बुधवार, 30 सितंबर 2026

ग्लानि


यूँ तो कलकत्ता इतनी भीड़-भाड़वाला शहर है कि सियालदह, हावड़ा, बड़ाबाज़ार-जैसे इलाक़ों में पैदल चलने पर चमड़े-से-चमड़ा छिलने का भय रहता है तथा इतने शोरशराबेवाला शहर भी है कि अलसुबह फेरीवालों की पुकार से नींद खुलने के बाद दिन मोटरगाड़ियों के भोंपू, आंदोलनकारियों की नारेबाज़ी और फ़ुटबॉल खिलाड़ियों के समर्थकों के शोर से गुंजायमान रहता है और रवीन्द्र संगीत, टेलिविज़न कार्यक्रम, तथा औरतों के गला फाड़-फाड़ कर बच्चों को घर वापस बुलाने के कोलाहल में शाम होती है; लेकिन उसी कलकत्ता में कुछ ऐसे रिहाइशी मुहल्ले भी हैं जहाँ आराम से साँस ली जा सकती है और जहाँ चलने-फिरने में दूसरों की प्राइवेसी भंग करने का अंदेशा नहीं होता। वैसे, यह बात मैं पच्चीस-तीस साल पुराने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ, हो सकता है कि अब हालात बदल गए हों और कलकत्ता के सारे मुहल्ले खुले-खुले हो गए हों या एक भी मुहल्ला शांत-स्वच्छ न बचा हो।

बहरहाल, तो जैसा कि मैं पहले ही अर्ज़ कर चुका हूँ, यह वाक़या कोई पच्चीस-तीस साल पुराना तो होगा ही। उन दिनों कलकत्ता के लेक गार्डन्स में क़रीने से बनी साफ़-सुथरी लेकिन सँकरी सड़कों के दोनों तरफ़ तीन-चार मंज़िले मकानों में मध्यम वर्ग के लोग रहते थे जिन्हें आम बंगाली भद्रलोग कहते हैं। मेरा दफ़्तर वहीं एक रिहाइशी मकान की निचली मंज़िल पर था और उससे सात-आठ सौ मीटर दूर एक मकान में मेरा घर था। घर के ठीक पीछे सब्ज़ी और रोज़ की ज़रूरतों के सामान का बाज़ार था। बच्चों की स्कूल बस घर से सौ मीटर दूर उन्हें ले-छोड़ जाती थी।

ग़रज़ यह, कि अपने ठाठ थे। सुबह उठे, चाय पी, तैयार हुए, नाश्ता किया, और ख़रामा-ख़रामा टहलते हुए दस बजे दफ़्तर पहुँच गए। डेढ़-दो बजे घर में गर्म-गर्म खाना खाकर और दफ़्तर में सात-साढ़े सात तक काम करने के बाद फिर घर में! हफ़्ते में तीन-चार दिन ग्राहकों से मिलने उनके दफ़्तर जाने के बावजूद मेरी दिनचर्या में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था। अब उसी ग्राहक से हर हफ़्ते-पंद्रह दिन में मिलने से कुछ हासिल होने वाला तो नहीं था, बल्कि उसके काम में बाधा पड़ने का ही डर था। दूसरे, हर शनिवार या सोमवार किसी-न-किसी हड़ताल की वजह से कलकत्ता में कामकाज ठप रहता था।

दफ़्तर के काम से बाहर जाते समय मेरा सहयोगी भी साथ होता था और हम टैक्सी लिया करते थे। इस चक्कर में होता यह था कि मेरी मोटरगाड़ी चुपचाप खड़ी-खड़ी मुँह बिसूरती रहती थी। मुझे चिन्ता होती, इस्तेमाल में न आने से कहीं उसके अस्थि-पंजर ढीले न हो जाएँ, बैटरी न बैठ जाए। लेकिन एक तो घर से दफ़्तर या बाज़ार के बीच मोटरगाड़ी चलाने लायक दूरी और सड़क का अभाव और दूसरे कलकत्ता पुलिस का ग़ैर-बंगाली नम्बरप्लेटवाले वाहनों को दण्ड देने का चलन मुझे मोटरगाड़ी से वैसे ही दूर रखता था जैसे मधुमेह का रोगी चाह कर भी गर्मागर्म जलेबी नहीं खाता।

बंगाल में गाड़ी के पंजीकरण के लिए आवेदन दिए तीन महीने से ऊपर हो चुके थे, किन्तु वहाँ के ऑटोमोबाइल असोसिएशन के अधिकारियों के हिसाब से ऐसे कामों में वक़्त लगता ही है। उन्होंने सलाह दी थी कि पंजीकरण होने तक मैं दुर्गा के नाम का जाप करता हुआ मुहल्ले में ही मोटर चलाऊँ, क्योंकि वहाँ ट्रैफ़िक पुलिसवाले पर नहीं मारते। मरता क्या न करता! उनकी सलाह आत्मसात कर मैं हफ़्ते-दस दिन में एक बार मोटरगाड़ी सुबह सात के क़रीब निकालता और उसे आधा घंटा इधर-उधर की हवा खिला कर वापस आ जाता।

उस दिन भी मैं मोटरगाड़ी को मुहल्ले की सैर करा कर घर लौट रहा था। जब आप एक ही मोटरगाड़ी को कई साल चला चुके हों और रास्ता जाना पहचाना हो, तो गाड़ी चलाने में कोई ख़ास कोशिश नहीं करनी पड़ती। वह ख़ुद-ब-ख़ुद तेज़-धीमी होती है, दाएँ-बाएँ मुड़ कर गड्ढों से बच लेती है, और गंतव्य पर पहुँच कर रुक जाती है। तो, मोटरगाड़ी अपनेआप चल रही थी और मैं सामने पड़े दिन के कामकाज की योजना बना रहा था। मेरे आगे एक साइकिलरिक्शा जा रहा था। मेरे हाथ ने अपनेआप हार्न बजा दिया। अगर वह सड़क की बाईं तरफ़ हो जाता तो मैं गाड़ी आगे निकाल सकता था। लेकिन रिक्शे पर कोई असर न हुआ, वह पाँच किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से ख़ाली सड़क छेंक कर रेंगता ही रहा। मैंने फिर थोड़ा लम्बा हॉर्न बजाया, लेकिन रिक्शावाले के कानों पर जूँ तक न रेंगी। मैंने बेसब्री में बार-बार हॉर्न बजाना शुरू किया पर नतीजा ढाक के उन्हीं तीन पात से अधिक कुछ न निकला। सड़क के दोनों ओर की इमारतों की बालकनियों से भद्रलोग और भद्रमहिलाएँ नीचे ताकने लगे और मैं चींटी की रफ़्तार से चल रहे रिक्शे के पीछे सिसकती मोटर में झींकता रहा।

मामला दो-चार मिनट बदस्तूर जारी रहने के बाद मुझे रिक्शावाले की हिमाक़त पर ग़ुस्सा आ गया। माना कि बंगाल में साम्यवादी शासन था, पर उसका मतलब यह तो नहीं था कि हर मोटरकार के लिए किसी-न-किसी रिक्शे के पीछे चलना ज़रूरी था। एक स्थान पर सड़क जैसे ही ज़रा चौड़ी हुई, मैंने तेज़ रफ़्तार से गाड़ी लहराई और रिक्शे के दाहिने मडगार्ड को घिसते हुए उसके आगे ऐसे ब्रेक मार कर रोक दी जैसे सिनेमा में  पुलिसवाले करते हैं। बिजली की तेज़ी से बाईं तरफ़ का शीशा नीचे कर मैंने आग्नेय नेत्रों से रिक्शे की ओर देखा। रिक्शेवाला रिक्शे से उतर घबराहट में काँपने लगा। वह छरहरे बदन का था। उसकी उम्र अठारह-उन्नीस साल रही होगी। उसका रंग कभी गोरा रहा होगा, पर धूप और धूल-धक्कड़ में मशक्कत ने उसका रंग ताँबई कर दिया था। उसका चेहरा लाल पड़ चुका था। वह गिड़गिड़ा कर मुझसे ऐसे इशारों में माफ़ी माँगने लगा, जैसे गूँगे-बहरे मरीज़ करते हैं।

मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया। मैंने उसे नमस्कार किया और चुपचाप गाड़ी आगे बढ़ा ली। वह घटना जब भी याद आती है, मुझे ग्लानि का बोध सताता है। आर्थिक-सामाजिक मजबूरियाँ किस तरह लोगों को अपनी और दूसरों की जान दाँव पर लगा देने को मजबूर कर देती हैं! रिक्शे पर मोटरगाड़ी की प्रभुता कैसे एक इंसान को दूसरे का दमन करने का हक़ दे देती है!

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

बेशरम दिल है

 

उसकी याद आती है और दर्द उभर आता है
धड़कनें बढ़ती हैं और चेहरा उतर जाता है

जिसको गोदी में खिलाया कभी मैंने बरसों
अब वो बच्चा मेरे पास आने में घबराता है

कभी आओ न इधर घर मेरा ये कहता है
इस बियाबान में अब कोई नहीं आता है

वो चमन भी कभी गुलज़ार हुआ करता था
जिसकी शाख़ों पे यूँ फैला हुआ सन्नाटा है

थक रही नब्ज़ का ख़ूँ सर्द हुआ जाता है
बेशरम दिल है धड़कता ही चला जाता है

कौन समझा नहीं और किसने हमें छोड़ दिया
ऐसी बातों में ही अब वक़्त गुज़र जाता है


रविवार, 13 सितंबर 2026

अपने हमदम थे

अपने हमदम थे पर अब दूर हुए जाते हैं

लोग मिलते नहीं कतरा के निकल जाते हैं

 

गले तो मिलते हैं पर दिल कहाँ हैं मिल पाते

रंग चेहरे के हमें देख उतर जाते हैं

 

वो जो इंसाँ को हमेशा बचा के रखत था

आज हम उसकी हिफ़ाज़त की क़सम खाते हैं

 

बड़े अरमान से भेजा था जिसे पढ़ने बाहर

बाप अब उसके लिये क़फ़्न लिये आते हैं

ये अलग दौर है ख़ामोश ही रहना अच्छा

सब यहाँ ख़ून के प्यासे ही नज़र आते हैं

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

पंद्रह अनूदित लघुकथाएँ



1 - जूते

लेखक: (संभवतः) अर्नेस्ट हैमिंग्वे

 

घर के पुराने सामान में बिकाऊ हैं नवजात शिशु के जूते (जो कभी इस्तेमाल न हो सके)

 

2 - चूक

लेखक: (संभवतः) ओ हेनरी

 

चालक होठों में सिगरेट दबाए गाड़ी में पेट्रोल जाँचने लगा। मृतक तेईस वर्ष का था।

 

3 - कौन?

लेखक: (संभवतः) फ्ऱेडरिक ब्राउन

 

सृष्टि का अंतिम व्यक्ति कमरे में बैठा था। किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

 

4 - आपबीती

लेखकः अज्ञात

 

कभी मेरे कपड़ों पर सिलवटें और चेहरे पर चमक थी। अब उसका उल्टा हो गया है।

 

5 - हत्यारा

लेखिका: (संभवतः) जेन ओरविस

 

रीता की नृशंस हत्या के बाद कार्टर की दुनिया खिड़की के पार सिमट कर रह गई है। टेलिविज़न, किताबों, और पत्रों की छोड़िए, उसे तो इसकी भी परवाह नहीं कि उसका भोजन कौन पहुँचाता है और ख़र्च कैसे चलता है। गाड़ियाँ आती-जाती रहती हैं, लोग चहलक़दमी करते रहते हैं, मौसम बदलते रहते हैं, मगर रीता की याद में मग्न कार्टर कमरे से बाहर ही नहीं निकलता। वह तो यह भी महसूस नहीं कर पाता कि उसके कारावास में खिड़की है ही नहीं।

 

6 - दुर्घटना

लेखक: अज्ञात

 

पुराने सामान में बिकाऊ है बिना इस्तेमाल हुआ पैराशूट (जिस पर थोड़े दाग़-धब्बे लगे हैं)।

 

7 - बचने की क़ीमत

लेखक: (संभवतः) ऑगस्ट सालेमी

 

आँख-चुँधियाती हेडलाइट, टकराहट की कर्कश ध्वनि, होश भुला देनेवाली पीड़ा, और उन सबके बाद ऊष्ण नीला प्रकाश। ऊर्जा स्रोत की ओर बढ़ते जॉन को मुक्ति, नवजीवन, तथा असीम सुख का आभास होने लगा था; लेकिन अँधेरा और उत्कंठा लौट आईं। उसने पलकें मिचमिचाईं। नलियों, पट्टियों और प्लास्टर के बीच उसके दोनों पैर कट चुके थे।

पत्नी ने सुबकते हुए कहा, “उन्होंने तुम्हें बचा लिया, प्रियतम!”

 

8 - सहयात्री

लेखक: अज्ञात

 

“क्या आप भूत-प्रेतों में विश्वास रखते हैं?” सहयात्री ने घंटों की निस्तब्धता भंग की।

“नहीं,” डिब्बे में सवार एकमात्र दूसरा व्यक्ति किताब से आँखें हटाए बिना भुनभुनाया।

“मैं भी नहीं करता,” कहते हुए सहयात्री हवा से तेज़ रफ़्तार से चलती गाड़ी से ऐसी सहजता से नीचे उतर गया, मानो वह रुकी हुई हो।

 

9 - तिरस्कार

लेखिका: (संभवतः) लरिसा कर्कलैण्ड

 

हम दो प्रेमियों के बीच दो वर्षों से तीसरा कोई नहीं था। शानदार रेस्त्राँ में उस चाँदनी रात झिलमिलाती मोमबत्तियों के बीच भोजन के दौरान उसके मनमोहक लिबास, रेशम-सी नर्म ज़ुल्फ़ों, नशीली निगाहों, और दबी-दबी मुस्कान ने इंगित कर दिया, वही सबसे बेहतर मौक़ा था। लोगों की परवाह न करते हुए मैंने शैम्पेन मँगाई, एक घुटना ज़मीन पर टिकाया, तथा जेब से हीरे की अँगूठी निकाल मुस्कुराते अधरों और काँपते स्वर में प्रेमयाचना कर ही डाली।

वह बोली, “पागल हो गए हो क्या? हर्ग़िज़ नहीं!”

 

10 - काया परिवर्तन

लेखक: (संभवतः) चार्ल्स एनराइट

 

हादसा होते ही मैं पत्नी को सूचना देने घर भागा, लेकिन उसने मुझे देखकर भी नहीं देखा, रोज़मर्रा के काम करने और टीवी देखने में ही उलझी रही।

फ़ोन की घंटी बजी। बात करते-करते उसका चेहरा उतर गया, आँसू बहने लगे।  

11 - मुफ़लिसी का संतोष

लेखक: (संभवतः ऐनड्र्यू ई हन्ट)

 

भीख में मिले कम्बल ओढ़ते ही उसके कन्धों में ठंड लगनी बन्द हो गई थी। सुबह कूड़ेदान में मिले जूते उसके पैरों की नाप के ही थे। सड़क पर जलती बत्तियाँ हाड़-कँपकँपाती ठंड में गर्मी का अहसास दिला रही थीं। पार्क की बेंच की गोलाई उसकी थकी पीठ को नर्म सहारा दे रही थी। उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया। ज़िन्दगी में भला और क्या चाहिए!

 

12 - सौदा

लेखक: (संभवतः) ब्रायन नीवेल

 

शैतान का साया दूर हो रहा था, पर दोनों लड़के उसकी चुभती नज़र अब तक महसूस कर रहे थे।

“क्यों? आख़िर वह क्या चाहता था तुझसे?”

“मेरी आत्मा! और, तुझसे?”

“पे-फ़ोन के लिए सिक्का। उसको तुरन्त फ़ोन करना है कहीं।“

“भूख लग रही है। कुछ ख़रीद कर खा लें?”

“भूख तो मुझे भी लग रही है, पर सारे पैसे तो वह ले गया।“

“फ़िक़्र मत कर, मेरे पास सिक्के-ही-सिक्के हैं।“  

 

13 - मौत का शिकंजा

लेखक: (संभवतः ऐलन ई मेयर)

 

हल्का-हल्का होश आया। मेरा हर अंग दर्द से टूट रहा था। बिस्तर के पास खड़ी नर्स ने कहा, “मिस्टर फ़ूजिमा, आप भाग्यशाली हैं जो दो दिन पहले हिरोशिमा की बमबारी में ज़िन्दा बच निकले। अब आप चिकित्सालय में पूर्ण सुरक्षित हैं।“

बेहोशी में डूबता-उतराता मैं फुसफुसाया, “मैं कहाँ हूँ?”

“नागासाकी में,” उसका उत्तर था।

 

14 - असमंजस

लेखक: (संभवतः जे रिप)

 

क्रोध और प्रेम के जाल में किंकर्तव्यविमूढ़ हम प्रेमी युगल ने अपने भविष्य का फ़ैसला सिक्के की उछाल पर छोड़ दिया—हेड आने पर विवाह, टेल आने पर सम्बन्धविच्छेद।

सिक्का उछला, नाचा, झूमा, और हेड पर थम गया।

हम दोनों ने असमंजस से देखा और एकसाथ कहा, “तीन में से जो दो बार आए, उसे मानना ठीक रहेगा।“

 

15 - सच्चाई

लेखक: (संभवतः रॉबर्ट टॉम्पकिन्स)

 

उसकी सच्चाई की खोज एक सुदूर गाँव की टूटी-फूटी झोंपड़ी में जाकर पूरी हुई। बुझते अलाव के सामने फटे-पुराने वस्त्रों में बैठी सच्चाई उसकी कल्पना से भी अधिक वृद्ध और कुरूप थी। 

“क्या आप ही सच्चाई हैं,” उसने पूछा।

सच्चाई ने सिर हिलाकर हामी भरी।

“जगत के लिए आपका क्या संदेश है? लोगों से आपके बारे में क्या कहूँ?”

“उन्हें बताओ, कि मैं कितनी जवान और ख़ूबसूरत हूँ!”

सोमवार, 29 जून 2026

होली

 

पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं फ़िल्मी गीतों को पिरोतीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट में से ’हवा’, ’बरसात’ और ’शाम’ पिछले सप्ताह आपकी नज़र हो चुकी हैं। आज पेश है वह स्क्रिप्ट जो 18 मार्च, 2003 को प्रसारित हुई थी। आज की स्क्रिप्ट में गीतों का स्थान रिक्त है, ताकि आप अपनी पसन्द का उपयुक्त गाना वहाँ रख सकें।

 

होली

(प्रसारण अवधि 44 मिनट, प्रसारण समय संध्या पाँच के बाद और आठ बजे से पहले)

 

(गुनगुनाते हुए) यूँ तो हमने लाख हँसी देखे हैं, तुमसा नहीं देखा! … अजी, चौंकिए नहीं, ये गीत हम आप ही के लिए गुनगुना रहे हैं। ज़रा ग़ौर कीजिए, आज कितनी बार रंग से सराबोर हुए, कितनी बार दूसरों को भिगोया, रंग कभी आँखों में घुसा तो कभी कानों में, पर मानना पड़ेगा! थक कर चूर होने की बजाय आप खिसक आए हैं रेडियो के क़रीब। ये चाहत ही तो है आपकी जो हमें बार-बार खींच लाती है आपके पास और जिसकी वजह से होली के इस होली-होली ऐटमस्फ़ीयर में हम हो लिए हैं आपके साथ ‘शीर्षक संगीत’ के चंद नग़मे और ढेर सारी बधाइयाँ लेकर। आज तो, भाई, होली पर ही गीत बजते रहने चाहिएँ। क्यों, क्या ख़याल है?

 

गीत 1:

होली के हुड़दंग से भला कौन बच सका है? हमने ऐसे बहुत से महारथी देखे हैं जो महीना-भर पहले ढिंढोरा पीटते हैं कि वे होली नहीं खेलेंगे, पर होली के दिन दोपहर बारह बजते-न-बजते रंगों में ऐसे सने-पुते नज़र आते हैं कि पहचान में ही नहीं आते। एक कान हरा तो दूसरा लाल, दाँत काले तो बाल जामुनी! ऐसे टेक्नीकलर बन जाते हैं कि ईंट से घिस-घिस कर रंग छुड़ाया जाए तो भी शायद एक सप्ताह तो गुज़र ही जाए उनकी असली रंगत नुमायाँ होने में। और, तन से भले ही छूट जाए, मन से कहाँ मिट पाता है होली का रंग!

गीत 2:

एक बात सच-सच बताइएगा! आज आपने किस-किसके साथ होली खेली? मेरा मतलब है, मौक़ा देखकर कहीं किसी ख़ास के साथ छुप कर तो होली नहीं खेली? अरे, शरमाइए नहीं, घबराइए भी नहीं, हम किसी को बताने थोड़े-ही जा रहे हैं! बस, आपकी चोरी पकड़ रहे थे और पकड़ भी ली! चलिए, माफ़ किया इस गीत के साथ।

गीत 3:

अरे, आपका चुपके से होली खेलनेवाला राज़ क्या खोल दिया, आप तो एक्स्ट्रा लाल हो गए! चलिए, आप भी क्या याद करेंगे, हम भी अपना एक राज़ ज़ाहिर किए देते हैं सिर्फ़ आपके आगे। वैसे तो हम डायटिंग करते हैं, रोज़ अपना वज़न तौलते हैं, पर आज पता नहीं कौन-सा कीड़ा काट गया कि हमने सुबह से इतने सारे पापड़, गुझिया, चिप्स, दही बड़े, गुलाब जामुन और मालपुए खा डाले हैं कि भूखी भैंस भी शर्मा कर, रंभा कर, और खाने से इन्कार कर देती। लेकिन हम नहीं माने। आप से बतियाने से पहले दो गिलास ठंडई और ढाल आए हैं कि गला तर रहे। अब अगर आपने ठंडई नहीं पी तो हम क्या करें? चलिए, ये गाना सुन लीजिए। इसमें भी ठंडई का मज़ा है।

गीत 4:

आज लोगों का होली खेलने का अलग-अलग स्टाइल देखने को मिला। कोई बड़ी मेहनत से टेसू के फूलों का रंग निकाल रहा था तो कोई मेंहदी घोल रहा था, किसी का दिल एनामेल पेन्ट पर क़ुर्बान हो रहा था तो कोई विशुद्ध कीचड़ का प्रयोग कर धन्य हो रहा था। अब हमें ये तो नहीं पता कि होली खेलने का आपका स्टाइल कौन-सा है, पर हमारा स्टाइल भी बड़ा स्पेशल था। बताएँ? अच्छा, बताते हैं। हमने सिर पर शावर कैप पहना, चेहरे और हाथों पर लोटा-भर सरसों का तेल मला, और ढेर सारा सूखा रंग रख दिया टेबिल फ़ैन के आगे। जैसे ही कोई पास आता, हम चुपके से फ़ैन चला देते, और रंग की परत ऐसे चढ़ जाती कि स्प्रे पेंट करनेवाले भी दंग रह जाएँ। आज का दिन तो गुज़र गया लेकिन देखिए, होली कल भी है। इस समझदारी से खेलिएगा कि भीगनेवाले के मुँह से वाह निकले, आह नहीं। 

गीत 5:

आप भी हैरान होंगे, आज हमें हो क्या गया है! क्या करें, होली का माहौल ही ऐसा है। लेकिन होली में इतना बावला भी नहीं होना चाहिए कि होश ही गुम हो जाएँ। न ही इतना भीगना-भिगोना चाहिए कि बुख़ार चढ़ जाए। अब देखिए न, इन्हीं दिनों आसपास इधर-उधर रिंकी-पिंकी, चुन्नू-मुन्नू, सबके इम्तहान भी तो चल रहे हैं! होली तो हर साल आएगी, पर इस साल का इम्तहान दोबारा देने की नौबत नहीं आनी चाहिए। पर्चा ऐसे मज़े में निकलना चाहिए जैसे मज़े में ये गाना गाया जा रहा है।  

गीत 6:

भला देखिए तो, आधे घण्टे से ज़्यादा हो गया आपकी कम्पनी में और पता ही नहीं चला! ये तो अच्छा हुआ कि मच्छर उड़ाने के चक्कर में घड़ी पर नज़र पड़ गई वरना हम न जाने कब तक बकर-बकर करते रहते। आज शाम कितने सारे लोग घर आने वाले हैं, हमको कितने लोगों से मिलने जाना है, गिले-शिक़वे भुला कर मुस्कुराहटें बिखेरनी हैं। तो चलें? बस ये वायदा लिए जा रहे हैं कि आप भी आज से सिर्फ़ मुस्कुराहटें बिखेरेंगे, शिक़वे भुला देंगे, और याद रखेंगे आज की ये शाम जिसे आपकी [नाम] ने सजाया था कुछ बेहतरीन नग़मों से। फ़िल्में थीं …..। और जाते-जाते नज़र करते हैं फ़िल्म … का यह गीत 

गीत 7:


रविवार, 28 जून 2026

रेलगाड़ी

                                                      बाहर दालान था

पीछे खलिहान था

पेड़ थे, चिड़ियाँ थीं

ताल था, मछलियाँ थीं

 कोस-भर दूर से रेल गुज़रती थी

सोंधी भाप घर उतरती थी

क्षितिज पर सियाह लकीर खिंच जाती

बहन उसे देखने बाहर आ जाती

 

’लेलगाली’, वह तुतलाती

’रेलगाड़ी’, दादी समझातीं

दादा बहलाते, रेलगाड़ी देखने चलोगे?

उस पर चढ़ोगे?

 

मैं झिझकता, मन तो करता है

पर, दादाजी, दिल डरता है

रेल पर चढ़ूँ और वो ऐसी चले

कि फिर रोकने से भी न रुके

 

फिर क्या होगा?

तब तो मैं बहुत पछताऊँगा

आप-सब को

दोबारा कैसे देख पाऊँगा?

 

दादा मुस्कुराते

ऐसा कैसे हो जाएगा?

तेरा दादा

तुझे बचाएगा

 

घर-खलिहान में आग लगी

न दादा बचे, न दादी बचीं

हम रात-रात जागे

खेत-खेत भागे

 

बाबूजी ने काँधे पर उठाया

खिड़की से अन्दर पहुँचाया

मन बहुत घबराया

पर मैं कुछ न बोल पाया

 

भीड़ में सैंकड़ों दब गए

बहन-माँ नीचे रह गए

बस, इतनी तसल्ली थी दिल को

बाबूजी रेल पर चढ़ गए

 

रेल चलते ही तलवारें चलने लगीं

हर तरफ़ रक्त की धार बहने लगी

मैं लाशों के गट्ठर तले छुप गया

                                                            
                                                              
                                                              मैं नौ साल की उम्र में मर गया