया है आज तक! फिर, मात्र अस्तित्व की
स्वीकृति ही किसी को महत्वपूर्ण भी नहीं बना सकती। किसी लावारिस कुत्ते, बिल्ली या चूहे की मौत ने शायद ही किसी को परेशान
किया हो। परेशान तो आदमी उनके जीवन-मरण से होता है जिनसे उसका स्वार्थ प्रभावित
होता है। पचकौड़ी को मतलब था केवल अपनी इच्छा की पूर्ति से, और इसके लिए वह सब-कुछ करने को तैयार था। तभी तो, विवाह के साल-भर बाद भी जब बिंदिया ने पुण्यवती होने
के कोई लक्षण न दिखाये, तब पचकौड़ी ने होम-जाप, पूजा-पाठ, आदि कराये। लेकिन बिंदिया के पाप बहुत ही बड़े थे। अतः
एक साल और बीत जाने पर पचकौड़ी उसे तीर्थ कराने ले गया। अयोध्या के एक पहुँचे हुए
महात्माजी ने बिंदिया को पाप से उबार देने का वचन भी दिया पचकौड़ी को, पर बिंदिया ने एक नया पाप कर डाला वहाँ - उसने बन्द
कमरे में योग क्रिया के लिए तत्पर
महात्माजी के सिर पर उन्हीं का चिमटा इतना कस कर मारा कि बेचारे ख़ून से
लथपथ गिर कर बेहोश हो गये। इसके बाद पाप से मुक्ति भला कैसे सम्भव होती! निदान, गले पड़ी बिंदिया को दासी की तरह रखने के लिए पचकौड़ी
मजबूर हो गया। अपनी कमाई-रूपी तेल को बालू की तरह सोखनेवाली बिंदिया को वह बात-बात
पर डाँटता, तरह-तरह की यन्त्रणाएँ
देता, समय-बेसमय ताना भी देता
कि ’इतने दिनों में तो बिलाई
भी तीन-चार बियान दे दे है’ लेकिन बिंदिया न जाने किस चिन्ता में खोयी रहती - उसकी
आँखें भी जैसे बाँझ हो गयी थीं।
लेकिन दूसरों की आँखों के साथ तो ऐसी बात नहीं थी। उनकी
आँखें अक्सर गीली हो उठतीं बिंदिया की दुरवस्था देख कर। इस बीच एक किरायेदारिन से
बिंदिया की कुछ आत्मीयता भी हो गयी थी। और, वह जब भी मौक़ा पाती थी, बिंदिया को समझाती थी कि उसे दुनियादारी सीखनी चाहिए
और किसी तरह एक बच्चा पैदा करके पचकौड़ी की नाक में नकेल डाल देनी चाहिए। इस तरह, वह पचकौड़ी पर शासन करने के साथ-साथ ज़िन्दगी के मज़े भी
ले सकेगी। लेकिन बिंदिया के दिमाग़ में कभी न अँट सकी यह बात। वह अपने धर्म से
गिरना नहीं चाहती थी - गिरने के नाम से ही उसे पसीना छूटने लगता था, लोक-मर्यादा उसके पाँवों की बेड़ी बन जाती थी। एक बार
वह थोड़ी दुर्बल भी हुई, पर दूसरे ही क्षण उसके मानस-पट पर उन गुंडों के चित्र उभर
आये, जिन्होंने अपनी सेवाएँ
अर्पित करने के लिए समय-समय पर, भिन्न-भिन्न ढंग से, आवेदन-निवेदन किया था, और वह घृणा से भरकर बुदबुदा उठी - ’’उन गुंडों की शय्यासंगिनी! छिः! थू है ऐसे जीवन पर।
मुझे वेश्या नहीं बनना!’’ उसे लगा कि वह एक शिखर पर खड़ी है, जिसके चारों ओर गन्दे-बदबूदार पानी का समुद्र फैला है
और गुंडे उसमें उज-बुज कर रहे हैं। ’’उस गन्दी खाई में गिर कर जीने से कहीं अच्छा इस शिखर
पर भूखी-प्यासी मर जाना है।’’ - उसका निश्चय और भी दृढ़ हो गया।
इसी बीच वह किरायेदारिन भी मकान छोड़ गयी। उसके पोस्टमैन पति
का किसी दूसरी जगह तबादला हो गया था और उसे मकान छोड़ना पड़ा था। अपनी इस एकमात्र
सखी के विछोह से, स्वभावतः ही, बिंदिया को कष्ट हुआ और उसने भरे हृदय से उसे विदा
दी। अब वह किसी से भी अपने मन की बातें नहीं कह सकती थी। लेकिन कुछ दिन बाद ही उसे
लगा कि वह गयी, यह अच्छा ही हुआ। उसके
साथ बातचीत के क्रम में प्रायः ही उसकी दशा का विश्लेषण होने लगता था और इसके
फलस्वरूप उसका असन्तोष कुलाँचे मारने लगता था; वह घबरा उठती थी और अपने जीवन के अन्धकार को दूर करने
के लिए ग़लत-सही कुछ भी करने की सोचने लगती थी। उसके जाने के बाद से यह क्रम रुक
गया था और वह परिस्थिति की मीमांसा करने के बजाय गुमसुम बैठी रहती थी - उसका दिमाग़
कुंद हो जाता था और वह पहलेवाली परेशानी से बच जाती थी।
लेकिन किरायेदार के जाने से पचकौड़ी की परेशानी बढ़ गयी थी।
हर शाम उसे तीन-साढ़े तीन आने के घाटे की याद आती थी और अगले दिन किसी-न-किसी
किरायेदार को घर में बसाने का वह निश्चय करता था। इसी तरह बारह दिन बीत गये, और तब तेरहवें दिन उसने गली में झपटी जा रही भगजोगिन
महरिन को पुकारा - ’’अरे रामपियारे की महतारी, एतना गोस्सा भी आखिर कौन काम का! कभी तो
टोला-मोहल्लावालों की ख़बर लिया करो।’’
अधेड़ भगजोगनी के पाँवों में जैसे अचानक फन्दे पड़ गये। वह
लड़खड़ा कर दुकान की ओर मुड़ गयी और लजाती-लजाती पास आकर बोली - ’’अरे सावजी, का बताऊँ। काम के मारे नाक में दम है!’’
’’अरे, तो बुरा क्या है! चाँदी बटोर रही हो। भगवान ऐसे ही काम दिये
रहें तोरे। ... कहो, कुसल तो है न?’’ - पचकौड़ी ने आत्मीयता दर्शाते हुए कहा।
’’सब किरपा है रामजी की!’’
’’रामपियारे तो नौकरी करे है न?’’
’’हाँ, अभी तक तो करे है। बाकी उसकी मति-गति के तो राम ही मालिक
हैं। कौन जाने, कब का करे!’’
’’अरे, कुछ नहीं, तू निश्चिंत रहो। हाँ, पोता-पतोहू तो मज़े में हैं?’’
’’हाँ, ठीके हैं। वैसे खोंखी-सर्दी तो लगे रहे है!’’
’’हाँ, ई तो हई!’’ - बोल कर पचकौड़ी ने धागे की कमानियों और रुपहले बार्डरवाले
अपने चश्मे को तनिक हिलाया-डुलाया, फिर कहा - ’’अरे, एक काम था तोरे से। तू तो घर-घर आती-जाती हो। टोला-मोहल्ला
की ख़बर रहे है तोरे पास ...’’
अब तक भगजोगनी के कान खड़े हो गये थे, आँखें एकदम जम गयीं थी पचकौड़ी पर, अभिमान से सीना भी थोड़ा तन गया था। वह बोली - ’’हाँ, हाँ, बताओ न। ज़रा जल्दी है हमें। ...’’
’’अरे, अपनी एक कोठरिया खाली है कै दिन से। पूरे दू रूपय्या का
नोक्सान हो गया। कोई किरायेदार होय, तो लाओ। कुछ तो हमारा भी खेयाल करो!’’ - बोल कर पचकौड़ी ने एक दीन दृष्टि
भगजोगनी पर डाली।
’’है तो एक बेचारा, लेकिन कौन जाने, तोरे रुचे कि न रुचे।’’ - बोलते-बोलते भगजोगनी रुक गयी।
’’काहे, काहे, पूरी बात तो बोलो। कुँवारा है का?’’
’’हाँ, पढ़निहार है बेचारा। कलेजा में पढ़े है, लेकिन अब का बताऊँ, उसकी नजर, समझो, धरती से नहीं उठे है। एकदम गऊ समझो। छौ महीना से अकलू महाजन
के घुड़सार में टिको है - सात रुपया महीना पर। टिउशन कर-करके बेचारा पढ़ाई-लिखाई करे
है। कहो, तो लाय दूँ।’’
अकलू महाजन से पचकौड़ी का जन्मजात बैर था, सो एक क्षण का भी विलम्ब किये बिना वह बोल उठा - ’’हाय, हाय, ई भी पूछन की बात है। आज ही ले आओ। बेचारा पढ़निहार का यह
हाल! ई देस का कौन हवाल होयगो? ... ले आओ बेचारे को। हम छौ रुपय्या में ही सुत्थर-सात्थर कोठरी
दे देंगे।’’
और इस तरह, हरभजन का पचकौड़ी के घर में प्रवेश हुआ। हरभजन इस बात से खु़श
कि एक रुपया कम में ही उसे घुड़साल से अच्छी जगह रहने को मिल गयी और पचकौड़ी को अपने
कमरे के किराये में एक रुपये की वृद्धि का हर्ष । लेकिन इस एक रुपये के पीछे वह
एकदम दीवाना हो गया हो, बात ऐसी नहीं थी। उसने कमरा देने से पहले हरभजन को अच्छी
तरह चेता दिया कि उसके घर में अपनी बहू है, दूसरे किरायेदारों की भी बहू-बेटियाँ हैं - इसलिए नज़र
इधर-उधर नहीं उठनी चाहिए- जिस दिन उठी, उसी दिन बाहर कर दिए जाओगे। साथ ही, उसने यह भी जता दिया कि मुहल्ले के कई आवारा लड़के
उसके पैसे पर पलते हैं।
लेकिन, दरअसल, इन धमकियों की कोई जरूरत थी ही नहीं। हरभजन की नज़रें यों ही
इतनी कमज़ोर थीं कि ऊपर नहीं उठती थीं। मामा के गाँव की लड़की चम्पा ने कुछ कम तंग
किया था उसे, पर हुआ क्या? आख़िर में उसे ही तंग आकर अपनी कोशिशें छोड़नी पड़ीं।
हरभजन को अपनी ग़रीबी-लाचारी का पूरा-पूरा ध्यान था, बल्कि ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान था। एकाध बार मित्रों
द्वारा परेशान किये जाने पर उसने, बस, इतना कहा था - ’’मामा के पैसे पर पलने-पढ़नेवाले अनाथ लड़के के लिए ये
सब चीज़ें नहीं बनीं!’’ उसके सामने अपने भविष्य
का कार्यक्रम स्पष्ट था। वह पढ़-लिख कर जीवन में सुव्यवस्थित होना चाहता था और इसी
कारण आवाराग़र्दी से पूरी तरह दूर रहता था। यह उसके भविष्य का कार्यक्रम ही था, जिसके कारण उसने अपने मामा को असन्तुष्ट किया और
मैट्रिक पास करने के बाद आगे पढ़ने के लिए, बिना किसी सहारे के ही, इस शहर में चला आया।
लेकिन उसकी इस सादग़ी-भलमनसाहत ने जहाँ पचकौड़ी और दूसरे
किरायेदारों को अभयदान दिया, वहीं बिंदिया को कमज़ोर बनाना शुरू किया। वह दिन-दिन कमज़ोर
पड़ने लगी। हरभजन में वह सब-कुछ था, जो बिंदिया को पसन्द था। उसमें पढ़ने-लिखने की रुचि थी, आत्मविश्वास था, चरित्र था, हार्दिकता थी। वह भी उसी शिखर का निवासी था, जिस पर बिंदिया खड़ी थी - गन्दा-बजबज समुद्र देख कर
उसे भी उबकायी आती थी। फिर, वह जवान भी था - बिंदिया का हमजोली! लेकिन एक शिखर पर होने
के बावजूद वह बिंदिया के पास न आया - बिंदिया को भी उसके पास जाने की हिम्मत न
हुई। दोनों दो समानान्तर रेखाओं की तरह चलते रहे अपनी राह। कोई भी रेखा वक्रता के
लिए तैयार नहीं थी - शायद वक्र होने की हिम्मत-भी नहीं थी उनमें। लेकिन हाँ, दोनों को सम्बल अवश्य मिला एक-दूसरे से!
हरभजन को पचकौड़ी के घर में रहते एक साल हो गया था। फिर से
जाड़े की ऋतु आ गयी थी। दो महीने बाद हरभजन की इंटरमीडिएट की परीक्षा थी, सो वह ज़ोर-शोर से पढ़ाई में लगा था। शाम का समय तो ट्यूशनों
में निकल जाता था, इसलिए रात के एक-एक, दो-दो बजे तक उसे पढ़ाई करनी पड़ती थी। उन्हीं दिनों
पचकौड़ी को एक बारात में जाना पड़ा। बिंदिया अपनी कोठरी में अकेली रह गयी। लेकिन
उसका अकेलापन निरापद था, यह बात पचकौड़ी भी जानता था और दोनों किरायेदार भी। एक दिन
तो उनमें से एक ने हरभजन के सीधेपन का मज़ाक उड़ाते हुए अपने एक मित्र से यहाँ तक कह
दिया था - ’’पूरा बछिया का ताऊ है -
बम भोला। सहुआइन तो बौराई फिरती है उसके पीछे, लेकिन उसके भेजे में भरा है गोबर। पता नहीं, कैसे पढ़ता-लिखता है!’’ ये वही सज्जन थे, जिन्होंने शुरू में ’छुट्टा साँड़’ को घर में किरायेदार बनाने के लिए पचकौड़ी को बुरा-भला
कहा था। ख़ैर, तो जिस दिन पचकौड़ी बारात
में गया, उस रात तो कुछ न हुआ, पर अगले दिन रात के कोई बारह बजे जब बिंदिया आँगन
जाने के लिए उठी, तो उसे हरभजन के कमरे में
दिया जलता दिखाई पड़ा। उसके मन में तुमुल संघर्ष छिड़ गया - ’हाँ’ और ’नहीं’ के बीच जम कर उठा-पटक होने लगी; और अन्त में आँगन से लौटते समय बिंदिया ने दबे पाँव
हरभजन के कमरे में प्रवेश कर दरवाज़ा उठँगा दिया।
हरभजन ने किताब पर से नज़र उठायी, तो हक-बक। वह गूँगे-सा देखने लगा बिंदिया की ओर, पर यह देखना भी क्षणिक ही रहा। बिंदिया ने लालटेन के
पास पहुँच कर उसकी बत्ती इतनी नीचे कर दी कि कुछ देखना सम्भव न रहा। हरभजन के दिल
की धड़कन और बढ़ गयी - उसका रोम-रोम हरि को भजने लगा। लेकिन बिंदिया में ग़ज़ब का साहस
भरा था आज। उसकी फ़ौलादी रेखा अन्तर की लपटों से लाल होकर आज मुड़ गयी थी - हरभजन की
रेखा तक पहुँच गयी थी। पास आकर बिंदिया ने धीरे-से, किन्तु गम्भीर स्वर में, पूछा - ’’तुम्हें अजीब-सा लग रहा है न?’’
हरभजन हकला कर रह गया, कुछ बोल न सका।
बिंदिया ने ही पुनः प्रश्न किया - ’’तुम मुझे ग़लत तो नहीं समझ रहे?’’
’’उहूँ!’’ - अनजाने में ही हरभजन के मुँह से हल्की-सी ध्वनि निकल गयी।
’’एक बात पूछने आयी हूँ तुमसे! बताओगे?’’
’’बोलो!’’ - हरभजन की वाणी काँप रही थी!
’’सिर्फ़ किताबों की ही भाषा समझते हो, या कुछ और भी? वह पढ़ाई किस काम की, जो किसी के दिल का दर्द न पढ़ सके?’’ - बिंदिया के स्वर में असाधारण दृढ़ता
थी।
’’मैं सब जानता हूँ, सहुआइन!’’ - हरभजन ने किसी तरह जवाब दिया।
’’सहुआइन नहीं, बिन्दु, बिंदिया ... हाँ, क्या जानते हो? इस साल-भर में क्या पढ़ा है?’’
’’यही कि तुम दुःखी हो - तुम्हें दुःख बँटानेवाला साथी चाहिए’’ - अब हरभजन के स्वर में कम्पन नहीं था।
’’और कुछ नहीं?’’
’’हाँ, एक बात और!’’
’’क्या?’’
’’यह कि वह साथी तुम मुझे बनाना चाहती हो!’’
’’तब क्या कहते हो?’’
’’कहना क्या है, वह तो मैं पहले ही कह चुका हूँ। मैं समझता था, मेरी आँखों से, मेरे व्यवहार से, तुमने पहले ही जान लिया है!’’
’’हाँ, अन्दाज़ लगाया था, पर तुम्हारे मुँह से सुनना चाहती थी। ... फिर?’’
’’फिर क्या? अब बाक़ी ही क्या रहता है?’’
’’एक नये संसार का निर्माण - सुखद भविष्य की ओर यात्रा। अकारण
ही गलना-मरना क्या उचित है?’’
’’लेकिन यहाँ कारण है। हमें अपने आदर्शों से गिरना नहीं
चाहिए। अपने जिन गुणों के कारण हम एक-दूसरे की ओर आकर्षित हुए हैं, उनकी हत्या करके क्या हम ’हम’ रह सकेंगे? ... हमें अपने आदर्शों के लिए बलिदान करना ही पड़ेगा। तुम अकेली
नहीं हो, मैं भी तुम्हारे साथ हूँ।
... ’’
’’लेकिन ... ’’
’’लेकिन कुछ नहीं, बिन्दु! कमज़ोर मत बनो तुम! जानती हो, कमज़ोरी अपने सिवा किसी को नहीं भाती!’’
’’वह तो है, लेकिन यहाँ हम कैसे मिल सकेंगे एक-दूसरे से? क्या यह ख़तरे से ख़ाली होगा?’’
’’मिलने-जुलने की ...’’ तभी बरामदे में किसी की पदचाप सुनाई
पड़ी और हरभजन का दिल पीपल के पत्ते की तरह काँपने लगा। उसके मुँह की बात मुँह में
ही रह गयी और कान पदचाप के साथ-साथ चलने लगे। कुछेक मिनट यही हाल रहा - ऊपर की
साँस ऊपर और नीचे की नीचे। और तब, पदचाप आँगन से लौट कर बरामदे में होती हुई दूर निकल गयी; फिर किवाड़ बन्द होने की आवाज़ सुनाई पड़ी। अब कहीं
हरभजन की जान-में-जान आयी। फिर भी, कुछेक सेकंड वह गुमसुम रहा और तब फुसफुसाया - ’’देखा? ये सब ख़तरे हैं मिलने-जुलने में। मुझे अपनी फ़िक्र नहीं है
उतनी, जितनी तुम्हारी इज़्ज़त की
फ़िक्र है। इसलिए मैं तो समझता हूँ कि हमारे लिए इतना विश्वास ही काफ़ी है कि हमारे
दुःख-सुख का कोई साझीदार भी है। एक-दूसरे को दूर से देख कर ही हमारी पीड़ा समाप्त
हो जाएगी।’’
’’लेकिन हम अपने मन की बातें कैसे कहेंगे एक-दूसरे से?’’ - बिंदिया ने कठिनाई जतायी।
’’अब हम कहेंगे कुछ नहीं, बिन्दु, सिर्फ समझेंगे।’’ - हरभजन ने परमज्ञानी की भाँति जवाब
दिया - ’’तुम पूरा विश्वास रखो मुझ
पर। मेरी आत्मा छाया की तरह तुम्हारे साथ रहेगी। मैं हर पीड़ा समझूँगा तुम्हारी। आज
से दूर रह कर भी एक रहेंगे हम। ... अब जाओ, फिर कोई उठ न जाए। बेकार में बदनाम न हो जाओ तुम।’’
’’जैसी तुम्हारी इच्छा!’’ कहते हुए बिंदिया ने अपनी हथेली हरभजन
के होंठों से लगा दी; पर हरभजन ने दो उँगलियों
से पकड़ कर जब उसे माथे से छुला लिया, तब बिंदिया ने झुक कर उसका माथा चूम लिया और फिर
धीरे-धीरे वह कमरे से बाहर हो गयी।
उसके जाते ही हरभजन को लगा, जैसे एक बड़ा बोझ उतर गया हो सिर से। उसने लाल्टेन की
लौ तेज़ की, एक झटके से रज़ाई फेंकी और
दो डगों में दरवाज़े तक पहुँच कर साँकल चढ़ा दी। लेकिन दरवाज़े से लौटते समय ठंड से
उसके हाथ-पाँव जमने लगे और किसी तरह सिकुड़ते हुए खाट पर आकर उसने सिर तक रज़ाई ओढ़
ली। अब उसे याद आया कि माथे से सटी बिंदिया की हथेली कितनी ठंडी थी। उसका मन
मसोसने लगा कि सिर्फ़ एक साड़ी में लिपटी वह उतनी देर खड़ी रही थी उसके पास - कितना
कष्ट हुआ होगा उसे। लेकिन तभी उसके होंठों का स्पर्श जीवन्त हो उठा - होंठ तो बड़े
गर्म थे उसके! क्यों ... क्यों ... उसने कोशिश की रहस्य को समझने की, पर किसी निष्कर्ष पर न पहुँच सका। और तब, आज की विकट परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए वह शाबासी
देने लगा अपने-आप को। अपने असाधारण होने की कल्पना से उसका रोम-रोम पुलक उठा।
लेकिन अब और पढ़-लिख सकना सम्भव न था उसके लिए - बिंदिया उसके दिल-दिमाग़ पर छा गयी
थी।
उस रात बड़ी देर तक हरभजन सोचता रहा बिंदिया के बारे में।
आगे भी कई दिन वह परेशान रहा उसकी समस्या लेकर। तरह-तरह की बातें आयीं उसके मन
में। कई बार कमज़ोर भी हुआ वह। लेकिन अन्त में, घूम-फिर कर, वह अपनी पुरानी जगह ही आ पहुँचा - ’’नहीं, बिंदिया पत्नी है किसी की, और जब तक वह किसी की पत्नी है, तब तक उसके शरीर से मेरा कोई नाता नहीं हो सकता।
हमारा प्यार तब तक विशुद्ध आध्यात्मिक रहेगा। पथभ्रष्ट नहीं होना है हमें - साधारण
नहीं बनना है। यह वासना है, जो बिंदिया को भी कमज़ोर बना रही है और मुझे भी - जो हमें
पथभ्रष्ट करने पर तुली है। नहीं, हमें बचना ही होगा इससे। प्रेम और वासना दो अलग चीज़ें हैं।
मैं दिखाऊँगा कि वासना के बिना भी प्रेम सम्भव है। हमारा प्रेम आदर्श होगा। वह मर
मिटेगी अपनी मर्यादा की वेदी पर, और मैं ... मैं प्रेम की बलिवेदी पर। अपने को मिटा कर ही तो
कोई आदर्श बनता है!’’
लेकिन बिंदिया की अवस्था कुछ दूसरी थी। उसने किताबों के
अलावा दुनिया भी देखी थी। वह जानती थी कि धूप-छाँव से भरी दुनिया के निवासी के
जीवन में भी धूप-छाँव होगी ही। विधि के विधान में औचित्य-अनौचित्य, दोनों हैं, इसलिए मनुष्य में भी औचित्य और अनौचित्य, दोनों ही होंगे। सिद्धान्त और व्यवहार का अन्तर उसके
समक्ष दोपहर दिन की भाँति स्पष्ट था, और चूँकि वह जीना चाहती थी, इसलिए व्यवहार से आँखें नहीं मूँद सकती थी। जब से
हरभजन उसकी नज़र में आया था, तब से उसके विचारों में बड़ा भारी परिवर्तन आ गया था, उसमें साहस बढ़ गया था, उसकी जीने की साध बढ़ गयी थी। पचकौड़ी को छोड़ कर किसी
मनपसन्द आदमी के साथ भाग निकलने में उसे कोई दोष नज़र नहीं आता था। वह सोचती थी - ’’दुनिया ने इतने काम मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किये और मैं
एक भी काम उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नहीं कर सकती? क्यों? ... यह जीवन मेरा है, इसका ख़रा-खोट मेरा है, फिर क्यों न इसे अपना मनचाहा रूप दूँ? यदि समाज कुछ भला नहीं कर सकता मेरा, तो बुरा ही करने का क्या अधिकार है उसे? ... नहीं, मुझे जीना है। अब तक समाज की मर्ज़ी के मुताबिक जीती
रही, अब अपनी मर्ज़ी के मुताबिक
जिऊँगी। कहते रहें लोग, जो कुछ चाहें।’’
बिंदिया को हरभजन पसन्द आया था और उस रात अपना मन्तव्य
व्यक्त करने के बाद उसने सोचा था कि हरभजन जब ठंडे दिमाग से सारी बात पर सोचेगा, तब उसे अपनी दिशा बदलनी पड़ेगी। युवावस्था-सुलभ दुर्बलता
भी उसे बाध्य करेगी इसके लिए। अतः हर दिन उसने बड़ी आशा से हरभजन की आँखों में देखा, पर उनमें पीड़ा और करुणा के सिवा कुछ न दिखाई पड़ा - वह
चमक न आयी उसकी आँखों में, जो आग से खेलनेवालों की आँखों में दिखाई देती है। सो, अन्त में, निराश होकर बिंदिया को किसी ऐसे हरभजन की खोज में
लगना पड़ा, जिसकी आँखों में वह चमक
भी हो। इस क्रम में पड़ोस के मुंशीजी के लड़के शिवराज के साथ वह थोड़ी दूर चली भी, पर निकटता के पहले ही दिन जब उसने उसे आलिंगनबद्ध कर
लिया, तब वह अकुला उठी -
ख़री-खोटी सुना कर उसने अलग कर लिया उसे और उसका नाम भी उन गुंडों की सूची में दर्ज
हो गया, जो बिंदिया को फूटी आँखों
भी नहीं सुहाते थे। इसके बाद बिंदिया की तलाश धीमी पड़ गयी - उसने तक़दीर के आगे
तदबीर की दुर्बलता स्वीकार कर ली। शनैः शनैः उसकी आँखों में भी चमक का स्थान पीड़ा
और करुणा ने ले लिया। इसके साथ ही उसका स्वास्थ्य भी गिरने लगा और साल
बीतते-न-बीतते उसने ख़ाँसी-बुख़ार को अपना साथी बना लिया।
हरभजन को जब मालूम हुआ कि बिंदिया केवल ख़ाँसती ही नहीं रहती, उसके सीने में दर्द और तन में ताप भी रहता है, तब अपना मुँह ख़ोलने के लिए वह मजबूर हो गया। अब केवल
समझने से काम नहीं चल सकता था। वह भूल गया मर्यादा की वेदी पर बिंदिया के मर-मिटने
की बात और अक्सर पचकौड़ी से कहने लगा कि वह डाक्टर से उसकी जाँच करवा ले। पर पचकौड़ी
ने हर बार दुत्कार दिया उसे - ’’अरे, अब का खोंखी-बुखार भी न हो किसी के। का जमाना है। दू अच्छर
पढ़े नहीं कि डाँगडर-दवाई चढ़ी जुबान पर। न-जाने किताबन माँ यही पढ़े हैं कि का। अरे, सौ दवाई की एक दवाई है बनप्सा। बस, पीती रहे चुपचाप। सब ठीक हो जाएगो।’’
लेकिन हर दवा हर किसी को थोड़े ही फ़ायदा पहुँचाती है। जिस
साल हरभजन ने खींच-खाँच कर बी. ए. पास किया, उसी साल बिंदिया के सीने में दर्द, ख़ाँसी और बुख़ार में ख़ून की उल्टी का भी योग हो गया और
तब सबने एक स्वर से कहा - ’’राजरोग!’’ डाक्टर ने भी पुष्टि की इस घोषणा की और बिंदिया को
सेनेटोरियम भेजने की राय दी। लेकिन पचकौड़ी बेचारे के पास इतना पैसा कहाँ था!
बुढ़ापे में समय-कुसमय काम आने के लिए कुल दस ही हज़ार की तो नक़दी, ज़ेवर, वगैरह थे उसके पास - उन्हें पचपन साल की ही अवस्था में कैसे
फूँक देता वह! उधर, हरभजन भी दरिद्र था। बी.
ए. पास करने के बावजूद उसे एक सरकारी दफ़्तर में कुल सत्तर रुपये महीने पर लोअर
डिवीज़न क्लर्क की नौकरी मिली थी। सो, घर में ही बिंदिया के इलाज की व्यवस्था करने के अलावा
कोई चारा न रहा।
बिंदिया की बीमारी सचमुच राजरोग थी। उसने उसे एक राजरानी के
अनुरूप सर्वसाधारण से दूर कर दिया। महीने-भर के अन्दर ही हरभजन के अतिरिक्त, घर के अन्दर रहनेवाले दोनों किरायेदारों ने मकान बदल
लिया। पास-पड़ोस की औरतों ने पचकौड़ी के घर आना बन्द कर दिया। पचकौड़ी के ग्राहक उसकी
दुकान से डरने लगे। स्वयं पचकौड़ी ने भी राजरानी से दूर हट जाने में ही अपनी भलाई
देखी और उसे एक दूसरे ख़ाली कमरे में भेज दिया। राजरानी की सेवा और देखभाल के लिए
उसकी माँ को बुलवा दिया उसने - यही कुछ कम था? यों, पचकौड़ी चाहता तो यह था कि बिंदिया को उसकी माँ अपने पास ही
ले जाए, पर नौकरी करते हुए वह
अपनी बेटी की सेवा नहीं कर सकती थी और नौकरी छोड़ने पर दानों के लाले पड़ जाते। सो, पचकौड़ी को मजबूरन उसे अपने घर में जगह देनी पड़ी।
एक तो, सन्तानहीनता का शोक, दूसरे पत्नी को राजरोग! ज़ाहिर है, सुख-चैन छिन जाता पचकौड़ी का। अब वह दुकान पर
बैठा-बैठा अक्सर बड़बड़ाता रहता - ’’ससुर जहमत आय पड़ो हमार माथे। पंडितो सब कमीना हैं साले -
घूस लेके बियाह कराय देत हैं। न देखिहें साइत, न देखिहें सगुन - बस, कर लेवो चटपट बियाह और दे
देओ हमार दच्छिना। ... अब देखो, मुर्दवो के पालो और उनकी मइयो के। हे भगवान्, कौन पाप किये रहे हम! ससुर सब लुटात जात हो हमरे
अँखियों के आगे। अब का? अब तो पचकौड़ी पाँच कौड़ी के हो जइहें!’’
लेकिन बकने-भूकने के अलावा अब उपाय भी क्या था उसके पास।
उधर वह बकता-भूकता रहता और इधर बिंदिया ख़ाँसती रहती। उसकी दवा का इंतज़ाम कर रखा था
हरभजन ने - बहाना यह कि उसकी जान-पहचान के एक डाक्टर मुफ़्त में ही इलाज कर रहे
हैं। अपनी तनख़्वाह के सत्तर रुपये में से तीस-पैंतीस रुपये वह बिंदिया की दवा पर
ख़र्च कर रहा था। बाक़ी रुपये खाने-पीने और कमरे का किराया देने में चले जाते थे।
लेकिन एक बात थी - अब बिंदिया से उसके मिलने-जुलने में कोई रोक-टोक नहीं थी। दफ़्तर
जाने से पहले और उसके बाद उसका अधिकांश समय बिंदिया के ही पास बीतता था। लेकिन
पचकौड़ी एकदम उदासीन हो बिंदिया की तरफ से - ऐसी बात भी नहीं थी। रोज़ सबेरे शौच के
लिए जाते समय वह एक बार बिंदिया के दरवाज़े पर खड़ा होकर उससे या उसकी माँ से उसका
हाल ज़रूर पूछ लेता था। उसके बाद फिर समय ही कहाँ मिलता था उसे? दुकान ही तो सारा समय खा जाती थी - यहाँ तक कि खाना
भी उसे वहीं मँगवा कर खाना पड़ता था।
बिंदिया के चलते बेचारे पचकौड़ी को टोले-मुहल्ले से अलग होना
पड़ा - यह कोई कम सालनेवाली बात नहीं थी। बिना किसी कसूर के दंड मिले, तो किसे क्षोभ न होगा, दुःख न होगा। फिर, पचकौड़ी की तो जीविका भी छिन गयी थी। वह दिन-भर दुकान
की रखवाली करता था; ’हनुमान-चालीसा’ का पाठ करता था, सबेरे-शाम लक्ष्मी की पूजा भी करता था, पर लक्ष्मी के वाहन, ग्राहक, उसके घर में बैठी पापिष्ठा के कारण उधर रुख़ ही नहीं
करते थे। सबने तज दिया था उसे।
पर एक हद तक साम्यवाद के समर्थक चोरों ने उसे नहीं तजा। एक
रात वे बड़े प्रेम से उसके घर में घुसे और सन्दूक के साथ-साथ ज़मीन के अन्दर बन्दिनी
लक्ष्मी को मुक्त करके अपने साथ ले गये। पहलेवाले दिन होते, तो चोर क्या, चोर के बाप भी नाग के रहते ख़ज़ाने तक नहीं पहुँच सकते
थे। पर इधर, ग़म गलत करने के लिए, पचकौड़ी ने हर शाम थोड़ी-बहुत ताड़ी पीनी शुरू कर दी थी, और उस रात वह उसी के नशे में बेसुध पड़ा था। दूसरे दिन
सुबह सोकर उठते ही उसने जो हाल देखा अपने कमरे का, तो उसे बिजली का करेंट लग गया। अपनी जीवन-भर की
आराध्या का वियोग उससे एकदम ही सहन न हो सका - अपनी छाती पर एक ज़बर्दस्त मुक्का
मारा उसने और फिर कभी न उठने के लिए धरती पर लोट गया। जहाँ लक्ष्मी न हो, वहाँ भला कैसे रह सकता था पचकौड़ी!
पचकौड़ी की मृत्यु के बाद हरभजन की ज़िम्मेदारी आशातीत रूप से
बढ़ गयी। अब वही एकमात्र सहारा था बिंदिया का, उसकी माँ का। अब तक तो उस पर बिंदिया के इलाज का ही
भार था, पर अब माँ-बेटी के
खाने-पहनने का भी भार आ पड़ा। उधर तनख़्वाह थी थोड़ी। लेकिन हिम्मत नहीं हारी उसने।
वह एक आदर्श प्रेमी था - अपने कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः जागरूक प्रेमी। उसने
मुसीबतों से लड़ कर बिंदिया को मौत के मुँह से निकालने का निश्चय किया और चार ट्यूशन
पकड़ कर अपनी आमदनी में चालीस-पैंतालीस रुपये की वृद्धि की। इस तरह, पचकौड़ी का अभाव पूरा कर दिया उसने। दरअसल, बिंदिया के जीवन के हर अभाव को वह पूरा करना चाहता
था। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि अब तक बिंदिया ने जितना दुःख भोगा था, उतना ही, बल्कि उससे भी अधिक, वह सुख भोगे। अब वह अपने को सक्षम भी पाता था इसके
लिए - बिंदिया अब किसी की पत्नी जो नहीं थी, केवल उसकी प्रेमिका थी और कल उसकी पत्नी भी बन सकती
थी।
उसी भावना से अभिभूत होकर कुछ दिन पहले उसने बिंदिया को
चूमना भी चाहा था, पर बिंदिया ने उसे अपने
दुर्बल हाथों से रोक दिया था, कहा था - ’’पागल मत बनो, हरि! यह शरीर अब किसी काम का नहीं रहा - सड़े हुए कूड़े से भी
बदतर है यह।’’
’’तुम बेकार हिम्मत हारती हो, बिन्दी। बहुत जल्दी अच्छी हो जाओगी तुम, बल्कि हो गयी हो!’’ - हरभजन ने उसे समझाया था, आशा दिलायी थी - ’’देखना, साल बीतते-न-बीतते तुम एकदम नीरोग हो जाओगी, और तब ... तब सारी दुनिया को दिखा कर मैं शादी करूँगा
तुमसे, फिर बच्चे होंगे अपने, हमारे प्रेम को देख कर जलेगी सारी दुनिया ... ’’ बोलते-बोलते हरभजन रुक गया था।
बिंदिया के होंठों पर खेल रही निरीह-विद्रूप-भरी मुस्कान ने उसे चौंका दिया था।
उसने पूछा था - ’’क्यों, तुम्हें विश्वास नहीं होता मेरी बातों पर?’’
’’यह बात नहीं है, हरि।’’ - बिंदिया ने जवाब दिया था।
’’फिर ऐसे मुस्कुरा क्यों रही थीं?’’ - पूछा था हरभजन ने।
’’तुम्हारी बातें अच्छी लग रही थीं, इसीलिए!’’ - बिंदिया ने बात टालनी चाही थी।
’’नहीं, नहीं, कोई और बात थी। बोलो न, क्या सोच रही थीं तुम?’’ - हरभजन ने ज़िद की थी।
बिंदिया गम्भीर हो गयी थी, बोली थी - ’’यमराज सावजी से दुर्बल नहीं है, हरि। बस, जितना पुण्य है मेरा, उतने दिन तुम्हारे दर्शनों का सौभाग्य मिल रहा है।
फिर तो ... ’’ और बिंदिया का स्वर
अवरुद्ध हो गया था, आँखें डबडबा आयी थीं।
बिंदिया की आँखों में जैसे सारा संसार जलमग्न हो गया था और
हरभजन डूबने-उतराने लगा था उसमें - संज्ञाहीन-सा, तिनके-सा।
उस दिन के बाद हरभजन ने वैसी कोई बात नहीं कही बिंदिया से -
चुपचाप, मनोयोगपूर्वक, सेवा करता रहा उसकी। यमराज को हराने के बाद, बिंदिया को अपने सपने का साकार स्वरूप दिखाने का ही
उसने निश्चय कर लिया था; पर अब उसका वह निश्चय भी लड़खड़ा गया था - डाक्टर ने बिंदिया
को टी. बी. के तीसरे स्टेज में घोषित कर दिया था। फिर भी, हिम्मत हारने को वह तैयार न था। बिंदिया की आखिरी
साँस तक वह यमराज से लड़ने वाला था। सवाल बिंदिया की बीमारी का नहीं था उतना, जितना उसकी अपनी आदर्शनिष्ठा का था।
झरोखा बन्द हो गया, तो बिंदिया को कुछ राहत मिली। उसने आँखें बन्द कर लीं
अपनी। पर आँखों का बन्द होना था कि एक नील पट आ उपस्थित हुआ उसकी अन्तर्दृष्टि के
समक्ष, और उस पर उभरने लगे
तरह-तरह के सजीव चित्र। एक-एक करके कई चित्र गुज़र गये उस पर से और तब एक अद्भुत दृश्य
सामने आया। बिंदिया ने देखा, चीथड़ों में लिपटी, एक भोली-सी लड़की एक वीरवेशधारी युवक के सामने गिड़गिड़ा
रही है, मिन्नतें कर रही है, अपनी प्राण-रक्षा के लिए शरण माँग रही है - और वह
वीरवेशधारी युवक एक फटी-पुरानी पुस्तक पढ़-पढ़ कर उसे समझा रहा है कि पूरी सहानुभूति
होने और उद्धार की पूर्ण क्षमता रखने के बावजूद वह हत्यारे के हाथ से उसकी रक्षा
इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि उसी ने उसे नदी से छान कर निकाला था और इस तरह, उसके जीवन पर उसी का अधिकार है। हाँ, अगर हत्यारा न आए, या उसे मुक्त कर दे, तब वह उसे शरण अवश्य देगा। तभी हाथ में गँड़ासा लिये
एक लँगड़ा-डरावना-सा व्यक्ति आता है और लड़की का हाथ पकड़ लेता है। वीरवेशधारी युवक
रोमांचित हो उठता है, उसका दायाँ हाथ तलवार की
मूठ पर जाता है, थोड़ी-सी तलवार बाहर भी
निकल आती है, लेकिन तभी उसकी दृष्टि
बायें हाथ की जीर्ण-शीर्ण पुस्तक पर जाती है और वह सजल-नयन होंठ काट कर रह जाता
है। हत्यारा रोती-चिल्लाती लड़की को घसीटता हुआ आगे बढ़ने लगता है। ...
इससे आगे बिंदिया कुछ न देख सकी। वह घबराहट से भर गई; उसका कमज़ोर दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा; वह भय के मारे चिल्ला उठी - ’’मैया री!’’ वह पसीने से तर-ब-तर हो रही थी।
आवाज़ सुनते ही मैया दौड़ी आयी, परेशानी से भर कर बोली - ’’क्या हुआ, बेटी? इतनी घबराई हुई क्यों हो?’’
’’मेरा दम घुट रहा है, मैया!’’ - बिंदिया ने हाँफ़ते हुए कहा - ’’खोल दे झरोखा। जल्दी कर!’’
मैया में जैसे बिजली की गति भर गयी। उसने पल-भर का भी
विलम्ब किये बिना झरोखे के दोनों पट ख़ोल दिये और मिसराइन की स्वर-लहरी से सारा
कमरा भर उठाः
अब्बे हंसा उड़ेगो अकास
भेखजवा का करिहे।
दुअरा पर डोलिया-कहार
दुल्हिनिया चल परिहे।
जो दिया जरे भिनसार ...
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