हिन्दुस्तान में मामूली और
बड़े आदमी के बीच बड़ा फ़र्क होता है। यहाँ साइकिल-स्कूटर-कार सवार तब तक रुके रहते हैं
जब तक बड़े आदमी का काफ़िला गुज़र न जाए। इधर बीमार इलाज के लिए अस्पताल में घंटों पर्ची
बनवाने की कतार में खड़े रहते हैं, उधर बड़े आदमी को आनन-फ़ानन दाख़िल कर लिया जाता है।
बड़े आदमी अव्वल तो सार्वजनिक विमान में सफ़र नहीं करते, और अगर करते भी हैं तो शेष यात्रियों
की परवाह न कर उनके देर से आने पर उड़ान ’तकनीकी कारणों से’ देर से ही उड़ती है। क्या
पुलिस, क्या अदालत, और क्या बाक़ी सरकारी- ग़ैर सरकारी महकमे, बड़े आदमी का रौब तथा मामूली जन पर छाया ख़ौफ़ हर जगह शीशे की
तरह साफ़ नज़र आता है। बड़े आदमी तारे हैं और साधारण लोग धूल के कण, यह हमारी मानसिकता
में कूट-कूट कर भरा है। ऐसे में जब किसी ’तारे’ से आमने-सामने मुलाकात हो जाए, उसका
सामीप्य मिल जाए, या उसी हवा में साँस लेने का सौभाग्य मिल जाए जिसमें उस व्यक्ति ने
निश्वास छोड़ी हो, तो आदमी अपने को धन्य समझता है, उस घटना को हर्ग़िज़ नहीं भूलता, अमूल्य
ट्रॉफ़ी की तरह सजा देता है मन के ऊपरवाले ताख़े पर।
नीचे व्यक्त घटनाएँ वर्णन हैं उन क्षणों का जब क्षणभर को ही सही, मेरे ग्रहों
की कक्षा कुछ ’तारों’ के ग्रहपथ से
एकाकार हो गई थीं।
अनिल कपूर
जब मैंने पहली बार अनिल कपूर को देखा तो मैं उन्हें नहीं जानता था। मैं ही क्या,
शायद कोई भी मामूली आदमी उनके नाम से परिचित न था उन दिनों। बात 1981 के अंतिम दिनों
की है। मेरा सहकर्मी मित्र और मैं सांसद ज्योतिर्मय बासु के गेस्ट हाउस में रहते थे
कलकत्ता में। बालीगंज स्थित उस गेस्ट हाउस में बहुत-से कमरे थे जिन्हें महीने या हफ़्ते
की दर पर किराये पर लिया जा सकता था। कुछ लोग तो सालों-साल रहते थे वहाँ। हम उस गेस्ट
हाउस के हर स्थायी निवासी की शक़्ल पहचानते थे, भले ही उसका नाम मालूम न हो। संभवतः
यही वजह रही होगी जब एक शाम वहाँ अनेक नए चेहरे देख हम चौंक गए। पता चला, फ़िल्म ’गर्म
हवा’ के निर्देशक एम एस सथ्यू अपनी निर्माण मंडली और कलाकारों के साथ
वहीं ठहरे हैं। ’गर्म हवा’ ने मुझे बहुत
प्रभावित किया था। उसमें बलराज साहनी, शौकत आज़मी, फ़ारुख़ शेख़, और जलाल आग़ा जैसे कलाकारों
के संवेदनशील अभिनय और मुसलमानों की समस्याओं के मार्मिक चित्रण का मैं क़ायल था। ज़ाहिर
है, मैं सथ्यू की नई फ़िल्म के बारे में जानने को उत्सुक हो गया। फ़िल्म का नाम था ’कहाँ-कहाँ
से गुज़र गया’। एक-दो चरित्र
अभिनेता तो वहीं घूमते दिखे। दूसरे दिन सुबह जब दफ़्तर जाने को तैयार हुआ तो मित्र की
माँ ने कहा, “वह देखो, वह नीचे खड़े हैं फ़िल्म के हीरो-हीरोइन। तुम भी जल्दी जाकर अगर
उसके पास एक पल को रुको, तो देखूँ कि तुम में कितनी समता है।“ हम झटपट नीचे गए और
’हीरो’ के पास खड़े हो गए। उनकी उम्र, क़द-काठी, रंग, वगैरह हमसे अलग न थे।
यही नहीं, वे बिना किसी लटके-झटके के खड़े थे, आराम से। बाद में पता चला कि उन ’हीरो’ का नाम था अनिल कपूर।
अमोल पालेकर
चित्रकार तथा रंगकर्मी अमोल पालेकर ने फ़िल्म कलाकार, निर्देशक और निर्माता के
तौर पर ख़ासा नाम कमाया है। साधारण चेहरे और डील-डौल उनकी सहज अदाकारी में किस तरह चार-चाँद
लगा देते हैं, वह ’रजनीगंधा’, ’छोटी-सी बात’, ’गोलमाल’ और ’नरम-गरम’ जैसी फ़िल्मों में साफ़ नुमायाँ होता है। ’गोलमाल’ में रामप्रसाद और लक्ष्मणप्रसाद के किरदार निभाने के लिए उन्हें
वर्ष 1980 में फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। एक साल भी न बीता होगा कि मैंने उन्हें
अपने सामने पाया। हल्की नीली जीन्स पहने वे कलकत्ता के हवाईअड्डे पर मामूली इंसान की
तरह खड़े थे। लोगों ने उन्हें देखा, पहचाना, लेकिन न कोई बदहवास हुआ और न ही किसी ने
हस्ताक्षर माँग कर उन्हें परेशान किया। मैं उनके गरिमापूर्ण व्यवहार का कायल हो गया।
इंदिरा गांधी
वह मेरे हाफ़ पैंट में स्कूल जाने के दिन थे। साल था सन् 1971। प्रधानमंत्री
श्रीमती इंदिरा गांधी मध्यावधि चुनाव का ऐलान कर चुकी थीं और बंगलादेश की लड़ाई को कुछ
महीने बाक़ी थे। वैसे, वहाँ के अनेक ग़रीब भारत पलायन कर चुके थे और क्या बंगाल क्या
बिहार, हर जगह बूढ़े बंगलाभाषी भिखारियों की संख्या बेहिसाब बढ़ गई थी। इंदिराजी जगह-जगह
चुनावी दौरे कर रही थीं और उसी सिलसिले में वे पटना के गांधी मैदान में चुनाव सभा में
भाषण देने वाली थीं। मैं भी उन दिनों पटना में था। एक सुबह बोरिंग रोड के नुक्कड़ पर
कुछ ख़रीदने गया तो देखा कि सड़क के दोनों ओर बाँस-बल्लों की जाली लगाई जा रही थी। पता
चला कि शाम को श्रीमती गांधी वहाँ से गुज़रेंगी। इंदिरा गांधी के वहाँ से गुज़रने की
बात मेरे गले नहीं उतर रही थी। सड़क मुश्किल से बीस फ़ुट चौड़ी थी और जाली इतनी कमज़ोर
कि चार आदमियों के हिलाने पर उखड़ जाए। कोई भी सड़क के बीचों-बीच या उस पार आसानी से
बम या पत्थर फेंक सकता था। “ना, देश की प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर
थोड़े ही होगी!”, मैं सोच रहा था। लेकिन वहाँ उपस्थित जानकारों के अनुसार श्रीमती गांधी
न केवल वाक़ई उस पतले रास्ते से गुज़रने वाली थीं, बल्कि उसके बाद नव्वे अंश के कोण पर
मुड़ बोरिंग कनाल रोड होते हुए सदाकत आश्रम भी जाने वाली थीं। वह सड़क तो और भी सँकरी
थी। “भला प्रधानमंत्री अपनी जान जोखिम में क्यों डालेंगी, इन लोगों को ज़रूर कोई ग़लतफ़हमी
हुई है” सोचता मैं घर लौटा, पर शाम को उसी जगह वापस आ गया। अब वहाँ भीड़ थी। कम उम्र
का फ़ायदा उठा कर मैंने लोगों के बीच जगह बनाई और जाली से सट कर खड़ा हो गया। पायलट जीप
दिखते ही सबका उत्साह चरमसीमा पर जा पहुँचा। जीप के पीछे, लगभग तीस किलोमीटर प्रति
घंटा की रफ़्तार से, एक खुली कार आ रही थी। सचमुच, वे श्रीमती गांधी ही थीं! “इंदिरा
गांधी ज़िंदाबाद” के नारे गूँजने लगे। उन्होंने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ कर अभिवादन किया
और दोनों ओर मालाएँ उछाल दीं। मेरी तरफ़ आ रही एक माला को लेने के लिए छीना-झपटी होने
लगी। मैंने अपने को सँभाला और नज़रें सड़क की ओर वापस फिराईं। वहाँ अब सिर्फ़ फूलों की
पंखुड़ियाँ शेष रह गई थीं। इंदिराजी का कारवाँ सकुशल गुज़र चुका था, जैसे सिनेमा के पर्दे
पर एक दृश्य समाप्त हो गया हो और दूसरा आ गया हो।
उस्ताद अमजद अली खाँ, अमान, अयान
सुबह के साढ़े छह बजे होंगे। सहमा-सहमा सूरज क्षितिज पर बादलों के बीच से झाँकने
लगा था। आसमान नीले से नारंगी होने की जुगत में था। बोर्डिंग अनाउंस होते ही उनींदे
यात्री क़तार में व्यग्रता से खड़े हो गए, जैसे एक पल की देर होते ही उन्हें हवाई जहाज़
में घुसने से मना कर दिया जाएगा और फिर वे ताउम्र हवाई सफ़र नहीं कर सकेंगे। डिपार्चर
गेट से बाहर निकल मैंने कोच की ओर क़दम बढ़ाए, लेकिन हठात ठिठक गया। उसके दो कारण थे।
एक तो, कोच भरा-भरा सा लग रहा था और मैं थोड़े आराम से जाना चाहता था। लेकिन दूसरी वजह
और ज़्यादा महत्वपूर्ण थी। कोच की बगल में अभिजात वर्ग के तीन मर्द खड़े थे। लगा, इन्हें
तो मैं जानता हूँ! फिर झटके से अहसास हुआ, वे तो उस्ताद अमजद अली ख़ाँ खड़े थे दोनों
बेटों के साथ। तीनों बिलकुल तैयार, चुस्त-दुरुस्त, थे, मानो उस समय सुबह की बजाय शाम
के साढ़े छह बजे हों। उन्होंने शानदार कुर्ता-पायजामा पहना हुआ था—वैसा, जैसा मान्यवर-जैसी
दुकानें शो केस में सजाती हैं। एयरलाइन का कर्मचारी उनके साथ खड़ा था। बस में चढ़ कर
भी मैं उन्हें देखता रहा। लगभग सब यात्रियों के हवाई जहाज़ में चढ़ने के बाद वे एक कार
से प्लेन तक आए, उतरने से पहले कर्मचारी का शुक्रिया अदा किया, और फिर अपनी सीट की
ओर बढ़ गए।
ए आर रहमान
बात 1996 या 1997 की होगी। मैं बम्बई के सहार हवाई अड्डे से बाहर निकल रहा था,
तभी एक सहयोगी ने कहा, “वह देखिए, ए आर रहमान!” तब तक ’रोजा’ फ़िल्म का संगीत धूम मचा चुका था और मौसीक़ी को एक अनूठी दिशा देने
के साथ रहमान शायद सबसे ज़्यादा फ़ीस लेने वाले संगीत निर्देशक बन चुके थे। मैंने देखा,
सचमुच, मुझसे चार क़दम आगे वह ए आर रहमान ही चले जा रहे थे। उनके बाल बिखरे हुए थे और
एक हाथ में बड़ा-सा बैग था। वे लोगों की पुकार अनसुनी करते ऐसे चल रहे थे मानो ’ए आर
रहमान’ किसी अन्य व्यक्ति का नाम हो जिससे उनका कोई लेना-देना न हो। मैंने
सहयोगी की ओर देख हामी भरी और वापस रहमान की तरफ़ देखा, लेकिन तब तक वे भीड़ में ग़ायब
हो चुके थे।
ऐश्वर्या राय
सन 1995 की बात है। मैं बम्बई के सहार हवाई अड्डे पर अटलांटा की चेक इन लाइन
में खड़ा था। मेरे साथ कुछ और सहकर्मी थे। विश्व के सौ सर्वश्रेष्ठ कर्मचारियों में
हमारा शुमार होने के कारण इंगरसॉल रैण्ड कम्पनी हवाई द्वीप पर हमें इंटरनैशनल क्लब
ऑफ़ एक्सिलेंस की सदस्यता से सम्मानित करने वाली थी। न तो हमारी ख़ुशी का ठिकाना था,
और न ही हमारे शोर-शराबे का। अचानक माहौल शांत हो गया, जैसे चिल्ल-पों मचाती क्लास
में हेड मास्टर घुस गए हों। मैं चौंक गया। देखा, हर मर्द की गर्दन एक ही दिशा की ओर
मुड़ी हुई थी। मेरी पत्नी फुसफुसाईं, “ऐश्वर्या राय!” कुछ ही महीने पहले ऐश्वर्या ने
विश्वसुंदरी का ख़िताब जीता था। मैंने आव देखा न ताव, अपनी क़तार छोड़ी और लपक कर जा पहुँचा
उस काउंटर पर जिसके आगे ऐश्वर्या राय खड़ी थीं। मैंने काउंटर पर तैनात अधिकारी पर एक
सवाल दाग़ा। ऐश्वर्या से बातचीत अधूरी छोड़ अधिकारी ने मेरे प्रश्न का उत्तर दिया। मैंने
उसे धन्यवाद दिया और ऐश्वर्या की ओर देखा, जो मुझे ही देख रही थीं। उनकी आँखों से जादू
बरस रहा था। उफ़्फ़! वैसी तिलिस्मी आँखें
न मैंने पहले कभी देखी थीं, न बाद में कभी देखने का नसीब हुआ। आज अपनी बदतमीज़ी पर शर्म
आती है पर साथ ही यह ख़याल भी आता है कि अगर वह ग़ुस्ताख़ी न की होती, तो उतनी सुंदर आँखें
कभी न देख पाता!
चंद्र शेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह
यह एक ऐसा क़िस्सा है जो मुझे हमेशा अपनी बेवकूफ़ी पर हँसने पर मजबूर कर देता
है। मैं बनारस में था, खीझा और परेशान। उन दिनों ’वर्क फ़्रॉम होम’ नहीं होता था, और मुझ जैसे मल्टीनैशनल कम्पनियों की भारतीय शाखा
में काम करने वालों के लिए रोज़ ऑफ़िस जाना निहायत ज़रूरी होता था। कर्मचारी पीलिया से
मर रहा हो या एक सौ चार डिग्री बुख़ार में तप रहा हो, दफ़्तर में हाज़िरी बजाए बिना गुज़ारा
न था। अब सोचिए, ऐसे माहौल में घंटों के इंतज़ार के बाद मेरी फ़्लाइट के कैंसिल होने
पर मेरा क्या हाल हुआ होगा! यह सच है कि एयरलाइनवालों ने रात में पाँच सितारा होटल
में रहने-खाने का इंतज़ाम कर दिया था, लेकिन अगले दिन ऑफ़िस में लगने वाली क्लास का ख़याल
कर मेरा हलक सूख रहा था। मोबाइल फ़ोन आने में कुछ साल बाक़ी थे, और रात में बॉस के घर
लैंड लाइन पर फ़ोन कर अगले दिन की ग़ैरहाज़िरी की इत्तिला करना भूखे शेर के मुँह में हाथ
घुसाने से कम ख़तरनाक न था। वह कुछ भी कह सकते थे, जैसे “तुम बिना रिज़र्वेशन ट्रेन से
दिल्ली चले आओ”, या, “टैक्सी लेकर आ जाओ!” भला बताइए, उस तरह जाने से थका आदमी दूसरे
दिन सुबह साढ़े नौ बजे बन-ठन कर ऑफ़िस कैसे आ सकता था? सो, मैं अगले दिन के इंतज़ार में
करवटें बदल-बदल कर सो गया था। दूसरे दिन एयरलाइनवाले मेरी तरह फँसे यात्रियों को बाबतपुर
हवाईअड्डे ले आए। दो-ढाई घंटे के माथा-फुटव्वल के बाद एक बार फिर चेक इन हुआ। लेकिन
यह क्या? बोर्डिंग पास पर सीट नम्बर तो दर्ज ही नहीं था! कर्मचारी ने समझाया कि चूँकि
उड़ान किसी और शहर से आ रही थी, इसलिए कौन-सी सीटें ख़ाली हैं, वह उन्हें नहीं पता। “बस,
जो सीट ख़ाली दिखे, उस पर बैठ जाइएगा,” उन्होंने सलाह दी। मैं घबराया। कहीं ऐसा न हो
कि उन्होंने ख़ाली सीटों से ज़्यादा बोर्डिंग पास वितरित कर दिए हों। “न! ढिलाई से काम
नहीं चलेगा, जहाँ सींग समाएँ, घुस जाओ!”—मैंने अपनेआप को चेतावनी दी और इशारा होते ही विमान की
ओर इस तेज़ी से लपका कि सरदार मिल्खा सिंह भी पीछे छूट जाते। कहना न होगा, दौड़ कर सीढ़ियाँ
चढ़ जहाज़ के अन्दर प्रवेश करनेवाला मैं पहला यात्री था। अन्दर घुसते ही मैंने दाहिनी
आँख के कोर से देखा, दरवाज़े के ठीक पीछे बाईं तरफ़ की पहली तीन सीटों में बीचवाली पर
भूरे चमड़े का ब्रीफ़केस रखा था। मतलब, वह ख़ाली थी और उस पर बैठा जा सकता था। मैंने ब्रीफ़केस
के बगल में, खिड़की के पास बैठे यात्री से पूछा, “मे आई?” उस व्यक्ति ने मुझे अचरज से
देखा, और मैं सन्न रह गया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की उस
अचरजवाली मुद्रा को मैं टेलिविज़न पर कई बार देख चुका था। जब तक मैं ब्रीफ़केस की दूसरी
तरफ़ आइल की सीट पर बैठे भारत के एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री, चन्द्र शेखर, को ठीक से
देख पाता, न जाने कहाँ से प्रकट हुए सुरक्षा कर्मियों ने मुझे जकड़ कर उठाया और पलक
झपकते आठवीं-नवीं क़तार के पास छोड़ दिया। होशो-हवास क़ाबू में आए तो मैं एक ख़ाली सीट
पर बैठ कर सोचने लगा, “एक-दूसरे के ख़िलाफ़ षड़यंत्र रच सत्ता हासिल करनेवाले एक-दूसरे
के पास इतने आराम से कैसे बैठ पाते हैं?” मन में एक और प्रश्न उमड़ा, “चन्द्र शेखर चार-चार
दिन दाढ़ी बनाए बग़ैर कैसे रह पाते हैं?” मैंने यह सवाल किसी से नहीं पूछे। पूछ कर फ़ायदा
भी क्या था! राजनीति हर किसी के पल्ले पड़ती कहाँ है!
दलेर मेंहदी
मैं बम्बई में सम्रुद्र से लगे एक आलीशान होटल के लाउंज में बैठा था। अब तक
यह भूल चुका हूँ कि वहाँ क्यों बैठा था, लेकिन इतना याद है मैं उस पाँच सितारा होटल
के बनावटी वातावरण में ख़ासी बोरियत महसूस कर रहा था। यह भी याद है कि मैं हर थोड़ी देर
में रिसेप्शन काउंटर की ओर नज़र दौड़ा लेता था। शायद मुझे किसी अतिथि का इंतज़ार था। अतिथि
तो नहीं आए, पर उनके आने से पहले एक झटके से दलेर मेंहदी आ गए। उनके बग़ैर सामान अकेले
पदार्पण से मैंने अंदाज़ लगाया कि वे संभवतः उसी होटल में ठहरे हुए थे। मैं बचपन में
इंद्रजाल कॉमिक्स में जादूगरों और राजाओं की सचित्र कहानियाँ बड़े चाव और कौतूहल से
पढ़ता था। उस दिन मानों उन्हीं जादूगरों में से एक साक्षात प्रकट हो गया था—नग-जड़ी चमकती
पगड़ी, लम्बे भड़कीले कोट, और लम्बी चोंचवाले जूते में उनकी छटा देखते ही बनती थी। ‘साडे
नाल’ गीत से वे ख़ासी प्रसिद्धी अर्जित कर चुके थे, पर जैसे उन्हें अपनी तरक्की का पूरा
यक़ीन नहीं था। या, शायद वे चाहते थे कि लोग उन्हें देखते ही घेर लें, उनकी तारीफ़ करें,
उन्हें फूल-माला पहनाएँ। पर मैंने वैसा कुछ नहीं किया। उन्होंने मुझे देखा और झूमते
हुए एक ओर बढ़ गए। फिर, जैसे अचानक कुछ याद आ गया हो, वापस मुड़ कर कॉन्सियर्श से दो
बातें की, और फिर मुझे देखते-झूमते चले गए। मैं फिर भी चुपचाप बैठा रहा। ’साडे नाल’ गीत से मेरा जो मनोरंजन न हो सका था, वह उनके दर्शनों से हो गया
था।
दिलीप कुमार और
सायरा बानो
दिलीप कुमार को मैं हिन्दी सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता मानता
हूँ; उन्हें मोती लाल, बलराज साहनी, नसीरुद्दीन शाह, अमिताभ बच्चन, वगैरह से बेहतर
समझता हूँ। ‘देवदास’ हो या ‘शक्ति’, ‘मुग़ल-ए-आज़म’ हो या ‘कोहिनूर’, वे हमेशा मेरे पसंदीदा
कलाकार रहे हैं। ऐसे में कल्पना कीजिए उस क्षण का, जब मैंने उन्हें अपने सामने खड़ा
पाया। कहते हैं कि उनकी ऊँचाई पाँच फ़ुट दस इंच थी, पर मुझे तो वे छह फ़ुट से कम के न
लगे। पूना के लोहेगाँव हवाईअड्डे की बैगेज रिक्लेम जैसी नीरस जगह पर भी उनका ओजस्वी
व्यक्तित्व उभर कर सामने आ रहा था। डील-डौल इतना शानदार, कि बहुतेरे हीरो उनके आगे
पानी भरें! उनके ललाट पर बालों का बेतरतीब गुच्छा लहरा रहा था और एक तरफ़ कुछ गूमड़-सा
दिख रहा था। वे सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहने थे। उनका चेहरा दमक रहा था और उस पर वही चिरपरिचित,
थोड़ी शरारती-सी, मुस्कान थी जिसकी वजह से ‘नया दौर’ का ‘उड़ें जब-जब ज़ुल्फ़ें तेरी’ इतना
मक़बूल हुआ कि लोगों को आज तक नहीं भूला। उनकी उम्र पचहत्तर वर्ष की रही होगी, पर वे
बिलकुल सीधे खड़े थे, ऊर्जा से परिपूर्ण। उनके साथ सायरा बानो और एक अन्य स्त्री थीं।
सायरा बानो को देख कर विश्वास न होता था कि वे वही महिला थीं जिन्होंने ‘जंगली’ में
मटक-मटक कर ‘काश्मीर की कली हूँ मैं’ गीत से दर्शकों को दीवाना बना डाला था। दिलीप
कुमार को कोई जल्दबाज़ी न थी, वे किसी गहरे सागर की तरह शांत नज़र आ रहे थे। सब उन्हें
देख रहे थे, पर उनका तेज या प्रभामंडल इतना गरिमामय था कि सबकी हदें बिना बोले ही तय
हो गई थीं। उसे लांघ कर उनके पास जाने का साहस कोई नहीं जुटा पाया।
दीप्ति नवल और
सैफ़ अली ख़ाँ
यात्रा चाहे रेल से हो या हवाई जहाज़ से, मैं हमेशा समय से बहुत पहले
पहुँच जाया करता हूँ। घरेलू उड़ानों में हवाई अड्डे पर तीन-साढ़े तीन घंटा इंतज़ार करने
में मुझे कोफ़्त नहीं होती। उस दिन भी मैं इंडियन
एयरलाइन्स की मुम्बई की आठ बजे की उड़ान के लिए सुबह पौने छह बजे ही इंदिरा गांधी हवाई
अड्डे पर पहुँच गया। चेक इन काउंटर सिर्फ़ खुला ही नहीं था, बल्कि एक महिला यात्री
ने उस पर मुझसे चंद सेकेंड पहले धावा भी बोल दिया था। काउंटर अधिकारी उस यात्री से
बड़े अदब से, मुस्कुरा-मुस्कुरा कर, बात कर रही थीं। और करती भी क्यों नहीं, सिने अभिनेत्री
दीप्ति नवल का चेक इन भला सपाट भावभंगिमा के साथ कैसे किया जा सकता था! दीप्ति तथाकथित
समानांतर सिनेमा की सफल अभिनेत्री होने के साथ ही ‘अंगूर’, ‘साथ-साथ’, ‘किसी से न कहना’,
‘रंग बिरंगी’, और ‘कथा’ जैसी मुख्यधारा की फ़िल्मों में भी अपने स्वाभाविक अभिनय कौशल
का लोहा मनवा चुकी थीं। चेक इन के बाद मैं डिपार्चर लाउंज में जाकर बैठ गया। उन्हें
वहाँ न पाकर अफ़सोस हुआ। डेढ़ घंटा मैं उनकी राह ताकता रहा, पर वे न आईं। निराश मन मैं
विमान में अपनी विंडो सीट पर बैठ गया, पर कुछ ही मिनटों में माहौल बदल गया। वे आईं
और मेरी बगलवाली सीट पर बैठ गईं। थोड़ी देर में सिनेमा जगत के कई और जाने-अनजाने कलाकार
भी हवाई जहाज़ में आ गए। ज़ाहिर था कि वे एक ग्रुप का हिस्सा थीं, पर अलग-थलग बैठना चाहती
थीं। मैंने चोर नज़रों से उनकी ओर देखा। वे दुबली-पतली थीं। उनके ख़ूबसूरत साँवले चेहरे
के दोनों तरफ़ होंठों के कोर से नथुनों तक स्पष्ट लकीरें थीं। शायद गई रात उन्होंने
किसी सांस्कृतिक आयोजन में भाग लिया था। वे अपने ग्रुप के सदस्यों से पूछ रही थीं,
“ठीक था ना?” मुम्बई तक की यात्रा में उनसे बात करने का मौक़ा तो मिल ही जाएगा, यह सोच
मैं ख़ुश था। मेरी ख़ुशी और बढ़ गई जब उन्होंने एक ग्रुप मेम्बर का सीट बदलने का सुझाव
ठुकरा दिया। उन्होंने थोड़े पंजाबी लहजे में कहा था, “दो घंटे की तो फ़्लाइट है, क्या
फ़रक़ पड़ता है!” लेकिन थोड़ी ही देर बाद उन्होंने साथी की बात मान कर सीट बदल ली। मेरी
दो घंटे की उड़ान उस दो मिनट के साथ की वजह से यादगार बन गई थी।
दीप्ति नवल के ग्रुप में एक गोरा-चिट्टा नौजवान भी था। उसके बाल
पोनी टेल में बँधे थे। वह जब भी बोलता, लगता कोई अंग्रेज़ बोल रहा है। विमान में तो
मैं उसे नहीं पहचान पाया, पर बाद में पता चला कि वह सैफ़ अली ख़ाँ थे।
नाना पाटेकर
किसी व्यक्ति को देख एक ही झलक में यह अंदाज़ लगाया जा सकता है कि
वह भला आदमी होगा या नहीं। भले आदमियों को दूर से ही पहचाना जा सकता है, यह एक दिन
मैंने पूना के लोहेगाँव हवाईअड्डे की बैगेज रिक्लेम बेल्ट के समीप महसूस किया। मैं,
मेरी पत्नी, और दोनों बच्चे उस बेल्ट की एक तरफ़ खड़े थे, और दूसरी तरफ़ खड़े थे फ़िल्म
अभिनेता नाना पाटेकर। मेरा दस-वर्षीय पुत्र उन्हें देख ख़ुश होकर ज़ोर-ज़ोर से गाने लगा,
“कभी शंभर वन कभी शंभर टू!” झेंप कर उसे चुप कराने की चेष्टा में हम मुस्कुरा दिए।
बेल्ट के दूसरी तरफ़ नाना पाटेकर ने उसे देख कर हाथ हिलाया और खुल कर मुस्कराने लगे।
लग ही नहीं रहा था कि वे आम आदमी से अलग एक फ़िल्मी सितारे हैं। ऐसा महसूस हुआ जैसे
वे हमें जानते हों, हमारे पड़ोसी हों। वे बिलकुल वैसे ही लग रहे थे जैसे रुपहले पर्दे
पर दिखते हैं—ईमानदार और ज़मीन से जुड़े, जैसा हर भले आदमी को होना चाहिए।
निशा सिंह
मैं जितनी भी महिलाओं से आमने-सामने मिला हूँ, उनमें निशा सिंह सबसे
ख़ूबसूरत हैं। यह मैं विश्वसुंदरी ऐश्वर्या राय को क़रीब से देखने के बावजूद कह रहा हूँ।
वे एम एस सथ्यू की फ़िल्म ‘कहाँ कहाँ से गुज़र गया’ की शूटिंग के दौरान कलकत्ता में उसी
गेस्ट हाउस में ठहरी थीं जिसमें मैं रहता था। उनका चेहरा बड़ा सुंदर और रंग गुलाबी-जैसा
था। उन का क़द दरमियाना था। मुझे नहीं मालूम कि ‘कहाँ कहाँ से गुज़र गया’ रिलीज़ हो पाई
या नहीं, लेकिन निशा सिंह को ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गीत में देखा जा सकता है।
अफ़सोस! कैमरा उनके साथ न्याय न कर सका, वरना आज कहानी
कुछ और होती!
पंडित जसराज
बंगलोर का एच ए एल हवाई अड्डा खचाखच भरा था। तिल धरने की जगह भी
नहीं बची थी। कई लोग सेल फ़ोन पर बात कर रहे थे, बहुत से आपस में बोलचाल रहे थे। और
इतनी कर्कश आवाज़ों के बीच स्वर सम्राट, संगीत मार्तण्ड, पंडित जसराज चुपचाप खड़े थे।
भीड़ में होकर भी वे कितने अलग थे सबसे! मानो मेले के बीचोबीच कोई निर्वाणप्राप्त साधु
खड़ा हो। उनके चेहरे पर दिव्य आभा थी। कैसा विरोधाभास था! पंडितजी का संगीत सुन मुग्ध
होनेवाले आज उन्हें अपना कलरव सुना रहे थे, और पंडितजी धैर्यपूवक सुन रहे थे। मैं उन्हें
चन्द सेकेंड ही देख पाया, किन्तु उनकी छवि मेरे स्मृतिपटल पर हमेशा के लिए अंकित हो
गई।
पी टी उषा
कहते हैं कि आदमी टीवी पर मोटा दिखता है, उसका वज़न बीस पाउंड बढ़ा-सा
लगता है। लेकिन पी टी उषा के मामले में बात इसकी उलट थी। उड़नपरी उषा मेरे ठीक पीछे
खड़ी थीं विमान की सीढ़ी चढ़ने के लिए। उन्हें टीवी स्क्रीन पर मैंने हमेशा कमज़ोर-सा महसूस
किया था। लेकिन वहाँ, मेरे पीछे, वे ख़ासी बलिष्ठ दिख रही थीं। उनकी कलाई मेरी कलाई
से कहीं ज़्यादा चौड़ी थी। उनकी लम्बाई भी अच्छी थी। वे बड़े आराम से खड़ी थीं। मैंने
उन्हें अपनी जगह खड़े होने का निमन्त्रण दिया, पर उन्होंने मनमोहक मुस्कान के साथ उसे
नकार दिया। वे एयरलाइन कर्मचारियों के साथ भी बड़ी नर्मी से पेश आईं। मैं जानता हूँ
कि उन्होंने कई पदक जीते हैं, लेकिन अपने सद्व्यवहार से उन्होंने उस दिन कई दिल भी
आसानी से जीत लिए।
मनोज सिन्हा
सोलह वर्ष की कच्ची आयु में घर से पहली बार छात्रालय जाते हुए मेरा
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मेरा डरना स्वाभाविक था—काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का प्रौद्योगिक
संस्थान नए छात्रों की वहशियाना रैगिंग के लिए कुख्यात जो था! मेरी रैगिंग हुई, लेकिन
हर क़िस्म का हिन्दी फ़िल्मी गाना गा लेने की क्षमता और विनोदी स्वभाव ने मेरी नैया डूबने
से बचा ली। एक बार तो मुझसे रात के दस से बारह बजे तक नरेन्द्र चंचल, भूपेन्द्र, तलत
महमूद, सी एच आत्मा, पंकज मल्लिक, किशोर कुमार, मुहम्मद रफ़ी, हेमन्त कुमार, और मुकेश
वगैरह के गाने एक-के-बाद-एक ऐसे गवाए गए जैसे मैं आदमी नहीं, रिकॉर्ड प्लेयर था! इन
अनुभवों ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ा दिया, और पंद्रह दिनों में ही मैंने डर-डर कर जीना
छोड़ दिया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं बिलकुल निश्चिंत हो गया था। निश्चिंत होने
का सवाल ही नहीं उठता था, क्योंकि अभियांत्रिकी के प्रथम वर्ष के हर छात्र के सर दो
वरिष्ठ छात्रों से रैगिंग का ख़तरा हमेशा मँडराया करता था। ये छात्र थे मनोज मिश्रा
और मनोज सिन्हा। अफ़वाह गर्म थी कि मनोज मिश्रा नए छात्रों को लोहे की छड़ पर लटकने को
मजबूर कर उनके तलवों के नीचे हीटर जलाया करते थे। सौभाग्य से मैं उनसे कभी नहीं मिला।
सिविल इंजीनियरिंग के छात्र मनोज सिन्हा ने भी मेरी रैगिंग कभी नहीं की। पता नहीं वे
रैगिंग करते भी थे या किसी ने यूँ ही बेसिरपैर की उड़ा दी थी। मैंने किसी की रैगिंग
करने या किसी को परेशान करने का उनका क़िस्सा पाँच साल में एक बार भी नहीं सुना। उन्हें
थर्ड ईयर में पहली बार देखा। रात के आठ बजे मैं सी वी रामन हॉस्टल में दरवाज़ा बन्द
कर पढ़ रहा था। कॉरिडॉर में भारी पदचापों से मेरा ध्यान भंग हो गया। पदचाप मेरे कमरे
के सामने बंद हो गई और कोई ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा भड़भडाने लगा। द्वार खोला, तो वहाँ दस-पंद्रह
छात्रों के साथ मनोज सिन्हा खड़े थे। वे स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में प्रत्याशी थे
और उसी की कैनवासिंग के लिए सबसे मिल रहे थे। वे मुझसे गले मिले और कहा, “तुम तो अपने
आदमी हो!” उनकी आवाज़ ध्रुपद गायकों सदृश्य गंभीर थी। मेरा अभिन्न मित्र अजित सिन्हा
उनसे रोज़ मिलता था, जिसके कारण वे मुझे जानते थे। उनके हृष्ट-पुष्ट शरीर, व्यवहार,
और पहिरावे में पूर्वी उत्तर प्रदेश की मिट्टी का सोंधापन था। वे सामान्य छात्रों से
बिलकुल अलग-थलग, दूर से ही पहचाने जा सकते थे। मैंने उन्हें कुर्ते-पाजामे के अलावा
और किसी लिबास में कभी नहीं देखा। उनकी हाल की तस्वीरें देखता हूँ तो पाता हूँ कि वे
अब भी पहले-जैसे ही दिखते हैं। जी हाँ, उनके कुछ बाल तब भी सफ़ेद थे जब वे पढ़ाई कर रहे
थे!
राजीव प्रताप
सिंह ‘रूडी’
‘रूडी’ पटना में मेरे पड़ोसी थे। हम दोनों बोरिंग रोड पर रहते थे।
मेरे पिता वहाँ डुमरी कोठी में किरायेदार थे, और दो ख़ाली प्लॉटों के बाद ‘रूडी’ का
घर था। वे अपने बड़े भाई सुधीर के साथ अक्सर डुमरी कोठी आते। कोठी की मालकिन बबुनी देवी
के दोनों लड़के, राजेश और राकेश, उनके हमउम्र और मित्र थे। वे चारों सेंट माइकल स्कूल
के विद्यार्थी थे। उन सब में सुधीर सबसे ज़्यादा बोलते थे, और ‘रूडी’ थे सबसे शांत।
वे उन दिनों पाँचवीं कक्षा के छात्र रहे होंगे शायद। दुबले-पतले ‘रूडी’ को बढ़चढ़ कर
कुछ भी करने में दिलचस्पी न थी। जहाँ सुधीर किशोर कुमार जैसी आवाज़ में ज़ोर-ज़ोर से राजेश
खन्ना के गाने गाते हुए डुमरी कोठी के औसारे की सीढ़ियाँ फलांगते, वहीं ‘रूडी’ उन्हें
चुपचाप देख कर ही संतोष कर लेते। सन् 1973 में डुमरी कोठी छोड़ने के बाद मैं उनके बारे
में भूल-सा गया था कि दस-ग्यारह साल पहले उनके मंत्री बनने की ख़बर ने बीती बातें याद
दिला दीं। मैंने उनका चित्र देखा। संदेह की कोई गुंजाइश न थी। हाँ, ये वही थे, एक समय
के शर्मीले ‘रूडी’!
राजनाथ सिंह
प्रार्थना सभा में एक बार मेरे पिता महात्मा गांधी के बिलकुल सामने
जा बैठे। बोलते-बोलते बापू की नज़रें मेरे पिताजी की नज़रों से मिलीं, तो जैसे सीने में
उतर कर अंतरतम तक छेद गईं। पिताजी ने कहा था, “गांधीजी ने देखा नहीं, आँखों से नश्तर
चला दिया था!” पत्रकार की हैसियत से वे उसके बाद भी गांधीजी की सभाओं में भाग लेते
रहे, किन्तु सामने बैठने की ग़लती कभी नहीं दोहराई। मुझे राजनाथ सिंह को एक बार देखने
का मौक़ा मिला, और उन्हें देखते ही पिताजी का गांधी प्रसंग याद आ गया। राजनाथ लखनऊ के
चौधरी चरण सिंह हवाई अड्डे की उड़ान पट्टी से लगी जीप में बैठ किसी की खोज में इधर-उधर
देख रहे थे, कि हठात उनकी दृष्टि मेरी नज़रों से पल भर को जा टकराई। उनकी आँखें नश्तर
तो नहीं चला रही थीं, लेकिन बीस-पच्चीस फ़ुट की दूरी से भी उनकी अद्भुत शक्ति छुपाए
नहीं छुप रही थी। उतना तो याद नहीं कि वे उस समय तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन
चुके थे अथवा नहीं, पर इतना ज़रूर जानता हूँ कि वे एक तब भी एक कद्दावर नेता थे। उनकी
आँखों का तेज कई चित्रों में भी झलकता है।
राज सिंह डूंगरपुर
यह उन दिनों की बात है जब इंडियन एयरलाइन्स की उड़ानों में चीनी मिट्टी
की तश्तरियों-प्यालों में भोजन और चाय परोसी जाती थी तथा विमान के कुछ हिस्सों में
धूम्रपान करने पर कोई पाबन्दी नहीं होती थी। मैं दिल्ली से बम्बई जा रहा था। मेरे इर्द-गिर्द
के कुछ यात्री बड़े जोशोख़रोश से बातचीत कर रहे थे। उनकी चर्चा का विषय क्रिकेट था। अपनी
सीट पर बैठने की बजाय वे एक-दूसरे के पास जा-जाकर ज़ोर-ज़ोर से बोलते, एक-दूसरे को धौल
जमाते, और ठहाके लगाते। इतना ही नहीं, नॉन-स्मोकिंग ज़ोन में होने के बावजूद वे धड़ल्ले
से सिगरेट-पर-सिगरेट भी पिये जा रहे थे। मुझे उन अधेड़ उम्र तथा प्रौढ़ व्यक्तियों की
हरकतों से मज़ा भी आ रहा था और उनके चुटकुले सुन कर हँसी भी आ रही थी, पर वहाँ सब मुझ-जैसे
सहिष्णु थोड़े ही थे! बाक़ी यात्रियों को इस धौलधप्पे से तक़लीफ़ हो रही थी। एयरहोस्टेस
ने एक बार उन लोगों से सिगरेट न पीने, अपनी जगह पर बैठने, और धीमे स्वर में बात करने
का अनुरोध किया। उन्होंने बात मान ली, पर छोटे बच्चों की तरह पाँच मिनट में ही दोबारा
उछलकूद मचाने लगे। उनमें से एक, जयवंत लेले, को मैं आसानी से पहचान गया। अबकी बार उन्होंने
आइल के बीचोंबीच खड़े होकर मीटिंग शुरू कर दी। मेरे आसपास के यात्री कुड़मुड़ाए, पर इससे
पहले कि बात आगे बढ़ती, विमान के अगले हिस्से से एक बेहद रौबीला, गोरा चिट्टा, और लम्बा
आदमी उनकी ओर बढ़ा। उसकी चाल में बला का आत्मविश्वास था, जैसे वह उस हवाईजहाज़ का मालिक
हो, उसे जहाँ चाहे उड़ा ले जाए, जहाँ चाहे उतार दे। उसे आते देख उछलकूद गैंग के सदस्य
सकपका गए, मानो भरी पिकनिक में चूहों ने बिल्ली मौसी को देख लिया हो। मैं उन्हें एक
नज़र में ही पहचान गया। वे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष, राज सिंह डूंगरपुर,
थे। लेले से दो बातें करने के बाद वे वापस लौट गए। आइल मीटिंग तत्क्षण भंग हो गई। मुफ़्त
का मनोरंजन समाप्त हुआ देख मैं मैगज़ीन पलटने लगा। उसके बाद की बम्बई तक की यात्रा में
उन अधेड़-प्रौढ़ बच्चों ने कोई चूँ-चाँ नहीं की। उन्हें डाँट थोड़े-ही खानी थी!
सुरेन्द्र शर्मा
सुरेन्द्र शर्मा का परिचय अक्सर हिन्दी साहित्य के कवि के रूप में
दिया जाता है, किन्तु मैं उन्हें ऐसा हास्य-व्यंग्य लेखक और वक्ता समझता हूँ जिन्होंने
कई चुटीली कविताएँ भी लिखी हैं। उनका लेखन हर स्तर का है। शायद इसीलिए वे कवि सम्मेलनों
में हर तरह के श्रोता के मन से किसी-न-किसी तरह संवाद स्थापित कर लेते हैं—उनसे भी
जो भौंडे लतीफ़ों को हास्य समझते हैं और उनसे भी जो सेटायर की बारीक़ पर्तों के नीचे
छिपे संदेश को समझ कर आनंदित होते हैं। उन्होंने भारत की राजनीति, इंसानी कमज़ोरियों,
और दकियानूसी रवैयों पर ज़ोरदार प्रहार किए हैं। चुनावों में धन के दुष्प्रभाव और उसके
हानिकारक महत्व को दर्शाती एक कविता में उन्होंने बड़े मज़ाकिया ढंग से जता दिया है कि
वोट देनेवाले राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के बारे में गम्भीरता से नहीं सोचते। यहाँ
तक कि उम्मीदवार की तस्वीर की जगह उसके चुनावचिन्ह, उल्लू, की तस्वीर छप जाने पर जनता
को पता तक नहीं चल पाता और चुनाव सम्पन्न हो जाते हैं। एक बार दिल्ली पुस्तक मेले में
मेरी पत्नी और मैंने शर्माजी को उनकी किताबों के साथ गंभीर मुद्रा में बैठे देखा। उन्होंने
भी हमें अपनी बड़ी-बड़ी, गोल-गोल, आँखों से घूरा। फिर क्या था! हमें उल्लूवाली रचना याद
आ गई और हम हँसी दबाए वहाँ से रुख़सत हो लिए। कई वर्ष पश्चात मैंने उन्हें अमदावाद हवाई
अड्डे के डिपार्चर लाउंज में एक कन्या के साथ देखा। वे किसी ग़मग़ीन सोच में डूबे लग
रहे थे। एक यात्री, बिना उनकी अनुमति लिए, उनके साथ सेल्फ़ी लेने को बढ़ा, तो शर्माजी
चौकन्ने हुए पर एतराज़ नहीं किया। शायद उन्हें अपनी अगली रचना के लिए मसाला मिल रहा
था। अगले दिन पढ़ने में आया कि उनके किसी अभिन्न की मृत्यु हो गई थी।
सोनिया गांधी
मैं अंग्रेज़ी ठीक-ठाक समझ लेता हूँ और ग्यारह साल पहले मेरी श्रवण शक्ति भी
अच्छी थी। फिर भी, मैं हवाई जहाज़ के पायलटों की उद्घोषणा बमुश्किल ही समझ पाता था—उनके
बीस प्रतिशत अल्फ़ाज़ मेरे सिर के ऊपर से निकल जाते थे। शायद विमानचालक भी इस बात से
वाक़िफ़ थे, और इसलिए पूरी उड़ान के दौरान चार वाक्यों से ज़्यादा बोलने की ज़हमत मोल नहीं
लेते थे। लेकिन एक बार तो ग़ज़ब हो गया! दिल्ली से बेंगलुरू की जेट एयरवेज़ की उस उड़ान
में पायलट इतने स्पष्ट तरीक़े से बोल रहे थे कि देवकी नंदन पांडे और रामानुज प्रसाद
सिंह की याद आ गई। हर बीस मिनट पर हमें बताया जाता कि हम कहाँ पहुँ च गए थे, आगे बाईं और दाईं ओर क्या-क्या है, वगैरह, वगैरह। मैं हैरान था। जहाज़
से उतरने के बाद पता चला कि उसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सफ़र कर रही थीं। सत्ता
में लगातार दस वर्ष रहने के बाद एक साल पहले ही उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा
था। आपके मन में प्रश्न होगा, “क्या मैं सोनियाजी को देख पाया, उनसे मिल सका?” जवाब
है, “बिलकुल नहीं!” मुझे क्या, अधिकतर यात्रियों को गुमान तक न हो सका कि वे भी उसी
जहाज़ पर सवार थीं! मुझे 1995 का बम्बई-अटलांटा का हवाई सफ़र याद आ गया, जिसमें पहुँच
से परे बैठे तबलावादक ज़ाकिर हुसैन की एक झलक से ही मन गदगद हो गया था। उसी तरह
1999 की एक यात्रा में आगे बैठे प्रधानमंत्री के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार डॉ अब्दुल
कलाम के बालों को देख कर बड़ी ख़ुशी हुई थी। ऐसे संयोग मामूली आदमी के जीवन की धरोहर
बन जाते हैं। ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी ने क्या ख़ूब कहा है, “सबकी साक़ी पे नज़र हो ये ज़रूरी है,
मगर, सबपे साक़ी की नज़र हो ये जरूरी तो नहीं!”