कुछ दिन पहले एक व्यक्ति को दूसरे से कहते सुना, "कैंची? ये 'कैंची' क्या होता है? 'कैन्ची' होता है, 'कैन्ची'!"
मैं सोच में
पड़ गया। उस व्यक्ति के मुख से उच्चारित 'कैन्ची', 'फ़ैन्कना', 'खैन्चना' इत्यादि शब्दों को मैं सामान्य
उच्चारण दोष की उपज मानता आया था,
पर उस दिन महसूस
हुआ कि समस्या कहीं अधिक गहरी है। उसी सन्दर्भ में दैनिक जनसत्ता के भूतपूर्व
सम्पादक ओम थानवी का 8 जनवरी 2022 का ट्वीट भी याद आ गया—"कुछ शब्दों का उच्चारण बहुत
खलता है। विद्वानों तक के श्रीमुख से एवं को ऐवम् सुनेंगे, स्रोत को स्त्रोत, सहस्र को सहस्त्र, विद्यार्थी को विध्यार्थी, विद्यालय को विध्यालय, प्लेज़रिज़्म को प्लेगरिज़्म, आर्किटेक्ट को आर्चिटेक्ट, लायन को लॉइन, ड्यूप्लैक्स को डुप्ले, बाइडन को बाइडेन ..."
बात सोलहों
आने सच्ची है थानवीजी की। दिल्ली मेट्रो पर 'विश्वविद्यालय' की अटपटी उद्घोषणा यह साबित
करती है कि विद्वान भी किसी-किसी शब्द का सही उच्चारण करने में चूक जाते हैं।
आकाशवाणी के मौजूदा उद्घोषकों में से कई 'शून्य' को 'शुन्य' और 'प्रस्तुत' को 'प्रस्तूत' बोल कर पतली गली से सरक लिया
करते हैं। हाँ,
चीन के
राष्ट्रपति ची जिन्गपिन्ग का नाम 'इलेवेन
जिनपिन्ग' पढ़ने के बाद 2014 में दूरदर्शन की समाचारवाचिका
को ज़रुर नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। मैं ख़ुद 'संन्यासी', 'लकड़हारा' और 'मछलियाँ' शब्दों का सही उच्चारण करते
समय रिकॉर्डिस्ट का कोपभाजन बन चुका हूँ। वे लोग 'सन्यासी', 'लक्कड़हारा' और 'मछ्लियाँ' को ही सही मानते थे।
वैसे तो
अंग्रेज़ीदाँ महिलाओं को सगर्व पटना को 'पैटना' और जमशेदपुर को 'जामशेदपोर' भी कहते सुना है, पर यहाँ मैं जानबूझ कर ग़लत
बोलनेवालों की चर्चा नहीं कर रहा।
मैं उनकी बात
भी नहीं कर रहा जो शारीरिक,
आनुवांशिक, सांस्कृतिक या किसी अन्य कारण
से शुद्ध उच्चारण करने में असमर्थ हैं। आख़िर क्या वजह है कि सामान्य जन की तो
छोड़िए,
बुद्विजीवी
भी सही हिन्दी नहीं बोल पाते?
हिन्दी
को देवनागरी लिपि में सहज-प्रकाश्य बनने के लिए कई
क़ुर्बानियाँ देनी पड़ी हैं। जब अनुस्वार (ं) और अनुनासिक (ँ) उच्चारणों के लिए अनुस्वार का ही प्रयोग
होने लगे,
तो 'चाँद' की जगह 'चान्द' सुनाई पड़ने पर आश्चर्य नहीं
होना चाहिए। यहाँ साहित्य वाचस्पति, व्याकरणाचार्य
पण्डित कामता प्रसाद गुरू की सलाह (हिन्दी व्याकरण, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, [वि.] सं. 2009 [1952-53], पृ. 51) पर ध्यान देने से बात बन सकती है।
(1) ठेठ हिन्दी शब्दों के अन्त में
जो अनुस्वार आता है,
उसका उच्चारण
अनुनासिक होता है;
जैसे मैं, में, गेहूँ, जूँ, क्यों ['केन्चुआ' कहना ग़लत है]।
(2) पुरुष अथवा वचन के विकार के
कारण आनेवाले अनुस्वार का उच्चारण अनुनासिक होता है; जैसे करूँ, लड़कों, लड़कियाँ, हूँ, हैं, इत्यादि।
(3)
दीर्घ स्वर
के पश्चात आनेवाला अनुस्वार अनुनासिक के समान बोला जाता है; जैसे आँख, पाँच, ईधन, ऊँट, साँभर, सौंपना, इत्यादि [कैंची को 'कैन्ची' न कहने का भी यही कारण है]। (4) जब इ और ए अकेले आते हैं, तब उनमें चन्द्र-बिन्दु और जब
व्यंजन में मिलते हैं तब चन्द्र-बिन्दु के बदले अनुस्वार ही लगाया जाता है, जैसे सिंचाई, संज्ञाएँ, ढेंकी, इत्यादि। [इन
शब्दों का
उच्चारण भी अनुनासिक होता है] ।
तो बात साफ़
है,
संभवतः
सैंक्शन-जैसे अंग्रेज़ी शब्द बोलते-बोलते उस व्यक्ति को कैंची-जैसे हिन्दी शब्द भी
उसी अंदाज़ में बोलने की आदत पड़ गई है। चन्द्र-बिन्दु की बैसाखी के बग़ैर कई लोग
अनुनासिक उच्चारण न कर अनुस्वार का उच्चारण कर बैठते हैं।
अब 'फ़ैन्कना' और 'खैन्चना' पर आएँ।
कई
हिन्दी-भाषी 'फ' और 'फ़' में फ़र्क न कर हमेशा 'फ़' का ही प्रयोग करते हैं। हाल ही
में मैंने एक अभिभावक को प्रेमसागर में डूबते-उतराते कहते सुना, "मेरा फ़ूल-सा बच्चा!" मुझमें साहस न हुआ कि उन्हें
आगाह कर दूँ,
"आप अपने
बच्चे को नाहक ही बेवक़ूफ़ कह रहे हैं!"
जहाँ तक 'फ़ैन्कना' और 'खैन्चना' का सवाल है, इसके लिए मैं भाषा में पंजाबी
के प्रभाव को दोषी मानता हूँ।
ऐसा उच्चारण
दिल्ली,
हरियाणा और
पंजाब में ही अधिक सुनाई देता है। बच्चों के लिए निर्मित कार्टूनों में भी अक्सर
जाने-अनजाने अशुद्ध भाषा का प्रयोग देखने में आता है।
आइए, अब एक और बीमारी, बल्कि महामारी, की ओर ध्यान दें। आजकल
योगाभ्यास के छोटे रूप को 'योगा' कहा जाता है। आधुनिक सभ्य समाज
अंग्रेज़ी में तो 'राम' को 'रामा' कहता ही है, हिन्दी में भी राम के 'म' पर अनावश्यक ज़ोर देने से नहीं
चूकता। ऐसा करते समय हम हिन्दी उच्चारण का एक सामान्य नियम [उपर्युक्त पुस्तक, पृ. 46] भूल जाते हैं–"अन्त्य अ का उच्चारण प्रायः
हल् के समान होता है; जैसे गुण, रात, घन, इत्यादि।" 'राज' और 'राजा' में अन्तर होता है।
कुछ
शब्द-समूहों का उच्चारण वक्ता को ग़लती करने पर मजबूर दिया करता है। अब आकाशवाणी के
प्रसारण,
विविध-भारती, को ही लीजिए। अधिकतर लोग 'विविध' को 'विविद' बोले बिना नहीं रह पाते।
हिन्दी के
जिन दो अक्षरों का उच्चारण किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं, वे हैं 'ज्ञ' और 'ऋ'। मुझे इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त
विश्वविद्यालय के रेडियो चैनल ज्ञानवाणी से सम्बद्ध होने का सौभाग्य मिला, तो देखा, वहाँ 'ज्ञ' को 'ग्य' की तरह बोला जाता है। जब 'ग्य' ही बोलना है, तो क्या 'ज्ञ' लिखने का झंझट व्यर्थ ही पाला
जाता है?
इस सिलसिले
में स्वामी सुखबोधानन्द की सराहना करूँगा; वे ज्ञान को 'ग्यान' कह कर उसकी मिटृटी-पलीद नहीं करते, बल्कि इस शब्द को 'द्ँयान'-जैसा उच्चारित करते हैं। "हिन्दी में 'ज्ञ' का उच्चारण बहुधा 'म्यँ' के सदृश [भी] होता है। महाराष्ट्र [में] लोग इसका उच्चारण 'द्न्यँ' के समान करते हैं। पर इसका
शुद्व उच्चारण प्रायः 'ज्यँ' के समान है [उपर्युक्त पुस्तक, पृ. 52]।"
'ज्ञ' की ही तरह 'ऋ' का शुद्ध उच्चारण भी अच्छे-अच्छों की पकड़
से बाहर है। 'ऋषि' को 'रिशि' कहने वाले करोड़ों नहीं तो लाखों की संख्या में तो
अवश्य होंगे। लेकिन ध्यान दीजिए,
तो 'ऋ' कहना उतना कठिन नहीं कि उससे बचा जाए।
जहाँ 'रि' कहते समय जीभ का छोर दाँतों और तालू के बहुत क़रीब आ जाता है, वहीं 'ऋ' अपनी जगह एक मूर्धन्य, ह्रस्व, अग्र, अवृत्तमुखी, स्वर के रूप में बनाता
है। इसे बोलते समय जीभ दाँतों, तालू, और होठों से नहीं सटती।
अब 'ष' और 'श' की बात भी हो जाए। चाहे 'श' हो या 'ष', लोग अक्सर 'श' ही कहते पाए जाते हैं। इस तरह 'शेष' 'शेश' बन जाता है और 'विष' 'विश'! 'ष' कहना तो 'ऋ' बोलने से भी अधिक आसान है, बस मूर्धा का उपयोग करिए। परेशानी हो रही है? अच्छा, ऐसा करिए, तालू का इस्तेमाल कर पहले 'शट' बोलिए और फिर मूर्धा से 'षट' बोलने की चेष्टा कीजिए। अधिकतर लोग इस
प्रयास के फलस्वरूप 'श' और 'ष' के उच्चारण की पहेली बूझ लिया करते हैं।
इन दिनों
पाककला के कार्यक्रमों के अन्त में पाकविधि दोहरानेवालों ने एक अजीब ढर्रा अपनाया
है। वे आख़िरी शब्द में अनुस्वार का उच्चारण बिलकुल न कर कुछ इस तरह बोलते हैं–"एक कड़ाही में तेल गर्म कर ले।
अब उसमें जीरा डाल ले। थोड़ी देर में बारीक़ कटे प्याज़ डाल दे। ..." बेचारों को पता नहीं कि 'ले' 'दे' इत्यादि का प्रयोग असम्मान या अत्यधिक
सामीप्य का द्योतक होता है,
जो औपचारिक
वार्तालाप के अनुपयुक्त है।
चलते-चलते एक ऐसी आदत का ज़िक्र जिसने बहुत
लोगों को परेशान कर रखा है। ये आदत है बिलावजह अनुनासिक प्रयोग की। इस आदत के
शिकार दही नहीं,
'दहीं' खाते हैं; दुनिया में नहीं, 'दुनियाँ' में रहते हैं; और इनके हाथों में नहीं, 'हाँथों' में लकीरें होती हैं! इसी तरह, कुछ लोग बहुवचन सम्बोधन में भी अनुनासिक उच्चारण करने
से नहीं चूकते। सम्बोधन के लिए 'दोस्तो', 'मित्रो', 'साथियो' सही है, 'दोस्तों', 'मित्रों', 'साथियों' नहीं। इसे इस तरह समझें—"दोस्तों से बात करते समय मैंने
कहा,
'दोस्तो! अब
कुछ करने का समय आ गया है।'
" सबको मेरी
विनम्र सलाह—कृपया गायकों, कलाकारों और उद्घोषकों के
उच्चारण को प्रामाणिक न मानें; अपनी शंका के निवारण के लिए
अच्छा साहित्य पढ़ें।
याद रखें, 'कहना', 'रहना', 'गहना' को 'कैहेना', 'रैहेना', और 'गैहेना' तथा 'यह' को 'ये' और 'वह' को 'वे' कहने-जैसे चलन के बावजूद हिन्दी अब भी
लगभग वैसी-ही पढ़ी जाती है जैसा लिखा हो।
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