मंगलवार, 30 जुलाई 2024

असभ्य लोग - विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’

पिल्लै-दम्पति से हमारा प्रथम परिचय शर्माजी के घर हुआ था। उन दिनों हमें एक अच्छे फ़्लैट की बेहद ज़रूरत थी। पुराने मकान-मालिक को दी गयी एक महीने की नोटिस की मियाद समाप्ति पर थी और कोई नया फ़्लैट अब तक तय नहीं हुआ था। सड़क पर बैठने-जैसी नौबत आ गयी थी। हमारे पुराने मित्र शर्माजी को जो यह बात मालूम पड़ी, तो उन्होंने तुरन्त ख़बर भिजवायी कि उनके पड़ोस के मकान में एक फ़्लैट ख़ाली है; हम उसे देख लें। शर्माजी का मुहल्ला हमें पसंद था। ट्राम रास्ते से मात्र तीन-चार मिनट की दूरी, पढ़े-लिखे सभ्य लोगों का निवास और राजनीतिक हलचलों से लगभग अप्रभावित - कितनी ही हड़तालें हुईं, पर न तो वहाँ कोई जुलूस निकला और न कोई ट्राम, बस या कार ही जली। फिर, शर्माजी ने कहलवाया था कि फ़्लैट फ़र्स्ट फ़्लोर पर साउथ-फ़ेसिंग है। कलकत्ते में फ़र्स्ट फ़्लोर साउथ फ़ेसिंग फ़्लैट का वही महत्व है, जो टैक्सियों के बीच प्राइवेट कार का। सो, हम, अर्थात् मैं और श्रीमतीजी, उसी दिन शाम को शर्माजी के घर जा पहुँचे। 

शर्माजी शाम को अक़्सर घर पर नहीं मिलते। मियाँ-बीवी या तो सिनेमा देखने निकल जाते हैं, या किसी प्रदर्शनी के आयोजकों को कृतार्थ करने, या फिर किसी सभा- गोष्ठी के गाजर-मूली वक्ताओं से उलझने का रस लेने। कहते हैं, ’’जब तक बच्चे नहीं होते, शाम का आनन्द ले लें।’’ पर उस दिन दोनों न केवल घर पर थे, बल्कि उन्होंने एक चाय-पार्टी का आयोजन भी कर रखा था - पिल्लै दम्पति के सम्मान में। दुबले-पतले, किन्तु मूँछों के शौक़ीन, पिल्लै साहब और उनकी ढोलक-जैसी धर्मपत्नी, दोनों ही वहाँ मौजूद थे, जब हमलोग पहुँचे। शर्माजी को अतिथि-सत्कार में बड़ा आनन्द आता है। हम जो इस तरह बेमौक़े पहुँच गये, इससे उनका आनन्द, सच मानिए, दुगुना हो गया। दूसरा कोई होता, तो मन-ही-मन बुरी तरह कोसता हमें, पर शर्माजी ठहरे अद्भुत प्राणी, उनकी बाँछें खिल गयीं। उन्होंने लपक कर हमारा स्वागत किया और फिर पिल्लै दम्पति से हमारा परिचय कराया।

पिल्लै दम्पति शर्माजी के ही मकान में फ़र्स्ट-फ़्लोर पर रहते थे - बगल के मकान के उस फ़्लैट के ठीक सामने, जिसे हम देखने गये थे। इसलिए, हमें भी, स्वभावतः ही, उनमें रुचि हुई। फिर, वे थलचर नहीं, नभचर थे - किसी प्राइवेट कम्पनी के मालवाहक विमान का चालक होने के कारण गौहाटी और कलकत्ता के बीच का पूरा व्योमपथ उनका जाना-पहचाना था। उनकी श्रीमतीजी जरूर थलचर थीं और अपनी स्थूल काया के बावजूद एक स्थानीय बालिका विद्यालय में व्यायाम शिक्षिका का पद गौरवान्वित कर रही थीं।

दक्षिणवालों से बात करने में अब मुझे थोड़ा भय होता है। मुँह से कहीं हिन्दी का कोई शब्द निकल गया, तो हाथापाई की नौबत न आ जाए; इसलिए उनसे उनकी मातृभाषा, अंग्रेज़ी में ही बात करने की मैं सावधानी बरतता हूँ; बहुत सोच-समझ कर एक-एक शब्द मुँह से निकालता हूँ। किन्तु पिल्लै साहब शायद बहुत दिनों से उत्तर में थे - अंग्रेज़ी बोलने में, मैंने लक्ष्य किया, उन्हें कठिनाई होती थी और अंग्रेज़ी के दो-तीन टूटे-फूटे वाक्यों के बीच वे हिन्दी का एक दाक्षिणात्य वाक्य ज़रूर घुसेड़ देते थे, ख़ास कर वहाँ, जहाँ अंग्रेज़ी का कोई मौजूँ शब्द उन्हें नहीं सूझता था।

शर्माजी ने शायद मेरी हैरत भाँप ली, बोले - ’’अरे भाई, ये राष्ट्रभाषा प्रेमी हैं, इनसे राष्ट्रभाषा में ही बात कीजिए!’’

मुझे यह सुन कर कितनी ख़ुशी हुई, कह नहीं सकता। एक मेरा बालमित्र है रमण, जो तमिल-भाषी होते हुए भी हिन्दी को ही अपनी मातृभाषा मानता है और भाषायी दंगों के समाचार सुन कर जिसकी मुट्ठियाँ बँध जाती हैं। वही मेरा सबसे आत्मीय और विश्वासी मित्र है। दूसरे निकले ये पिल्लै महाशय, जो थे तो केरलवासी मळयाळी, पर जिन्होंने हिन्दी को अपनी ज़ुबान पर इस तरह चढ़ा लिया था कि अंग्रेज़ी वहाँ आने में हिचकती थी। मैं उनका मुँह ताकने लगा।

शर्माजी ने मेरे आश्चर्यमिश्रित आनन्द को और भी बढ़ा दिया, जब उन्होंने घोषणा की - ’’राष्ट्रीयता के प्रबल समर्थक हैं हमारे पिल्लै साहब। आप सोच रहे होंगे, मिस्टर पिल्लै भले हिन्दी बोल-समझ लें, मिसेज़ पिल्लै मळयाळम और अंग्रेज़ी ही बोलती होंगी। पर बात एकदम ऐसी नहीं है। ये मळयाळम का क ... ख ... ग ... भी नहीं जानतीं। ये बंगकन्या हैं और सच पूछिए, तो मिस्टर पिल्लै को हिन्दी सिखाने का श्रेय भी इन्हें ही है। ये आपस में हिन्दी में ही बातचीत करते हैं। आपकी गवर्नमेंट तो हिन्दी को सम्पर्क-भाषा बनाते-बनाते रह गयी, इन्होंने हिन्दी को सम्पर्क भाषा बना लिया।’’

श्रीमती पिल्लै ने लजा कर सिर झुका लिया, फिर भी मैं उनके चेहरे से अपनी दृष्टि न हटा सका। उनकी स्थूलता ने उनके प्रति मेरे मन में जो एक वितृष्णा उत्पन्न की थी, उनकी सूक्ष्म बुद्धि ने उसे नष्ट कर दिया।

मैंने हर्षावेग में आकर कहा - ’’सुना था, पंजाब की महिलाओं ने वहाँ के पुरुषों को हिन्दी सीखने पर विवश किया था - प्रेमपत्र पढ़ने के लिए ही उर्दूदाँ पंजाबियों को हिन्दी सीखनी पड़ी थी। अब देखता हूँ, अन्य राज्यों की महिलाएँ भी पीछे नहीं हैं। वे अन्तर्राज्यीय स्तर पर हिन्दी का प्रचार कर रही हैं। वास्तव में, हिन्दी प्रचार का काम केवल स्त्रियाँ ही कर सकती हैं, किसी पर बिना कुछ थोपे हुए। मैं सचमुच बहुत आभारी हूँ मिसेज़ पिल्लै का!’’

इस तरह, पिल्लै-दम्पति से प्रथम परिचय बड़ा ही सुखद रहा। कहना चाहिए, उस दिन हमारे सितारे ही कुछ अच्छे थे। जो फ़्लैट शर्माजी ने दिखाया, वह हमें बेहद पसंद आया। उस मकान में ही एक गैरेज भी ख़ाली था, सो गाड़ी बाहर रखने के ख़तरे से भी मुक्ति की सम्भावना स्पष्ट हो गयी। कलकत्ते का क्या ठिकाना! फ़ुटबाल मैच में हारती है मोहन बगान की टीम और नाराज़ भक्त आग लगाने लगते हैं सड़क पर खड़ी गाड़ियों को! फिर, मकान-मालिक भी बड़े सज्जन निकले। एक तो उस मकान में रहते नहीं थे, दूसरे मैंने जितना किराया कम करने को कहा, उन्होंने चुपचाप मान लिया। एक किरायेदार को और चाहिए भी क्या! हमने उसी दिन एडवांस का चेक देकर, फ़्लैट बुक कर लिया।         

कलकत्ते में मकान के मामले में मैं सचमुच भाग्यशाली रहा। एक साल के अन्दर मैंने चार मकान बदले, और बड़ी आसानी से बदले, हालाँकि तबादले की ख़बर पाकर जब अपनी ससुरालवालों और मित्रों को एक फ़्लैट ठीक कर देने को  लिखा था, तब सबने इस तरह मायूसी ज़ाहिर की थी, मानो उनसे एक सप्ताह का राशन माँगा गया हो। तभी तो, दो मकान बदल कर तीसरे में आने पर जब एक साले साहब ने रोज़-रोज़ मकान बदलने की शिक़ायत की थी, मैंने उत्तर दिया था - ’’वे मुहल्ले दिखा रहा हूँ तुम्हें, जहाँ किराये पर मकान मिलते हैं।’’ किन्तु तीसरे मकान-मालिक को नोटिस दे देने पर जब चौथा मकान मिलने में परेशानी महसूस होने लगी, तब लगा, मेरे अहंकार पर भगवान् की दृष्टि चली गयी है और अब इज़्ज़त मिट्टी में मिल कर रहेगी। पर भला हो शर्माजी का। उन्होंने मुझे न केवल संकट से उबार लिया, बल्कि एक ऐसा फ़्लैट दिलवा दिया, जहाँ से और कहीं जाने की मुझे जरूरत नहीं पड़ी। मेरे कलकत्ता-निवास की शेष अवधि उसी फ़्लैट में बीत गयी।

शर्माजी के यहाँ से लौटते समय हम दोनों ही बहुत ख़ुश थे। रास्ते-भर हम अपने भाग्य को तो सराहते ही रहे, पिल्लै-दम्पति की भी प्रशंसा करते गये। हमें लगा, नये मकान में जाने पर शर्माजी-जैसे मित्र तो पड़ोसी हो ही जाएँगे, पिल्लै-दम्पति-जैसे उदार राष्ट्रवादियों का भी साहचर्य प्राप्त होगा।

जैसे-तैसे करके पाँच-छः दिन बीते और पहली तारीख़ को हम अपने नये फ़्लैट में आ गये। यहाँ आकर, सच मानिए, पहली बार हमें लगा कि अपने घर में आ गये हैं, जहाँ विश्राम किया जा सकता है - पहले के तीन फ़्लैटों से इतना ही भिन्न था यह। वस्तुतः तीन साल पहले, जब दिल्ली छोड़ी थी, तब से ऐसे-वैसे मकानों में ही ज़िन्दगी बितानी पड़ी थी। कहीं मोज़ैक फ़्लोर का अभाव ख़लता था, तो कहीं वॉश बेसिन और कहीं शावर बाथ का। एक-दो मकानों में तो हवा और धूप न आने की भी शिक़ायत थी। यहाँ सब-कुछ था - साफ़ हवा, पूरी धूप, मोज़ैक फ़्लोर, शावर, वॉश बेसिन, शेविंग मिरर, फ़्लश डोर, कॉल बेल, किसी चीज़ की कमी न थी। भूखे को जैसे रोटी मिल गयी हो, हमें यह फ़्लैट मिल गया।     

जिस किसी ने कभी मकान बदला है, उसे ज्ञात है, सामान चाहे ठेले पर आए या टेम्पो पर, गृहस्वामी को लगता है, जैसे उसकी पीठ पर ही लद कर आया हो, और गृहस्वामिनी जब कि छितराये सामानवाले घर में हरारत दूर करने के लिए चाय बनाने को स्टोव पम्प करने लगती है, गृहस्वामी सीधे पसर जाना चाहता है। पर पसरने के लिए चाहिए पलंग और पलंग उस समय ख़ुले होते हैं। इसलिए पलंग कसने की ज़रूरत उसे सबसे पहले महसूस होती है। मैं भी उस समय पलंग ही कस रहा था, जब चाय बनाते-बनाते अचानक श्रीमतीजी आ धमकीं और बड़े उत्साह से बोलीं - ’’, देखा, पिल्लै ने कितना अच्छा पर्दा लगाया है अपनी खिड़की में?’’  

रेंच से नट कसते-कसते मैंने पूछा - ’’किस खिड़की में?’’

’’उसी अपने सामनेवाली में। चलो, उठो, देखो न!’’ और वे मुझे लगभग घसीटती हुई दूसरे कमरे में ले गयीं, जिसके ठीक सामने पिल्लै का एक कमरा पड़ता था और हमारे तथा उसके कमरों की एक-एक खिड़की आमने-सामने ख़ुलती थी।

देखा, हरे रंग का एक भारी डिज़ाइनदार पर्दा ऊपर से नीचे तक खिड़की को ढँके था। वैसे, मुझे दूसरों के पर्दों और पर्देवालियों में तनिक भी रुचि नहीं है, पर जब श्रीमतीजी इतनी दिलचस्पी दिखा रही थीं, तब चुप रहना उचित न लगा, बोला - ’’पहले यहाँ कैसा पर्दा था, कुछ याद नहीं पड़ता।’’

’’धन्य है तुम्हारी याद भी!’’ - श्रीमतीजी बोलीं - ’’पहले पर्दा कहाँ था इस खिड़की में!’’

’’, नहीं था? हाँ, उस समय ज़रूरत भी क्या थी! यह फ़्लैट तो ख़ाली ही पड़ा था। पर्दा अच्छा लगाया है। पसंद अच्छी है पिल्लै की।’’ - मैंने कहा।

’’हुँह, पिल्लै की पसंद! अरे, यह उसकी बीवी की पसंद होगी। बंगाल की लड़की है न। कलात्मकता बंगालियों के स्वभाव में ही होती है। इस बार हम भी ऐसे ही पर्दे लगाएँगे!’’ - श्रीमतीजी ने कहा और मैंने चुपचाप हामी भर दी।

पर श्रीमतीजी को संतोष न हुआ इससे, बोलीं - ’’तुम तो सिर्फ हाँ-हाँ कर देते हो, पर पर्दे लाने जाओगे, तो वही कॉटेज इंडस्ट्रीज़वाले उठा लाओगे। इस बार मैं लाऊँगी अपनी पसंद से। न होगा, मिसेज़ पिल्लै से पूछ लूँगी दुकान का पता!’’

पर मिसेज पिल्लै से पता पूछना सम्भव न हो सका। दिन-भर तो वे दिखाई ही न पड़ीं और शाम को जब अपनी बालकनी में दिखाई पड़ीं, तब श्रीमतीजी पर नज़र पड़ते ही वहाँ से हट गयीं। इसके बाद एक-दो दिन और श्रीमतीजी ने उनके दिखने का इंतजार किया, पर व्यर्थ। हाँ, तीसरे दिन उनकी बालकनी के हमारी ओरवाले अंश में एक पर्दा जरूर लग गया।

यह बात मेरी श्रीमतीजी को अपमानजनक लगी - अकारण ही ऐसी बेरुख़ी क्यों? उन्होंने श्रीमती शर्मा से इसकी चर्चा की, तो जवाब मिला - ’’अरे, मत पूछिए उसकी बात। मुहल्ले में किसी से उसकी बातचीत थोड़े ही है। उस दिन शर्माजी ही पता नहीं कैसे पकड़ लाये दोनों को, अन्यथा मुझसे भी बात थोड़े करती है। एक दिन क्या ज़रूरत पड़ी मुझे कि उसके घर चली गयी। विश्वास कीजिए, दरवाज़़े पर से ही रुख़सत कर दिया - बिठाने की तो बात दूर, अन्दर आने तक नहीं दिया।’’

’’अच्छा?’’ - श्रीमतीजी जैसे आसमान से गिरीं - ’’यह तो भारी असभ्यता है।’’

’’असभ्यता होगी दूसरों के लिए, उसकी नज़र में तो इससे प्रतिष्ठा बढ़ती है। अभी उसी दिन की बात लीजिए न। मैं बाज़ार से लौट रही थी कि पानी बरसने लगा। रास्ते में ही पकड़ गयी। पर पास में छुपने की कोई जगह न थी, सो चलती गयी। तभी दोनों मियाँ-बीवी मेरी बगल से अपनी गाड़ी निकाल ले आये। इतना न हुआ कि पानी में भीग रही है - जरा लिफ़्ट दे दें। चार कदम की तो बात थी।’’

’’छि-छि-छि-छि!’’ मैं तो समझती थी, अच्छी औरत है। छिः! आखिर इतनी शान भी किस बात की!’’ - श्रीमतीजी ने कहा।

’’भई, शान क्यों न होगी। जल्दी ही तरक़्क़ी होने वाली है पिल्लै की। अभी एक हज़ार के ग्रेड में है, अब दो हज़ार के ग्रेड में जाएगा। फिर गाड़ी भी ख़रीद ही ली है। फ्रि़ज, रेडियोग्राम, आदि भी हैं ही।’’ - श्रीमती शर्मा ने गिरी-गिरी आवाज में जवाब दिया।

’’हुँह, फ्रि़ज, रेडियोग्राम यहाँ नहीं किसके पास हैं? गाड़ी भी ख़रीदी है तो उन्नीस साल पुरानी, जो गाड़ी से अधिक छकड़ा है। और, ग्रेड बढ़ जाएगा, इससे पड़ोसियों का क्या बनता-बिगड़ता है? किसी को कुछ दे देंगे क्या? जरा सोचने की बात है। जितने भी लोग हैं आसपास, सबकी आर्थिक स्थिति लगभग समान है - अब उन्नीस-बीस तो लगा ही रहता है। हाँ, अगर कोई सोचे कि उसकी स्थिति बीस से बढ़ कर अचानक सौ हो गयी है, तो सौ वाले मुहल्ले में ही उसे चले जाना चाहिए। पड़ोसी क्यों सहेंगे किसी की शान? अरे, प्रेम से बात करोगी, करेंगे; नहीं तुम अपने घर ख़ुश, हम अपने घर। कौन देता है किसी को कुछ!’’

’’सब लोग यह बात नहीं समझते न!’’ - श्रीमती शर्मा ने कहा - ’’आजकल तरक़्क़ी अपनी और दूसरों की सुखसुविधा बढ़ाने के लिए नहीं चाहते लोग, चाहते हैं दूसरों को जलाने के लिए। वैल्यूज़ इतने नीचे गिर गये हैं कि क्या कहा जाए!’’

जीवन के मूल्य सचमुच कितने नीचे गिर गये हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमें उसी रात को मिला। यही कोई साढ़े ग्यारह बजे होंगे कि अचानक एक चीख से मेरी भी नींद खुल गयी और श्रीमतीजी की भी। नयी जगह, पता नहीं, क्या हो गया। हम साँस रोक कर अगली आहट की प्रतीक्षा करने लगे। प्रतीक्षा अधिक नहीं करनी पड़ी। कोई मिनट-भर बाद ही सुनाई पड़ा - ’’नईं-नईं, आज नईं। तुमको बोल दिया न?’’ आवाज़ श्रीमती पिल्लै की थी। वे तोतली बोली में मान कर रही थीं। किन्तु मान क्या इतनी ऊँची आवाज़ में किया जाता है?

माना, मेरे बेडरूम के सामने ही उनका बेडरूम है, किन्तु इतना तेज़ बोल कर क्या दूसरों को अपनी अत्यन्त निजी बातें सुनायी जाती हैं?

तभी एक ज़ोरदार धप्पकी आवाज़ सुनाई पड़ी, जैसे किसी ने ताल ठोकी हो, और इसके साथ ही नारी-कंठ से निकला एक प्रकांड उफ़्!फिर जैसे कोई गुदगुदा रहा हो, श्रीमती पिल्लै बेतहाशा हँसने लगीं, हँसते-हँसते उनका दम फूल गया।

’’आज तो अम बी नेई छोड़ेंगा!’’ - पिल्लै महाशय भी तोतली बोली में ही बोल रहे थे और उनकी आवाज़ इतनी तेज़ थी, मानो उनकी बीवी उनके पास न होकर दूसरे कमरे में हो।

धप्प’, ’उफ़्और हु-हु-हु-हुका यह क्रम रुक-रुक कर इतनी देर तक चला कि हम ऊब गये। जहाँ थोड़ी झपकी आने लगती कि उइ-आयकी एक तीखी आवाज कानों से घुस कर आँखें खोल देती।

मैंने और श्रीमतीजी ने यही समझा कि दोनों आज बेहद मूडमें हैं और इस कारण उन्हें लोक-लाज की परवाह नहीं रह गयी है। नयी-नयी शादी हुई थी उनकी, इसलिए हमने उन्हें माफ़ कर दिया।

पर उस दिन के बाद हर रात का यह सिलसिला बन गया। मैं चकित! पहले तीन दिन तो पूरी शांति रही थी, अब क्या हो गया इन लोगों को? समाधान श्रीमतीजी ने दिया - ’’उन दिनों वह छूत में थी। कपड़ेमैंने बाहर सूखते देखे थे।’’

और तब, एक दिन शाम को दफ़्तर से घर पहुँचते ही श्रीमतीजी ने बताया - ’’हद दर्जे के असभ्य हैं ये लोग तो! उस कमरे में बच्चों का जाना मुश्क़िल है!’’

’’क्यों, क्या हो गया है ऐसा?’’ - मैंने सावधानकी स्थिति में आते हुए पूछा।

जवाब मिला - ’’इनका पर्दा देखने में तो मोटा लगता है, पर कमरे में बत्ती जलने पर अन्दर की हर चीज़ धुंधले रूप में दिखाई पड़ती है बाहर से। आज दिन में ही क्या देखा कि पिल्लै नंग-धड़ंग अपनी बीवी के पीछे-पीछे दौड़ रहा है और वह बेशर्म केवल पेटीकोट पहने, ऊपर से बिल्कुल नंगी, भागी फिर रही है। अगर सुषमा ने, या कि कट्टू-बट्टू ने ही, देख लिया होता, तो? यह तो बड़ी बुरी बात है।’’   

बात श्रीमतीजी की ठीक थी। रात को हम उन्हें बर्दाश्त कर सकते थे, कर ही रहे थे, क्योंकि हमारी उम्र कच्ची नहीं थी; पर बच्चे यदि देखें यह सब, तो? मैंने कहा - ’’यह तो सचमुच बुरा है। कोई उपाय सोचना पड़ेगा।’’

’’हाँ, देखो न, दूसरी तरफ भी तो लोग रहते हैं, बोस-दम्पति की भी नयी-नयी ही शादी हुई है, पर ऐसा कुछ तो नहीं दिखाई पड़ता उनके यहाँ। यह तो अच्छा हुआ कि बच्चों का बेडरूम हमने उस तरफ रखा था, नहीं तो ...’’

’’ठहरो, शर्माजी से बात करूँगा इस बारे में। सोच-विचार कर ही कोई कदम उठाना अच्छा होगा। है कि नहीं?’’ मैंने कहा और श्रीमतीजी ने अपनी स्वीकृति जतायी।

पर शर्माजी से बात करने के पहले ही बात हो गयी श्रीमती शर्मा से। थोड़ी देर बाद ही किसी काम से श्रीमती शर्मा आयीं, तो श्रीमतीजी ने यह प्रसंग छेड़ दिया।

श्रीमती शर्मा बोलीं - ’’सच? फिर तो आप लोग मुफ़्त का सिनेमा देख रहे हैं। भई, हमें भी दिखाइये न किसी दिन!’’

यह लीजिए, आये थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास। श्रीमती शर्मा कहाँ निन्दा करतीं पिल्लै-दम्पति की, वे रस लेने लगीं उनकी बेहयाई में।

मैंने हँसते-हँसते कहा - ’’देखता हूँ कीलर कांड ने आपमें भी दिलचस्पी पैदा की है। ठहरिये, कहता हूँ शर्माजी से।’’

वे बोलीं - ’’अरे, वे तो और शौक़ीन हैं। बैठ जाएँगे आकर; कहेंगे, देख-सुन कर ही जाऊँगा!’’

’’फिर तो गये काम से।’’ मैं खिसियाई हँसी हँसा।

’’नहीं जी, आप ऐसा कीजिए, टिकट लगा दीजिए शो का। कलाकार मुफ़्त के, पूरा-का-पूरा मुनाफ़ा ही समझिए!’’

’’सुझाव बुरा नहीं है आपका!’’ - मैंने कहा - ’’लेकिन अगर बच्चों ने शो में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी, तो?’’ श्रीमती शर्मा गम्भीर हो गयीं, बोलीं - ’’हाँ, यह तो बुरी बात होगी।’’

’’फिर क्या करूँ? पिल्लै से कहूँ इस बारे में?’’ - मैंने पूछा।

जवाब मिला - ’’एकदम बेकार! कोई असर नहीं होगा उन पर। देखते नहीं, रात को उनका रेडियोग्राम कितना तेज़ बजता है। सोते हैं इस कमरे में और रेडियोग्राम रख छोड़ा है दूसरे कमरे में। फिर आवाज़ इस कमरे में साफ़-साफ़ सुनाई पड़े, इसके लिए पूरा वॉल्यूम ख़ोल देते हैं उसका। अब हमारा बेडरूम उसी कमरे के नीचे है, जिसमें रेडियोग्राम बजता है। धमक से सोना मुश्क़िल हो जाता है। कई बार शर्माजी ने कहा पिल्लै से, पर कोई असर नहीं। एक दिन यहाँ तक कह दिया कि मैं अपना ट्रांज़िस्टर दे देता हूँ आपको। अपने बेडरूम में लेट कर धीमे-धीमे सुनिएगा। पर जवाब क्या मिला, जानते हैं? ’ट्रांज़िस्टर तो मेरे पास भी है, पर उसकी आवाज़ का क्या मुक़ाबला रेडियोग्राम की आवाज़ से!अब बताइए, आप क्या कहेंगे?’’

सचमुच क्या कहेगा कोई ऐसे आदमी से! हम लोगों ने अपना भाग्य मान कर चुपचाप स्वीकार कर ली पिल्लै-दम्पति की बढ़ा-चढ़ी। फिर से मकान बदलने को हम तैयार न थे। आख़िर, दूसरे लोग भी क्या सोचते होंगे हमें बार-बार मकान बदलते देख कर!

लेकिन दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते होंगे, इसकी परवाह पिल्लै-दम्पति को, ख़ास कर श्रीमती पिल्लै को, एकदम नहीं थी। एक रात कोई साढ़े बारह बजे होंगे कि अकस्मात नींद ख़ुल गयी। श्रीमती पिल्लै बरस रही थीं - ’’बड़ा भारी पाइलट बना है। हवाई जहाज उड़ाता है। उल्लू का माफिक काम करता है। हम पूछता है, गाड़ी ले के कहाँ गया था तुम? जहाँ गया था, जाओ ओहीं। एतना रात को आता है। बाप का नौकर समझ रखा है। एतना खेयाल नेही कि घर में कोई एंतजार करता होगा। अब बोलता है, खाके आया है। हम तुम्हारा सराध करने को खाना बनाया था क्या? नहीं, तुम जाओ। जा के गाड़ी में सोओ। जाओ-जाओ, हम तुमको नहीं माँगता घर में। तुम अब्बी जाओ, निकल जाओ। ... ’’

पिल्लै महाशय बिल्कुल चुप, कोई आवाज़ नहीं। इतनी फटकार और गालियाँ सुन कर एक पिल्ला भी काँय-काँयकरता, या कम-से-कम कुँकुआता, लेकिन पिल्लै साहब तो पिल्लै साहब - उन्हें एकदम साँप सूँघ गया। दूसरी ओर, श्रीमती पिल्लै का भाषण जारी था, मानो एक बड़े श्रोता समुदाय को लक्ष्य कर बोल रही हों - ’’नहीं, हम बोल देता है। हमारा-तुम्हारा नहीं चलने सकता। तुम बेशक निकल जाओ। तुम आवारा है; एतना रात तक आवारा का माफिक घूमता है। हम कल तुम्हारा हिसाब साफ कर देगा। कोई खेयाल नहीं दूसरों का। निर्लज्ज ... ’’

उनके मुँह से ये शब्द सुन कर हमें पहली बार महसूस हुआ कि - दूसरों का ख़यालऔर निर्लज्जताजैसे शब्दों से वे भी अपरिचित नहीं हैं। मन में आया कि उठ कर कहूँ - ’’आप भी दूसरों का ख़याल न कर चिल्लाये जा रही हैं।’’ लेकिन कहा नहीं; सोचा, अभी सारा ग़ुस्सा मुझ पर उतर जाएगा सो चुपचाप पड़ा रहा। कोई आध घंटे तक उनका भीषण भाषण चला और तब उनकी थोड़ी शान्त आवाज़ सुनाई पड़ी - ’’लो, दूध पियो। ... उँह, गोस्सा किया है। ... तब बोलेगा नहीं? लो, दूध पियो। ... ऐसा काम काहे करता है? ... लो, दूध पियो। हमारा भी तो कुछ खयाल रखना चाहिए तुमको। ... लो, दूध पियो। ... उँह, बड़ा गोस्सा है कि! ... लो, दूध पियो। ... नहीं पिएगा? तो जाओ, जाके गाड़ी में सोओ। हम सोने नहीं देगा एहाँ। ... लो, दूध पियो। ... उँह, नहीं बोलेगा, गोस्सा है। बड़ा गोस्सावाला है। ... लो, दूध पियो।’’ पिल्लै महोदय ने अन्ततः दूध पिया या नहीं, मुझे नहीं मालूम - दूध पिलानेवाली की मनुहार सुनते-सुनते ही मुझे नींद आ गयी। सवेरे उठा, तो श्रीमतीजी ने, जो रात को मेरी ही तरह दम साधे सारा कांड सुन रही थीं, बताया कि पूरे कांड की जड़ थे उनके कपड़े’, जो पिछले तीन दिन से सूख रहे थे। 

यह सारा विवरण अगले दिन श्रीमती शर्मा ने सुना, तो हँसते-हँसते दोहरी हो गयीं, फिर दौड़ी-दौड़ी शर्माजी को बुला लायीं और मुझे पूरा वृत्तान्त एक बार फिर दुहराना पड़ा। उनका भी हँसते-हँसते बुरा हाल, बोले - ’’तो दूध पिया या नहीं पिल्लै ने?’’

’’क्या पता, पिला ही दिया हो। डाँट तो ऐसे रही थी, जैसे पिल्लै पति न हो कर छोटा बच्चा हो!’’ - मैंने जवाब दिया।

’’आख़िर, व्यायाम शिक्षिका है न।’’ - शर्माजी बोले - उससे जीतेगा पिल्लै? चाहेगी तो दाब कर घुट्टी पिला देगी।’’

’’अरे, पिल्लै भी वैसा ही है!’’ - श्रीमती शर्मा ने कहा - ’’देखा नहीं, जब गाड़ी ख़रीदने की सोच रहा था, तब क्या बोला था?’’

’’क्या बोला था?’’ - श्रीमतीजी ने उत्सुकता से पूछा।

श्रीमती शर्मा हँसने लगीं, हँसते-हँसते बोलीं - ’’कहने लगा - बॉडीकी मुझे परवाह नहीं; बस एंजिन ठीक होना चाहिए। शादी में भी, लगता है, उसने इसी सिद्धान्त का पालन किया है।’’

सुन कर ख़ूब हँसे हम। प्रतीक बड़ा अच्छा बिठाया था श्रीमती शर्मा ने। श्रीमती पिल्लै की बॉडीचाहे जैसी हो, एंजिन काफ़ी तगड़ा था, तीस हार्स पावर का। उनकी ज़ोर-ज़बर्दस्ती से यह बात सिद्ध हो जाती थी। चीखने-चिल्लाने में, वास्तव में, मुहल्ले-भर में उनका कोई सानी नहीं था। उनके यहाँ न तो कोई नौकरानी टिकती थी, न नौकर। और-तो-और, श्रीमती पिल्लै की माँ भी, जिनकी वे एकमात्र संतान थीं, जब कभी उनके घर आती थीं, रोकर ही जाती थीं। ऐसी स्त्री से उलझना, ज़ाहिर है, बुद्धिमानी की बात न थी। आधी-आधी रात को उनके भाषण से हमारी नींद टूट जाती, फिर भी हम कुछ न कहते। हर रात हमें लगता कि किसी कुलीन मुहल्ले में नहीं, वेश्याओं के मुहल्ले में रह रहे हैं, फिर भी चुप रहते। एक रात मैंने एक उपाय भी आज़माया - बत्ती जला कर खिड़की के सामने लिखने बैठ गया, ताकि वे निर्लज्जता-पूर्वक अपनी केलि-क्रीड़ा का प्रदर्शन न कर सकें, पर मुझे बुरी तरह हार माननी पड़ी - उस रात उनकी आवाज़ तो अन्य दिनों की अपेक्षा ऊँची रही ही, उनके आलाप-संलाप और क्रिया-प्रतिक्रिया का भी इतना वृहत् रूप सामने आया, कि उनकी हर गतिविधि घोरतम रूप में स्पष्ट होती रही। मैंने मान लिया कि जो-कुछ भी वे करते हैं, उसे चुपचाप बर्दाश्त कर लेने के सिवाय कोई उपाय नहीं है।

पर उस दिन बर्दाश्त की सीमा आख़िर टूट ही गयी। सुषमा की स्कूल फ़ाइनल परीक्षा सिर पर थी, सो वह हमारे सोने के कमरे में दरवाज़ा बन्द कर पढ़-लिख रही थी। शाम को अकस्मात् श्रीमती पिल्लै ने अपनी नौकरानी पर बरसना शुरू किया, और यह वर्षा जो शुरू हुई, तो मिनटों की सीमा पार कर घंटों पर पहुँच गयी। जब दो घंटे हो गये, तब सुषमा ने चिढ़ कर उनकी तरफ़ की खिड़की बन्द कर दी। बस, फिर क्या था! श्रीमती पिल्लै ने नौकरानी को छोड़ कर हमें अपना लक्ष्य बना लिया, चिल्लाने लगीं - ’’शान मारता है। मुँह पर जंगला बन्द करता है। जंगली कहीं का। ऐसा ही जंगली है तो जंगल में जा कर रहो - आदमी लोग का बीच में काहे को रहता है। बड़ा पढ़नेवाला बना है। सब पढ़ना ठीक कर देगा तुम्हारा। छोटा लोग है। नीच कहीं का। तुम्हारा जैसा कितना को देख लिया।’’ आदि-आदि।

रात को घर लौटा, तो श्रीमतीजी ने सारा कांड बताया।

मैंने पूछा - ’’तुम लोगों ने कोई जवाब तो नहीं दिया?’’

उत्तर मिला - ’’नहीं, हम लोग क्यों लगें उसके मुँह? हमें क्या पता नहीं कि कैसी औरत है।’’

’’हाँ, उसे मुँह न लगाने में ही भलाई है। छोड़ दो पागल को। जो चाहे, बका करे!’’ - मैंने कहा।

’’लेकिन आख़िर कब तक? हर बात की एक सीमा होती है।’’ - श्रीमतीजी का धैर्य जवाब दे रहा था।

’’तब क्या करोगी? फिर मकान बदलोगी?’’ - मैंने पूछा।

’’नहीं, मकान हम क्यों बदलेंगे? बदलना हो, तो वह बदले! मैंने उपाय ढूँढ़ लिया है।’’

’’उपाय?’’ - मैं चौंका - ’’क्या उपाय ढूँढा है?’’

श्रीमतीजी मुस्करायीं, बोलीं - ’’ये लोग रात को देर तक जागते है और सबेरे देर तक सोते हैं। खाना भी रात को ही बना कर फ्रि़ज में रख देते हैं। ... ’’

’’हाँ, तो इससे क्या हुआ?’’ मैं चकित।

’’आज हम रेडियो बच्चों के कमरे से हटा कर उस कमरे में लगा देते हैं।’’

’’फिर?’’

’’फिर क्या? हम सवेरे छः बजे से रेडियो बजाना शुरू कर देंगे। बस, देखना, मज़ा आ जाएगा।’’

’’ओ!’’ - मैं मतलब समझ गया - ’’लेकिन दूसरों को भी तो इससे परेशानी होगी।’’

’’उँह, इसकी चिंता मत करो तुम। सब लोग परेशान हैं उनसे। उन्हें ठीक राह पर लाने में हर कोई साथ देगा हमारा। श्रीमती शर्मा से मैं पहले ही बात कर चुकी हूँ। दरअसल, उन्हीं का सुझाव है यह!’’

’’फिर, ठीक है। करो ऐसा ही। देख लो, यह कर के भी!’’ मैंने अपनी सहमति दे दी।

अगली सुबह सचमुच बड़ा चमत्कारी परिणाम सामने आया। पूरे वॉल्यूम पर ख़ुले रेडियो ने पिल्लै-दम्पति को बेचैन कर दिया। श्रीमती पिल्लै गयीं ऊपर के तल्ले पर रहनेवाले अपने मकान-मालिक से शिक़ायत करने। मकान-मालिक पहुँचा शर्माजी के पास। शर्माजी ने पूरा विवरण दिया उसे, फिर मुझे भी बुलवा लिया वहाँ। मैंने पूरी रामकहानी सुना दी पिल्लै दम्पति की।

मकान-मालिक की भी सहानुभूति प्राप्त हो गयी हमें, किन्तु किया क्या जाए, यह उसकी समझ में न आता था, बोला - ’’किन्तु किसी को अपने घर में बात करने से कैसे रोका जा सकता है?’’

मैंने पूछा - ’’फिर किसी को अपने मकान में रेडियो बजाने से ही कैसे रोका जा सकता है?’’

तर्क ज़ोरदार था। उसे चुप हो जाना पड़ा।

अन्त में शर्माजी ने एक सुझाव दिया - ’’एक काग़ज़ पर शांति बनाये रखने और दूसरों की सुविधा-असुविधा का ध्यान रखने का प्रतिज्ञापत्र तैयार किया जाए और उस पर मैं, ये (यानी मैं), आप और पिल्लै हस्ताक्षर करें।’’

बात मकान-मालिक को पसंद आ गयी। शर्माजी ने तुरंत एक प्रतिज्ञापत्र तैयार किया और हम तीनों ने उस पर हस्ताक्षर कर दिये। फिर, मकान-मालिक ही उसे पिल्लै के पास ले गया, शायद उसे समझाया-बुझाया भी। पिल्लै ने हस्ताक्षर कर दिये और वह काग़ज़ वापस शर्माजी के पास आ गया।

इसके बाद, विश्वास मानिए, परिस्थितियाँ एकदम ही बदल गयीं। कहीं से न तो रेडियो का शोर सुनाई पड़ता, न रास-लीला का। श्रीमतीजी कभी-कभी कहतीं भी - ’’बेचारों का सारा खेल ही ख़त्म हो गया। अब तो उनलोगों की आवाज़ भी सुनाई नहीं पड़ती।’’

मैं व्यंग्य करता - ’’तुम्हें पाप चढ़ेगा!’’

’’सच, किस तरह तुतला-तुतला कर बात करते थे दोनों, जैसे आठ साल के बच्चे हों। बेचारों का मुँह ही बन्द हो गया।’’ - श्रीमतीजी के स्वर में पश्चाताप स्पष्ट हो जाता।

कभी-कभी रात को मुझे भी एक अभाव का एहसास होता। लगता, अभी-अभी पिल्लै-दम्पति की चोंचलेबाजी शुरू हो जाएगी, पर ऐसा होता नहीं। लगातार छः महीने तक जो आवाज़ें मैं नित्यप्रति सुनता आया था, उनसे, मैंने महसूस किया, मुझे लगाव हो गया है। पर अब उनसे पुनः अपना कार्यक्रम आरम्भ करने को तो कहा नहीं जा सकता था। दरअसल, उन्होंने अपना बेडरूम ही बदल लिया था - अब वे रेडियोग्रामवाले कमरे में ही, जिसकी बगल में कोई मकान नहीं था, सोने लगे थे।

कोई दो महीने इसी प्रकार बीते और तब डेढ़ महीने के लिए हम कलकत्ते से बाहर चले गये। जब लौट कर आये, तब सुना, इस-बीच बोस-दम्पति अपना फ़्लैट छोड़ कर चले गये और उनकी जगह एक नवविवाहित जोड़ी आ गयी है।

लेकिन इससे भी गम्भीर बात हमें अगले दिन बच्चों से सुनने को मिली। उन्होंने अपनी माँ को बताया कि रात इतना गुलगपाड़ा मचाते रहे बोस-दम्पतिवाले फ़्लैट के नये किरायेदार कि आधी रात तक वे सो न सके।

मेरे कान खड़े हो गये। निश्चय ही, पिल्लै-दम्पति की तरह हैं वे लोग भी और बच्चों का कमरा ठीक उनके सामने पड़ता है। मैंने श्रीमतीजी से कहा - ’’यह तो बहुत बुरा हुआ। एक पिल्लै से छुट्टी पायी, तो दूसरा पिल्ला आ पहुँचा। असभ्य लोग! गांगुली साहब (उस मकान के मालिक) से कहना ही पड़ेगा!’’

लेकिन श्रीमतीजी ने अगले ही क्षण बात काट दी - ’’नहीं-नहीं, किसी से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। क्या सोचेंगे लोग? फिर, बेचारों की नयी-नयी शादी हुई है। हम क्यों दे बाधा?’’      

’’फिर? बच्चों पर क्या असर पड़ेगा, कुछ सोचा है?’’ - मैंने थोड़ा खीझ कर प्रश्न किया।

पर वे शांत ही रहीं, बोलीं - ’’कोई असर नहीं पड़ेगा बच्चों पर। हम उनका कमरा बदल देंगे। वे हमारे कमरे में आ जाएँगे और हम उधर चले जाएँगे। बस, समस्या हल!’’ बोल कर वे मेरा मुँह ताकने लगीं।

दो पल मैं चुपचाप विचार करता रहा उनके प्रस्ताव पर, फिर रहस्य हाथ आते ही मुस्कुरा पड़ा - ’’, तो यह बात है!’’

और, जवाब में श्रीमतीजी ने केवल मुस्कुरा दिया। 

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