सोमवार, 12 जनवरी 2026

मुर्दों की खेती

हमारा घर पुराना था
वैसे, घर हमारा कहाँ था!
किराये का था
फिर भी
हम उसे अपना मानते थे
चूहे, छिपकली, गौरेया, कीट-पतंगे भी
बरसों से
उसे अपना जानते थे।
 
एक बार वहाँ
बहुत चीटियाँ हो गईं
छोटी-बड़ी, लाल-काली
रुक-रुक कर रेंगने वाली
तपाक से डंक मारने वाली
सूजी में, शहद में
सब्ज़ी में, नमक में
उन्होंने मेरे टिफ़िन को भी नहीं छोड़ा
मैंने सिल से उठाया लोढ़ा
चींटी कुचलने को कमर कसी
तभी अम्मा चौके में आ घुसीं
ना, बेटा! चींटी को मत मारना
किसी का घर मत उजाड़ना
मैंने अम्मा की बात मानी
चींटी को बख़्श देने की ठानी।
 
उधर अम्मा गेहूँ धोकर
धूप में पसारती थीं
इधर गौरेया की पलटन को
ख़बर हो जाती थी
धूल में अनाज बिखर जाता था
अम्मा की मेहनत पर
पानी फिर जाता था
मैंने ख़रगोश के दरबे में दाना फैलाया
गौरेया का झुंड उसमें घुस आया
गर्व से अम्मा को बुलाया
देखो, इन्हें कैसा सबक सिखाया!
मौक़ा पाते ही फुर्र-से उड़ जाएँगी
तुम्हें और सताने दोबारा नहीं आएँगी।
 
अम्मा बोलीं, हाय राम
ये क्या किया!
निरीह पंछियों को क़ैद कर लिया?
देखा है, हमारे कुत्ते की रोटी
तोता अक्सर खा जाता है?
और, उसका पानी तो
ख़रगोश हमेशा गिरा जाता है
वह हमें देखता है पर उन्हें कुछ नहीं कहता
वह जानता है, साथ मिलकर कैसे जिया जाता है।
 
दीवार पर टँगी तस्वीर
की बड़ी-बड़ी आँखों से
अम्मा जब ताकती हैं
मुझे हँसी आ जाती है …
सिर्फ़ अम्मा ही गर्त में दफ़्न नहीं हुईं
उनका सिखाया भी
उनके साथ ही दफ़्न हो गया है
अब मजबूरी में जुर्म नहीं होते
अपराध आधुनिक शगल बन गया है
अम्मा, आप कीड़ों-परिंदों की भी सोचती थीं
पर हमने इंसानों के बारे में भी
सोचना बन्द कर दिया है
उजाड़ता है कोई ग़रीबों के छप्पर
किसी ने किसी देश को ग्रस लिया है।
 
फूल-पत्ते-पौधे हमें नहीं भाते हैं
हम मुर्दों की खेती करते हैं
मुर्दे उगाते हैं
मुर्दे पसंद हैं हमें
अपनी गली में
अपनी बस्ती, मुहल्ले, शहर में
हम एक नया रिवाज चला रहे हैं
हम मुर्दों का जहाँ बसा रहे हैं।

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