सोमवार, 1 जून 2026

धमक

मेरे बिलकुल सामने बैठी लड़की की सुर्ख़ मिनी स्कर्ट से आबनूसी जांघें ताक रही थीं। हम दोनों सोलह बरस के आसपास के थे। लड़कियाँ सोलह की होते-होते लगभग वयस्क हो जाती हैं, जबकि लड़के अर्द्धवयस्क से अघिक नहीं हो पाते। उसका बदन विकसित हो चुका था, मेरी मूँछों को दाढ़ी उभरने की प्रतीक्षा थी। वह अपने पिता के साथ आई थी। ज़ाहिर है, मेरे माँ-बाप भी मेरे पास बैठे थे। पिछले साल माध्यमिक परीक्षा में राज्य-भर में ऊँचा स्थान हासिल कर मैंने झण्डे गाड़ दिए थे और उस मध्यमवर्गीय सरकारी मुहल्ले का हर बाशिन्दा अपने बच्चे की अनोखी प्रतिभा का हमसे लोहा मनवाने की जुगत में भिड़ गया था।

लड़की आशा भोंसले का गाया गीत, उन्हीं के अंदाज़ में, हर खटके और मुर्की के साथ गा रही थी, “तुम्हीं रहनुमा हो, मेरी ज़िन्दगी के …” हवा से पर्दे हिल रहे थे, और उसकी आवाज़ से मेरा दिल के तार झनझना रहे थे। सबको उसका गीत इतना अच्छा लगा कि उससे एक और गीत गाने की फ़र्माइश की गई और उसने सुनाया, “आपके कमरे में कोई रहता है।“ वह गाना मेरी माँ ने पहली बार सुना था और उन्हें बहुत पसंद आया। आज भी जब वे गीत सुनता हूँ, वह शाम याद आ जाती है।

मेरी पसंद का संगीत थोड़ा अलग था। पन्नालाल घोष की बाँसुरी पर राग पीलू, बेगम अख़्तर की गाई ग़ज़ल, “ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया”, और तलत महमूद का गाया लगभग हर गीत मुझे मंत्रमुग्ध किया करता था। फिर भी, उसकी गायकी मुझे पसंद आई। उसका परीक्षाफल बहुत अच्छा नहीं था और उसके पिता आगे की पढ़ाई के बारे में हमसे सलाह लेने आए थे।

वे लोग हमारी इमारत के पीछेवाली क़तार में रहते थे। तो मेरी प्रसिद्धी वहाँ तक पहुँच गई थी! हमारी इमारत के निचले तल पर रह रहे लोगों को मेरी मार्कशीट याद हो चुकी थी। उसमें स्नातकोत्तर अध्ययन कर रहे दो लड़के अपनी बड़ी बहन, छोटे भाई, और माँ-बाप के साथ रहते थे।

इमारत के सबसे ऊपरी तल पर राय साहब रहते थे। वे सबसे अलग-थलग दिखते थे। और उसमें ग़लत भी क्या था? राय साहब ने इंगलैण्ड में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और वे हवाई जहाज़ों की देखभाल करते थे। उनके सिगार की महक हमें घर बैठे मिल जाती थी। उनकी चमकती लम्बी स्टूडेबेकर कमांडर गाड़ी के आगे मुहल्ले की बाक़ी सभी गाड़ियाँ पानी भरती थीं। थोड़े भारी शरीर के राय साहब धूप का चश्मा लगाए बिना बाहर नहीं निकलते थे। उनकी पत्नी सिर के ऊपर जूड़ा बना कर ऊँचाई में सात-आठ सेंटीमीटर का इजाफ़ा किया करती थीं। उनका एक ही बच्चा, टीटू, मुझसे चारेक साल छोटा रहा होगा।

उनके घर में बजता संगीत बड़े-बड़े सिनेमाघरों की टक्कर का होता था। संगीत उनके घर की खिड़कियों से छन कर तो बहता ही था, दीवारों में भी उसका कम्पन साफ़ पता चलता था। वे कभी विदेशी संगीत बजाते, तो कभी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत। तबले की धमक और सितार का टिम्बर, यह दोनों जितने स्पष्ट सुनाई देते थे, बाद में सिर्फ़ आकाशवाणी के स्टूडियो में ही उतनी साफ़ आवाज़ सुनाई पड़ी।

एक दिन पिताजी दफ़्तर जा रहे थे और राय साहब एरोड्रोम से लौट रहे थे। माँ और मैं उन्हें ऊपर बालकनी से देख रहे थे। दोनों ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया, थोड़ी देर बात की, मुस्कुराए, और फिर नमस्कार कर अपनी-अपनी राह चल दिए। माँ को उत्सुकता हुई, आख़िर दोनों क्या बात कर रहे थे।

उन्होंने पिताजी को फ़ोन किया, पूछा, “क्या बोल रहे थे राय साहब?”

पिताजी दफ़्तर के काम में व्यस्त हो सब भूल-भाल चुके थे। उन्होंने पलट कर पूछा, “कौन राय साहब?”

माँ ने याद दिलाया तो उन्होंने बताया कि राय साहब ने हमसब को शाम को उनके घर चाय पीने का निमंत्रण दिया था।

माँ हैरान थीं। “देखो तो, अगर हम नहीं पूछते तो फ़जीहत ही हो जाती। ऑफ़िस से सात बजे घर लौट कर कहते, ‘चलो ऊपर’। रात का खाना कौन बनाता, तैयार कब होते, उससे कोई सरोकार है इनको?”

एक तल ऊपर जाने में कौन सी बड़ी भारी तैयारी करनी होगी, बात मेरी समझ से बाहर थी। यह सब चीज़ें माध्यमिक परीक्षा के पाठ्यक्रम में कहाँ होती हैं! और फिर, जो गुत्थी मेरे पिता नहीं सुलझा पाए थे, वह भला मैं कैसे हल कर सकता था? मुझे बड़ी ख़ुशी हुई। राय साहब के स्टीरियो को क़रीब से देखने-सुनने का मौक़ा जो मिलने वाला था।

दोपहर बाद दीदी कॉलेज से आईं।

“मम्मी, क्या पहन कर जाएँ? पहली बार जा रहे हैं आख़िर!” सोलह सीढ़ियाँ चढ़ ऊपर के तल पर जाना उनके लिए भी मामूली बात नहीं थी। उन दिनों हमलोग जया भादुड़ी को सभ्य-सुसंकृत महिलाओं का आदर्श मानते थे और दीदी उन्हीं की तरह दाँत में जीभ टिका कर हँसा करती थीं।

ख़ैर, शाम हुई और हम चारों ने राय साहब के घर धावा बोल दिया। पिताजी और राय साहब बात करने लगे और थोड़ी देर में श्रीमती राय अंदर चली गईं। माँ ने बैठे-बैठे ही दबी आवाज़ में उनके ड्राइंग रूम के फ़र्नीचर, सजावटी सामान, पर्दों, वगैरह का आर्थिक विश्लेषण शुरू कर दिया। उनकी फुसफुसाहट पर दीदी रुमाल की तहें खोलती-बंद करती मुस्कुरा-मुस्कुरा कर ऐसे सिर हिलाने लगीं मानो वे हिमालय की तराई में किसी युवा संतूरवादक से राग पहाड़ी की कोई मनमोहक धुन सुन रही हों।

हर बंगाली की तरह राय साहब के घर भी बेंत के मूढे़ थे और उन पर कपड़ों का कवर लगा था। दो मूढ़े, दोनों की बगल में लकड़ी का एक-एक स्पीकर, और बीच में स्टीरियो ऐम्प्लीफ़ायर। वह तीनों हल्की भूरी लकड़ी से बने थे। स्पीकरों के आगे गाढ़ा कत्थई खुरदुरा कपड़ा जड़ा था। ऐम्लीफ़ायर के ऊपर लगे हल्के भूरे रंग के एक्रिलिक कवर से टर्नटेबल नज़र आ रही थी।

शाम ढलती गई, और नाश्ते-चाय के बीच गपशप का दौर चलता रहा। राय साहब बातें दिलचस्प करते थे। उस एक-डेढ़ घंटे में ही उन्होंने रूसी महिलाओं के सूखा भात खाने, दरवाज़े पर पेलिकन की खटखटाहट को भूत-लीला समझने, और एक अजनबी द्वारा उनके घर में छोड़े बेंत के बक्से में चाकू से लैस डाकू के पाए जानेजैसे कई वाक़िए बयान कर दिए। मेरी मिस्त्रीगीरी के शौक़ के बारे में जानकर वे हर्षित हुए। वे भी कुछ वैसा-ही शौक़ रखते थे। बोले, “देखो, ये स्टीरियो हाम खूद बानाया हाय।“

मेरा निचला जबड़ा अचानक भारी हो गया और मुँह खुल कर लटक गया। मैंने अचरज से कहा, “लेकिन ये तो दुकानों में बिकनेवाले म्यूज़िक सिस्टम जैसा है।“

“आरे नाहीं। दोकान में ऐसा सिन्क्रोनाइज़ेशन नहीं होता हाय। इतना ट्रू रिप्रोडाक्शान भी नहीं होता है। एहाँ सूनोगे तो मालुम पोरेगा कि सामने बोइठ के बाजा राहा हाय। सुनो!” और उन्होंने बीटल्स तथा रविशंकर के एल पी बजाए। वाक़ई, मैं क्या, हम चारों उस संगीत में डूब गए।

उस शाम के बाद हम हर चार-पाँच दिनों में राय साहब के घर जाने लगे। वे हर बार प्रेम से मिलते। संगीत सुनाते। उनके घर जा-जा कर मुझ पर भी म्यूज़िक सिस्टम बनाने की धुन सवार हुई। मैं उससे पहले सफलतापूर्वक टूटे माउथ ऑर्गन से बर्गलर अलार्म बना चुका था, साइकिल की सर्विसिंग कर लेता था, और अपने नवनिर्मित मकान में पानी के पाइप का लेआउट बना चुका था। स्टीरियो भी शायद बना ही लेता, अगर एक अड़चन न होती।

वह अड़चन दो दुर्लभताओं के संगम का परिणाम थी। पहली दुर्लभता यह थी कि मेरे पिताजी सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद ईमानदार थे। घूस कमाना तो दूर, झूठे टी ए बिल भी नहीं भरते थे। दूसरी दुर्लभता पहली दुर्लभता का नतीजा थी। हमारे घर में पर्याप्त पैसे कभी होते ही नहीं थे, बीस तारीख़ आते-आते हम ठन-ठन गोपाल हो जाते थे। महीने के आख़िरी सप्ताह हम बस भाड़े और रिक्शे के किराये की किल्लत के बीच अटक-अटक कर साँस लेते थे।

स्टीरियो बनाने में कम-से-कम दो हज़ार रुपयों का ख़र्च तो आता। राधा रानी नौ मन तेल के बिना भी शायद नाच लेतीं, पर दो हज़ार रुपये लगाये बग़ैर स्टीरियो कैसे बनता? मैंने माँ-पिताजी से उस बारे में कभी बात नहीं की। जिस गली जाना नहीं, उसका पता क्या पूछना? वैसे भी, ग़ुस्से में पिताजी दुर्वासा मुनि का किरदार निभाने लगते थे। मैं उनके हाथों बड़े-बड़ों को पिटता देख-देख कर बड़ा हुआ था। इनमें मेरे भाई से लेकर दफ़्तर के निकम्मे कर्मचारी और सार्वजनिक क्षेत्र में बदतमीज़ी करने वाले शोहदे शामिल थे। सौभाग्य से मैं तब तक उनके चरण पादुका और वरद हस्त प्रहार से वंचित रह सका था, और अपना रिकॉर्ड ख़राब नहीं करना चाहता था।

लेकिन हमारी लोकल जया भादुड़ी, यानी दीदी, ने मेरा ख़ामोश-सा अफ़साना पढ़ लिया। बोलीं, “बड़े पहाड़ चढ़ने के लिए पहले छोटी पहाड़ियाँ पार करनी पड़ती हैं।“

मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा। भाई-बहन के बीच ऐसी सांकेतिक बातों के कई मतलब हो सकते हैं। मामला आलमारी के सबसे ऊपरी ताखे पर रखे बोयाम से आम का अचार चुराने जैसी मामूली बात से लेकर बड़े-बूढ़ों को किसी अप्रिय निर्णय लेने पर मजबूर करने तक, कुछ भी हो सकता था। मैंने उनकी ओर तटस्थता से देखा।

“तुम स्टीरियो बनाना चाहते हो न? पर डैडी उसके लिए पैसे देंगे नहीं। और दें भी कैसे? एक तो उनके पास उतने सारे पैसे होंगे नहीं, दूसरे, तुमने पहले कोई छोटा-मोटा म्यूज़िक सिस्टम भी नहीं बनाया। तालाब-और नदी में तैरे बिना तो मिहिर सेन ने भी समंदर पार नहीं किए थे।“

मिहिर सेन की तालाब और नदी में तैराकी के बारे में मुझे ठीक-ठीक इल्म न था। शायद दीदी को पता रहा हो, या उन्होंने बात में वज़न लाने के लिए तुक्के में मिहिर सेन का दामन थाम लिया था। फिर भी, वे संकेत क्या करना चाह रही थीं, मेरी समझ में नहीं आया।

“मतलब?” मैंने पूछा।

“देखो, बाबू! तुम सब कुछ नया-नया ख़रीदने की बजाय हमारे रेडियो के स्पीकर को मॉडिफ़ाई क्यों नहीं करते?”

रेडियो! पिताजी को उस रेडियो पर बड़ा गर्व था। एक बार उन्होंने कहा था, “यह कोई ऐसा-वैसा रेडियो नहीं है। आर सी ए है। आर सी ए मतलब, रेडियो कॉरपोरेशन ऑफ़ अमेरिका।“ उन्होंने ‘अमेरिका’ पर ख़ासा ज़ोर डाला था, और वाक्य ख़त्म करते-करते उनकी आवाज़ दिलीप कुमार से पृथ्वीराज कपूर जैसी हो गई थी। उस रेडियो में चार नॉब थे। ऊपर के बाँए नॉब को दाँए-बाँए घुमा कर उसे ऑन-ऑफ़ किया जाता था और आवाज़ तेज़-धीमी की जाती थी। उसी तरफ़ के निचले नॉब से ट्रेबल कन्ट्रोल होता था। दाहिनी तरफ़ के ऊपरी नॉब से एक मीडियम वेव तथा दो शॉर्ट वेव सेट होती थी तथा उसके नीचेवाले नॉब से ट्यूनिंग की जाती थी। कुछ ऊपर लगी मैजिक आई में ‘विस्मयादिबोधक चिन्ह’ का अवतरण सही रिसेप्शन का संकेत होता था। रेडियो में कई वॉल्व थे, जिनके आधा-एक मिनट में गर्म होने के बाद उससे आवाज़ निकलती थी। आवाज़ ठीक-ठाक ही थी, लेकिन राय साहब के स्टीरियो से उसकी तुलना करना सूरज को दीपक दिखाने के समान था।

“लेकिन डैडी?”

“डैडी को पता कैसे चलेगा। उनके ऑफ़िस जाने के बाद कर देना मॉडिफ़ाई।“ उन्होंने बड़े इत्मीनान से कहा। फिर चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में बोलीं, “तुमको पता है न कि क्या करना है? वरना अगर वे रात में ‘हवामहल’ सुनने बैठे और रेडियो से आवाज़ ही नहीं निकली … “

“नहीं-नहीं, हमको पता है क्या करना है।“ मेरे बुझे चेहरे पर रौनक़ दौड़ गई।

दूसरे दिन पिताजी के दफ़्तर जाते ही मैंने रेडियो का बैक-पैनेल खोल कर स्पीकर की लम्बाई-चौड़ाई का अंदाज़ ले लिया। माँ के देखने से पहले ही पैनेल वापस कस कर मैं जुट गया सामग्री जुटाने में। एक-दो दिन में ही मैंने सारा सामन इकट्ठा कर लिया। माँ-पिताजी से नज़र बचा कर दीदी रोज़ मुझसे प्रोजेक्ट की प्रगति का हालचाल लेती रहीं।

और एक दिन मैंने स्पीकर को रेडियो से अलग कर लकड़ी के एक डब्बे में फ़िट कर दिया। डब्बा तो डब्बा ही था। उसमें राय साहब के स्टीरियो-जैसी, या हमारे रेडियो-जैसी ही, फ़िनिश कहाँ से आती! उसे रेडियो के बगल में रखना मलमल के पर्दे पर टाट के पैबन्द समान लगा। जिस टेबिल पर रेडियो रखा था, मैंने उसी के नीचे स्पीकर का डब्बा लगा दिया।

दीदी ने रेडियो ऑन कर दो-चार स्टेशन लगाए। मैं उनका मुँह उसी उत्सुकता से ताकने लगा जिससे कोई पहली बार खाना बनाने के बाद खानेवालों का मुँह ताकता है। दीदी ने पहले तो आदतन “वाह!” कहा, फिर गंभीर होकर बोलीं, “इसमें वह बात नहीं आ रही।“

“बज तो रहा है,” मैंने अपराधी-स्वर में आत्मरक्षा की।

“नहीं, नहीं, बज तो रहा ही है। उसमें कोई बात नहीं। राय साहब के स्टीरियो-जैसा नहीं बज सकता, वह भी मालूम है। लेकिन धमक अगर थोड़ी और बढ़ जाती … “

“अंकल ने धमक बढ़ाने के लिए रूई भरने को कहा था, सो हमने भर भी दी थी।“ राय साहब मेरे गुरु थे, मैं उनका नाम कैसे ले सकता था।

“देखो, जितना गुड़ डालोगे उतना मीठा होगा। रूई और भर कर देखो।“ दीदी ने सलाह दी।

स्पीकर न हुआ, गुलगुला हो गया! लेकिन दीदी की बात में दम था। मैंने सोचा, लगे हाथ स्पीकर के डब्बे में थोड़ी रूई और भर दूँ, पर तब तक माँ के दोपहर की नींद पूरी कर उठने का समय हो चुका था। मैंने बाक़ी का काम अगले दिन पर मुल्तवी कर दिया।

शाम को पिताजी आए तो फ़ोन पर ही उलझे रहे। वे सुप्रीम कोर्ट के किसी फ़ैसले के बाद की संभावित गतिविधि पर चर्चा कर रहे थे। उस फ़ैसले ने हाई कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया था जिसमें इंदिरा गांधी का चुनाव ख़ारिज कर दिया गया था। पिताजी और उनके-जैसे केन्द्रीय सरकार के उच्चाधिकारियों का सोचना था कि चूँकि अदालत ने अपील पर फ़ैसला होने तक श्रीमती गांधी को पद पर बने रहने की मोहलत दे दी थी, इसलिए वे कोई अप्रत्याशित क़दम भी उठा सकती थीं। दूसरी ओर, दीदी-जैसे युवा दो खेमों में बँटे थे। एक का कहना था कि श्रीमती गांधी कोई-न-कोई रास्ता निकाल ही लेंगी, और दूसरे के अनुसार उन्हें जेल जाने, और शायद सूली पर लटकने से, अब कोई नहीं रोक सकता था। मेरा ध्यान इंदिरा जी के चुनाव से ज़्यादा स्पीकर की आवाज़ को धमकदार बनाने पर अटका था।

सुबह होते ही दिल्ली से ट्रंक कॉल आने लगे। कुछ पक रहा था। स्थानीय अधिकारियों के भी कई फ़ोन आए। जैसे ही आठ बजने को हुए, पिताजी ने रेडियो ऑन कर दिया। वे सूचना और प्रसारण मंत्रालय में थे, और वैसे भी अक्सर सुबह आठ और रात पौने नौ बजे से हिन्दी और अंगरेज़ी की बुलेटिन सुनते थे। मैं उनके पास आ गया। वे असमंजस में थे। आवाज़ पूरी तरह तेज़ करने और स्पीकर की पुरानी जगह पर कान सटाने के बाद भी उन्हें समाचार अपेक्षित तीव्रता से सुनाई नहीं पड़ रहे थे। उनके चेहरे पर झुंझलाहट की लकीरें उभरने लगीं। दुर्वासा-रूप धारण करने का वह पहला चरण होता था उनका। मैं घबराया। होम करते हाथ जलेंगे, कभी सोचा न था। मैंने उन्हें रेडियो से कान हटा कर टेबिल के नीचे कान लगाने को इशारा किया। देश में आपातकाल की घोषणा के समाचार ने उन्हें इतना अभिभूत कर दिया था कि उन्होंने, “अच्छा, यहाँ” कह कर नीचे कान लगा कर हिन्दी और अंगरेज़ी की बुलेटिन सुनी और मुझसे स्पीकर के मॉडिफ़िकेशन के बारे में कुछ न कहा। जल्दी तैयार होकर उस दिन वे समय से पहले ही दफ़्तर चले गए।

दोपहर में मैंने डिब्बे में रूई ठसाठस भर दी। काम होते ही मैंने दीदी को पुकारा जो उस दिन कॉलेज नहीं गई थीं। रेडियो ऑन करने पर बड़ी निराशा हुई। उसकी आवाज़ मरणासन्न बिल्ली की मिमियाहट जैसी हो गई थी।

“यह क्या हो गया?” हम दोनों घबरा गए। इतना तय था कि पिताजी हर समाचार बुलेटिन सुनने की कोशिश ज़रूर करेंगे, और समाचारवाचक के मनुष्य से मार्जार रूपान्तर पर रूपान्तरकार की, यानी मेरी, ख़ाल उधेड़ने में तनिक भी कोताही नहीं करेंगे।

दीदी ने चेतावनी दी, “सब कुछ पहले-जैसा कर दो, वरना हम भी नहीं बचा पाएँगे।“

मरता क्या न करता! मैंने स्पीकर रेडियो में लगा दिया और डिब्बे, तार, रूई, वगैरह को मन ही मन श्रद्धांजलि अर्पित की। रेडियो ऑन किया तो स्पीकर को गुलगुला समझने का ख़मयाज़ा शीशे में बाल की तरह सामने आ गया। मैंने बैक-पैनेल दोबारा खोला। रूई भरने के दबाव से स्पीकर का कोन कई जगह से फट गया था। मैंने गोंद और टेप से फटी जगहों को जोड़ने की कोशिश की, पर स्पीकर तो जैसे मुझसे बदला लेने पर उतारू था। मेरा हर यत्न बेकार गया।

पिताजी उस शाम भी फ़ोन पर ही व्यस्त रहे। दूसरे दिन सुबह उनके रेडियो के पास आते ही मैं भी वहाँ पहुँच गया। उन्होंने रेडियो ऑन कर टेबिल के नीचे कान लगाया ही था कि मेंने उन्हें रेडियो के सामने कान लगाने को संकेत कर वॉल्यूम थोड़ा कम कर दिया ताकि फटे कोन की फरफराहट कम सुनाई दे। पिताजी ने हैरत से मेरी ओर देखा और समाचार सुनने में तल्लीन हो गए। हिन्दी और अंगरेज़ी दोनो बुलेटिनें सुनने के बाद वे कोई राजनीतिक टिप्पणी करते हुए चले गए। मैं बाल-बाल बच गया।

उस दिन के बाद मैंने रेडियो को दोबारा नहीं छेड़ा। हाँ, स्पीकरों की धमक बढ़ाने के प्रयोग करता रहा और कुछ में सफल भी हुआ, पर अपना अलग घर बनाने के बाद। उन प्रयोगों की चर्चा फिर कभी।

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

ब्लेड

“ज़रा इसमें पानी भर देना,” पिताजी ने कटोरी देते हुए कहा।

वे कमरे के एक कोने में दरी बिछा रहे थे। फ़र्श पर मोज़ैक के छोटे-छोटे काले-सफ़ेद पत्थर जड़े थे। दरी से जगह-जगह उधड़े धागे इस बात की गवाही दे रहे थे कि वह कई साल पहले हथकरघे पर बुनी गई थी। पिताजी ने दरी कुछ इस चतुराई से बिछाई कि अधिकांश फटे हिस्से छुप गए। उस ज़माने में दूसरों की कमज़ोरी उजागर करना बुरा समझा जाता था। निष्प्राण दरी की लाज ढाँप कर पिताजी लोक धर्म निभा रहे थे।

मैं नाख़ून से कटोरे की सतह खुरचता रसोईघर की ओर बढ़ा। उस पर साबुन की परतें जम-जम कर इतनी मोटी हो गई थीं कि मेरे लिए उसके वास्तविक रंग का अंदाज़ लगाना नामुमक़िन था। नाखून से खुरचने पर उन मुलायम परतों से जमा हुआ साबुन आसानी से उधड़ने लगता था। पिताजी दाढ़ी बनाते समय रह-रह कर कटोरे के पानी में रेज़र घुमा कर उसमें फँसे बाल निकालते और उसकी दीवार से रेज़र टकरा कर उसमें जमा फ़ालतू पानी गिराया करते थे। वैसा करते समय टन्-टन् की आवाज़ होती और पानी तथा झाग की बूँदे आसपास फैल कर विभिन्न आकार बना जाती थीं। मैं उनमें जानवरों का अक़्स ढूँढ़ता। मोज़ैक के काले पत्थर अक्सर उन आकृतियों की आँख-नाक का रूप अख़्तियार करते। जानवर न भी मिलें, तरह-तरह के बादल तो दिख ही जाते थे मुझे। दाढ़ी बनाने के बाद पिताजी कटोरे को पानी से खंगाल कर उस डिब्बे में वापस रख देते थे जिसमें उनका दाढ़ी बनाने का बाक़ी सामान--ब्रश, साबुन की टिकिया, फिटकरी, ब्लेड, वगैरह--रहता था। शेष बर्तनों के विपरीत, इस्तेमाल के बाद साबुन के घोल में रोज़ नहानेवाले उस कटोरे को कभी राख से माँजा नहीं जाता था। ठीक भी है, थानेदार की तलाशी कौन लेता है?

वह कटोरा ज़रूर अलुमिनियम का रहा होगा। ताँबे, काँसे, या पीतल का कटोरा पिताजी दाढ़ी बनाने के लिए थोड़े ही इस्तेमाल करते! और अगर करना भी चाहते, तो माँ उसे खाना परोसने के लिए ले न लेतीं? हम पाँच प्राणियों के घर की रसोई चार अलहदा क़िस्म के कटोरों में परोसी जाती थी। काँसे के बड़े, बंगालीनुमा मुँहवाले कटोरे पर पिताजी का, उससे ज़रा छोटे ताँबे के कटोरे पर दीदी का, पीतल के दो छोटे-छोटे कटोरों पर दीदी से छोटे हम दोनों भाइयों का, और स्टील के कटोरे पर माँ का अघोषित सर्वाधिकार सुरक्षित था।

माँ रसोईघर में पीढ़े पर बैठी थीं। सामने जलते चूल्हे पर कड़ाही में कुछ पक रहा था, जिसे माँ ने पीतल की परात से ढँका हुआ था और उस पर छलछलाए फेन को छोलनी से निकाल रही थीं। बगल में नल था जिसके नीचे जूठे बर्तन पड़े थे। माँ ने बैठे-बैठे ही हाथ बढ़ा कर कटोरी में पानी भरा, और मुझे देते हुए ताक़ीद की, “सम्हाल कर ले जाना, गिराना मत!”

मैं इतने बड़े दायित्व को अंजाम देने में ग़फ़लत करने की जुर्रत कर भी नहीं सकता था। रसोई से कमरे के बीच कहीं भी अगर पानी छलक जाता, तो माँ का काम बढ़ जाता, वे पिताजी को अगली बार से ख़ुद कटोरी भरने को कह देतीं, और फिर मैं पिताजी की मदद करने से महरूम रह जाता। मैं अब कोई छोटा बच्चा थोड़े ही था, तीन साल से ऊपर की उम्र हो चुकी थी मेरी। हर इतवार को दाढ़ी बनाने में उनकी मदद किया करता था।

मैंने दोनों हाथों में कटोरा थामा और उसे लेकर कमरे की ओर कुछ वैसे ही बढ़ा जैसे दुल्हन जयमाला लिए धीरे-धीरे बढ़ती है। माँ शायद मुझे देख कर मुस्कुराईं, पर मेरा ध्यान कटोरी पर केन्द्रित रहा। उधर, पिताजी फ़र्श पर सामने आईना टिका चुके थे और बालिश्त-भर के उस दर्पण में अलग-अलग कोणों से अपना प्रतिबिम्ब निहार रहे थे। उनके हाथ के सिगरेट में अभी तीन-चार कश-भर जान बाक़ी थी। मैं जानता था, जब तक सिगरेट ख़त्म नहीं हो जाएगी, वे चेहरे का मुआयना, उस पर पड़े दाग़-झाइयों का विश्लेषण, और अलग-अलग मुद्राओं का अभ्यास करते रहेंगे, विभिन्न तरीक़ों से बाल सँवारते रहेंगे।

वे मुझे सुंदर लगते थे। एक बार उन्होंने पूछा था, “हम शशि कपूर जैसे दिखते हैं न?”

मैं शशि कपूर को नहीं जानता था, इसलिए चुप रह गया था। घर में ‘माधुरी’ और ‘फ़िल्मफ़ेयर’ सहित कई पत्र-पत्रिकाएँ और किताबें आती रहती थीं, लेकिन मैं ‘इंद्रजाल कॉमिक्स’ के वेताल, ‘पराग’ के कथाकार अवतार सिंह के किरदार राजू-मुन्नू-पिंकी, ‘चन्दामामा’ के विक्रमार्क, ‘धर्मयुग’ के ढब्बूजी, और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के ‘मुसीबत है’ के आगे यदाकदा ही बढ़ पाता था।

मैंने पानी भरा कटोरा पिताजी के दाहिने हाथ की तरफ़, ब्रश और रेज़र के समीप, रख दिया। उन्होंने फू-फू कर जल्दी-जल्दी दो-तीन कश लिए और सिगरेट को ऐश ट्रे के सुपुर्द कर दिया। मैं सामने पलंग पर बैठ कर उन्हें देखने लगा। उनके चेहरे पर सिगरेट के सिलेटी-नीले धुएँ के धागे-से लहरा कर गड्ड-मड्ड हो रहे थे। उन्होंने साबुन की डिबिया का ढक्कन खोल कर अंदर गीला ब्रश चार-पाँच बार घुमाया, और फिर उसे चेहरे पर ‘पचाक-पचाक’ की आवाज़ के साथ मलने लगे। थोड़ी ही देर में उनके गाल और गले पर सफ़ेद झाग के नन्हे-नन्हे पहाड़-से बनने लगे। ब्रश ने उनके चेहरे और गले पर कई बार दायें से बायें, बायें से दायें, नीचे से ऊपर, और ऊपर से नीचे यात्रा की और इसी क्रम में कई पर्वत बना-बिगाड़ दिए। आईने में मुआयने के बाद पिताजी आश्वस्त-से लगे। उन्होंने ब्रश नीचे रख दिया और रेज़र उठा लिया।

वे तरह-तरह की भंगिमा में मुँह फुला-बिचका-सिकोड़ कर दाढ़ी बनाते रहे और मैं उन्हें अपलक देखता रहा। पहाड़ी रास्तों पर चढ़ती-उतरती जीप की तरह रेज़र झाग की पहाड़ियों के दर्रों-घाटियों से गुज़रता और पिताजी की साफ़ त्वचा झलकने लगती। यह सारा कमाल रेज़र में लगे ब्लेड का होता था, और इसीलिए वह मेरी जिज्ञासा का विषय रहता था। ब्लेड दोहरी पैकिंग में आते थे। पहले उन पर मोमजामे-सा सफ़ेद काग़ज़ लिपटा होता था, और उसके ऊपर रंगीन काग़ज़ जिस पर बहुत कुछ छपा रहता था। ब्लेड पर नाम और चिन्ह चाहे जो हो, उनके अंदर कटे खाँचे एक-समान होते थे, और प्रत्येक ब्लेड की अलग-अलग धार के पास एक, दो, तीन, या चार अंकित रहता था। पिताजी ने बताया था कि वे चारों धारों को एक-एक बार इस्तेमाल करने के बाद दूसरा ब्लेड ले लेते थे। पहले इस्तेमाल किए जा चुके ब्लेड जल्दी फेंके नहीं जाते थे, उनका पेंसिल छीलने जैसे कामों में उपयोग होता था।

एक बार मैं ब्लेड के सिरों को आपस में फँसा कर रेलगाड़ी बनाते हुए पकड़ा गया था, और तब से वे ब्लेड मुझसे छुपा कर रखे जाने लगे थे। न वे सूई-धागे के डिब्बे में थे, न दीदी के ज्यौमेट्री बॉक्स में, और न ही औज़ारोंवाली पेटी में। इतना छुपाव-दुराव मेरी समझ से बाहर था। अब मैं इतना छोटा भी नहीं था कि ब्लेड-जैसी मामूली चीज़ से घायल हो जाऊँ, लेकिन माँ-पिताजी को मनाना मेरी क्षमता से परे था। पिताजी उन्हें चेहरे पर जैसे-चाहें वैसे घंटों रगड़ सकते थे, माँ उनसे तलवों की मरी चमड़ी छील सकती थीं, दीदी पेंसिल कतर सकती थीं, और भाई कागज़ काट सकता था, बस, सारी रोक-टोक मेरे लिए ही थी।

दाढ़ी बना लेने के बाद पिताजी ने रेज़र खोल कर ब्लेड अलग कर लिया, और कटोरी में ब्रश, रेज़र, ब्लेड, वगैरह डाल कर उन्हें खंगालने चले गए। आईना, कंघी और दरी अपनी बारी के इंतज़ार में वहीं पड़े रहे। मैं आईना, कंघी और फिटकरी रखने दूसरे कमरे में गया, जहाँ पिताजी हज़ामत के सामान को ताखे में रखने के बाद उस पर बिछे अख़बार के नीचे कुछ कर रहे थे। वह दूसरा कमरा हम तीनों भाई-बहनों का था। पिताजी ने आईना ताखे पर रखा, बालों पर एक बार कंघी फिराई और माँ से कुछ कहने रसोईघर चले गए। मैंने अख़बार को ज़रा-सा उठाया, और मेरी बाँछें खिल गईं। कितने सारे ब्लेड पड़े थे वहाँ पैकिंग के अन्दर! मैंने झट से तीन-चार ब्लेड पैंट की जेब में डाले और माँ-पिताजी की बातचीत सुनने उनके पास चला गया।

माँ थोड़ी झल्लाई हुई थीं। “इन दोनों भाई-बहन को घर से कोई सरोकार ही नहीं है। बिस्तर से उठे, जैसे-तैसे नाश्ता किया, और ग़ायब!”

पिताजी ने समझाया, “अब एक ही तो छुट्टी का दिन आता है, रविवार का। अब उस दिन भी नहीं खेलें तो …”

माँ ने बात काटी, “दो घंटे हो चुके लाटसाहबों को बाहर निकले। रविवार है तो उसका मतलब क्या हुआ? नहाएँगे-धोएँगे या जंगली-जैसे फिरते रहेंगे दिन भर? कहा था कि एक घंटे में लौट आना …”

मुझे लगा, मुझे अपनी श्रेष्ठता साबित करने का अवसर ख़ाली नहीं जाने देना चाहिए। टप से बोल पड़ा, “लेकिन मम्मी, हम तो कहीं नहीं गए। डैडी की मदद कर रहे थे तब से …”

माँ का ग़ुस्सा थोड़ा शान्त हुआ। उनके सब बच्चे जंगली नहीं थे, एक सभ्य भी था! वे बोलीं, “बस तू ही एक राजा बेटा है हमारा।“

मैं जानता था कि भाई और दीदी पड़ोस में अलका के घर खेलने गए हुए थे।

“बुला लाएँ उनकों?” मैं पिताजी की मदद कर चुका था और अब माँ को निहाल करने का अवसर तलाश रहा था।

“हाँ, जा, बुला ला। अलका के घर होंगे दोनों। सम्हाल कर जाना।“

मैं सीढ़ियों से धीरे-धीरे नीचे उतरा। अलका बगलवाली सिलेटी इमारत में हमारी ही तरह पहली मंज़िल पर रहती थी। उस इमारत की खिड़कियों के लाल छज्जे अँधेरे में दूर से ही दिखते थे। हमारी इमारत के छज्जे सफ़ेद थे, जिन पर कहीं-कहीं कालिख जम गई थी। दोनों इमारतों के बीच एक गली थी, जिसका एक छोर पार्क से मिलता था और दूसरा मुख्य सड़क से। पिताजी इसी गली में अपनी लैंडमास्टर खड़ी करते थे। वह इस समय भी अपनी जगह विराजमान थी।

मैं कूदता-फाँदता गली पार कर रहा था कि दीवार के पास घास में दबी एक वस्तु ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। उस पर जमी धूल के बावजूद मुझे पहचानते देर न लगी कि वह अलका के भाई राजू की स्वचालित खिलौना कार की छत थी। जब से उसके किसी रिश्तेदार ने वह कार दी थी, राजू के पैर ज़मीन पर पड़ने बन्द हो गए थे। भाई ने हज़ार मिन्नतें की होंगी, तब जाकर उसने दी थी वह कार दो मिनट के लिए। और, मुझे तो दी ही नहीं। बोला, “टूट जाएगी।“ मैंने दीदी से विनती की और उसने अलका से, पर वह भी पूरी चोट्टी निकली। कहने लगी, “अब, भाई, राजू के अंकल की कार है तो वो ही डिसाइड करेंगे न कि उससे कौन खेलेगा, कौन नहीं।“

मैं थोड़ी देर राजू को कार चलाते देखता रहा था। उसकी बत्तियाँ जलती थीं, वह असली मोटरगाड़ी की तरह चलती थी, और उससे वास्तविक कारों जैसी ही आवाज़ निकलती थी। राजू उसे इतनी तेज़ी से मेज़ के पाये के पास ले जाता कि लगता अब टकराई, तब टकराई, लेकिन ऐन वक़्त पर वह उसे दायें-बायें घुमा कर बचा लेता। गाड़ी का निचला ढाँचा हरे रंग की धातु का बना था और छत देखने में कपड़े की लगती थी पर दरअसल काले रबर की थी। गाड़ी में आगे-पीछे और दरवाज़ों के ऊपर शीशे लगे थे। उसके लम्बे बॉनेट के साथ रबर की एक स्टेपनी थी, जिसे उसके खाँचे से बाहर निकाला जा सकता था। राजू ख़ुशी में गुनगुना रहा था, मेरा भाई भी प्रसन्नचित्त था, और दीदी अलका के साथ पता नहीं क्या गुटर-गूँ कर रही थी।

कह नहीं सकता, उस काली छत को देख कर मुझे कितनी ख़ुशी हुई। जब छत गली में अलग-थलग पड़ी थी, तो कार के बाक़ी पाट-पुर्ज़े भी इधर-उधर छितरा चुके होंगे, मैंने सोचा। अच्छा हुआ, टूट गई! बड़ा घमंड था राजू को उस पर।

मैंने धूल झाड़ कर छत को जेब के हवाले किया और हँसता-मुस्कुराता अलका के घर जा पहुँचा। खिड़की के पास दीदी और अलका फुसफुस कर रही थीं। अलका के माथे पर गुलाबी हेयरबैंड फँसा था, और वह दीदी की बातें सुनते-सुनते अपने बालों के छोर को चूस रही थी। दीदी की दोनों चोटियों पर बड़ी तितलियों-जैसे रिबन बँधे थे और वह तर्जनी घुमा-घुमा कर किसी मुद्दे पर ज़ोर दे रही थी। आलमारी के सामने काग़ज़ की कतरनों, गोंद, और कैंची वगैरह के बीच भाई और राजू ज़मीन पर पैर फैलाए गत्ते का घर बना रहे थे।

चारों ने मुझे देखा पर मेरे आने को महत्व नहीं दिया। जैसे मेरे आने-न-आने से उन्हें रत्तीभर फ़र्क भी न पड़ता हो। माना कि मैं अलका और राजू का कोई नहीं था, पर दीदी और भाई का तो अपना था! उन्हें तो कुछ हिलना-डुलना चाहिए था, मुझे देख कर मुस्कुराना चाहिए था, कम-से-कम यही पूछ लेना चाहिए था कि मैं क्यों आया था। पता नहीं लोग छोटे भाई-बहनों से शालीन बर्ताव क्यों नहीं करते।

मैं दरवाज़े पर ठिठक गया। थोड़ी देर चुप रहा, फिर गम्भीर स्वर में बोला, “मम्मी बहुत ग़ुस्सा हैं। तुम दोनों को तुरंत बुला रही हैं।“

“अच्छा, चलो, आ रहे हैं,” दीदी ने लापरवाही से कहा और अलका के आगे उँगलियाँ नचाती रही। भाई ने तो जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं।

“डैडी भी ग़ुस्सा हैं,” मैंने रुखाई से कहा।

दीदी ने भाई को आजिज़ी से देखा और थकी आवाज़ में बोली, “चल!”

गली में मैंने भाई से पूछा, “तुम लोग आज कार से नहीं खेल रहे थे?”

“राजू बोला कि उसकी बैटरी ख़त्म हो गई है,“ उसने एक पत्थर को ठोकर मारते हुए जवाब दिया।

“बैटरी ख़त्म हो गई है? अच्छा!” मैं पिताजी के अंदाज़ में बोला।

“इसे पहचानते हो?” मैंने नाटकीय अंदाज़ में जेब से छत निकाल कर उसकी नाक के आगे लहराई, लेकिन इस कोशिश में उँगलियों के पोरों में ऐसा दर्द हुआ कि क्या बताऊँ--जैसे किसी ने तेज़ दाँतों से काट लिया हो।

भाई चौंका, “ये कहाँ मिली? दिखा!”

वह मेरे हाथ से छत छीन कर उलटने-पलटने लगा।

“तभी राजू कार से नहीं खेल रहा था! लेकिन इसमें ये गीला-गीला-सा क्या लगा है?”

छत और उसकी उँगलियों में गीला रंग लगा था।

दीदी गंभीर हो गई। “अपना हाथ दिखा,” उसने मुझसे कहा।

मैंने बायाँ हाथ आगे कर दिया।

“ये नहीं, दूसरावाला,” उसने आग्रह किया।

मजबूरन मुझे दायाँ हाथ दिखाना पड़ा। मेरी उँगलियों और अँगूठे पर काफ़ी लाल रंग लगा था।

दीदी ने ध्यान से देख कर कहा, “तुम्हारे हाथ से तो ख़ून बह रहा है। देखो, उँगलियाँ और अँगूठा, सब कट-फट गए हैं। दर्द भी हो रहा है?”

लोग कैसे बेवक़ूफ़ी-भरे सवाल करते हैं! उँगली कटने पर दर्द न होगा तो क्या गुदगुदी होगी? लेकिन बात बढ़ाने से उन्हें मेरी जेब में रखे ब्लेडों के बारे में पता चल जाता, और फिर न जाने क्या होता। मैंने बात टाल दी, “दर्द नहीं हो रहा, बस, कुछ लाल-लाल लगा है। जहाँ से छत उठाई वहाँ रंग पड़ा होगा। चलो, जल्दी चलो, नहीं तो डैडी-मम्मी और ज़्यादा ग़ुस्सा हो जाएँगे।“

दीदी घर में घुसी और उसके पीछे भाई। मैं ब्लेड छुपाने के लिए जल्दी से अन्दर जाने की फ़िराक़ में था कि भाई ने न जाने किस जन्म का बदला लिया, “मम्मी, बाबू के हाथ से ख़ून बह रहा है।“

दीदी ने आग में घी डाला, “हाँ, उसकी उँगलियाँ और अँगूठा कट-फट गए हैं।“

“कुछ कटा-फटा नहीं है। दर्द भी नहीं हो रहा, बस लाल-लाल हो गया है,” मैंने प्रतिवाद किया।

साधारण माँएँ ऐसी अवस्था में करुणा से ओत-प्रोत हो जाती होंगी, बच्चे से बेहद मुलामियत से पेश आती होंगीं, पर मेरी माँ में चंडी ने प्रवेश कर लिया। उन्होंने कठोर स्वर में आदेश दिया, “बाबू, इधर आओ!”

विश्वास न हुआ, पाँच मिनट पहले यही औरत मुझे ‘राजा बेटा’ की पदवी से अलंकृत कर रही थी। बेकार ही गया था इसके दोनों बच्चों को बुलाने। हाथ बटाने का एहसान मानना तो दूर, अब ये मेरी छीछालेदर करेगी, मुझे सबके सामने बेइज़्ज़त करेगी। हाथ में दर्द अलग हो रहा था। मैं रुँआसा होकर माँ के सामने खड़ा हो गया।

“ये तो किसी तेज़ धारवाली चीज़ से कटी मालूम पड़ती हैं,” उन्होंने कहा।

“इसने ये छत उठाई थी रोड से,” भाई ने खिलौनेवाली कार की छत माँ के आगे कर दी।

“छत?” बात माँ की समझ में नहीं आई।

“हाँ, माँ, ये राजू की कार की छत है।“ भाई ने स्पष्टीकरण दिया।

माँ ने उसे हाथ में लेकर ऐसे उलटा-पलटा जैसे चीरा लगाने से पहले वे रोहू मछली को उलटती-पलटती थीं।

“उँह, इसमें तो कोई धार नहीं।“

“जहाँ से छत उठाई, हो सकता है वहाँ धारवाली चीज़ रही हो।“ मैंने मासूमियत से कहा।

“नहीं, मम्मी, छत दिखाते समय ही इसके हाथ से ख़ून बह रहा था। ज़रूर इसके पॉकेट में कुछ चाकू-वाकू है!” भाई बख़ूबी विभीषण का किरदार अदा कर रहा था।

मैं बचाव में जेब में हाथ डाल ही रहा था कि माँ गुर्राईं, “ख़बरदार! हाथ बाहर रखो।“

उन्होंने मेरे पैंट के पाँयचे को उल्टा किया तो अन्दर से लाल धब्बों से सनी जेब उभर आई।

“हे भगवान, ये क्या रखा है इसमें? ख़ून से लथपथ है ये तो!” माँ बड़बड़ाईं और फिर बड़ी सावधानी से, ख़ून की एक भी बूँद बहाए बग़ैर, उन्होंने चारों ब्लेड बरामद कर लिए। तीन की पैकिंग सलामत थी, पर चौथे ब्लेड को मोमजामा और कवर विपत्ति से घिरे रिश्तेदार की तरह अकेला छोड़ गए थे।

“ये तेरे पास कैसे आया?” माँ का पारा सातवें आसमान तक पहुँच चुका था। दीदी कौतूहल से और भाई आनंद से ताक रहा था। माँ ने उसे घुड़का, “खड़े-खड़े तमाशा क्या देख रहे हो? जाओ, जल्दी से डेटॉल और रूई लाओ।“

भाई सकपका कर डेटॉल और रूई ले आया। ज़ख़्म पर डेटॉल लगते ही मेरी सीत्कार निकल गई, पर माँ पर कोई असर नहीं हुआ। वे रूई के फाहों से डेटॉल लगाती रहीं। वे इतनी क़रीब थीं कि मैं उनका पूरा चेहरा नहीं देख पा रहा था। माथे पर छितराए बाल, ललाट पर लगी बिंदी, एकाग्रता में सिकुड़ी भौंहें, छोटी पर चमकती नासिका, उभरे कपोल, और लम्बी-लम्बी बरौनियों से ढँकी काली-काली आँखें--मेरी माँ कितनी सुन्दर थीं! बस, अगर नाराज़ कम हुआ करतीं …

मैं सोच ही रहा था कि माँ ने प्रश्न दोहराया, “इतने सारे ब्लेड तेरे पास कैसे आए, नहीं बताएगा?”

मैं मासूमियत से बोला, “सुबह ये सब ताखे के पास पड़े थे ज़मीन में। मैं इनको लेकर आपके पास आया तो आपने दीदी-भाई को लाने भेज दिया …” बात ख़त्म करते-करते मेरे आँसू बह निकले और मैं सुबकने लगा।

“बीना, ये सब ठीक से साफ़ कर दे,” कहते-कहते माँ कमरे में पिताजी के पास चली गईं।

दीदी ने डेटॉल की शीशी पर ढक्कन लगाया और ख़ून लगे ब्लेड कूड़ेदान में फेंक दिए। भाई मुझे अविश्वास से देखता रहा।

कमरे में माँ पूछ रही थीं “आप दाढ़ी बनाने के बाद ब्लेड ठीक से क्यों नहीं रखते?”

मैं मना रहा था कि ब्लेड अब जहाँ भी रखे जाएँ, मेरी पहुँच से ज़्यादा दिन बाहर न रहें।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

जूते

 


“मीरा के लिए नए जूते ख़रीदने पड़ेंगे। पुरानेवाले बहुत तंग हो गए हैं,” मेरी पुत्रवधु आशा ने ऐलान किया। 

वह ऐसे ऐलान अकाट्य तर्कों की बिना पर करती है, उनमें क़तरब्योंत की लेषमात्र भी गुंजाइश नहीं होती। और जब ऐसे ऐलान उसकी बेटी मीरा के बारे में हों, तो पागल कुत्ते के काटे लोग भी उससे सवालजवाब नहीं करते, मैं भला किस खेत की मूली ठहरा? इसलिए मैंने व्यवस्था का यह प्रश्न नहीं उठाया कि वाक़ई जूते ही तंग हुए हैं या मीरा के पैर बड़े हो गए हैं। घर के बाक़ी सदस्यों ने भी दुम दबाए मेरी शांतिप्रिय कायरता का अनुसरण किया। 

आशा उत्साहित थी, “इस बार आउटलेट मॉल से लेंगे जूते। वहाँ चुनने में आसानी होती है और दाम भी वाजिब होते हैं। देखिए न, वहाँ बढ़िया-से-बढ़िया जूता बस अस्सी दिरहम में मिल जाएगा, जबकि बाक़ी जगहों पर दाम एक सौ बीस – एक सौ तीस से कम होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।“ 

मेरी आस्था सस्ती-से-सस्ती चीज़ ख़रीदने में है। साबुन हो या अनाज, सब्ज़ी हो या मुर्ग़े का गोश्त, इंटरनेट डेटा हो या दाढ़ी बनाने का ब्लेड, मैं वही ख़रीदता हूँ जो सबसे कम पैसों या दिरहम में बिकता है। एक रुपया बचाने के चक्कर में मैं एक बार जिलेट की जगह वी जॉन की दाढ़ी बनानेवाली शेविंग क्रीम तक ख़रीद चुका हूँ, भले ही उसके बाद हर इस्तेमाल के दौरान हज्जामों-जैसी फ़ीलिंग को ख़ामोशी से जज़्ब ही क्यों न करना पड़ा हो। 

हमारे घर से आउटलेट मॉल का फ़ासला कोई तीस किलोमीटर का है। पैसे बचाने के लिए यह दूरी मामूली है, पाजामे के नाड़े की लम्बाई जितनी। गर्मी की दुपहरिया में पैंतालीस मिनट गाड़ी चलाने और उसके बाद दस मिनट पार्किंग खोजने के बाद हम आउटलेट मॉल में दाख़िल हुए। हम, यानी सबसे आगे प्रैम में मीरा, उसके पीछे, प्रैम धकेलती आशा, उससे एक क़दम पीछे मेरी पत्नी महिषी, उससे दो क़दम पीछे मेरा पुत्र अद्भुत, और फ़ैशनपरेड में कमनीय अर्द्धनग्न बालाओं की तरह आख़िर में शो स्टॉपर की तरह मैं। 

हम बड़े उत्साह और लगन से अस्सी दिरहम के जूते की तलाश में लग गए। जूता हमसे छुपन-छुपाई खेलने लगा। दुकान-पर-दुकान छान मारी, पर कहीं नज़र ही नहीं आया कमबख़्त! हर जगह भ्रष्ट नेताओं और पिलपिले अफ़सरों की तरह एक सौ पैंतीस दिरहम से ज़्यादा क़ीमती जूतों की भरमार थी। 

मरता क्या न करता! आशा ने उन्हीं एक सौ पैंतीस दिरहमवाले जूतों में से मीरा के लिए एक जोड़ा पसंद किया। मीरा ने तुरंत मुँह बिचका कर उसे नापसंद कर दिया। 

अब मीरा की बारी थी। उसने एक जूते की ओर इशारा किया। आशा ने मीरा से भी बड़ा मुँह बिचकाया। 

माँ-बेटी लगभग एक घंटा सम्मानित महिलाओं-जैसा बर्ताव करती रहीं, यानी मीरा आशा की पसंद में और आशा मीरा के चुनाव में मीनमेख निकालती रही। आख़िरकार अमरीका-भारत व्यापार समझौते की तरह उनमें भी रज़ामन्दी हो गई और कोयले की खान से हीरा, मेरा मतलब है कि हज़ारों में एक जोड़ी होनहार जूता, दोनों को पसंद आ गया। 

“क्या कहते हो, अद्भुत?” आशा ने सत्तारूढ़ दल की तरह सदन की राय माँगी। 

इतने ज़रूरी मौक़े पर अद्भुत विपक्ष की तरह ग़ायब हो चुका था। उसे एक अदद जूते की अपनी ज़रूरत अचानक याद आ गई थी। 

मैंने उसे ढूँढने के लिए इधर-उधर देखा। सामने ट्रेनर सेक्शन था। 

‘ट्रेनर’ जूते? भला जूते भी किसी को ट्रेनिंग दे सकते हैं? कैसी वाहियात बात है! मैंने मन-ही-मन निर्णय लिया, वक़्त मिला तो मैनेजर को उस सेक्शन का नाम बदलने की ताक़ीद करूँगा। 

लेकिन उससे पहले मुझे अद्भुत को खोजना था, जो चुनावी वायदों की तरह पकड़ में नहीं आ रहा था। 

मैं ट्रेनर सेक्शन से बाहर निकला। अद्भुत एक दूसरे सेक्शन में जूते तलाशता दिखा। 

“मैंने सोचा कि तुम ट्रेनर सेक्शन में होगे।“ मैंने बिलावजह झेंपते और बावजह हाँफ़ते हुए कहा। 

“मुझे ‘रनिंग’ शूज़ चाहिएँ, ट्रेनर्स नहीं। दोनों अलग चीज़ें हैं।“ उसने ऐसी सहजता से समझाया मानो एलजेब्रा और जेब्रा का फ़र्क बता रहा हो। 

‘रनिंग’ शूज़! मतलब, दौड़नेवाले जूते। पर, जूते कहाँ दौड़ते हैं? अगर वे सचमुच दौड़ पाते तो रैक पर सदा वहीं थोड़े ही मिलते जहाँ उन्हें छोड़ा गया हो? क्या ज़माना आ गया है! आदमी तो जहाँ का तहाँ रह गया और जूते इतना आगे बढ़ गए कि कोई ट्रेन करता है, कोई दौड़ लगाता है, और कोई सरकारी कर्मचारी की तरह बिना कुछ किए रैक पर इत्मीनान से पड़ा रहता है। लेकिन मौक़ा इन बातों में और वक़्त ज़ाया करने का नहीं था। पहले ही कई मिनट गुज़र चुके थे, जबकि मीरा का मिज़ाज बदलने के लिए कुछ मिलीसेकेंड ही काफ़ी होते हैं। 

अद्भुत ने मीरा के लिए चुने गए जूतों पर अपनी हामी का ठप्पा लगा लिया। बदले में, आशा ने उन जूतों के लिए हामी भर दी जो अद्भुत ने ख़ुद के लिए पसंद किए थे। 

“सस्ते में मिल गए। पाँच सौ दिरहम से कम में नहीं मिलते कहीं और, पर यहाँ पड़े सिर्फ़ साढ़े तीन सौ के!” क्रेडिट कार्ड स्वाइप करते हुए उसने विजयमुस्कान बिखेरी। 

साढ़े तीन सौ दिरहम, माने, क़रीब नौ हज़ार रुपए! मुझे धक्का लगा—वह रक़म मेरी मासिक कर्मचारी भविष्यनिधि पेंशन से कई गुना ज़्यादा थी। 

दो दिन बाद मेरी बेटी मानसी और मैं महिषी को सहारा सेंटर ले गए, जन्मदिन पर उसकी पसंद के उपहार ख़रीदने के लिए। जूते और कपड़े, दोनों ही उसे बताए बिना लेते तो बड़े-छोटे निकलने पर उन्हें बदलने का झंझट था। 

महिषी को शो केस में सजाई चीज़ें पसंद नहीं आ रही थीं। जो जूते मुझे आकर्षक लगते, वह उन पर नाक-भौं सिकोड़ती—उसे कोई जोड़ा ‘मर्दाना’ लगता, कोई बुढ़ियों के लायक, कोई आजकल की छोकरियों के लिए मुफ़ीद, और कोई बेहूदा रंग का। अगर इनमें से कोई दोष नहीं निकला, तो भी, उसमें ‘वह बात’ नहीं होती! 

“मुझे सादग़ीवाला जूता चाहिए!” वह तंग आ रही थी। तंग तो मैं और मानसी भी आ रहे थे, पर फ़र्क यह था कि हम चुप थे। सिर्फ़ एक सेल्समैन ही था जो बिना तंग आए, बड़े जोशो-ख़रोश से जूते पर जूते दिखाए चला जा रहा था। और करता भी क्या, उस समय दुकान में ग्राहक के नाम पर सिर्फ़ हम ही जो थे। सारे जूते दिखाने के बाद उसने उन्हें दुबारा दिखाना शुरू कर दिया। 

“ऐसे नहीं, पहन कर देखिए, पहन कर,” बोल-बोल कर वह जूतों में शू हॉर्न फँसाता, और सम्मोहित-सी महिषी जूते में पैर डाल देती। 

“अब चल कर देखिए, चल कर,” वह आग्रह करता, और चाभीवाली गुड़िया की तरह महिषी चलने भी लगती। कहना न होगा, तरक़ीब काम आई और सिर्फ़ पंद्रह मिनट की क़वायद के बाद महिषी ने तीन सौ पचहत्तर दिरहम की एक ऐसी जोड़ी पसंद कर ली जिसे पहले वह सिरे से नापसंद कर चुकी थी। 

किराना और घरेलू चीज़ें ख़रीदने के लिए हम अगले दिन सेंचुरी मॉल गए। चाहे कुछ भी लेना हो, महिषी मॉल या स्टोर की परिक्रमा किए बग़ैर सौदा तय नहीं करती। उस दिन भी वही हुआ। वह सबसे पहले किराना से बिलकुल उल्टी तरफ़ वाले छोर पर गई। 

“अरे, यहाँ भी जूते बिकते हैं!” उसने हैरत से कहा। 

बात सच थी—वहाँ सादे और भड़कीले, हर तरह के, जूतों की भरमार थी। वह जूतों में पैर घुसा-घुसा कर चलने लगी। मैं हैरान, अभी कल ही तो इसने मानसी से कितने महँगे जूते ख़रीदवाए थे! मुझे ताकता देख बोली, “तुम भी देखो न कोई अच्छी-सी जोड़ी अपने लिए!” 

उसकी बात में दम था। मेरी सबसे अच्छी जोड़ी के दाएँवाले जूते ने तीन साल के इस्तेमाल के बाद एक छेद से मुझे आँख दिखाना शुरू कर दिया है। डेढ़ साल पहले सेल में ख़रीदे स्नीकर्स अगले हिस्से में मुहल्ले के मोची से काली चिप्पी लगवा कर लज्जा ढाँक रहे हैं, और छः महीने पहले दो सौ रुपयोंवाली जोड़ी के दाएँ जूते के सोल के रिश्तों के बीचोंबीच दरार आ गई है। संक्षेप में, मैं प्रेमचंद की अवस्था में पहुँच चुका था और जल्दी ही हुसैन की तरह नंगे पाँव चलने की नौबत आने का ख़तरा था। 

मैं जूतों के ढेर में सस्ती जोड़ी की तलाश में जुट गया। एक-एक जूते को देखना, उठाना, और सेल्समैन की मदद के बिना पहनना—कितना अच्छा अनुभव था! सेल्समैन तो माथा ख़राब कर देते हैं अपनी बकर-बकर से, “ऐसे पैर डालिए, चल कर देखिए, बैठ कर देखिए … ” जैसे हम जिंदगी में पहली बार जूते पहन रहे हों। हुँह! 

मुझे थोड़ी देर तक जूतों में पैर डालते-निकालते देखने के बाद आशा से रहा नहीं गया, “आप मर्दों के जूते क्यों नहीं ट्राई करते? यह औरतों के जूते हैं।“ 

झेंप मिटाते हुए मैं मर्दोंवाले सेक्शन की ओर लपक लिया और जल्दी ही मेरे हाथों जैकपॉट, यानी तीस दिरहम का एक जूता, लग गया। तबतक महिषी भी ख़ुद के लिए सैंडल पसंद करने के बाद वहाँ पहुँच गई, “ये वाला देखो!” उसके हाथ में जूतों की एक जोड़ी थी। 

“हाँ, यह ज़्यादा अच्छी है,” आशा ने सास की हाँ-में-हाँ मिलाई। 

मैंने जूते पहने। फिर, वापस अपनी पसंदवाले पहने। 

“नहीं, मेरी पसंदवाले ज़्यादा आरामदेह हैं,” कहते हुए मैंने जूते शॉपिंग कार्ट में डाल दिए। उन्हें लेते हुए मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही थी। उनसे मेरा पहनावा तो निखरता ही, मेरी याददाश्त के मज़बूत होने की भी पूरी उम्मीद थी। उन पर ‘मेमोरी फ़ोम’ जो लिखा था।