मंगलवार, 8 सितंबर 2026

पंद्रह अनूदित लघुकथाएँ



1 - जूते

लेखक: (संभवतः) अर्नेस्ट हैमिंग्वे

 

घर के पुराने सामान में बिकाऊ हैं नवजात शिशु के जूते (जो कभी इस्तेमाल न हो सके)

 

2 - चूक

लेखक: (संभवतः) ओ हेनरी

 

चालक होठों में सिगरेट दबाए गाड़ी में पेट्रोल जाँचने लगा। मृतक तेईस वर्ष का था।

 

3 - कौन?

लेखक: (संभवतः) फ्ऱेडरिक ब्राउन

 

सृष्टि का अंतिम व्यक्ति कमरे में बैठा था। किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

 

4 - आपबीती

लेखकः अज्ञात

 

कभी मेरे कपड़ों पर सिलवटें और चेहरे पर चमक थी। अब उसका उल्टा हो गया है।

 

5 - हत्यारा

लेखिका: (संभवतः) जेन ओरविस

 

रीता की नृशंस हत्या के बाद कार्टर की दुनिया खिड़की के पार सिमट कर रह गई है। टेलिविज़न, किताबों, और पत्रों की छोड़िए, उसे तो इसकी भी परवाह नहीं कि उसका भोजन कौन पहुँचाता है और ख़र्च कैसे चलता है। गाड़ियाँ आती-जाती रहती हैं, लोग चहलक़दमी करते रहते हैं, मौसम बदलते रहते हैं, मगर रीता की याद में मग्न कार्टर कमरे से बाहर ही नहीं निकलता। वह तो यह भी महसूस नहीं कर पाता कि उसके कारावास में खिड़की है ही नहीं।

 

6 - दुर्घटना

लेखक: अज्ञात

 

पुराने सामान में बिकाऊ है बिना इस्तेमाल हुआ पैराशूट (जिस पर थोड़े दाग़-धब्बे लगे हैं)।

 

7 - बचने की क़ीमत

लेखक: (संभवतः) ऑगस्ट सालेमी

 

आँख-चुँधियाती हेडलाइट, टकराहट की कर्कश ध्वनि, होश भुला देनेवाली पीड़ा, और उन सबके बाद ऊष्ण नीला प्रकाश। ऊर्जा स्रोत की ओर बढ़ते जॉन को मुक्ति, नवजीवन, तथा असीम सुख का आभास होने लगा था; लेकिन अँधेरा और उत्कंठा लौट आईं। उसने पलकें मिचमिचाईं। नलियों, पट्टियों और प्लास्टर के बीच उसके दोनों पैर कट चुके थे।

पत्नी ने सुबकते हुए कहा, “उन्होंने तुम्हें बचा लिया, प्रियतम!”

 

8 - सहयात्री

लेखक: अज्ञात

 

“क्या आप भूत-प्रेतों में विश्वास रखते हैं?” सहयात्री ने घंटों की निस्तब्धता भंग की।

“नहीं,” डिब्बे में सवार एकमात्र दूसरा व्यक्ति किताब से आँखें हटाए बिना भुनभुनाया।

“मैं भी नहीं करता,” कहते हुए सहयात्री हवा से तेज़ रफ़्तार से चलती गाड़ी से ऐसी सहजता से नीचे उतर गया, मानो वह रुकी हुई हो।

 

9 - तिरस्कार

लेखिका: (संभवतः) लरिसा कर्कलैण्ड

 

हम दो प्रेमियों के बीच दो वर्षों से तीसरा कोई नहीं था। शानदार रेस्त्राँ में उस चाँदनी रात झिलमिलाती मोमबत्तियों के बीच भोजन के दौरान उसके मनमोहक लिबास, रेशम-सी नर्म ज़ुल्फ़ों, नशीली निगाहों, और दबी-दबी मुस्कान ने इंगित कर दिया, वही सबसे बेहतर मौक़ा था। लोगों की परवाह न करते हुए मैंने शैम्पेन मँगाई, एक घुटना ज़मीन पर टिकाया, तथा जेब से हीरे की अँगूठी निकाल मुस्कुराते अधरों और काँपते स्वर में प्रेमयाचना कर ही डाली।

वह बोली, “पागल हो गए हो क्या? हर्ग़िज़ नहीं!”

 

10 - काया परिवर्तन

लेखक: (संभवतः) चार्ल्स एनराइट

 

हादसा होते ही मैं पत्नी को सूचना देने घर भागा, लेकिन उसने मुझे देखकर भी नहीं देखा, रोज़मर्रा के काम करने और टीवी देखने में ही उलझी रही।

फ़ोन की घंटी बजी। बात करते-करते उसका चेहरा उतर गया, आँसू बहने लगे।  

11 - मुफ़लिसी का संतोष

लेखक: (संभवतः ऐनड्र्यू ई हन्ट)

 

भीख में मिले कम्बल ओढ़ते ही उसके कन्धों में ठंड लगनी बन्द हो गई थी। सुबह कूड़ेदान में मिले जूते उसके पैरों की नाप के ही थे। सड़क पर जलती बत्तियाँ हाड़-कँपकँपाती ठंड में गर्मी का अहसास दिला रही थीं। पार्क की बेंच की गोलाई उसकी थकी पीठ को नर्म सहारा दे रही थी। उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया। ज़िन्दगी में भला और क्या चाहिए!

 

12 - सौदा

लेखक: (संभवतः) ब्रायन नीवेल

 

शैतान का साया दूर हो रहा था, पर दोनों लड़के उसकी चुभती नज़र अब तक महसूस कर रहे थे।

“क्यों? आख़िर वह क्या चाहता था तुझसे?”

“मेरी आत्मा! और, तुझसे?”

“पे-फ़ोन के लिए सिक्का। उसको तुरन्त फ़ोन करना है कहीं।“

“भूख लग रही है। कुछ ख़रीद कर खा लें?”

“भूख तो मुझे भी लग रही है, पर सारे पैसे तो वह ले गया।“

“फ़िक़्र मत कर, मेरे पास सिक्के-ही-सिक्के हैं।“  

 

13 - मौत का शिकंजा

लेखक: (संभवतः ऐलन ई मेयर)

 

हल्का-हल्का होश आया। मेरा हर अंग दर्द से टूट रहा था। बिस्तर के पास खड़ी नर्स ने कहा, “मिस्टर फ़ूजिमा, आप भाग्यशाली हैं जो दो दिन पहले हिरोशिमा की बमबारी में ज़िन्दा बच निकले। अब आप चिकित्सालय में पूर्ण सुरक्षित हैं।“

बेहोशी में डूबता-उतराता मैं फुसफुसाया, “मैं कहाँ हूँ?”

“नागासाकी में,” उसका उत्तर था।

 

14 - असमंजस

लेखक: (संभवतः जे रिप)

 

क्रोध और प्रेम के जाल में किंकर्तव्यविमूढ़ हम प्रेमी युगल ने अपने भविष्य का फ़ैसला सिक्के की उछाल पर छोड़ दिया—हेड आने पर विवाह, टेल आने पर सम्बन्धविच्छेद।

सिक्का उछला, नाचा, झूमा, और हेड पर थम गया।

हम दोनों ने असमंजस से देखा और एकसाथ कहा, “तीन में से जो दो बार आए, उसे मानना ठीक रहेगा।“

 

15 - सच्चाई

लेखक: (संभवतः रॉबर्ट टॉम्पकिन्स)

 

उसकी सच्चाई की खोज एक सुदूर गाँव की टूटी-फूटी झोंपड़ी में जाकर पूरी हुई। बुझते अलाव के सामने फटे-पुराने वस्त्रों में बैठी सच्चाई उसकी कल्पना से भी अधिक वृद्ध और कुरूप थी। 

“क्या आप ही सच्चाई हैं,” उसने पूछा।

सच्चाई ने सिर हिलाकर हामी भरी।

“जगत के लिए आपका क्या संदेश है? लोगों से आपके बारे में क्या कहूँ?”

“उन्हें बताओ, कि मैं कितनी जवान और ख़ूबसूरत हूँ!”

सोमवार, 29 जून 2026

होली

 

पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं फ़िल्मी गीतों को पिरोतीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट में से ’हवा, ’बरसात और ’शाम पिछले सप्ताह आपकी नज़र हो चुकी हैं। आज पेश है वह स्क्रिप्ट जो 18 मार्च, 2003 को प्रसारित हुई थी। आज की स्क्रिप्ट में गीतों का स्थान रिक्त है, ताकि आप अपनी पसन्द का उपयुक्त गाना वहाँ रख सकें।

 

होली

(प्रसारण अवधि 44 मिनट, प्रसारण समय संध्या पाँच के बाद और आठ बजे से पहले)

 

(गुनगुनाते हुए) यूँ तो हमने लाख हँसी देखे हैं, तुमसा नहीं देखा! … अजी, चौंकिए नहीं, ये गीत हम आप ही के लिए गुनगुना रहे हैं। ज़रा ग़ौर कीजिए, आज कितनी बार रंग से सराबोर हुए, कितनी बार दूसरों को भिगोया, रंग कभी आँखों में घुसा तो कभी कानों में, पर मानना पड़ेगा! थक कर चूर होने की बजाय आप खिसक आए हैं रेडियो के क़रीब। ये चाहत ही तो है आपकी जो हमें बार-बार खींच लाती है आपके पास और जिसकी वजह से होली के इस होली-होली ऐटमस्फ़ीयर में हम हो लिए हैं आपके साथ ‘शीर्षक संगीत’ के चंद नग़मे और ढेर सारी बधाइयाँ लेकर। आज तो, भाई, होली पर ही गीत बजते रहने चाहिएँ। क्यों, क्या ख़याल है?

 

गीत 1:

होली के हुड़दंग से भला कौन बच सका है? हमने ऐसे बहुत से महारथी देखे हैं जो महीना-भर पहले ढिंढोरा पीटते हैं कि वे होली नहीं खेलेंगे, पर होली के दिन दोपहर बारह बजते-न-बजते रंगों में ऐसे सने-पुते नज़र आते हैं कि पहचान में ही नहीं आते। एक कान हरा तो दूसरा लाल, दाँत काले तो बाल जामुनी! ऐसे टेक्नीकलर बन जाते हैं कि ईंट से घिस-घिस कर रंग छुड़ाया जाए तो भी शायद एक सप्ताह तो गुज़र ही जाए उनकी असली रंगत नुमायाँ होने में। और, तन से भले ही छूट जाए, मन से कहाँ मिट पाता है होली का रंग!

गीत 2:

एक बात सच-सच बताइएगा! आज आपने किस-किसके साथ होली खेली? मेरा मतलब है, मौक़ा देखकर कहीं किसी ख़ास के साथ छुप कर तो होली नहीं खेली? अरे, शरमाइए नहीं, घबराइए भी नहीं, हम किसी को बताने थोड़े-ही जा रहे हैं! बस, आपकी चोरी पकड़ रहे थे और पकड़ भी ली! चलिए, माफ़ किया इस गीत के साथ।

गीत 3:

अरे, आपका चुपके से होली खेलनेवाला राज़ क्या खोल दिया, आप तो एक्स्ट्रा लाल हो गए! चलिए, आप भी क्या याद करेंगे, हम भी अपना एक राज़ ज़ाहिर किए देते हैं सिर्फ़ आपके आगे। वैसे तो हम डायटिंग करते हैं, रोज़ अपना वज़न तौलते हैं, पर आज पता नहीं कौन-सा कीड़ा काट गया कि हमने सुबह से इतने सारे पापड़, गुझिया, चिप्स, दही बड़े, गुलाब जामुन और मालपुए खा डाले हैं कि भूखी भैंस भी शर्मा कर, रंभा कर, और खाने से इन्कार कर देती। लेकिन हम नहीं माने। आप से बतियाने से पहले दो गिलास ठंडई और ढाल आए हैं कि गला तर रहे। अब अगर आपने ठंडई नहीं पी तो हम क्या करें? चलिए, ये गाना सुन लीजिए। इसमें भी ठंडई का मज़ा है।

गीत 4:

आज लोगों का होली खेलने का अलग-अलग स्टाइल देखने को मिला। कोई बड़ी मेहनत से टेसू के फूलों का रंग निकाल रहा था तो कोई मेंहदी घोल रहा था, किसी का दिल एनामेल पेन्ट पर क़ुर्बान हो रहा था तो कोई विशुद्ध कीचड़ का प्रयोग कर धन्य हो रहा था। अब हमें ये तो नहीं पता कि होली खेलने का आपका स्टाइल कौन-सा है, पर हमारा स्टाइल भी बड़ा स्पेशल था। बताएँ? अच्छा, बताते हैं। हमने सिर पर शावर कैप पहना, चेहरे और हाथों पर लोटा-भर सरसों का तेल मला, और ढेर सारा सूखा रंग रख दिया टेबिल फ़ैन के आगे। जैसे ही कोई पास आता, हम चुपके से फ़ैन चला देते, और रंग की परत ऐसे चढ़ जाती कि स्प्रे पेंट करनेवाले भी दंग रह जाएँ। आज का दिन तो गुज़र गया लेकिन देखिए, होली कल भी है। इस समझदारी से खेलिएगा कि भीगनेवाले के मुँह से वाह निकले, आह नहीं। 

गीत 5:

आप भी हैरान होंगे, आज हमें हो क्या गया है! क्या करें, होली का माहौल ही ऐसा है। लेकिन होली में इतना बावला भी नहीं होना चाहिए कि होश ही गुम हो जाएँ। न ही इतना भीगना-भिगोना चाहिए कि बुख़ार चढ़ जाए। अब देखिए न, इन्हीं दिनों आसपास इधर-उधर रिंकी-पिंकी, चुन्नू-मुन्नू, सबके इम्तहान भी तो चल रहे हैं! होली तो हर साल आएगी, पर इस साल का इम्तहान दोबारा देने की नौबत नहीं आनी चाहिए। पर्चा ऐसे मज़े में निकलना चाहिए जैसे मज़े में ये गाना गाया जा रहा है।  

गीत 6:

भला देखिए तो, आधे घण्टे से ज़्यादा हो गया आपकी कम्पनी में और पता ही नहीं चला! ये तो अच्छा हुआ कि मच्छर उड़ाने के चक्कर में घड़ी पर नज़र पड़ गई वरना हम न जाने कब तक बकर-बकर करते रहते। आज शाम कितने सारे लोग घर आने वाले हैं, हमको कितने लोगों से मिलने जाना है, गिले-शिक़वे भुला कर मुस्कुराहटें बिखेरनी हैं। तो चलें? बस ये वायदा लिए जा रहे हैं कि आप भी आज से सिर्फ़ मुस्कुराहटें बिखेरेंगे, शिक़वे भुला देंगे, और याद रखेंगे आज की ये शाम जिसे आपकी [नाम] ने सजाया था कुछ बेहतरीन नग़मों से। फ़िल्में थीं …..। और जाते-जाते नज़र करते हैं फ़िल्म … का यह गीत 

गीत 7:


रविवार, 28 जून 2026

रेलगाड़ी

                                                      बाहर दालान था

पीछे खलिहान था

पेड़ थे, चिड़ियाँ थीं

ताल था, मछलियाँ थीं

 कोस-भर दूर से रेल गुज़रती थी

सोंधी भाप घर उतरती थी

क्षितिज पर सियाह लकीर खिंच जाती

बहन उसे देखने बाहर आ जाती

 

’लेलगाली’, वह तुतलाती

’रेलगाड़ी’, दादी समझातीं

दादा बहलाते, रेलगाड़ी देखने चलोगे?

उस पर चढ़ोगे?

 

मैं झिझकता, मन तो करता है

पर, दादाजी, दिल डरता है

रेल पर चढ़ूँ और वो ऐसी चले

कि फिर रोकने से भी न रुके

 

फिर क्या होगा?

तब तो मैं बहुत पछताऊँगा

आप-सब को

दोबारा कैसे देख पाऊँगा?

 

दादा मुस्कुराते

ऐसा कैसे हो जाएगा?

तेरा दादा

तुझे बचाएगा

 

घर-खलिहान में आग लगी

न दादा बचे, न दादी बचीं

हम रात-रात जागे

खेत-खेत भागे

 

बाबूजी ने काँधे पर उठाया

खिड़की से अन्दर पहुँचाया

मन बहुत घबराया

पर मैं कुछ न बोल पाया

 

भीड़ में सैंकड़ों दब गए

बहन-माँ नीचे रह गए

बस, इतनी तसल्ली थी दिल को

बाबूजी रेल पर चढ़ गए

 

रेल चलते ही तलवारें चलने लगीं

हर तरफ़ रक्त की धार बहने लगी

मैं लाशों के गट्ठर तले छुप गया

                                                            
                                                              
                                                              मैं नौ साल की उम्र में मर गया

शुक्रवार, 26 जून 2026

 


पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट के बारे में पिछली बार बताया था। फ़िल्मी गीतों को पिरोती ये स्क्रिप्ट मैंने आकाशवाणी के सहयोगियों के लिए बारह-तेरह साल पहले लिखी थीं। श्रोताओं ने इन्हें दोबारा सुनाने का अनुरोध कई-कई बार किया था। हवा और ‘बरसात पर आधारित स्क्रिप्ट से आप वाक़िफ़ हैं। आज पेश है ‘शाम पर स्क्रिप्ट। ‘होली पर आधारित स्क्रिप्ट आगे पेश होगी। इन्हें पढ़िए और बताइए, क्या आपका चुनाव भी उन्हीं गीतों का होता जो हमने आकाशवाणी में उपलब्धता के कारण किया था, या आपकी पसन्द कुछ और है? एक बात और, स्क्रिप्ट का एक भी शेर मेरा नहीं है। प्रोग्राम पेश करनेवाले तारतम्य भंग होने के डर से शायरों का नाम नहीं बताते, और मेरे नोट्स ग़ायब हो चुके हैं। अगर आप शायरों के नाम बता सकें, तो मेहरबानी होगी।

शाम

(प्रसारण अवधि 29 मिनट, प्रसारण समय रात नौ के बाद और ग्यारह बजे से पहले)

मुझे पूछने का हक़ दे कि ये एहतिमान [रवायत] क्यों है?

मेरे साथ प्यास क्यों है, तेरे पास जाम क्यों है?

जिसे मेरी तीरा-बख़्ती [बदनसीबी] से फ़रोग [चमक] मिल रहा था

वही सुबह पूछती है, मेरे घर में शाम क्यों है?

शाम साँवली से काली होकर रात बन चुकी है। सैंकड़ों-हज़ारों सितारे उसकी माँग में झिलमिला उठे हैं। ऐसे में आप हैं, हैं ’सदाबहार दस नग़मे, और मैं, [नाम]! लेकिन हमारे साथ कुछ ऐसा भी है जिसका ज़िक़्र लबों तक पहुँचने से पहले-ही सहम कर ख़ामोश हो जाता है।

गीतः ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा ग़म, लता मंगेशकर, आह

उनके ग़म की टीस का कोई मुक़ाबला नहीं। जब वो पास होते थे, सारा ज़माना ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो जाता था।

ख़ुदा जाने तुम्हारे नाम से कैसी मुहब्बत है

किसी का नाम लेता हूँ, तुम्हारा नाम आता है

गीतः फिर वही शाम, वही ग़म, वही तनहाई है, तलत महमूद, जहाँआरा

दर्द में डूबा फ़साना चाहिए

और सुनने को ज़माना चाहिए

दोस्त-दुश्मन सब अयादत [मिज़ाजपुर्सी] कर चुके

वो न आए जिनको आना चाहिए

 

गीतः लो आ गई उनकी याद, वो नहीं आए, लता मंगेशकर, दिल एक मन्दिर

अब्र [बादलों] में छुप रहा है चाँद

चाँदनी छन रही है शाख़ों से

जैसे खिड़की का आधा पट खोले

झाँकता हो कोई सलाखों से

गीतः तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है, हेमन्त कुमार, ख़ामोशी

नक़ाब तुमने जो उलटा है मुस्कुरा के कभी

फ़लक [आसमान] के चाँद-सितारों को शर्म आई है

गीतः चौदहवीं का चाँद हो, मुहम्म्द रफ़ी, चौदहवीं का चाँद

’सदाबहार दस नग़मे आपकी ख़िदमत में पेश कर रही है, आपकी [नाम] ।

गीतः ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, हेमन्त कुमार - लता मंगेशकर, जाल

सहारा ढूँढ़ लाया हूँ मैं ज़िन्दगी के लिए

इक अजनबी की ज़रूरत है, अजनबी के लिए

बुरा न मानो तो मैं तुमसे एक बात कहूँ

तुम्हारी मुझे ज़रूरत है ज़िन्दगी के लिए

गीतः फैली हुई हैं सपनों की बाहें आजा चल दें कहीं दूर, लता मंगेशकर, घर नम्बर 44

कहकशाँ [तारामण्डल] रस्ते-रस्ते बिखर जाएगी

चाँदनी मेरे आँगन उतर जाएगी

आज आने का वादा है, आएँगे वो

आज झोली मुरादों की भर जाएगी

 

गीतः तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चाँद निकला, अलका याग्निक, ज़ख़्म

 

वो आएँगे और चाँदनी रात होगी

न ये बात होगी, न वो बात होगी

कटी उम्र सारी इसी कश्मकश में

अगर वो मिलेंगे तो क्या बात होगी

 

गीतः तेरा मेरा प्यार अमर, फिर क्यों मुझको लगता है डर, लता मंगेशकर, असली-नक़ली

 

शायद ये सच है कि हर किसी के पास दिलक़श अंदाज़े-बयाँ नहीं होता, पुरअसर आवाज़ नहीं होती, लेकिन

ये बात और है कि पत्थर में न ढल सकें लेकिन

हर जवाँ दिल में कई ताजमहल होते हैं

तो रुख़सत होती है [नाम] इस वायदे के साथ

 

गीतः जो वादा किया हो, निभाना पड़ेगा, मुहम्मद रफ़ी - लता मंगेशकर, ताजमहल