सोमवार, 29 जून 2026

होली

 

पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं फ़िल्मी गीतों को पिरोतीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट में से ’हवा, ’बरसात और ’शाम पिछले सप्ताह आपकी नज़र हो चुकी हैं। आज पेश है वह स्क्रिप्ट जो 18 मार्च, 2003 को प्रसारित हुई थी। आज की स्क्रिप्ट में गीतों का स्थान रिक्त है, ताकि आप अपनी पसन्द का उपयुक्त गाना वहाँ रख सकें।

 

होली

(प्रसारण अवधि 44 मिनट, प्रसारण समय संध्या पाँच के बाद और आठ बजे से पहले)

 

(गुनगुनाते हुए) यूँ तो हमने लाख हँसी देखे हैं, तुमसा नहीं देखा! … अजी, चौंकिए नहीं, ये गीत हम आप ही के लिए गुनगुना रहे हैं। ज़रा ग़ौर कीजिए, आज कितनी बार रंग से सराबोर हुए, कितनी बार दूसरों को भिगोया, रंग कभी आँखों में घुसा तो कभी कानों में, पर मानना पड़ेगा! थक कर चूर होने की बजाय आप खिसक आए हैं रेडियो के क़रीब। ये चाहत ही तो है आपकी जो हमें बार-बार खींच लाती है आपके पास और जिसकी वजह से होली के इस होली-होली ऐटमस्फ़ीयर में हम हो लिए हैं आपके साथ ‘शीर्षक संगीत’ के चंद नग़मे और ढेर सारी बधाइयाँ लेकर। आज तो, भाई, होली पर ही गीत बजते रहने चाहिएँ। क्यों, क्या ख़याल है?

 

गीत 1:

होली के हुड़दंग से भला कौन बच सका है? हमने ऐसे बहुत से महारथी देखे हैं जो महीना-भर पहले ढिंढोरा पीटते हैं कि वे होली नहीं खेलेंगे, पर होली के दिन दोपहर बारह बजते-न-बजते रंगों में ऐसे सने-पुते नज़र आते हैं कि पहचान में ही नहीं आते। एक कान हरा तो दूसरा लाल, दाँत काले तो बाल जामुनी! ऐसे टेक्नीकलर बन जाते हैं कि ईंट से घिस-घिस कर रंग छुड़ाया जाए तो भी शायद एक सप्ताह तो गुज़र ही जाए उनकी असली रंगत नुमायाँ होने में। और, तन से भले ही छूट जाए, मन से कहाँ मिट पाता है होली का रंग!

गीत 2:

एक बात सच-सच बताइएगा! आज आपने किस-किसके साथ होली खेली? मेरा मतलब है, मौक़ा देखकर कहीं किसी ख़ास के साथ छुप कर तो होली नहीं खेली? अरे, शरमाइए नहीं, घबराइए भी नहीं, हम किसी को बताने थोड़े-ही जा रहे हैं! बस, आपकी चोरी पकड़ रहे थे और पकड़ भी ली! चलिए, माफ़ किया इस गीत के साथ।

गीत 3:

अरे, आपका चुपके से होली खेलनेवाला राज़ क्या खोल दिया, आप तो एक्स्ट्रा लाल हो गए! चलिए, आप भी क्या याद करेंगे, हम भी अपना एक राज़ ज़ाहिर किए देते हैं सिर्फ़ आपके आगे। वैसे तो हम डायटिंग करते हैं, रोज़ अपना वज़न तौलते हैं, पर आज पता नहीं कौन-सा कीड़ा काट गया कि हमने सुबह से इतने सारे पापड़, गुझिया, चिप्स, दही बड़े, गुलाब जामुन और मालपुए खा डाले हैं कि भूखी भैंस भी शर्मा कर, रंभा कर, और खाने से इन्कार कर देती। लेकिन हम नहीं माने। आप से बतियाने से पहले दो गिलास ठंडई और ढाल आए हैं कि गला तर रहे। अब अगर आपने ठंडई नहीं पी तो हम क्या करें? चलिए, ये गाना सुन लीजिए। इसमें भी ठंडई का मज़ा है।

गीत 4:

आज लोगों का होली खेलने का अलग-अलग स्टाइल देखने को मिला। कोई बड़ी मेहनत से टेसू के फूलों का रंग निकाल रहा था तो कोई मेंहदी घोल रहा था, किसी का दिल एनामेल पेन्ट पर क़ुर्बान हो रहा था तो कोई विशुद्ध कीचड़ का प्रयोग कर धन्य हो रहा था। अब हमें ये तो नहीं पता कि होली खेलने का आपका स्टाइल कौन-सा है, पर हमारा स्टाइल भी बड़ा स्पेशल था। बताएँ? अच्छा, बताते हैं। हमने सिर पर शावर कैप पहना, चेहरे और हाथों पर लोटा-भर सरसों का तेल मला, और ढेर सारा सूखा रंग रख दिया टेबिल फ़ैन के आगे। जैसे ही कोई पास आता, हम चुपके से फ़ैन चला देते, और रंग की परत ऐसे चढ़ जाती कि स्प्रे पेंट करनेवाले भी दंग रह जाएँ। आज का दिन तो गुज़र गया लेकिन देखिए, होली कल भी है। इस समझदारी से खेलिएगा कि भीगनेवाले के मुँह से वाह निकले, आह नहीं। 

गीत 5:

आप भी हैरान होंगे, आज हमें हो क्या गया है! क्या करें, होली का माहौल ही ऐसा है। लेकिन होली में इतना बावला भी नहीं होना चाहिए कि होश ही गुम हो जाएँ। न ही इतना भीगना-भिगोना चाहिए कि बुख़ार चढ़ जाए। अब देखिए न, इन्हीं दिनों आसपास इधर-उधर रिंकी-पिंकी, चुन्नू-मुन्नू, सबके इम्तहान भी तो चल रहे हैं! होली तो हर साल आएगी, पर इस साल का इम्तहान दोबारा देने की नौबत नहीं आनी चाहिए। पर्चा ऐसे मज़े में निकलना चाहिए जैसे मज़े में ये गाना गाया जा रहा है।  

गीत 6:

भला देखिए तो, आधे घण्टे से ज़्यादा हो गया आपकी कम्पनी में और पता ही नहीं चला! ये तो अच्छा हुआ कि मच्छर उड़ाने के चक्कर में घड़ी पर नज़र पड़ गई वरना हम न जाने कब तक बकर-बकर करते रहते। आज शाम कितने सारे लोग घर आने वाले हैं, हमको कितने लोगों से मिलने जाना है, गिले-शिक़वे भुला कर मुस्कुराहटें बिखेरनी हैं। तो चलें? बस ये वायदा लिए जा रहे हैं कि आप भी आज से सिर्फ़ मुस्कुराहटें बिखेरेंगे, शिक़वे भुला देंगे, और याद रखेंगे आज की ये शाम जिसे आपकी [नाम] ने सजाया था कुछ बेहतरीन नग़मों से। फ़िल्में थीं …..। और जाते-जाते नज़र करते हैं फ़िल्म … का यह गीत 

गीत 7:


रविवार, 28 जून 2026

रेलगाड़ी

                                                      बाहर दालान था

पीछे खलिहान था

पेड़ थे, चिड़ियाँ थीं

ताल था, मछलियाँ थीं

 कोस-भर दूर से रेल गुज़रती थी

सोंधी भाप घर उतरती थी

क्षितिज पर सियाह लकीर खिंच जाती

बहन उसे देखने बाहर आ जाती

 

’लेलगाली’, वह तुतलाती

’रेलगाड़ी’, दादी समझातीं

दादा बहलाते, रेलगाड़ी देखने चलोगे?

उस पर चढ़ोगे?

 

मैं झिझकता, मन तो करता है

पर, दादाजी, दिल डरता है

रेल पर चढ़ूँ और वो ऐसी चले

कि फिर रोकने से भी न रुके

 

फिर क्या होगा?

तब तो मैं बहुत पछताऊँगा

आप-सब को

दोबारा कैसे देख पाऊँगा?

 

दादा मुस्कुराते

ऐसा कैसे हो जाएगा?

तेरा दादा

तुझे बचाएगा

 

घर-खलिहान में आग लगी

न दादा बचे, न दादी बचीं

हम रात-रात जागे

खेत-खेत भागे

 

बाबूजी ने काँधे पर उठाया

खिड़की से अन्दर पहुँचाया

मन बहुत घबराया

पर मैं कुछ न बोल पाया

 

भीड़ में सैंकड़ों दब गए

बहन-माँ नीचे रह गए

बस, इतनी तसल्ली थी दिल को

बाबूजी रेल पर चढ़ गए

 

रेल चलते ही तलवारें चलने लगीं

हर तरफ़ रक्त की धार बहने लगी

मैं लाशों के गट्ठर तले छुप गया

                                                            
                                                              
                                                              मैं नौ साल की उम्र में मर गया

शुक्रवार, 26 जून 2026

 


पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट के बारे में पिछली बार बताया था। फ़िल्मी गीतों को पिरोती ये स्क्रिप्ट मैंने आकाशवाणी के सहयोगियों के लिए बारह-तेरह साल पहले लिखी थीं। श्रोताओं ने इन्हें दोबारा सुनाने का अनुरोध कई-कई बार किया था। हवा और ‘बरसात पर आधारित स्क्रिप्ट से आप वाक़िफ़ हैं। आज पेश है ‘शाम पर स्क्रिप्ट। ‘होली पर आधारित स्क्रिप्ट आगे पेश होगी। इन्हें पढ़िए और बताइए, क्या आपका चुनाव भी उन्हीं गीतों का होता जो हमने आकाशवाणी में उपलब्धता के कारण किया था, या आपकी पसन्द कुछ और है? एक बात और, स्क्रिप्ट का एक भी शेर मेरा नहीं है। प्रोग्राम पेश करनेवाले तारतम्य भंग होने के डर से शायरों का नाम नहीं बताते, और मेरे नोट्स ग़ायब हो चुके हैं। अगर आप शायरों के नाम बता सकें, तो मेहरबानी होगी।

शाम

(प्रसारण अवधि 29 मिनट, प्रसारण समय रात नौ के बाद और ग्यारह बजे से पहले)

मुझे पूछने का हक़ दे कि ये एहतिमान [रवायत] क्यों है?

मेरे साथ प्यास क्यों है, तेरे पास जाम क्यों है?

जिसे मेरी तीरा-बख़्ती [बदनसीबी] से फ़रोग [चमक] मिल रहा था

वही सुबह पूछती है, मेरे घर में शाम क्यों है?

शाम साँवली से काली होकर रात बन चुकी है। सैंकड़ों-हज़ारों सितारे उसकी माँग में झिलमिला उठे हैं। ऐसे में आप हैं, हैं ’सदाबहार दस नग़मे, और मैं, [नाम]! लेकिन हमारे साथ कुछ ऐसा भी है जिसका ज़िक़्र लबों तक पहुँचने से पहले-ही सहम कर ख़ामोश हो जाता है।

गीतः ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा ग़म, लता मंगेशकर, आह

उनके ग़म की टीस का कोई मुक़ाबला नहीं। जब वो पास होते थे, सारा ज़माना ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो जाता था।

ख़ुदा जाने तुम्हारे नाम से कैसी मुहब्बत है

किसी का नाम लेता हूँ, तुम्हारा नाम आता है

गीतः फिर वही शाम, वही ग़म, वही तनहाई है, तलत महमूद, जहाँआरा

दर्द में डूबा फ़साना चाहिए

और सुनने को ज़माना चाहिए

दोस्त-दुश्मन सब अयादत [मिज़ाजपुर्सी] कर चुके

वो न आए जिनको आना चाहिए

 

गीतः लो आ गई उनकी याद, वो नहीं आए, लता मंगेशकर, दिल एक मन्दिर

अब्र [बादलों] में छुप रहा है चाँद

चाँदनी छन रही है शाख़ों से

जैसे खिड़की का आधा पट खोले

झाँकता हो कोई सलाखों से

गीतः तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है, हेमन्त कुमार, ख़ामोशी

नक़ाब तुमने जो उलटा है मुस्कुरा के कभी

फ़लक [आसमान] के चाँद-सितारों को शर्म आई है

गीतः चौदहवीं का चाँद हो, मुहम्म्द रफ़ी, चौदहवीं का चाँद

’सदाबहार दस नग़मे आपकी ख़िदमत में पेश कर रही है, आपकी [नाम] ।

गीतः ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, हेमन्त कुमार - लता मंगेशकर, जाल

सहारा ढूँढ़ लाया हूँ मैं ज़िन्दगी के लिए

इक अजनबी की ज़रूरत है, अजनबी के लिए

बुरा न मानो तो मैं तुमसे एक बात कहूँ

तुम्हारी मुझे ज़रूरत है ज़िन्दगी के लिए

गीतः फैली हुई हैं सपनों की बाहें आजा चल दें कहीं दूर, लता मंगेशकर, घर नम्बर 44

कहकशाँ [तारामण्डल] रस्ते-रस्ते बिखर जाएगी

चाँदनी मेरे आँगन उतर जाएगी

आज आने का वादा है, आएँगे वो

आज झोली मुरादों की भर जाएगी

 

गीतः तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चाँद निकला, अलका याग्निक, ज़ख़्म

 

वो आएँगे और चाँदनी रात होगी

न ये बात होगी, न वो बात होगी

कटी उम्र सारी इसी कश्मकश में

अगर वो मिलेंगे तो क्या बात होगी

 

गीतः तेरा मेरा प्यार अमर, फिर क्यों मुझको लगता है डर, लता मंगेशकर, असली-नक़ली

 

शायद ये सच है कि हर किसी के पास दिलक़श अंदाज़े-बयाँ नहीं होता, पुरअसर आवाज़ नहीं होती, लेकिन

ये बात और है कि पत्थर में न ढल सकें लेकिन

हर जवाँ दिल में कई ताजमहल होते हैं

तो रुख़सत होती है [नाम] इस वायदे के साथ

 

गीतः जो वादा किया हो, निभाना पड़ेगा, मुहम्मद रफ़ी - लता मंगेशकर, ताजमहल

बरसात

 


पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट के बारे में पिछली बार बताया था। फ़िल्मी गीतों को पिरोतीं  ये स्क्रिप्ट मैंने आकाशवाणी के सहयोगियों के लिए बारह-तेरह साल पहले लिखी थीं। श्रोताओं ने इन्हें दोबारा सुनाने का अनुरोध कई-कई बार किया था। हवा पर आधारित पहली स्क्रिप्ट से आप वाक़िफ़ हैं। आज पेश है ‘बरसात पर स्क्रिप्ट। ‘शाम और ‘होली पर आधारित तीसरी और चौथी स्क्रिप्ट आगे पेश होंगी। इन्हें पढ़िए और बताइए, क्या आपका चुनाव भी उन्हीं गीतों का होता जो हमने आकाशवाणी में उपलब्धता के कारण किया था, या आपकी पसन्द कुछ और है?

बरसात

(प्रसारण अवधि 29 मिनट, प्रसारण समय रात साढ़े नौ के बाद और ग्यारह बजे से पहले)      

गर्मी का मौसम विदा लेने को है। काली घटाओं की चिलमन से झाँक रही हैं वर्षा रानी। वर्षा रानी, तो बस, वर्षा रानी हैं! उनके आने का अंदाज़ सबसे जुदा है। वो किसी नई-नवेली, शर्माती-सकुचाती, दुल्हन-जैसी हौले-हौले पग धरती नहीं आतीं। वो तो आती हैं बिजली की आँखें-चुँधियाती चमक, मेघों की दिल-दहलाती गरज, और मदमस्त पवन के तेज़-तूफ़ानी झोंकों के साथ और कर जाती हैं सराबोर, बस, पहली-ही मुलाक़ात में। कोई उस अंदाज़ से घबराता है तो घबराता रहे! आपके-मेरे इसरार पर भी पवन कहाँ मद्धिम करेगी अपनी रफ़्तार!

गीतः कारी बदरिया मारे लहरिया, लता मंगेशकर, आदमी     

तपती धरती को सींचने से पहले-ही बरसात की पहली बूँद अक्सर उड़ जाती है भाप बन कर। जैसे किसी यतीम की तरफ़ बढ़ा ममता-भरा हाथ यकायक वापस खींच लिया गया हो। उस हाथ का तो, बस, इंतज़ार ही रह जाता है। किसी बाग़ीचे में पेड़ की शाखों से बँधे झूले में झूल कर देखिए, ये इंतज़ार कितना खलता है! ठंडी सबा तक नागवार लगने लगती है बदन को।

गीतः सावन के झूले पड़े हैं, लता मंगेशकर, जुर्माना

बरसात में बाग़ीचे और खेत ही हरे-भरे नहीं हो जाते, विसाले-यार की तड़प भी बुलंदियाँ छूने लगती है। दिल के जज़बात मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में बयाँ होने लगते हैं। अब देखिए न, उनका साथ, भीगी रात, मदमाती हवा, प्यारा-सा चंदा, बेहोश-सी कलियाँ—ये भी कोई वक़्त हुआ जीवन की उस अनजानी कमी के ज़िक्र का?

गीतः ये रात भीगी-भीगी, मन्ना डे - लता मंगेशकर, चोरी चोरी

किसी-भी दिलचस्प शख़्सियत से मुलाक़ात लम्बे अरसे तक ज़ेहन में बसी रहती है, है न? ओर अगर वो शख़्सियत इतनी हसीन हो कि पानी की बूँदें उसके फूल-से नाज़ुक गालों पर ठहरने को मचला करें, उसकी रेशमी ज़ुल्फ़ों से मोती की तरह ढलका करें! उफ़्फ़! वैसी मुलाक़ात तो ज़िंदगी-भर नहीं भुलाई जा सकती।

गीतः ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगी, मुहम्मद रफ़ी, बरसात की रात

उन्हें भुलाना आपके लिए नामुमकिन है, उधर वो भी आप-ही के ख़यालों में बेचैन हैं। भूलना-भुलाना कैसा? अब तो जब-जब बरसात आएगी, तन के साथ ही भीगा करेगा बेचारा मन। बरसात प्यार का संदेश जो लाएगी! हर बरसात के साथ वह मीठी-सी पहली मुलाक़ात याद आनी ही है अब। संकोच छोड़िए, कह डालिए दिल की वो बात जो होठों तक आकर ठहर जाती है।

गीतः रिमझिम के तराने ले के, मुहम्मद रफ़ी - गीता दत्त, काला बाज़ार

इश्क़ और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। आपके शर्माने, सकुचाने ने ही फ़ाश कर दिया न आपकी मुहब्बत का राज़! चलिए, अच्छा ही हुआ। अब अगर आपके वो आपसे जुदा होना भी चाहें, तो आप और हमराज़ मिलकर उन्हें रोक सकते हैं इस प्यार-भरी मनुहार से।   

गीतः बरसात में, लता मंगेशकर और साथी, बरसात

हमें उम्मीद है, बल्कि यक़ीन है, आपने उन्हें रोक भी लिया होगा और उन्हें हर ग़म, हर तक़लीफ़ से महफ़ूज़ रखने की भी ठान ली होगी। अब उस आलम में देर नहीं, जब घटाओं के गरजने और बिजली के चमकने पर वे बड़ी मासूमियत से आपके पास सिमट आएँगे। 

गीतः बादल यूँ गरजता है, लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार, बेताब  

बुधवार, 24 जून 2026

हवा


आलमारी में दस्तावेज़ तलाश करते हुए आज कुछ ऐसा हाथ आ गया जिसमें आपकी भी दिलचस्पी होगी—चार स्क्रिप्ट जो मैंने आकाशवाणी के सहयोगियों के लिए लिखी थीं। बारह-तेरह साल पहले फ़िल्मी गीतों को पिरोती ये स्क्रिप्ट इतनी लोकप्रिय हुईं कि श्रोताओं ने इन्हें दोबारा सुनाने का अनुरोध कई-कई बार किया था। पहली स्क्रिप्ट ‘हवा’ पर आधारित थी, दूसरी ‘बरसात’ पर, तीसरी ‘शाम’ पर, और चौथी का आधार है ‘होली’। पहली स्क्रिप्ट प्रस्तुत है नीचे, शेष आगे पेश होंगी। इन्हें पढ़िए और बताइए, क्या आपका चुनाव भी उन्हीं गीतों का होता जो हमने आकाशवाणी में उपलब्धता के कारण किया था, या आपकी पसन्द कुछ और है?

हवा

(प्रसारण अवधि 29 मिनट, प्रसारण समय रात साढ़े नौ के बाद और ग्यारह बजे से पहले)

गर्मी की उमस-भरी दोपहर, लू के थपेड़े, पसीना, ज़िन्दगी की जिद्दोजहद, और उस जिद्दोजिहद में थका इन्सान! इस आपाधापी का, सच मानिए, एक अलग लुत्फ़ है। देखिए, इसमें आप-हम ही नहीं थकते! सूरज भी थक जाता है अपने ताप से, और जा छिपता है रात के आग़ोश में। सूरज की जगह ले लेते हैं ढेर सारे टिमटिमाते तारे। बस, ज़रा-सा इंतज़ार और करिए-पुरवाई का झोंका आते ही छत पर बिछी सफ़ेद चादर ठंडी लगने लगेगी।

गीतः दिल ढूँढ़ता है, भूपेन्द्र, मौसम

सच, गर्मी में पुरवाई रिसते घाव पर मरहम से कम सुकून नहीं देती! आज कहाँ है किसी के पास इतना समय कि आपके पास आकर बैठे, दो बातें कहे, दो बातें पूछे, और आपके लड़खड़ाते क़दमों को सहारा दे? ऐसे में, इस पुरवाई को सहेली बना लेने को जी चाहता है।

गीतः सुन री पवन, लता मंगेशकर, अनुराग

जीवन एक परीक्षा ही तो है! इस परीक्षा में, कभी-न-कभी, हम बिलकुल तनहा होते हैं। उस दौरान जाने अनजाने बन जाते हैं और हम अपनों के बीच बेगाने हो जाते हैं। जैसे, अपने-ही देश में परदेसी हो गए हों। अगर आप भी ऐसे-ही हालात से गुज़र रहे हैं, तो परेशान न हों! कोई आपका नहीं, तो न सही। लिख भेजिए हवा पर एक सलाम-शायद आपका मीत मिल जाए! 

गीतः हवाओं पे लिख दो, किशोर कुमार, दो दूनी चार   

तो आपका पैग़ाम पहुँच ही गया उनके पास, जिन्हें आप बेताबी से तलाश रहे थे! चलिए, आपका ग़म बाँटनेवाला कोई तो मिला। मीत को ग़म से संजीदा तो कर लिया, अब अपनी ख़ुशियों से सराबोर भी तो कीजिए! ऐसा करिए, उन्हें ले जाइए ऐसी जगह जहाँ वो हों, आप हों, ख़ुश्बू हो, और हो ठंडी-ठंडी हवा, ताकि आपदोनों सारे ग़म भुलाकर बहक उठें।

गीतः बलमा खुली हवा में, आशा भोंसले, कश्मीर की कली

वैसे, ठंडी हवा बरसात में और भी मदमाती हो जाती है। बहकना बन्द कर ख़ामोशी से सुनिए इस प्रीत-भरी रात की सदा, जिसमें है झींगुरों की चीकी-मीकी और एक प्यार-भरा संदेश, जो हवा दे रही है।

गीतः आजा रिमझिम के ये प्यारे-प्यारे गीत लिए, लता मंगेशकर - तलत महमूद, उसने कहा था

कितना प्यारा होता है वो अहसास जब कोई आपका बन जाता है, सिर्फ़ आपका। छोटी-से-छोटी ख़ुशी और बड़े-से-बड़े दर्द में उसका साथ जिंदगी को हसीन बना देता है। बहार आ जाती है सूने जीवन में। जी चाहता है, उस पर सबकुछ निसार दें।

गीतः ये हवा ये रात ये चाँदनी, तलत महमूद, संगदिल

दुख, दर्द, ख़ुशी, प्यार, मुहब्बत—जीवन का चक्र नहीं थमता । एक के बाद एक नए रंग आते हैं और पुराने मिट जाते हैं। जो मिलता है, बिछुड़ता ज़रूर है एक दिन। आँखों में आँसू की लकीर छोड़कर, अपनी याद छोड़कर! बस, रह जाती है हवा में उसकी महक। हम कहते ही रह जाते हैं, अभी तो आए थे, ऐसी भी क्या जल्दी है जाने की? 

गीतः अभी न जाओ छोड़कर, मुहम्म्द रफ़ी, आशा भोंसले, हम दोनों  

बुधवार, 3 जून 2026

अब, उनका क्या करें!


पाँच काउंटर्स का छोटा-सा एक बैंक। एक छोर पर कैश लेने-देने वाले बाबुओं के केबिन थे, जिनका निचला हिस्सा लकड़ी का और ऊपरी भाग शीशे का था और जिनसे बाबुओं के मुँह और बाहें साफ़ दिखाई देती थीं । उसके बाद तीन बाबुओं के बैठने की जगह थी और दूसरे छोर पर मैनेजर का कमरा था। मैनेजर के कमरे की खिड़की पर पर्दा लगा था और बेइंतहा गर्मी के बावजूद उसका दरवाज़ा बन्द था। हर दस मिनट पर बहुत-से काग़ज़ और रजिस्टर लिए एक कर्मचारी दरवाज़ा खटखटा कर एक-दो मिनट के विलम्ब के बाद उस कमरे में प्रवेश करता और दो मिनट में साहब के दस्तख़त करवा कर लौटता। उसके बाहर निकलते ही दरवाज़ा स्वतः बन्द हो जाता था। बैंक का सारा तामझाम मात्र ढाई सौ वर्ग फ़ुट में समाहित था और ग्राहकों के लिए डेढ़ सौ वर्ग फ़ुट की अपार जगह छोड़ दी गई थी।

            बैंक के इर्द-गिर्द पाँच किलोमीटर तक आबादी का नामोनिशान न था। बैंक, जैसे, साथ लगे आर्मी कैम्प और एक बेहद सफल स्कूल की सहूलियत के लिए ही बनाया गया था। बैंक से बाहर निकलते ही युद्ध में जीता दुश्मनों का एक टैंक दीखता, फ़ौलादी ज़ंजीरों से घिरा, अकेला, झेंपा हुआ-सा। अक्सर सैनिकों की क़वायद की आवाज़ भी सुनाई देती।

यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल फ़ोन पर तस्वीर उतारने की गुंजाइश नहीं थी, जब फ़िज़ा में इलाहाबाद का नाम बदलने का ज़िक्र तक न था, और जब वहाँ पच्चीस पैसे में गर्मागर्म समोसा मिला करता था। अगर आप यह समझ रहे हैं कि इलाहाबाद के एक कोने में छुपे उस बैंक में बड़ी शांति का वातावरण रहता होगा, चैन की वंशी बजती होगी, तो बात सरासर ऐसी नहीं है। वहाँ इतनी चिल्लपों मचती थी, इतना सिर-फुटव्वल होता था, कि क्या बताऊँ! कभी-कभी तो नौबत हाथापाई तक उतर आती। याद नहीं कि वह कौन-सा साल था और कौन-सा महीना, पर इतना दुरुस्त है कि तारीख़ सोलह थी। इतनी भीड़ थी बैंक में, कि लोगों की क़तार मुख्य दरवाज़े से दस फ़ुट बाहर तक पहुँच गई थी। गर्मी का उमस भरा मौसम। उस पर सूरज इस ज़िद पर अड़ा था शायद, कि कल चाहे दिन भर बादलों के नर्म बिस्तर पर सुस्ताऊँ, पर आज तो अपनी तपिश से सबको झुलसा कर ही दम लूँगा।

सिर पर चमकता सूरज, पैरों के नीचे धूल-मिट्टी-कंकड़ का शहरी कालीन, और साँस लेने को आसपास के खेतों से आती लू-मिश्रित-धूल। रही-सही कसर पसीने की अविरल धार ने पूरी कर दी थी। भीड़ के पसीने की मात्रा देख कॉर्पोरेशन के नल को इन्फ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स हो जाता। ललाट, बाल, गर्दन, बाहें और गंजों के सर पसीने में यूँ चिपचिपाए हुए थे जैसे तेल में भुँजे बैंगन को कड़ाही से निकले घंटे-दो-घंटे बीत चुके हों।

ज़ाहिर है, लोगों के तन पर कपड़े गीले ज़्यादा थे, सूखे कम। दिल्ली होती, तो तीन-तीन रुपयों में नारियल की एक सरीखी कटी गरी बेचने वाला आ जाता। कलकत्ता के झालमूढ़ीवाले और भिखारी इस बिज़नेस ऑपरच्यूनिटी को एक्सप्लॉइट करते। मुंबई में सींगदाना और रेनबो सैंडविच की फेरी लगानेवाले चक्कर लगा लेते। लेकिन, इलाहाबाद इलाहाबाद था; दिल्ली, कलकत्ता या मुंबई नहीं। साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था इलाहाबाद एक ज़माने में। यह अलहदा बात है कि उस समय तक साहित्य नाममात्र को बचा था वहाँ; अलबत्ता कारें ज़रूर ज़्यादा हो गई थीं।

इलाहाबाद के उसी गौरवशाली अतीत से प्रभावित होकर, या टार्गेट पूरा करने की मजबूरी से परेशान होकर; न जाने कब एक नौजवान भीड़ के पास पहुँच गया। उसके जूतों के ऊपरी चमड़े स्वस्थ सोल का मोह त्याग चुके थे। आमतौर पर वैसे जूते कबाड़ीवाले या कूड़ेदान की शरणस्थली में चिरनिद्रा में लीन हो जाया करते हैं, पर वहाँ तो बात ही कुछ और थी। धागे की सिलाई और कीलों की वहृद व्यूह रचना नौजवान के जूतों की आत्मरक्षा कर रही थी। उसके काले पैंट पर पसीने की सूखी लकीरों ने सफ़ेद धारियों का डिज़ाइन बना दिया था। मटमैली कमीज़ औेर उसके ऊपर गहरे नीले रंग की टाई, जिसकी नॉट के पास का हिस्सा मैल से काला हो चुका था, नौजवान की ख़स्ताहाली खुले शब्दों में बयान कर रही थीं। नौजवान ने हैट भी लगाया हुआ था—गर्मी से बचने के लिए या किसी लोकप्रिय फ़िल्मी हीरो की नक़ल उतारने के लिए, निश्चय करना मुश्किल था। पर एक बात तो थी! उसकी इस वेशभूषा  ने हर किसी का ध्यान आकृष्ट कर लिया था।

कवि बच्चन कहते थे कि हिन्दी फ़िल्मों में तीन घंटे में पोइटिक जस्टिस मिल जाता है, लेकिन असली ज़िंदगी में या तो बहुत देर से मिलता है या फिर मिलता ही नहीं। फ़िल्में अलग हैं, यथार्थ अलग। तो, हमारे इस नौजवान का इस्तिक़बाल किसी फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं हुआ। कुछ लोगों ने उसे ऐसे घूरा मानो वह शीशे का बना हो और उसके आरपार देखा जा सकता हो। कुछ ने उससे नज़रें चुराईं। कुछ ने उसे शक़ की निगाहों से देखा। कुछ डरे हुए भी मालूम पड़े, मानो नौजवान एड्स का वायरस लिए घूम रहा हो।

नौजवान को इस रूखे अंदाज़ की शायद लत पड़ चुकी थी। वह लोगों के आक्रोश, असुविधा और असहयोग को नकार एक-एक व्यक्ति के पास जाने लगा। हर नए शख़्स के पास जाकर वह मुस्कुराता, सर थोड़ा झुकाता, और कहने लगता, “सर! आप अपने बच्चे की फ़ीस जमा करने के लिए खड़े हैं। आपके बच्चे के लिए हमारी कम्पनी ने प्रोमोशन के तौर पर यह इन्साइक्लोपीडिया निकाला है। दाम है सिर्फ़ चार सौ पचास रुपया। यही इन्साइक्लोपीडिया बाज़ार में नौ सौ रुपए में मिलता है। और भी बुक्स हैं। दिखाऊँ, सर?”

यह मोनोलॉग बड़ी अच्छी तरह रटा हुआ था उसे। हर नए आदमी के आगे सर झुकाते ही जैसे कहीं कोई बटन दब जाता उसके अंदर, और रिकॉर्ड बज उठता। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि हर आम हिंदुस्तानी क़तार की तरह उस क़तार में भी ऊबे-परेशान लोग एक-दूसरे के इतने पास खड़े थे कि किसी का जूता किसी की चप्पल पर टिका था, किसी की कोहनी किसी की पसलियों में घुसी जा रही थी, कोई अपने पीछे खड़े व्यक्ति की साँसें अपनी गर्दन पर महसूस कर रहा था, और किसी का ब्रीफ़केस आगेवाले के टखनों से बारबार टकरा रहा था।

नौजवान का मोनोलॉग मुझे विविधभारती की विभिन्न सभाओं की तरह कम-से-कम पाँच बार सुनाई पड़ चुका था। सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने बात पूरी सुने बिना हथेली यूँ हिलाई, जैसे मक्खी उड़ा रहा हो। दूसरा व्यक्ति साइकिल और इन्साइक्लोपीडिया के बारीक अंतर को समझे बिना बोला, “नौ सौ रुपय्ये की चीनी साइकिल फेल है बाज़ार में। बच्चा एक्को दिन चढ़ नहीं पाएगा।“

हर आदमी की फ़ितरत अलग, प्रतिक्रिया अलग! धीरे-धीरे नौजवान एक सफ़ारी सूटधारी सज्जन के पास पहुँच गया। नौजवान कुछ बोल पाता, उसके पहले ही सफ़ारी सूटवाले सज्जन बोल उठे, “अरे, जाओ!”

बात थोड़ी ज़्यादा ही रुखाई के साथ कही गई थी। नौजवान के अहम को ठेस लगी। उसने कुछ कहने की कोशिश की। सफ़ारी सूटवाले सज्जन न जाने किस गंभीर समस्या से ग्रस्त थे। उनका पारा आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने आव देखा न ताव, नौजवान को धकेला, उसका कॉलर पकड़ लिया, और एक धौल जड़ दिया उसके पेट में। नौजवान लड़खड़ाया। उसकी किताबें गिर पड़ीं।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन पहली सफलता के उत्साह में नौजवान पर फिर झपटे। सब लोग इस मुफ़्त तमाशे को दिलचस्पी से देखने लगे। आख़िर यह सब किसी फ़िल्म के मुफ़्त ट्रेलर से कम थोड़े-ही था! इससे पहले कि सफ़ारी सूट वाले सज्जन अपनी युद्ध कला का एक-आध नमूना और पेश करते, एक ज़नाना आवाज़ गूँजी, “यह क्या कर रहे हैं आप?”

जब सब हाथापाई से लुत्फ़ंदोज़ हो रहे थे तभी चालीस साल के आसपास की एक महिला का पदार्पण हुआ। सफ़ेद साड़ी, सफ़ेद ब्लाउज़, दोनों पर सफ़ेद कढ़ाई, और धूप से बचने को काला चश्मा, जो आँखों की बजाय उसके माथे की शोभा बढ़ा रहा था—कोई भी कह सकता था कि वह महिला आभिजात्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती थी, किसी बड़े आदमी की पत्नी थी या ख़ुद किसी ज़िम्मेदारीवाले पद पर आसीन थी, और उस लकड़बघ्घों के झुंड में अचानक सिंहनी-समान प्रकट हो गई थी।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन सकपकाए, नौजवान लड़खड़ाता हुआ अपनी टाई ठीक करने लगा, और बाक़ी लोग सकते में आ गए।

एक मनचले ने चुटकी ली, “यह तो अमरीका-इराक़ युद्ध हो गया!”

सफ़ारी सूटधारी सज्जन को सुपरपावर से अपनी तुलना एक न भाई। वे पराजित साँढ़ की तरह चिंघाड़े, “जानता नहीं मैं कौन हूँ?”

महिला ने कहा, “आपके व्यवहार से आपका परिचय पहले ही मिल चुका! चलिए, उठाइए इस लड़के की किताबें!”

अब तक बैंक मैनेजर भी बाहर आ गया था। उसके पीछे-पीछे लिप्स्टिक लगे होठों से मधुर मुस्कान बिखेरती बैंक की महिला चपरासी भी बाहर आ गई थी। बैंक मैनेजर अपनी तोंद सँभालते हुए बोला, “मैडम! आप वहाँ क्यों खड़ी हैं? उधर जाइए! औरतों के लिए अलग लाइन है।“

फिर महिला चपरासी से मुख़ातिब होता हुआ बोला, “ले जाइए इनको उधर।“

महिला चपरासी मैनेजर को अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी। उसने बिना हिलेडुले एक बार साड़ीवाली महिला को देखा, एक बार मैनेजर को। साड़ीवाली महिला को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था। वह रौबदार आवाज़ में बोली, “सुना नहीं आपने? उठाइए इस लड़के की किताबें!”

सफ़ारीवाले साहब ढिढाई पर उतर आए। गुटके से काले दाँतो को भन्नाए कुत्ते की तरह दिखा कर बोले, “काहे उठाएँ? आप हैं कौन? सरोजिनी नायडू? कि झाँसी की रानी?”

“कि रजनी?” मनचले ने फिर फ़ब्ती कसी।

मैंने बीचबचाव करने की सोची, पर उससे पहले ही महिला दृढ़ता से बोली, “मैं महिषी हूँ। और कुछ पूछना हो तो बाद में पूछना, पहले उठाओ इनकी किताबें!”

लोगों की सोच और भैंसों की चाल में कोई ख़ास फ़र्क नहीं होता। जहाँ पहली भैंस मुड़ी, बाक़ी भी मुड़ जाती हैं। वहाँ भी कुछ वैसा ही हुआ। एक सज्जन बोले, “मैडम का नाम-पता जान कर क्या करेगा? उठा किताब!”

बस, बाक़ी लोग भी बोल उठे, “उठाओ किताब!”

मैनेजर शांति बहाली की सफलता पर संतुष्ट होकर लौटने लगा। महिला चपरासी उससे चुंबक-सी सटी चल पड़ी। तभी महिषी ने कहा, “एक मिनट! हमलोग कब तक ऐसे खड़े रहेंगे?”

मैनेजर अपनी तोंद का विस्तार लिए एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाते हुए घूम गया। महिला चपरासी भी सवालिया शक़्ल लिए घूम गई। मैनेजर पर दाग़े गए सवाल को उसने झेला, “आपको तो पहले ही कहा कि आपकी लाइन अलग है। जाइए, लगिए!”

महिषी किसी दूसरी ही मिट्टी की बनी थी। बोली, “नहीं! अलग लाइन क्यों? दो-दो घंटे से लोग खड़े हैं लाइन में यहाँ। कोई औरत आ जाए और उसका काम जल्दी हो जाए, उससे बाक़ी लोगों को क्या फ़ायदा होगा?”

मैनेजर ख़फ़ा हो गया, “तो क्या करें? लगा तो हुआ है आदमी!”

महिषी बोली, “एक आदमी काफ़ी नहीं तो और लोग लगाइए काम पर। दो-दो घंटे आदमी अगर सिर्फ़ फ़ीस देने के लिए खड़ा रहे, तो बाक़ी कामों में कितना हर्ज़ होता है, पता भी है आपको? अगर आपके आदमी ठीक से काम करना नहीं जानते तो दूसरे आदमी लगाइए काम पर! कमरे की खिड़की से पर्दा हटा कर बैठिए। देखिए, कौन-क्या कर रहा है। और अगर आपसे ये प्रॉब्लम हल नहीं होती, तो हमें बताइए। आपके जनरल मैनेजर के पास इसका हल होगा ... “

मैनेजर बड़बड़ाया, “अब कैसे करें? लोग तो बस हुक़्म चलाने लगते हैं!”

महिषी फिर बोली, “तो ठीक है! हम सब लोग चलते हैं स्कूल के प्रिंसिपल के पास। उन्हें बताएँगे कि उन्होंने ग़लत बैंक का चुनाव किया है। स्कूल का करोड़ों का अकाउंट किसी अच्छे बैंक में ट्रांसफ़र कराएँ। और आपके जनरल मैनेजर को भी बता देते हैं कि उन्होंने ग़लत आदमी को मैनेजर की जगह बिठा दिया है।“

क़तार के बाक़ी लोग भी उत्तेजित हो गए, “मैडम ठीक कहती हैं ... मैं तो बहुत पहले से ही ये करना चाहता था ... “ वगैरह-वगैरह।

घोषणाओं की झड़ी लग गई, तो मैनेजर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, “अच्छा, चलिए! कोई व्यवस्था करते हैं।“ उसने कमरे की खिड़की से पर्दे हटा दिए। दस्तावेज़ों पर बारह-तेरह मिनट की बजाय दो-तीन मिनट में दस्तख़त होने लगे, तो फ़ीस जल्दी जमा होने लगी। जहाँ पहले और आधा घंटा खड़ा रहने का अंदेशा था, वहीं अब पाँच मिनट में फ़ीस जमा कर मैं गाड़ी में बैठ गया।

“तुमने कहा था कि बस पाँच मिनट में अद्भुत की फ़ीस जमा कर आ जाओगे, और मुझे तपती गाड़ी में चालीस मिनट बिठा दिया,” महिषी ने शिकायत की।

“सॉरी! मुझे क्या पता था कि आज यहाँ कामचोरी के रेकार्ड टूटनेवाले हैं।“ मैंने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा।

“मैं न आती तो अभी और न जाने कितनी देर खड़े रहते!”

“हाँ, तुम्हारी वजह से सबका काम बन गया,“ मैंने गाड़ी आगे बढ़ाते हुए कहा, “सिवाय एक के!”

“सिवाय एक के?” महिषी ने एयरकंडीशनर का फ़्लो एडजस्ट करते हुए पूछा।

“हाँ, उस लिप्स्टिकधारी चपरासी का काम तो बिगाड़ दिया न तुमने!” मैं शरारत से मुस्कुराया।

“ओह, वो!” महिषी मुस्कुराई, फिर धीरे से बोली, “अब, उनका क्या करें!”

मैंने गाड़ी घर की ओर बढ़ा दी। हमारी बेटी के स्कूल से लौटने का समय होने वाला था।