क्या आपको कभी अपने आसपास लोगों की हरकतों पर हैरत होती है? घृणा उपजती है? ग़ुस्सा आता है? शर्म आती है? ख़ास कर उन लोगों की बेहूदा हरकतों पर, जो लकदक कपड़ों में, मँहगे मोबाइल फ़ोन से लैस, पढ़ेलिखे दिखते हैं, किन्तु सार्वजनिक स्थलों पर अपना उल्लू सीधा करने की जुगत में दूसरों का जीना दूभर कर देते हैं?
सामान्य चाल से थियेटर से बाहर निकलते समय मुझे पीछे चल रहे लोग
अक्सर धक्का देते हैं। उन्हें मुड़ कर देखने पर अधीरता से कहते हैं, “आगे बढ़िये!” आगे
तो वैसे भी बढ़ रहा था बंधु, उसके लिए मेरी पीठ में छेद करने का प्रयास करने का क्या
विशेष प्रयोजन था?
व्हीलचेयर के पीछे चलनेवालों की व्यग्रता देखते ही बनती है। येन-केन-प्रकारेण,
उन्हें किसी भी तरह उससे आगे बढ़ना ही होता है—व्हीलचेयर अस्पताल में हो, पार्क में
हो, या सड़क पर-उनकी बला से।
सड़क पर ज़ीब्र क्रॉसिंग से पहले गाड़ी रोकनेवाले मैंने कम ही देखे
हैं। अधिकतर ड्राइवरों का वश चले तो वे ज़ीब्र क्रॉसिंग पर चल रहे लोगों को रौंद कर
गाड़ी निकाल ले जाएँ। गाड़ी धीमी करने या उसे रोकने की मजबूरी पर उनकी आँखों से बरसती
घृणा को देख कर मैं सहम जाता हूँ। सतयुग होता, तो शायद भस्म ही हो जाता।
ख़ाली सड़क पर बीच रात में आम लोगों द्वारा हॉर्न बजाने की बात छोड़िए,
एम्बुलेंस और पुलिस की गाड़ियों के सायरन बजने का औचित्य मेरी समझ से बाहर है। वे किसे
चेतावनी देते हैं, बात सोचने की है। आवारा कुत्तों को?
घरों और मोटरगाड़ियों में ज़ोर-ज़ोर से संगीत बजानेवाला एक ढूँढ़िए,
हज़ार मिलेंगे। कानफाड़ू शोरशराबे से कष्ट भी हो सकता है, यह उनकी समझ से परे है। इर्दगिर्द
इमारतों की खिड़कियों के शीशे कराह न उठें, तो ऐसे लोगों के स्पीकर की मर्दानगी को ठेस
लगती है।
भरे बाज़ार गुप्तस्थानों को खुजलाने-मसलने वालों की कमी नहीं है हमारे
यहाँ। शरीर आख़िर है ही क्या? माटी का पुतला! माटी के पुतले को टटोलने में आपत्ति की
गुंजाइश कहाँ होती है? एक परिचित को भरी महफ़िल
में रह-रह कर बदन टेढ़ा कर अंतड़ियों की सड़ी गैस के निसृतिकरण तथा नथुनों में देर तक
उँगली घुसा-घुमा-फँसा कर अनुसंधान-उत्खनन करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती, बल्कि
वे उसी बीच कोई ‘ज़ोरदार’ बात कह कर हाथ मिलाने को भी प्रस्तुत कर देते हैं। मैं दंग
रह जाता हूँ—जब वे मेरे सामने इतने बेतकल्लुफ़ हो जाते हैं तो पाख़ाने में क्या करते
होंगे?
हवाई जहाज़ हो
या रेलगाड़ी, दुकान हो या अस्पताल, कुछ लोग बिना चिल्लाए बात नहीं कर पाते। कुछ ट्रैफ़िक
जाम में फँसने पर हॉर्न बजाते रहते हैं, मानो ध्वनितरंगें उनका रास्ता खोल देंगी। क़तार
को धत बता कर आगे खड़े हो जाने वाले, बोलते समय थूक की बरसात करने वाले, दूसरों का स्थान
हथियाने वाले, सबसे पहले सर्विस माँगने वाले … समाज के शाही ख़ज़ाने में जवाहरातों-नगीनों
की कमी नहीं, कहाँ तक गिनाऊँ!
कभी सगर्व कहा
जाता था कि भले ही हमारे प्यारे हिन्दुस्तान में उजड्डता जीवनशैली की अभिन्न पहचान
हो, लेकिन विदेशों में हम से अच्छा व्यवहार कर के कोई नहीं दिखा सकता। अफ़सोस! अब उस
गर्वोक्ति को नज़र लग चुकी है। दुकानों में चोरी करने, नदियों-जलाशयों में गंदगी बहाने,
सड़कों पर थूकने, हल्लागुल्ला मचाने, महिलाओं को घूरने, फ़ायर अलार्म बाइपास करने, उठाईगीरी,
वगैरह में हम विदेशों में भी नाम कमाने लगे हैं। हाल यह है कि कई देशों में हमें संभ्रांत
मुहल्लों में घर नहीं मिलते, और कई देशों में हमारे मुहल्लों में वहाँ के निवासी नहीं
जाते।
हम बच्चों की
पढ़ाई पर इतना ख़र्च करते हैं, उन्हें अच्छे-से-अच्छे स्कूल में भेजते हैं, पर वही बच्चे
बड़े होकर गरिमामय आचरण क्यों नहीं करते? क़ायदे-कानून से चलने की बजाय वे उनसे कन्नी
क्यों काटते हैं, उनका ग़लत इस्तेमाल क्यों करते हैं, सच्चे लेकिन कमज़ोर इन्सान की अनसुनी
कर थोड़े से लाभ के लिए शक्तिशाली मक्कार का साथ क्यों देते हैं, गिरगिट की तरह रंग
क्यों बदलते हैं? हमारे नैतिक मूल्यों में इतना ह्रास कैसे हो गया है?
मेरे विचार में,
बच्चे बड़े होकर अचानक बदल नहीं जाते। अभिभावक और शिक्षक शुरू से उनसे अव्वल आने का
आग्रह ही नहीं करते, बल्कि आदेश भी देते हैं। बच्चा गीत गाए, साज़ बजाए, नृत्य करे,
नाटक करे, तैराकी करे, एबेकस सीखे, फ़ुटबॉल खेले, वादविवाद करे, पढ़ाई करे, या जो कुछ
भी करे—अव्वल आए बग़ैर उसकी गुज़र नहीं। जो अव्वल आए वही सफल है, स्नेहभाजन है। और, अव्वल
भी एक बार नहीं, बार बार, लगातार आए बिना ‘स्नेहभाजन’ को कोपभाजन बनने में देर नहीं
लगती। अब, अव्वल आने के तो दो ही तरीक़े हैं। या तो सबसे तेज़ आगे बढ़ो, या आगेवालों को
धकेल कर राह से निकालबाहर करो! अगर दोनों तरक़ीबें काम न आएँ, तो शिक्षक, ट्रेनर, रैकेट,
माइक, हवा, धूप, किसी पर भी दोष मढ़ दो। बच्चे छुटपन में ही यह मूलमंत्र सीख जाते हैं,
कि अभिभावकों के क्रोध से बचने के लिए ईमानदारी नहीं, छल का सहारा लेना आवश्यक है।
बस फिर क्या है? सहपाठी सहपाठी नहीं रहते, शिक्षक शिक्षक नहीं रहते, सहकर्मी सहकर्मी
नहीं रहते, यहाँ तक कि मनुष्य मनुष्य नहीं रहते। वे या तो उनकी मंज़िल तक पहुँचने का
ज़रिया होते हैं या राह का रोड़ा; जैसे देवता, वैसी पूजा।
एक बात और है। ज़्यादातर बच्चे स्कूलबस या किराये की सवारी से विद्यालय जाते हैं। वहाँ शिक्षकों की निगाहों के सामने चंद घंटे गुज़ारने के पहले और बाद वे अच्छा-ख़ासा समय बस या सवारी में बिताते हुए वाहन चालक के लोकव्यवहार से बहुत कुछ सीखते हैं। ड्राइवर, जो कोहरे में डूबी सर्द सुबह में पिक अप स्पॉट से सौ मीटर पहले से ही हॉर्न बजाने लगता है यह देखे बिना कि सब बच्चे पहले से ही मौजूद हैं, जो आगे निकलनेवालों और रास्ता काटनेवालों को गालियाँ देता है, जो रिक्शा और छोटी गाड़ियों का रास्ता छेंक कर अपना वाहन आगे बढ़ाता है, जो चालाकी और निडरता से कुछ दूर रॉन्ग साइड गाड़ी चला कर आगे पहुँच जाता है, जो ज़ीब्र क्रॉसिंग और ट्रैफ़िक सिगनल को “भाव नहीं देता”, जो पकड़े जाने पर पुलिसवाले को “मैनेज” कर लेता है। असली हीरो तो वही है! अभिभावक बच्चों को स्वयं स्कूल छोड़ें, तो भी स्थिति कोई बहुत अलग नहीं होती। बचपन के सबसे संवेदनशील दस साल बच्चा ऐसे ही ‘हीरो’ से अपारंपरिक शिक्षा ग्रहण करता है। अचरज नहीं कि इस तरह परिपक्व हुआ नन्हा नागरिक ‘दुनियादारी’ में ‘होशियार’ हो जाता है, निजस्वार्थ को सर्वोपरि मानने लगता है। वह कोडिंग में पारंगत हो जाता है पर सभ्य समाज में निर्वहन की बारीकियों से अनभिज्ञ रह जाता है। बेचारा!

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