उस दिन मैं पूरा दम लगा कर दौड़ रहा था।
वैसे, मैं दौड़ नहीं पाता। स्थूलकाय नहीं हूँ और अगर मेरे शरीर पर
कई किलो माँस-चर्बी चढ़ जाए तो भी मैं ओवरवेट नहीं होने वाला, फिर भी, न जाने क्यों
मेरे घुटने जर्जर हो चुके हैं। ट्रेडमिल पर पंद्रह मिनट चलते ही चरमरा-चरमरा कर सेवानिवृत्ति
भत्ता माँगने लगते हैं कमबख़्त!
इस दारुण अवस्था के बावजूद मैं दौड़ रहा था एक ख़ाली टैक्सी के पीछे।
न, मुझे कहीं जाना नहीं था। चंद मिनट पहले ही तो मैं पत्नी, बेटी
और पोती के साथ टैक्सी से उतरा था। टैक्सी के रवाना होते ही बेटी ने घबरा कर कहा था,
“अरे! मेरा फ़ोन मेरे पॉकेट से स्लिप होकर टैक्सी में छूट गया। कैब रोकिए!”
जुम्मा-जुम्मा पंद्रह दिन भी नहीं हुए थे वह फ़ोन ख़रीदे। उसके जीवन
का सबसे मँहगा फ़ोन था वह।
मैंने देखा, कैब टैक्सीवे पर दस मीटर आगे बढ़ चुकी थी। उसकी रफ़्तार
तेज़ हो रही थी। दुबई मॉल में लोग इतनी ज़्यादा तादाद में आते हैं जैसे सर्दियों में
सिर से रूसी झड़ती है। ऐसे में, वह हमारीवाली कैब थी भी या नहीं, यक़ीनन कहना मुश्किल
था।
बेटी और मैं टैक्सियों के पीछे हाथ हिला-हिला कर रोकने का इशारा
कर बदहवास दौड़ पड़े। आगेवाली कैब बदस्तूर चलती रहीं, अलबत्ता हमारे पीछे की टैक्सियाँ
धीमी हो गईं। पलक झपकते ‘हमारी’ टैक्सी बाईं ओर मुड़ कर गुम हो गई, और उसके साथ ही फ़ोन
पाने की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
मायूस और थके-हारे हम अलाइटिंग प्वाइंट वापस आए, जहाँ मेरी पत्नी
हमारी नन्ही पोती के साथ इंतज़ार कर रही थीं।
अब ख़रीदारी करने का सवाल न था।
“चलो, पुलिस में रपट लिखाते हैं,” मैंने कहा। हम डूबतों के लिए उसी
तिनके का सहारा बचा था।
दुबई मॉल में पुलिस पोस्ट में तीन मेज़ें थीं, लेकिन सिर्फ़ एक पर
ही कोई बैठा था। हमारे अलावा कुल जमा चार लोग थे वहाँ; एक वहाँ की पारम्परिक पोशाक
में, दो वर्दी में, और एक अंग्रेज़ी सूट में।
“मेरा फ़ोन टैक्सी में छूट गया,” बेटी ने रुँआसे स्वर में कहा।
“टैक्सी का नम्बर है आपके पास?” सूटधारी का प्रश्न था।
किसी तरह आँसू सँभालते हुए बेटी ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाया।
“फ़िक्ऱ नहीं, रिलैक्स,” उसने ढाँढ़स बँधाते हुए पूछा, “आपने टैक्सी
स्टैंड से ली थी?”
“ना!” मेरी पत्नी ने फँसी-फँसी आवाज़ में कहा।
“फ़िक्ऱ नहीं, रिलैक्स,” उसने लगभग पुचकारते हुए प्रश्न किया, “आपको
टैक्सी का रंग याद है—ऊपर क्या था और नीचे क्या?”
मैंने इन्कार में सिर हिलाया।
“फ़िक्ऱ नहीं, रिलैक्स,” उसने ग़ज़ब के धैर्य से सवाल किया, “आपने
कैब किसी सर्विस ऐप से ली थी?”
“नहीं,” हम सब का उत्तर था।
“फ़िक्ऱ नहीं, रिलैक्स,” वह फिर बोला।
अगर हम पुलिस को कोई ठोस जानकारी नहीं देंगे, तो तहकीकात कैसे होगी?
लेकिन जानकारी हो, तब तो दें! मैंने दिमाग़ पर ज़ोर डाल कर दो कौड़ी का भेद खोला, “ड्राइवर
एशियाई था, शायद बंगाली।“
पुलिसवाले ने भेद को दौ कौड़ीवाला ट्रीटमेंट दिया। अनसुनी कर बोला,
“क्या आप उस गुम फ़ोन को कॉल कर सकते हैं?”
“कर तो सकते हैं, पर हमारे पास दूसरा कोई फ़ोन नहीं। बस, वही था।“
हम सकुचाए।
बेटी की ओर अपना फ़ोन बढ़ाते हुए वह मुस्कुराया, “अब इसे न गुमा देना!”
बेटी ने नम्बर डायल किया।
“अगर घंटी बजती है तो चिंता की कोई बात नहीं, वरना … “ पुलिसवाले
का मंतव्य था।
मैं ऐसे अनुभव से दो साल पहले गुज़रा था, जब बेंगलुरू के सब्ज़ीबाज़ार
में किसी ने मेरे पॉकेट से फ़ोन निकाल कर पलभर में उसे ख़ामोश कर दिया था। पुलिस उस फ़ोन
का पता नहीं लगा सकी थी।
कहीं ड्राइवर या हमारे बादवाली सवारी ने सिम कार्ड निकाल कर फ़ोन
हथिया न लिया हो … मेरा मन आशंकाओं के सागर में गोते लगाने लगा।
तभी चमत्कार हुआ, लापता फ़ोन की घंटी बजने लगी!
“जवाब दो, भाई, जवाब दो,” हम मन-ही-मन प्रार्थना करने लगे।
हमारी अर्ज़ सुन ली गई। कोई लाइन पर आया। वह ड्राइवर ही था। उसने
तुरन्त मॉल वापस आने में असमर्थता ज़ाहिर की क्योंकि उसकी सवारी कहीं और जा रही थी।
“मॉल आने में तो एक घंटा लग जाएगा, ऐल नाहदा में, जहाँ से आपने टैक्सी
पकड़ी थी, वहीं फ़ोन दे दूँ?” उसने पूछा।
सवाल में चालाकी की बू थी। यहाँ हमें पुलिस का सहारा था, जबकि रिहाइशी
मुहल्ले में वह हमें चकमा दे सकता था।
“नहीं-नहीं, आप प्लीज़ दुबई मॉल में ही फ़ोन वापस कीजिए। हम आपको भाड़ा
और इनाम देंगे।“ बेटी ने टैक्सीवाले से याचना की और मैंने पुलिसवाले से मदद की गुहार
लगाई।
वह फ़ोन लेकर गुर्राया, “हैल्ल! मॉल आओ।“
दूसरी ओर से न जाने क्या जवाब आया।
“तुम्हारा नम्बर क्या है?”
उसने नम्बर नोट कर अपने सहयोगी की ओर बढ़ाया और ड्राइवर को आदेश दिया,
“इस लाइन को काटना मत, मैं तुम्हारे नम्बर पर कॉल कर रहा हूँ।“
उसके सहयोगी ने डायल किया,
050 8964423
ड्राइवर ने झूठ नहीं कहा था, नम्बर उसी का था।
“फ़िक्ऱ नहीं, रिलैक्स। ड्राइवर एक घंटे में फ़ोन लौटा देगा,” पुलिसवाले
ने बेटी से कहा, “मैं अब जा रहा हूँ। मेरी ड्यूटी तो पैंतालिस मिनट पहले ही ख़त्म हो
गई थी।“
वह चला गया।
इंतज़ार का एक-एक पल भारी पड़ रहा था। किसी तरह एक घंटा ग़ुज़र गया,
पर ड्राइवर गधे के सिर से सींग की तरह लापता ही रहा।
हमारी बेक़रारी बढ़ती देख दूसरे पुलिसवाले ने ड्राइवर को फ़ोन मिलाया,
“हम्म्म … कब … ”
“वह आ रहा है!” अब वह हमसे मुख़ातिब था।
हमारी घड़कनें तेज़ होने लगीं, मैं पुलिस पोस्ट के बाहर चहलक़दमी करने
लगा, पर ड्राइवर का कहीं नामोनिशान नहीं था।
दो मिनट बाद पुलिसवाले ने बताया, “वह आपका फ़ोन ‘लॉस्ट ऐंड फ़ाउंड’
काउंटर पर छोड़ कर चला गया है।“
हम ‘लॉस्ट ऐंड फ़ाउंड’ काउंटर की ओर लपके। मेरी बेटी के जीवन का सबसे
मँहगा फ़ोन सुरक्षित पड़ा था वहाँ।
बेटी के फ़ोन अनलॉक करते ही अधिकारी ने कोई पूछताछ या काग़ज़ी कार्रवाई
किए बग़ैर उसकी चीज़ उसे सौंप दी।
“ड्राइवर हमसे मिला भी नहीं। अब उसे किराया और इनाम कैसे देंगे?”
निर्दोष पर शक़ करने का अपराधबोध हमारा उपहास कर रहा था। कुछ लोग और व्यवस्थाएँ आज भी
इंसानी भरोसे पर क़ायम हैं— कितने अचरज की बात है!

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