“ज़रा इसमें पानी भर देना,” पिताजी ने कटोरी देते हुए कहा।
वे कमरे के एक कोने में दरी बिछा रहे थे। फ़र्श पर मोज़ैक के छोटे-छोटे
काले-सफ़ेद पत्थर जड़े थे। दरी से जगह-जगह उधड़े धागे इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह
कई साल पहले हथकरघे पर बुनी गई थी। पिताजी ने दरी कुछ इस चतुराई से बिछाई कि अधिकांश
फटे हिस्से छुप गए। उस ज़माने में दूसरों की कमज़ोरी उजागर करना बुरा समझा जाता था। निष्प्राण
दरी की लाज ढाँप कर पिताजी लोक धर्म निभा रहे थे।
मैं नाख़ून से कटोरे की सतह खुरचता रसोईघर की ओर बढ़ा। उस पर साबुन
की परतें जम-जम कर इतनी मोटी हो गई थीं कि मेरे लिए उसके वास्तविक रंग का अंदाज़ लगाना
नामुमक़िन था। नाखून से खुरचने पर उन मुलायम परतों से जमा हुआ साबुन आसानी से उधड़ने
लगता था। पिताजी दाढ़ी बनाते समय रह-रह कर कटोरे के पानी में रेज़र घुमा कर उसमें फँसे
बाल निकालते और उसकी दीवार से रेज़र टकरा कर उसमें जमा फ़ालतू पानी गिराया करते थे। वैसा
करते समय टन्-टन् की आवाज़ होती और पानी तथा झाग की बूँदे आसपास फैल कर विभिन्न आकार
बना जाती थीं। मैं उनमें जानवरों का अक़्स ढूँढ़ता। मोज़ैक के काले पत्थर अक्सर उन आकृतियों
की आँख-नाक का रूप अख़्तियार करते। जानवर न भी मिलें, तरह-तरह के बादल तो दिख ही जाते
थे मुझे। दाढ़ी बनाने के बाद पिताजी कटोरे को पानी से खंगाल कर उस डिब्बे में वापस रख
देते थे जिसमें उनका दाढ़ी बनाने का बाक़ी सामान--ब्रश, साबुन की टिकिया, फिटकरी, ब्लेड, वगैरह--रहता था। शेष बर्तनों
के विपरीत, इस्तेमाल के बाद साबुन के घोल में रोज़ नहानेवाले उस कटोरे को कभी राख से
माँजा नहीं जाता था। ठीक भी है, थानेदार की तलाशी कौन लेता है?
वह कटोरा ज़रूर अलुमिनियम का रहा होगा। ताँबे, काँसे, या पीतल का
कटोरा पिताजी दाढ़ी बनाने के लिए थोड़े ही इस्तेमाल करते! और अगर करना भी चाहते, तो माँ
उसे खाना परोसने के लिए ले न लेतीं? हम पाँच प्राणियों के घर की रसोई चार अलहदा क़िस्म
के कटोरों में परोसी जाती थी। काँसे के बड़े, बंगालीनुमा मुँहवाले कटोरे पर पिताजी का,
उससे ज़रा छोटे ताँबे के कटोरे पर दीदी का, पीतल के दो छोटे-छोटे कटोरों पर दीदी से
छोटे हम दोनों भाइयों का, और स्टील के कटोरे पर माँ का अघोषित सर्वाधिकार सुरक्षित
था।
माँ रसोईघर में पीढ़े पर बैठी थीं। सामने जलते चूल्हे पर कड़ाही में
कुछ पक रहा था, जिसे माँ ने पीतल की परात से ढँका हुआ था और उस पर छलछलाए फेन को छोलनी
से निकाल रही थीं। बगल में नल था जिसके नीचे जूठे बर्तन पड़े थे। माँ ने बैठे-बैठे ही
हाथ बढ़ा कर कटोरी में पानी भरा, और मुझे देते हुए ताक़ीद की, “सम्हाल कर ले जाना, गिराना
मत!”
मैं इतने बड़े दायित्व को अंजाम देने में ग़फ़लत करने की जुर्रत कर
भी नहीं सकता था। रसोई से कमरे के बीच कहीं भी अगर पानी छलक जाता, तो माँ का काम बढ़
जाता, वे पिताजी को अगली बार से ख़ुद कटोरी भरने को कह देतीं, और फिर मैं पिताजी की
मदद करने से महरूम रह जाता। मैं अब कोई छोटा बच्चा थोड़े ही था, तीन साल से ऊपर की उम्र
हो चुकी थी मेरी। हर इतवार को दाढ़ी बनाने में उनकी मदद किया करता था।
मैंने दोनों हाथों में कटोरा थामा और उसे लेकर कमरे की ओर कुछ वैसे
ही बढ़ा जैसे दुल्हन जयमाला लिए धीरे-धीरे बढ़ती है। माँ शायद मुझे देख कर मुस्कुराईं,
पर मेरा ध्यान कटोरी पर केन्द्रित रहा। उधर, पिताजी फ़र्श पर सामने आईना टिका चुके थे
और बालिश्त-भर के उस दर्पण में अलग-अलग कोणों से अपना प्रतिबिम्ब निहार रहे थे। उनके
हाथ के सिगरेट में अभी तीन-चार कश-भर जान बाक़ी थी। मैं जानता था, जब तक सिगरेट ख़त्म
नहीं हो जाएगी, वे चेहरे का मुआयना, उस पर पड़े दाग़-झाइयों का विश्लेषण, और अलग-अलग
मुद्राओं का अभ्यास करते रहेंगे, विभिन्न तरीक़ों से बाल सँवारते रहेंगे।
वे मुझे सुंदर लगते थे। एक बार उन्होंने पूछा था, “हम शशि कपूर जैसे
दिखते हैं न?”
मैं शशि कपूर को नहीं जानता था, इसलिए चुप रह गया था। घर में ‘माधुरी’
और ‘फ़िल्मफ़ेयर’ सहित कई पत्र-पत्रिकाएँ और किताबें आती रहती थीं, लेकिन मैं ‘इंद्रजाल
कॉमिक्स’ के वेताल, ‘पराग’ के कथाकार अवतार सिंह के किरदार राजू-मुन्नू-पिंकी, ‘चन्दामामा’
के विक्रमार्क, ‘धर्मयुग’ के ढब्बूजी, और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के ‘मुसीबत है’ के
आगे यदाकदा ही बढ़ पाता था।
मैंने पानी भरा कटोरा पिताजी के दाहिने हाथ की तरफ़, ब्रश और रेज़र
के समीप, रख दिया। उन्होंने फू-फू कर जल्दी-जल्दी दो-तीन कश लिए और सिगरेट को ऐश ट्रे
के सुपुर्द कर दिया। मैं सामने पलंग पर बैठ कर उन्हें देखने लगा। उनके चेहरे पर सिगरेट
के सिलेटी-नीले धुएँ के धागे-से लहरा कर गड्ड-मड्ड हो रहे थे। उन्होंने साबुन की डिबिया
का ढक्कन खोल कर अंदर गीला ब्रश चार-पाँच बार घुमाया, और फिर उसे चेहरे पर ‘पचाक-पचाक’
की आवाज़ के साथ मलने लगे। थोड़ी ही देर में उनके गाल और गले पर सफ़ेद झाग के नन्हे-नन्हे
पहाड़-से बनने लगे। ब्रश ने उनके चेहरे और गले पर कई बार दायें से बायें, बायें से दायें,
नीचे से ऊपर, और ऊपर से नीचे यात्रा की और इसी क्रम में कई पर्वत बना-बिगाड़ दिए। आईने
में मुआयने के बाद पिताजी आश्वस्त-से लगे। उन्होंने ब्रश नीचे रख दिया और रेज़र उठा
लिया।
वे तरह-तरह की भंगिमा में मुँह फुला-बिचका-सिकोड़ कर दाढ़ी बनाते रहे
और मैं उन्हें अपलक देखता रहा। पहाड़ी रास्तों पर चढ़ती-उतरती जीप की तरह रेज़र झाग की
पहाड़ियों के दर्रों-घाटियों से गुज़रता और पिताजी की साफ़ त्वचा झलकने लगती। यह सारा
कमाल रेज़र में लगे ब्लेड का होता था, और इसीलिए वह मेरी जिज्ञासा का विषय रहता था।
ब्लेड दोहरी पैकिंग में आते थे। पहले उन पर मोमजामे-सा सफ़ेद काग़ज़ लिपटा होता था, और
उसके ऊपर रंगीन काग़ज़ जिस पर बहुत कुछ छपा रहता था। ब्लेड पर नाम और चिन्ह चाहे जो हो,
उनके अंदर कटे खाँचे एक-समान होते थे, और प्रत्येक ब्लेड की अलग-अलग धार के पास एक,
दो, तीन, या चार अंकित रहता था। पिताजी ने बताया था कि वे चारों धारों को एक-एक बार
इस्तेमाल करने के बाद दूसरा ब्लेड ले लेते थे। पहले इस्तेमाल किए जा चुके ब्लेड जल्दी
फेंके नहीं जाते थे, उनका पेंसिल छीलने जैसे कामों में उपयोग होता था।
एक बार मैं ब्लेड के सिरों को आपस में फँसा कर रेलगाड़ी बनाते हुए
पकड़ा गया था, और तब से वे ब्लेड मुझसे छुपा कर रखे जाने लगे थे। न वे सूई-धागे के डिब्बे
में थे, न दीदी के ज्यौमेट्री बॉक्स में, और न ही औज़ारोंवाली पेटी में। इतना छुपाव-दुराव
मेरी समझ से बाहर था। अब मैं इतना छोटा भी नहीं था कि ब्लेड-जैसी मामूली चीज़ से घायल
हो जाऊँ, लेकिन माँ-पिताजी को मनाना मेरी क्षमता से परे था। पिताजी उन्हें चेहरे पर
जैसे-चाहें वैसे घंटों रगड़ सकते थे, माँ उनसे तलवों की मरी चमड़ी छील सकती थीं, दीदी
पेंसिल कतर सकती थीं, और भाई कागज़ काट सकता था, बस, सारी रोक-टोक मेरे लिए ही थी।
दाढ़ी बना लेने के बाद पिताजी ने रेज़र खोल कर ब्लेड अलग कर लिया,
और कटोरी में ब्रश, रेज़र, ब्लेड, वगैरह डाल कर उन्हें खंगालने चले गए। आईना, कंघी और
दरी अपनी बारी के इंतज़ार में वहीं पड़े रहे। मैं आईना, कंघी और फिटकरी रखने दूसरे कमरे
में गया, जहाँ पिताजी हज़ामत के सामान को ताखे में रखने के बाद उस पर बिछे अख़बार के
नीचे कुछ कर रहे थे। वह दूसरा कमरा हम तीनों भाई-बहनों का था। पिताजी ने आईना ताखे
पर रखा, बालों पर एक बार कंघी फिराई और माँ से कुछ कहने रसोईघर चले गए। मैंने अख़बार
को ज़रा-सा उठाया, और मेरी बाँछें खिल गईं। कितने सारे ब्लेड पड़े थे वहाँ पैकिंग के
अन्दर! मैंने झट से तीन-चार ब्लेड पैंट की जेब में डाले और माँ-पिताजी की बातचीत सुनने
उनके पास चला गया।
माँ थोड़ी झल्लाई हुई थीं। “इन दोनों भाई-बहन को घर से कोई सरोकार
ही नहीं है। बिस्तर से उठे, जैसे-तैसे नाश्ता किया, और ग़ायब!”
पिताजी ने समझाया, “अब एक ही तो छुट्टी का दिन आता है, रविवार का।
अब उस दिन भी नहीं खेलें तो …”
माँ ने बात काटी, “दो घंटे हो चुके लाटसाहबों को बाहर निकले। रविवार
है तो उसका मतलब क्या हुआ? नहाएँगे-धोएँगे या जंगली-जैसे फिरते रहेंगे दिन भर? कहा
था कि एक घंटे में लौट आना …”
मुझे लगा, मुझे अपनी श्रेष्ठता साबित करने का अवसर ख़ाली नहीं जाने
देना चाहिए। टप से बोल पड़ा, “लेकिन मम्मी, हम तो कहीं नहीं गए। डैडी की मदद कर रहे
थे तब से …”
माँ का ग़ुस्सा थोड़ा शान्त हुआ। उनके सब बच्चे जंगली नहीं थे, एक
सभ्य भी था! वे बोलीं, “बस तू ही एक राजा बेटा है हमारा।“
मैं जानता था कि भाई और दीदी पड़ोस में अलका के घर खेलने गए हुए थे।
“बुला लाएँ उनकों?” मैं पिताजी की मदद कर चुका था और अब माँ को निहाल
करने का अवसर तलाश रहा था।
“हाँ, जा, बुला ला। अलका के घर होंगे दोनों। सम्हाल कर जाना।“
मैं सीढ़ियों से धीरे-धीरे नीचे उतरा। अलका बगलवाली सिलेटी इमारत
में हमारी ही तरह पहली मंज़िल पर रहती थी। उस इमारत की खिड़कियों के लाल छज्जे अँधेरे
में दूर से ही दिखते थे। हमारी इमारत के छज्जे सफ़ेद थे, जिन पर कहीं-कहीं कालिख जम
गई थी। दोनों इमारतों के बीच एक गली थी, जिसका एक छोर पार्क से मिलता था और दूसरा मुख्य
सड़क से। पिताजी इसी गली में अपनी लैंडमास्टर खड़ी करते थे। वह इस समय भी अपनी जगह विराजमान
थी।
मैं कूदता-फाँदता गली पार कर रहा था कि दीवार के पास घास में दबी
एक वस्तु ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। उस पर जमी धूल के बावजूद मुझे पहचानते देर न लगी
कि वह अलका के भाई राजू की स्वचालित खिलौना कार की छत थी। जब से उसके किसी रिश्तेदार
ने वह कार दी थी, राजू के पैर ज़मीन पर पड़ने बन्द हो गए थे। भाई ने हज़ार मिन्नतें की
होंगी, तब जाकर उसने दी थी वह कार दो मिनट के लिए। और, मुझे तो दी ही नहीं। बोला, “टूट
जाएगी।“ मैंने दीदी से विनती की और उसने अलका से, पर वह भी पूरी चोट्टी निकली। कहने
लगी, “अब, भाई, राजू के अंकल की कार है तो वो ही डिसाइड करेंगे न कि उससे कौन खेलेगा,
कौन नहीं।“
मैं थोड़ी देर राजू को कार चलाते देखता रहा था। उसकी बत्तियाँ जलती
थीं, वह असली मोटरगाड़ी की तरह चलती थी, और उससे वास्तविक कारों जैसी ही आवाज़ निकलती
थी। राजू उसे इतनी तेज़ी से मेज़ के पाये के पास ले जाता कि लगता अब टकराई, तब टकराई,
लेकिन ऐन वक़्त पर वह उसे दायें-बायें घुमा कर बचा लेता। गाड़ी का निचला ढाँचा हरे रंग
की धातु का बना था और छत देखने में कपड़े की लगती थी पर दरअसल काले रबर की थी। गाड़ी
में आगे-पीछे और दरवाज़ों के ऊपर शीशे लगे थे। उसके लम्बे बॉनेट के साथ रबर की एक स्टेपनी
थी, जिसे उसके खाँचे से बाहर निकाला जा सकता था। राजू ख़ुशी में गुनगुना रहा था, मेरा
भाई भी प्रसन्नचित्त था, और दीदी अलका के साथ पता नहीं क्या गुटर-गूँ कर रही थी।
कह नहीं सकता, उस काली छत को देख कर मुझे कितनी ख़ुशी हुई। जब छत
गली में अलग-थलग पड़ी थी, तो कार के बाक़ी पाट-पुर्ज़े भी इधर-उधर छितरा चुके होंगे, मैंने
सोचा। अच्छा हुआ, टूट गई! बड़ा घमंड था राजू को उस पर।
मैंने धूल झाड़ कर छत को जेब के हवाले किया और हँसता-मुस्कुराता अलका
के घर जा पहुँचा। खिड़की के पास दीदी और अलका फुसफुस कर रही थीं। अलका के माथे पर गुलाबी
हेयरबैंड फँसा था, और वह दीदी की बातें सुनते-सुनते अपने बालों के छोर को चूस रही थी।
दीदी की दोनों चोटियों पर बड़ी तितलियों-जैसे रिबन बँधे थे और वह तर्जनी घुमा-घुमा कर
किसी मुद्दे पर ज़ोर दे रही थी। आलमारी के सामने काग़ज़ की कतरनों, गोंद, और कैंची वगैरह
के बीच भाई और राजू ज़मीन पर पैर फैलाए गत्ते का घर बना रहे थे।
चारों ने मुझे देखा पर मेरे आने को महत्व नहीं दिया। जैसे मेरे आने-न-आने
से उन्हें रत्तीभर फ़र्क भी न पड़ता हो। माना कि मैं अलका और राजू का कोई नहीं था, पर
दीदी और भाई का तो अपना था! उन्हें तो कुछ हिलना-डुलना चाहिए था, मुझे देख कर मुस्कुराना
चाहिए था, कम-से-कम यही पूछ लेना चाहिए था कि मैं क्यों आया था। पता नहीं लोग छोटे
भाई-बहनों से शालीन बर्ताव क्यों नहीं करते।
मैं दरवाज़े पर ठिठक गया। थोड़ी देर चुप रहा, फिर गम्भीर स्वर में
बोला, “मम्मी बहुत ग़ुस्सा हैं। तुम दोनों को तुरंत बुला रही हैं।“
“अच्छा, चलो, आ रहे हैं,” दीदी ने लापरवाही से कहा और अलका के आगे
उँगलियाँ नचाती रही। भाई ने तो जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं।
“डैडी भी ग़ुस्सा हैं,” मैंने रुखाई से कहा।
दीदी ने भाई को आजिज़ी से देखा और थकी आवाज़ में बोली, “चल!”
गली में मैंने भाई से पूछा, “तुम लोग आज कार से नहीं खेल रहे थे?”
“राजू बोला कि उसकी बैटरी ख़त्म हो गई है,“ उसने एक पत्थर को ठोकर
मारते हुए जवाब दिया।
“बैटरी ख़त्म हो गई है? अच्छा!” मैं पिताजी के अंदाज़ में बोला।
“इसे पहचानते हो?” मैंने नाटकीय अंदाज़ में जेब से छत निकाल कर उसकी
नाक के आगे लहराई, लेकिन इस कोशिश में उँगलियों के पोरों में ऐसा दर्द हुआ कि क्या
बताऊँ--जैसे किसी ने तेज़ दाँतों से काट लिया हो।
भाई चौंका, “ये कहाँ मिली? दिखा!”
वह मेरे हाथ से छत छीन कर उलटने-पलटने लगा।
“तभी राजू कार से नहीं खेल रहा था! लेकिन इसमें ये गीला-गीला-सा
क्या लगा है?”
छत और उसकी उँगलियों में गीला रंग लगा था।
दीदी गंभीर हो गई। “अपना हाथ दिखा,” उसने मुझसे कहा।
मैंने बायाँ हाथ आगे कर दिया।
“ये नहीं, दूसरावाला,” उसने आग्रह किया।
मजबूरन मुझे दायाँ हाथ दिखाना पड़ा। मेरी उँगलियों और अँगूठे पर काफ़ी
लाल रंग लगा था।
दीदी ने ध्यान से देख कर कहा, “तुम्हारे हाथ से तो ख़ून बह रहा है।
देखो, उँगलियाँ और अँगूठा, सब कट-फट गए हैं। दर्द भी हो रहा है?”
लोग कैसे बेवक़ूफ़ी-भरे सवाल करते हैं! उँगली कटने पर दर्द न होगा
तो क्या गुदगुदी होगी? लेकिन बात बढ़ाने से उन्हें मेरी जेब में रखे ब्लेडों के बारे
में पता चल जाता, और फिर न जाने क्या होता। मैंने बात टाल दी, “दर्द नहीं हो रहा, बस,
कुछ लाल-लाल लगा है। जहाँ से छत उठाई वहाँ रंग पड़ा होगा। चलो, जल्दी चलो, नहीं तो डैडी-मम्मी
और ज़्यादा ग़ुस्सा हो जाएँगे।“
दीदी घर में घुसी और उसके पीछे भाई। मैं ब्लेड छुपाने के लिए जल्दी
से अन्दर जाने की फ़िराक़ में था कि भाई ने न जाने किस जन्म का बदला लिया, “मम्मी, बाबू
के हाथ से ख़ून बह रहा है।“
दीदी ने आग में घी डाला, “हाँ, उसकी उँगलियाँ और अँगूठा कट-फट गए
हैं।“
“कुछ कटा-फटा नहीं है। दर्द भी नहीं हो रहा, बस लाल-लाल हो गया है,”
मैंने प्रतिवाद किया।
साधारण माँएँ ऐसी अवस्था में करुणा से ओत-प्रोत हो जाती होंगी, बच्चे
से बेहद मुलामियत से पेश आती होंगीं, पर मेरी माँ में चंडी ने प्रवेश कर लिया। उन्होंने
कठोर स्वर में आदेश दिया, “बाबू, इधर आओ!”
विश्वास न हुआ, पाँच मिनट पहले यही औरत मुझे ‘राजा बेटा’ की पदवी
से अलंकृत कर रही थी। बेकार ही गया था इसके दोनों बच्चों को बुलाने। हाथ बटाने का एहसान
मानना तो दूर, अब ये मेरी छीछालेदर करेगी, मुझे सबके सामने बेइज़्ज़त करेगी। हाथ में
दर्द अलग हो रहा था। मैं रुँआसा होकर माँ के सामने खड़ा हो गया।
“ये तो किसी तेज़ धारवाली चीज़ से कटी मालूम पड़ती हैं,” उन्होंने कहा।
“इसने ये छत उठाई थी रोड से,” भाई ने खिलौनेवाली कार की छत माँ के
आगे कर दी।
“छत?” बात माँ की समझ में नहीं आई।
“हाँ, माँ, ये राजू की कार की छत है।“ भाई ने स्पष्टीकरण दिया।
माँ ने उसे हाथ में लेकर ऐसे उलटा-पलटा जैसे चीरा लगाने से पहले
वे रोहू मछली को उलटती-पलटती थीं।
“उँह, इसमें तो कोई धार नहीं।“
“जहाँ से छत उठाई, हो सकता है वहाँ धारवाली चीज़ रही हो।“ मैंने मासूमियत
से कहा।
“नहीं, मम्मी, छत दिखाते समय ही इसके हाथ से ख़ून बह रहा था। ज़रूर
इसके पॉकेट में कुछ चाकू-वाकू है!” भाई बख़ूबी विभीषण का किरदार अदा कर रहा था।
मैं बचाव में जेब में हाथ डाल ही रहा था कि माँ गुर्राईं, “ख़बरदार!
हाथ बाहर रखो।“
उन्होंने मेरे पैंट के पाँयचे को उल्टा किया तो अन्दर से लाल धब्बों
से सनी जेब उभर आई।
“हे भगवान, ये क्या रखा है इसमें? ख़ून से लथपथ है ये तो!” माँ बड़बड़ाईं
और फिर बड़ी सावधानी से, ख़ून की एक भी बूँद बहाए बग़ैर, उन्होंने चारों ब्लेड बरामद कर
लिए। तीन की पैकिंग सलामत थी, पर चौथे ब्लेड को मोमजामा और कवर विपत्ति से घिरे रिश्तेदार
की तरह अकेला छोड़ गए थे।
“ये तेरे पास कैसे आया?” माँ का पारा सातवें आसमान तक पहुँच चुका
था। दीदी कौतूहल से और भाई आनंद से ताक रहा था। माँ ने उसे घुड़का, “खड़े-खड़े तमाशा क्या
देख रहे हो? जाओ, जल्दी से डेटॉल और रूई लाओ।“
भाई सकपका कर डेटॉल और रूई ले आया। ज़ख़्म पर डेटॉल लगते ही मेरी सीत्कार
निकल गई, पर माँ पर कोई असर नहीं हुआ। वे रूई के फाहों से डेटॉल लगाती रहीं। वे इतनी
क़रीब थीं कि मैं उनका पूरा चेहरा नहीं देख पा रहा था। माथे पर छितराए बाल, ललाट पर
लगी बिंदी, एकाग्रता में सिकुड़ी भौंहें, छोटी पर चमकती नासिका, उभरे कपोल, और लम्बी-लम्बी
बरौनियों से ढँकी काली-काली आँखें--मेरी माँ कितनी सुन्दर थीं! बस, अगर नाराज़ कम हुआ
करतीं …
मैं सोच ही रहा था कि माँ ने प्रश्न दोहराया, “इतने सारे ब्लेड तेरे
पास कैसे आए, नहीं बताएगा?”
मैं मासूमियत से बोला, “सुबह ये सब ताखे के पास पड़े थे ज़मीन में।
मैं इनको लेकर आपके पास आया तो आपने दीदी-भाई को लाने भेज दिया …” बात ख़त्म करते-करते
मेरे आँसू बह निकले और मैं सुबकने लगा।
“बीना, ये सब ठीक से साफ़ कर दे,” कहते-कहते माँ कमरे में पिताजी
के पास चली गईं।
दीदी ने डेटॉल की शीशी पर ढक्कन लगाया और ख़ून लगे ब्लेड कूड़ेदान
में फेंक दिए। भाई मुझे अविश्वास से देखता रहा।
कमरे में माँ पूछ रही थीं “आप दाढ़ी बनाने के बाद ब्लेड ठीक से क्यों
नहीं रखते?”

