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मंगलवार, 25 नवंबर 2025

नीरव नीड़


 बरसात के दिनों में बाहर निकलते ही मैं आसमान की ओर ऐसे ताकता हूँ जैसे रेलगाड़ी में बिना-टिकट यात्री पकड़े जाने के अंदेशे से बार-बार इधर-उधर देखता है और भूत-प्रेत-चोर के डर की मारी युवती पलंग के नीचे, दरवाज़े के पीछे, और हर परछाईं के इर्द-गिर्द घूरती है। उस दिन भी यही हुआ। दूर ही सही, पर आसमान के कोने में भूरे बादल वैसे ही घुमड़ रहे थे जैसे शादी के तम्बू के बाहर ग़रीब बच्चे कुछ पा लेने के लालच में जमा होने लगते हैं। अगर तुरन्त न निकला गया, तो हवाई-अड्डे तक पहुँचने से पहले बारिश में फँसने की पूरी
आशंका थी।

            “छाते ले लें?” मैंने सवाल कम पूछा, मंतव्य ज़्यादा ज़ाहिर किया।

            बुज़ुर्ग गृह-स्वामी की वही बातें समझी जाती हैं जिनसे परिवार के शेष सदस्यों की योजना में ख़लल पड़ने का ख़तरा हो, बाक़ी पुरोहित के संस्कृत श्लोक की तरह सिर्फ़ सुन कर दरकिनार कर दी जाती हैं। दक्ष पुरोहित और सफल गृह-स्वामी इस उपेक्षा के अभ्यस्त होते हैं।

लेकिन सदा फ़ेल होनेवाला बच्चा भी प्रभुकृपा से कभी-न-कभी पास हो ही जाता है, जैसे पुराने ज़माने में अंधे के हाथ बटेर लग जाती थी। उस दिन भी वैसा ही हुआ। मेरी पत्नी महिषी झटपट वापस मुड़ी और तपाक से दो छाते ले आई। गाड़ी के बूट में बैग और दोनों छाते रखने के बाद भी इतनी जगह पर्याप्त बची थी कि दो सूअर समा जाते। ये बात मैंने सिर्फ़ कहने के लिए कह दी, बूट में सूअरों को सवारी कराने का मेरा कोई इरादा न था। चार पैर के हों या दो के, खाने की मेज़ पर हों या बैठक की, मैं सूअरों से कन्नी काटता हूँ। चाहे कितने भी पैरों के हों, मुझे कीचड़ में लिपटे सूअरों की आँखों में सदा मुक़ाबला करने की चुनौती दिखती है। मैंने बूट बन्द कर गाड़ी स्टार्ट कर दी।

जैसे आइंस्टाइन को सापेक्षवाद और मार्क्स को साम्यवाद के बारे में हर बात मालूम थी, वैसे ही मेरी पत्नी महिषी और मेरी पुत्रवधु आशा सिनेमाजगत की रग-रग से वाक़िफ़ हैं। थोड़ी देर में उनका चिंतन-मनन आरम्भ हो गया। विषय था, अमुक विज्ञापन में जिस आदमी की एक झलक दिखती है, वह रणबीर कपूर है या नहीं। महिषी उसके रणबीर कपूर होने के बारे में तर्क-पर-तर्क दे रही थी, और आशा यह साबित करने पर तुली थी कि उस व्यक्ति के रणबीर कपूर होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था। मुझे दोनों की बातों में दम लग रहा था, किन्तु एक तो उस वाद-विवाद में मेरी भूमिका भीष्म पितामह से अधिक की नहीं थी, और दूसरे, मेरे टेलिविज़न दर्शन का औरांग-उटान की कलाबाज़ियों और बन्दरों की उठाईगीरी तक सीमित होना कोढ़ में खाज ही पैदा कर सकता था।

“शुरू हो गई!” अद्भुत बुदबुदाया।

“शुरू “हो” गईं? अरे, ये दोनों तो पिछले पाँच मिनटों से रणधीर कपूर या रणबीर सिंह के बारे में बात कर रही हैं जो शायद बाप-बेटे हैं और जिनमें जो बेटा है उसने ऑटिस्मवाली फ़िल्म में उस लड़की के साथ काम किया था जिसकी कलाई पर उसके पिता के नाम का गोदना है … “ मैंने हैरत से उसे देखा।

अद्भुत ने सामने के शीशे की ओर इंगित किया। वैसे गाड़ी चलाते समय मैं सामने ही देखता हूँ, बेहद ध्यान से देखता हूँ, और कहीं और नहीं देखता, फिर भी न जाने कैसे बॉनेट और शीशे पर हल्की-हल्की गिरती बूँदें मेरी नज़रों को धोखा देने में कामयाब हो गई थीं। हो सकता है कि दैत्याकार खुदाई मशीनों, विशालकाय ट्रकों, मधुमक्खी-सी चलायमान अन्य गाड़ियों और छुट्टा घूमते आवारा मवेशियों से बच कर निकलने की जुगत में मैं इतना मशगूल हो गया था कि पानी की नन्ही बूँदों पर ध्यान ही नहीं गया। बड़ों के आगे छोटों की क्या बिसात?

बरसात अपनी उपेक्षा से ख़फ़ा हो गई। शीशे और बॉनेट पर ’पटापट-पटापट की लय के साथ समोसे के आकार की बूँदें गिरने लगीं। बेचारा वाइपर नाच-नाच कर उनकी सेवा में जुट गया, लेकिन उसका प्रयास सांत्वना पुरस्कार से अधिक का हक़दार नहीं था। कुछ देर पहले का मस्त हाथी की तरह झूमता ट्रैफ़िक अब चींटी की क़तारों में सड़क पर नवनिर्मित नदी-नालों के इर्दगिर्द रेंगने लगा। बेशक, कुछ वीर ऐसी हालत में भी तेज़ रफ़्तार से आसपास जल का मुफ़्त छिड़काव कर गालियों का पुण्य बटोर रहे थे। कोई और दिन होता तो मैं मौसम का भरपूर मज़ा लेता, पर आज बात दूसरी थी—फ़्लाइट छूट जाने का डर था। लिहाजा, मैं पचहत्तर किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से गाड़ी चलाता रहा।

पार्किंग टिकट की मशीन को कचरेवाले काले पॉलिथीन का घूँघट उढ़ा कर सादग़ी के सौंदर्य को नया आयाम प्रदान किया गया था। उसकी बगल में तैनात कर्मचारी से टिकट लेकर हम ’प्रस्थान की ओर बढ़े। बारिश लगभग थम गई थी, फिर भी छातों की ज़रूरत तो थी ही, भीगी हालत में हवाई जहाज़ का सफ़र करवा कर अद्भुत और आशा को बीमार थोड़े-ही करना था! हमसे विदा लेकर वे हवाईअड्डे में दाख़िल हो गए। हम प्रवेशद्वार के पास एक ख़ाली काउंटर के सामने खड़े हो गए। वहाँ से अन्दर साफ़ दिखाई दे रहा था। क़रीब पाँच मिनट चेक-इन काउंटर के आगे खड़े रहने के बाद अद्भुत और आशा ने बोर्डिंग पास लिए और प्रवेशद्वार की ओर देखा। ज़ाहिर है, उन्हें हम नहीं दिख सकते थे, फिर भी हमने हाथ हिलाया और उनकी तरफ़ तब तक ताकते रहे जब तक वे एस्केलेटर से ऊपर जाकर किसी ऐसी जगह नहीं चले गए जहाँ से उनका और दिखाई पड़ना मुमक़िन न रहा।             

हवाईअड्डे से रौनक़ ग़ायब हो चुकी थी। मेरा शरीर शिथिल-सा हो गया, हाथ-पाँव में जान न रही। मैंने महिषी को देखा। आसमान के बादल न जाने कब उसकी आँखों में उतर आए थे। एक पल मुझे देख वह बुदबुदाई, “चले गए!” उसके माथे पर उम्र, थकावट, और मायूसी की लकीरें उभर आई थीं। एक-दूसरे का हाथ थामे, कंधे झुकाए, भारी मन हम पार्किंग की ओर बढ़े। थोड़ी-सी देर में कितना बदल गया था सबकुछ!

शाम ढले बग़ैर अँधेरा घिर आया। निर्माणाधीन फ़्लाईओवर, आधी बनी दीवारों और पिलर तथा इधर-उधर बिखरी इस्पात की छड़ों और पानी से भरे गड्ढों के बीच मैं यन्त्रवत गाड़ी चलाता रहा। महिषी अब मेरी बगल में थी पर हम दोनों ख़ामोश थे।

बादलों का गर्जन-तर्जन पुनः आरम्भ हो गया। इस बार बारिश का ताण्डव भयावह था। वाइपर का होना-न-होना एक बराबर था। ऊपर से, शीशे पर जगह-जगह बन गए अपारदर्शी सफ़ेद धब्बों ने मुश्किल और बढ़ा दी। सड़क पर लैम्पपोस्ट थे ही नहीं। अक्सर पता ही नहीं चलता कि गाड़ी सही तौर पर सड़क पर है या बहक रही है। स्टीयरिंग की मामूली सी चूक गंभीर दुर्घटना का सबब बन सकती थी। गाड़ी का डिवाइडर पर चढ़ कर पलटना और सड़क के किनारे बनी दीवार से टकरा कर चूर-चूर हो जाना, दोनों में से कुछ भी जानलेवा हो सकता था। सड़क पर रुक भी नहीं सकते थे, उसमें पीछे से आनेवाले वाहनों की टक्कर लगने का डर था।

आधे घंटे तक क़हर बरपाने के बाद मौसम का मिज़ाज कुछ नर्म पड़ा। हमारा सही-सलामत घर लौटना किसी चमत्कार से कम नहीं था, लेकिन हमें उसका कोई ख़याल न था। बच्चों के बिना कौन माता-पिता सही-सलामत रहना चाहते हैं? नीड़ नीरव हो चुका था!

हमने घड़ी की ओर देखा, फिर एक-दूसरे को।

’’एक घंटे बाद बच्चों को फ़ोन करेंगे। तब तक वे लैंड कर चुके होंगे।’’ दोनों की ज़ुबान से एकसाथ निकला।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

रक्षक


 “ओSSSSSSSSS SSSSSSSSS SSSSSSSSS

माँ का भयातुर चीत्कार रात के निस्तब्ध हृदयपटल में सिद्धहस्त शल्यचिकित्सक के धारदार चाकू की तरह उतर गया। उनके मुख से अनजाने ही निकला, “सर्वनाश!” चौखट पर खड़ी धर्मभीरू माँ के पैर अदृश्य बेड़ी से जकड़ गए, शरीर मिर्गी के दौरे की तरह काँपने लगा, आँसुओं से दृष्टि धूमिल हो गई, और काँपते होंठों से अस्फुट शब्द निकलने लगे, “हे माँ, रक्षा करो! … हे माँ, रक्षा करो! … हे माँ, रक्षा करो!”

दुर्गा पूजा बीते कुछ ही दिन हुए थे। दीवाली आने वाली थी। माँ रोज़ की तरह ब्रह्म मुहूर्त में उठी थीं, इकलौती संतान, दुधमुँही बच्ची, को स्नेह से थपथपा कर तकियों की दीवारों के बीच सुलाया था, और स्नेहसिक्त नेत्रों से उसे तब तक निहारती रही थीं जब तक वह कुनमुनाना बिसरा कर शान्ति से सो नहीं गई थी। पिताजी के काम से लौटने में समय था। वे पत्रकार थे। रात खाना खाकर अख़बार के दफ़्तर जाते, तो भोर आठ बजे के बाद ही लौटते थे। उनके वापस आने से पहले माँ एक कमरे का घर साफ़ करतीं, रसोई बनातीं, और पास के कुएँ से दो घड़ों में पानी लाकर एक कोने में रख देतीं। उनकी पूरी कोशिश रहती कि पिताजी घर वापस आकर कम-से-कम तीन घंटे आराम की नींद सो सकें।

हिन्दी अख़बार के उपसम्पादक को पटना के मीठापुर जैसे निम्नमध्यमवर्गीय इलाक़े में टूटी खपरैल की छत के नीचे एक कोठरी, अहाते के भीतर कुआँ, तीन किरायेदारों के साझा उपयोग के लिए एक पाख़ाना और एक स्नानघर की राजसी सुविधा मिलना लगभग असम्भव था, ख़ासकर जब उसे तीन-चार महीनों में एक बार ही वेतन मिल पाता हो और कमरे के किराये का भुगतान भगवान-भरोसे रहता हो। पिताजी ने महीना-भर कई मुहल्लों में सर छुपाने की जगह खोजी थी, लेकिन तीन महीने के किराये के अग्रिम भुगतान के बग़ैर सीढ़ी के नीचे के स्थान की भी मनाही हो जाने पर उनका आत्मविश्वास ताश के महल की तरह धराशायी हो गया था।

माँ-पिताजी की विपन्नता रेगिस्तानी बवंडर में फँसे बटोही की तरह उजागर होने को ही थी जब भवानी बाबू ने उनका उद्धार किया था। भवानी बाबू, यानी भवानी सहाय, कोठरी के मालिक। उनकी पत्नी स्कूल में शिक्षिका थीं। अक्खड़ स्वभाव ने भवानी बाबू को नौकरी करने या व्यवसाय चलाने के योग्य न छोड़ा था। वे कट्टर आर्यसमाजी और आदर्शवादी थे। पिताजी का अन्तर्राज्यीय विवाह, नौकरी करने के बावजूद उनका पढ़ाई जारी रखना, पत्रकारिता-जैसा सम्माननीय काम करना, और माँ के वंशवृक्ष में विवेकानन्द और सुभाष बोस जैसी महान विभूतियों की उपस्थिति—इतने गुणों के आगे वे समय पर किराया न मिलने जैसे कष्ट को सहर्ष स्वीकार कर लेते थे। इतना ही नहीं, उनकी पत्नी माँ की ‘माताजी’ बन चुकी थीं, वे स्वयं पिता-समान हो गए थे, और उनका जवान बेटा मुन्नू भाई-जैसा बन गया था।

माँ दरवाज़े पर जड़वत खड़ी थीं। चौखट के सामने था सिंदूर में सना नरमुंड, एक लाल कपड़ा, पत्तों की पोटली, कुछ काले दाने, भभूत, फूल, तेल, दिया, और न जाने क्या-क्या। स्पष्ट था कि उस अनुष्ठान को करनेवाला भलीभाँति जानता था कि सभी निवासियों में माँ सबसे पहले उठ कर बाहर निकलती थीं। संभवतः उसे यह अनुमान भी था कि छोटी बच्ची को मुँहअँधेरे घर में अकेली छोड़ कर बाहर निकलती माँ की दृष्टि फ़र्श की बजाय कुएँ की जगत की ओर गड़ी होती थी। शीघ्रातिशीघ्र घड़े भरने की उतावली में उनके पैर का उस सामग्री पर पड़ना स्वाभाविक होता। लेकिन वैसा हुआ न था; रात के अँधेरे में माँ ने उस सामग्री को आवारा कुत्ता जान क़दम रोक लिए थे। दूसरे ही पल उन्हें असलियत का भान हुआ था और उनके मुख से बरबस चीख निकल गई थी।

नरमुंड के सामने रखा दिया टिमटिमा कर माँ को चिढ़ा रहा था। उन्होंने संयम बटोरने की चेष्टा की, किन्तु वह तो मुट्ठी से रेत की तरह कब का फिसल चुका था! ओसारे पर नज़र दौड़ाई तो पाया कि दाहिनेवाली दोनों कोठरियों के दरवाज़ों के सामने भी जादू-टोने का सामान रखा था, बस नरमुंड नहीं थे वहाँ। वही हाल बाईं ओर की कोठरी का भी था जिसमें भवानीबाबू स्वयं रहते थे। उसके दरवाज़े की साँकल उतरी, भड़भड़ा कर किवाड़ खुले, और बिखरे बालों तथा उनींदी आँखों से तहमद बाँधते भवानी बाबू ने प्रश्नवाचक दृष्टि से माँ की ओर देखा। कोई सवाल-जवाब नहीं हुआ उनके बीच। माँ की कातर मुद्रा और भूमि पर पड़ी सामग्री की चुनौती से उनका पौरुष बिफर उठा, “तू किवाड़ बन्द कर अन्दर जा बेटी, हम अभी ठिकाने लगाते हैं इस स्साले खोपड़ को! बहुत फुटबॉल खेला है जवानी में, आज फिर खेलेंगे एक बार!”

पर माँ पर तो जैसे किसी ने जादू कर दिया था। वे वहीं सम्मोहित-सी खड़ी देखती रहीं। भवानी बाबू ने लात मार कर खोपड़ी को ओसारे से बाहर उछाला, फिर ठोकर मार-मार कर नाले में लुढ़का दिया। वापस आकर उन्होंने हर दरवाज़े के सामने से जादूटोने की सामग्री उठा कर एक टोकरी में डाली, और उसे भी बहते नाले को सुपुर्द कर आए। अंत में वे ओसारा धोने लगे। हाँलाकि सुबह की पहली किरण के फूटने में देर थी, लेकिन तब तक शेष कोठरियों के निवासी जाग कर अपने-अपने दरवाज़े पर आ गए थे। माँ भवानी बाबू की सहायता करने को उद्यत हुईं तो माताजी का स्वर उभरा, “नहीं, बेटी! तुम बाहर मत निकलो। जाओ, अपनी बच्ची के पास रहो।“

माँ ने यह आपबीती मुझे कई साल पहले सुनाई थी। मैंने पूछा था, “फिर हमलोगों को कोई बड़ी परेशानी हुई थी क्या?”

“नहीं, भवानी बाबू ने हमें बचा लिया!” माँ ने कहा था।

“और उनको कोई प्रॉब्लेम हुआ?”

माँ थोड़ी देर सोचती रहीं, फिर बोलीं, “उनके साथ बहुत-कुछ घटा। अब इस वजह से कि किस वजह से, पता नहीं, लेकिन उनका ऐक्सिडेंट हो गया। ज़िंदगी-भर लाठी के सहारे चलते रहे बेचारे। मुन्नू भी शायद किसी पुलिस केस में फँस गया। ठीक से पता नहीं, क्योंकि उस घटना के कुछ ही दिन बाद तुम्हारे पिताजी की नौकरी लग गई थी बम्बई में, और हमने वह घर हमेशा के लिए छोड़ दिया था।“

“और वो जंतर-मंतर जिसने किया था, उसका पता चला?”

“शायद!” माँ के रोंगटे खड़े हो गए थे और उनकी आँखों में भय उतर आया था। “जाने दो, उतनी पुरानी बात याद करने का क्या फ़ायदा?” कह कर वे चुप हो गई थीं।

शायद आप पूछें कि मैं आज उस सत्तर-बहत्तर साल पुरानी घटना का ज़िक्र क्यों कर रहा हूँ।

बात यह है, कि इस समय भी दुर्गा पूजा और दीवाली के बीच का काल चल रहा है और आज सुबह मुझे दुबई के पुराने मुहल्ले, बरदुबई, के एक चौराहे पर वैसा ही जादूटोना किया दिखाई पड़ा है। अफ़सोस, भवानी बाबू मौजूद नहीं हैं मेरी रक्षा को आज!

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

सुरेखा

शाम हौले से अपना पल्लू समेट रुख़सत हो चुकी थी। रात को जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने में देर थी। सुरेखा अपने कमरे में थी, दुतल्ले पर। छोटा-सा एक कमरा। तीन तरफ़ बिखरा दीवारों-दरवाज़ों का मायाजाल; एक तरफ़ एक झरोखा। यही उसकी मनपसंद जगह थी। उसका बिस्तर इसी झरोखे से सट कर लगा था। खिड़की का पर्दा हवा के झोंकों में इठलाता; पर्दे में टँकी नन्ही-नन्ही घंटियाँ टुनटुनातीं, और बिस्तर से सुरेखा को आसमान में टिमटिमाते तारे और उनसे अठखेलियाँ करता चाँद दिखता।

पास-ही आले पर रखे रेडियो पर एक गीत बज रहा था। सुरेखा आँखें मींच कर गीत सुनने लगी। लेकिन यह क्या? अचानक गीत की मधुर स्वर लहरी को कर्कश ध्वनि ने डँस लिया। शोर में गीत का वजूद गुम हो गया। शोर, जो कई आवाज़ों के मेल से बना था। लोहे के लोहे से टकराने की आवाज़। शीशा छनछना कर टूटने और किर्च-किर्च बिखरने की आवाज़। सड़क के पत्थरदिल सीने पर फ़ौलाद के घिसटने की आवाज़। और फिर, कोई आवाज़ नहीं—सिर्फ़ सन्नाटा! दिल दहला देने वाला सन्नाटा!! सुरेखा घबराई। उठी। खिड़की से नीचे सड़क की ओर झाँका।

सड़क पर जुगनू-ही-जुगनू बिखरे थे। उसे विश्वास न हुआ। ध्यान से देखा। वे काँच के टुकड़े थे जिन पर लैम्प पोस्ट की रोशनी चमक रही थी। एक ओर एक स्कूटर ढुलका पड़ा था। दूसरी ओर पड़ा था एक शरीर। बस, एक शरीर। ज़िंदा या मुर्दा, मालूम नहीं। सुरेखा थोड़ी देर ताकती रही। शायद कोई सड़क से गुज़रे। शायद वह शरीर हिले। पर नहीं। न कोई सड़क से गुज़रा; न सड़क पर पड़े लावारिस जिस्म में कोई हरकत हुई।

सुरेखा को अहसास हुआ—यह एक सड़क दुर्घटना थी। एक ऐसी दुर्घटना जिसमें आहत करने वाला सुनसान रास्ते का फ़ायदा उठा कर फ़रार हो गया था। सुरेखा लपक कर नीचे उतरी। भाई घर नहीं लौटा था। माँ-बाबूजी को बताया। इससे पहले कि माँ-बाबूजी ठीक से समझ पाते, सुरेखा सड़क पर थी। बाबूजी भी लपकते हुए आए। वे ज़ख़्मी को पलटने की कोशिश करने ही वाले थे कि सुरेखा ने चेतावनी दी—“नहीं! न उसे हिलाइए, न उठाइए। गर्दन या पीठ में चोट हो सकती है, बाबूजी!”

गनीमत थी कि अजनबी ने हेलमेट पहना हुआ था। वह अचेत था। सुरेखा फिर बोली, “बाबूजी, प्लीज़! टॉर्च …” आधे रास्ते आई माँ पलट कर वापस गईं और टॉर्च ले आईं। सुरेखा ने अजनबी के मुँह में दो उँगलियाँ डाल कर मुँह के अन्दर इकट्ठा चीज़ें निकालीं—एक अदद पूरा दाँत, दाँत का आधा टुकड़ा, और ख़ून का थक्का। अजनबी के गालों से रक्त बह रहा था।

सुरेखा फिर बोली, “एक जग पानी! सैवलॉन!”

थोड़ी देर बाद अजनबी सुरेखा के ड्रॉइंग रूम में था। मुश्किल से बोल पा रहा था, पर ठीक था। कुछ इशारों से, कुछ डायरी की मदद से, और कुछ बोल कर उसने बताया कि उसका नाम अक्षत है, वह पी एच डी का छात्र है, और छात्रावास में रहता है। सुरेखा का भाई, विनय, अक्षत को छात्रावास छोड़ आया।

मध्यमवर्ग के शांतिप्रिय परिवार के लिए यह घटना टी वी सीरियल से ज़्यादा अहम थी। उस रात सोने तक इसी घटना की चर्चा होती रही, और होता रहा बखान सुरेखा की समझदारी का। जैसे वह एम ए की छात्रा न हो कर एम बी बी एस की छात्रा हो, या फ़्लोरेंस नाइटिंगेल हो! सुरेखा बिस्तर पर लेटी तो ज़रूर, पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। पास थे ख़याल, जीवन की नश्वरता के। जीवन जैसे माला हो मनकों की। मनकों के आकर्षण पर तो सब रीझते हैं, पर डोर की कमज़ोरी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

दुर्घटना को दो दिन बीत गए। बात आई-गई हो गई। बचे, तो सड़क पर स्कूटर घिसटने के दाग़। सुरेखा ने विनय से पूछा, “उस लड़के को देखा था, जिसका एक्सिडेंट हो गया था?”

“हाँ! क्या हुआ उसे?” विनय उल्टा पूछ बैठा।

            “अरे, मैं ये पूछ रही हूँ कि फिर जा कर देखा था उसे हॉस्टल में?”

            पागल हो क्या? उसके दोस्त-वोस्त होंगे, वार्डन-शार्डन होंगे—देख ही लेंगे। हमने पहले ही ज़रूरत से ज़्यादा कर दिया है उसके लिए।“ विनय लापरवाही से कॉलर ठीक करता हुआ बोला।

            बाबूजी, माँ, दोनों सुन रहे थे। सुरेखा की बात उन्हें ठीक लगी। विनय को जाना पड़ा अक्षत को देखने। वापस आया तो बोला, “माँ! उसका गाल तो फ़ुटबॉल की तरह फूल गया है। बुख़ार भी है।“

            “दवा-दारू चल रही है या नहीं?” माँ ने पूछा।

            “दवा तो चल रही है, दारू के बारे में पता नहीं!” विनय शरारत से बोला। फिर सुरेखा की तरफ़ अर्थपूर्ण नज़रों से देखता हुआ बोला, “हम सबको धन्यवाद दे रहा था। ख़ास तौर पर दीदी को।“

            सुरेखा को थोड़ा ग़ुस्सा आया, पर चुप रही। माँ को सब्ज़ियाँ काटती छोड़ वह ऊपर चली गई, अपने कमरे में। विनय बाहर निकल गया दोस्तों में। सुरेखा काफ़ी देर बाद नीचे उतरी, जब माँ ने खाना खाने के लिए आवाज़ दी। चुपचाप खाना खाया, एक-आध ज़रूरी बात की, और चली गई वापस अपनी शरणस्थली, अपने कमरे में।

गुमसुम रहना न जाने कब से सुरेखा का स्वभाव बन चुका था। बाबूजी, माँ, विनय—सब इस बात से वाक़िफ़ थे। कब, कौन-सी बात सुरेखा के जी को छू जाएगी, कहना मुश्किल था। एक बार उदास हो जाए तो पूरा दिन, और कभी-कभी तो कई दिन लग जाते थे उसे सामान्य होने में। उसके स्वभाव की गुत्थियाँ सुलझाने में सब पस्त हो जाते, हार जाते। सच पूछिए, तो अब सबने यह प्रयास ही छोड़ दिया था। तनहाई ही हमदर्द थी, हमराज थी सुरेखा की। बाक़ी साथी जैसे कोई था ही नहीं।

एक सुबह सुरेखा नहा कर खिड़की के पास खड़ी थी। नीचे नज़र गई, तो देखा, कोई ऊपर की तरफ़ ही ताक रहा है। एक फूला, काला गाल; एक गोरा पिचका गाल लिए अक्षत उसे देख रहा था।

सुरेखा को देख कर अक्षत ने हाथ हिलाया। शायद कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से, क्योंकि मुँह विकृत कर दायें हाथ को बायें से तुरत थाम लिया अक्षत ने। उसने कुछ ऐसा मुँह बनाया, कि सुरेखा को हँसी आ गई। सीढ़ियाँ उतरते समय भी उसके होठों पर हँसी खिल रही थी। अक्षत ड्राइंग रूम में आ चुका था। बाबूजी और विनय भी वहीं थे। सुरेखा ने छूटते ही पूछा, “कहिए! कैसे हैं?”

“बस, आपकी दया से बच गया उस दिन, वरना …” अक्षत कृतज्ञता से बोला।

“ऐसी कोई ख़ास चोट तो नहीं लगी थी आपको। बस, मुँह पर एक खिड़की खुल गई।“ सुरेखा ने शरारत से कहा।

“एक दरवाज़ा भी!” अक्षत के नहले पर दहला जड़ते ही सब हँस पड़े। थोड़ी देर बाद अक्षत चला गया। सुरेखा ने चहकते हुए कहा, “माँ, देखा? अक्षत कितना ठीक हो गया है!”

माँ ख़ुश थीं। बाबूजी भी। पर, सुरेखा को विनय की आँख में एक विचित्र भाव दिखाई दिया। एक ऐसा भाव जो पहले कभी नहीं दिखा था।

शाम को अक्षत का फ़ोन आया। अगली शाम को भी। फ़ोन रखने के बाद माँ की निगाहें सवालिया-सी लगीं सुरेखा को। निर्विकार थे तो सिर्फ़ बाबूजी। वह थोड़ा सिटपिटाई। थोड़ा ग़ुस्सा भी आया। न जाने किस पर। हर कोई अपनी जगह ठीक था, हर प्रतिक्रिया तर्कसम्मत थी, पर उसे न जाने क्यों कटघरे में खड़ा कर जाती थी। हाल ये हो गया, कि अक्षत का नाम आते ही सुरेखा के चेहरे का रंग बदल जाता।

एक दिन सुरेखा ने बड़ी देर तक बात की फ़ोन पर। माँ ने सुनने की, हावभाव भाँपने की कोशिश की। सुरेखा कभी ख़ुश होती, खिलखिलाती, और कभी संजीदा हो जाती। कभी देर तक चुप रहती, मानो डेड रिसीवर थामे हो। माँ की समझ में कुछ न आया, तो वे वापस जुट गईं अपनी दिनचर्या में।

थोड़ी देर बाद सुरेखा उतर कर आई, बाहर जाने को तैयार। माँ चौंकीं, “कहाँ जा रही हो, सुरी?”

“अक्षत के पास।“ सुरेखा ने छोटा-सा जवाब दिया।

“अक्षत के पास? कोई ख़ास बात है क्या?”

“हाँ!”

            जवाब इतना संक्षिप्त था कि कि माँ सकपका गईं। कुछ अंदेशा-सा हुआ उन्हें, लेकिन बोल सिर्फ़ इतना-भर सकीं, “जल्दी आ जाना, बेटा।“

सुरेखा ने, पता नहीं, सुना भी या नहीं। माँ को सीने में दर्द-सा महसूस हुआ। सुरेखा को गए पाँच मिनट भी न हुए थे कि वे घड़ी देखने लगीं। बार-बार। हिसाब जोड़तीं, सुरेखा को गए कितना समय हुआ। थोड़ी देर बाद विनय भी आ गया। वैसे तो उसे घर के कामकाज से कोई सरोकार न था, पर आज माँ से पूछ बैठा, “माँ! सब ठीक तो है?”

माँ बेचारी क्या कहतीं! दिल-ही-दिल में सोचने लगीं, “लड़की इतनी बड़ी हो गई। इनकी समझ में तो कुछ आता नहीं। इतना कहा कि अच्छा लड़का देख कर शादी तय कर दी जाए, पर कहाँ? अब न जाने कहाँ गई है! कुछ कर न बैठे। अगर कर लेगी, तो क्या मुँह दिखाऊँगी सबको? फूल जैसी बच्ची, इतने प्यार में पली, और अब ...” माँ रुआँसी हो गईं।

खाने का समय गुज़र गया था। विनय खाना खा चुका था, बाबूजी खाना खा रहे थे। माँ कभी पतीलों को देखतीं, कभी घड़ी को। बाप-बेटे दोनों को ही बताया था कि सुरेखा किताब ख़रीदने गई है, शायद देर से लौटे। पर कब तक यह रहस्य छुपातीं कि सुरेखा अक्षत के पास गई है बाहर जाने के कपड़े पहन कर, शायद कभी न लौटने के लिए!

कदमों की आहट से माँ की तंद्रा टूटी। हड़बडा कर उठीं। बाबूजी के हाथ में कौर धरा रह गया। दरवाज़े से अंदर आने वाला पहला कदम अक्षत का था। उसके पीछे थी सुरेखा।

अक्षत के नमस्कार का ठीक से जवाब नहीं दे पाए माँ-बाबूजी। सुरेखा सकुचाते हुए बोली, “अक्षत आशीर्वाद माँगने आए हैं।“

“किस बात का?” माँ ने सहज होने की असफल चेष्टा के साथ पूछा।

“शादी का!”

“शादी?” बाबूजी, माँ चौंक गए। विनय भी बगल के कमरे से आ गया, पाजामे-बनियान में।

“हाँ, शादी!”

“पर, तुम …” माँ-बाबूजी के ऊपर जैसे कोई बम फट पड़ा था।

“माँ! अक्षत का यहाँ कोई है नहीं। उस घटना के बाद से हमें ही अपना समझने लगे। तो बस, शादी का आशीर्वाद लेने हमारे ही घर आ गए।“

माँ-बाबूजी सकते में थे। ख़ामोश रहे। अक्षत भी असमंजस में था। सुरेखा ने ही बात आगे बढ़ाई, “माँ, बहू को तो बुलाइए! कब तक बाहर खड़ी रहेगी बेचारी?”

“हाँ, हाँ …” माँ तपाक से बाहर निकलीं, जहाँ शर्म से दोहरी एक युवती खड़ी थी।

माहौल ऐसे बदल गया, जैसे अंतिम गेंद पर छक्का जड़ हार की कगार पर डगमगाता मैच जीत लिया गया हो! काफ़ी देर तक ठहाके, खिलखिलाहट गूँजती रही। फिर युवती बोली, “सुरेखा जी, आपको कैसे धन्यवाद दूँ! आपने रात के समय एक ऐसे शख़्स की मदद की जो आपके लिए अजनबी था। अगर समय पर मदद न मिलती, तो शायद ये दुर्घटना एक हादसे में बदल जाती। बाद में भी आपने अक्षत का खयाल रखा, सिर्फ़ इंसानियत के नाते। संवेदनशील होने की वजह से। आपके और अक्षत के सामीप्य का कुछ दूसरा अर्थ भी निकल सकता था। शायद आप कुछ झंझावातों से भी गुज़री हों, पर …”

“यह सब आपको कैसे मालूम?” सुरेखा ने मासूमियत से पूछा।

“नारी संवेदना का एक पहलू ये भी तो है!” युवती मुस्कुराई। बाबूजी और अक्षत भी। माँ की आँखों में बादल घुमड़ रहे थे। सुरेखा विनय की आँखों में न देख पाई। उसकी आँखें नीची जो थीं।

 

शनिवार, 7 सितंबर 2024

बात ही कुछ ऐसी है - विद्याभूषण ’श्रीरश्मि’


अभी-अभी घड़ी ने दो बार टन्-टन् बजा कर मुझसे पूछा, “आख़िर कब तक इन्तज़ार करोगी?” मैं क्या जवाब दूँ इसे? जवाब तो वह देता है, जिसके सामने कोई राह होती है, आशा का धुँधला-सा भी प्रकाश होता है! मैं क्या दूँ जवाब? फिर भी, यह घड़ी हर आधे घंटे पर मुझे छेड़ती है—कभी सोचने से मना करती है, कभी सोफ़े से बिस्तर पर जाने का इशारा करती है, कभी व्यावहारिक बनने की सीख देती है, और कभी खीझ कर बुरा-भला सुना देती है। इस घड़ी को क्या मालूम नहीं मेरी मजबूरी? यह काल को मापती है, उसे अपने सीने पर अंकित करती है; और मनुष्य के जीवन का कोई भी अंश कालातीत नहीं होता, इसलिए इसे सब-कुछ मालूम है, यह सब-कुछ जानती है। फिर भी यह क्यों छेड़ती है मुझे? इसे इतनी सहानुभूति क्यों है मुझसे? … संस्कार … हाँ, संस्कार ही इसे भी मजबूर करता है मुझे रोकने के लिए, काल के हर क्षण के सदुपयोग का उपदेश देने के लिए। उफ़्, यह संस्कार मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा, तब तक नहीं छोड़ेगा, जब तक मेरा अन्तिम संस्कार नहीं हो जाएगा!

आज की रात कितनी काली है! पेड़ों के पत्ते तक भयभीत हैं, उन्हें काठ मार गया है! हवा साँस रोके बैठी है। मेरे अन्तर की ही भाँति सारा वातावरण घुट-सा रहा है। फिर भी, लोग बेख़बर सोये हैं—सारा घर सोया है, सारा मुहल्ला सोया है, सारा शहर सोया है। सिर्फ़ कुछ अभागे जाग रहे हैं। हाँ, अभागे ही जाग रहे हैं। मजबूरी उन्हें जगा रही है। चौकीदार की भी मजबूरी है, और क्लब में खिलखिला रहे लोगों की भी। सब-के-सब पीड़ित हैं। कोई हृदय के अत्याचार से पीड़ित है, कोई मस्तिष्क के, और कोई शरीर के। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि कोई अपनी पीड़ा पर आँसू बहा लेता है और  कोई उसे छुपाने के लिए हँसने का ढोंग करता है। मैं रो रही हूँ, इसलिए पीड़ित हूँ, और विपिन हँस-मुस्करा रहा होगा, किसी के सीने से लगा नाच रहा होगा, या किसी के तन से अपनी तृष्णा मिटा रहा होगा, इसलिए वह पीड़ित नहीं है! नहीं, यह तुलना सही नहीं है। वह भी उतना ही पीड़ित है, जितनी मैं! मेरी पीड़ा को मेरे संस्कार ने जन्म दिया है और उसकी पीड़ा को मेरे व्यवहार ने, मुझमें आये परिवर्तन ने। पीड़ित दोनों हैं। पीड़ा को भूलने की कोशिश दोनों करते हैं। वह थोड़ी देर के लिए उसे भूल जाता है, मैं भूल नहीं पाती—बस, इतना-सा अन्तर है!

देखनेवाले कहेंगे—विपिन को मुझसे प्यार नहीं है; उसे उच्छृंखलता में, आवाराग़र्दी में, रस मिलता है। पर मैं जानती हूँ, यह सही नहीं है। विपिन को मुझसे बेहद प्यार है। आवाराग़र्दी में उसे कोई रस नहीं मिलता। बस, थोड़ी देर के लिए वह राहत पाता है उसमें। परेशान आदमी राहत की कामना भी न करे, यह कैसे सम्भव है? मैंने ही उसे परेशानी दी है और मुझे ही शिकायत? इससे बड़ी क्रूरता, स्वार्थपरता, और क्या होगी? फिर भी, मैं दुखी हूँ!

किसी ने ठीक ही कहा है कि सुख और दुख भौतिक उपादानों पर उतना निर्भर नहीं करते, जितना मनुष्य के अपने मन की अवस्था पर। हमारे जीवन की भौतिक परिस्थितियाँ तनिक भी नहीं बदली हैं, उनमें कोई व्यतिरेक नहीं आया है, फिर भी मेरा सारा हर्ष-आह्लाद मुझसे छिन गया है। सब-कुछ पहले की तरह होते हुए भी आज मैं अपने को अत्यन्त दरिद्र अनुभव कर रही हूँ, संताप की ज्वाला मुझे भस्म किये दे रही है। पर क्यों? यह सिर्फ़ मैं जानती हूँ। संसार का कोई दूसरा प्राणी इस रहस्य को नहीं जानता। तभी तो विपिन की परेशानी और भी गहन हो गयी है। परिणाम उसके सामने है, कारण अदृश्य! वह प्रायः मुझसे पूछता है कि यह अप्रत्याशित परिवर्तन मुझमें क्यों आया है, हरी-लहलहाती दाम्पत्य-बेल को मुरझाने पर मैं क्यों आमादा हूँ—उससे क्या कोई भूल हो गयी है?

बेचारा विपिन! आज भी उतना ही सरल है, जितना आठ साल पहले था। उसकी इस सरलता पर ही मैं मुग्ध थी। कॉलेज में कितने-सारे सुन्दर, स्वस्थ और प्रतिभाशाली युवक थे, पर मैं आकर्षित हुई विपिन की ओर, केवल विपिन की ओर। और आज तक विपिन के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति मेरे हृदय में प्रवेश नहीं पा सका है। विपिन ने भी अब तक यदि किसी लड़की को प्यार किया है, तो केवल मुझे। फिर, यह कैसी विडम्बना है! कितना संघर्ष किया था हमने अपने विवाह के लिए! कितने कष्ट उठाये थे हमने! उसके माँ-बाप कट्टरपंथी थे, जाति-पाँति की सीमा तोड़ना उनकी दृष्टि में अधर्म था! उधर, मेरे माँ-बाप लक्ष्मी के लाड़ले थे, निर्धन जामाता की वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। पर दोनों ही पक्षों को मात खानी पड़ी। हमने हिम्मत से काम लिया। माँ-बाप के मत्थे दोष मढ़ कर अपनी अक्षमता को ढँकना हमें पसन्द न था। हमने सिविल मैरेज कर ली, और कुछ समय तक कुड़बुड़ाते रहने के बाद दोनों ही परिवारों ने, बेमन से ही सही, पुत्रवधू-दामाद को स्वीकार कर लिया। फिर, भाग्य ने भी हमारा साथ दिया। जिस वर्ष हमारा विवाह हुआ, उसी वर्ष विपिन आई. ए. एस. में चुन लिया गया और हमारी गृहस्थी की गाड़ी स्वर्गीय रथ की-सी सरलता से चल निकली। इस बीच हमारे दो बच्चे भी हुए—प्रवीण और आलोक। और, हमारे पारिवारिक नन्दन-कानन का कण-कण सुरभिमय हो उठा। कहीं कोई कालिमा नहीं, कहीं कोई शुष्कता नहीं। पर इन सबके बावजूद एक दिन अचानक हमारे सुखमय संसार पर वज्रपात हो गया!

मुझमें यह त्रासदायी परिवर्तन लगभग छः महीने पहले आया था। उन दिनों मैं बच्चों के साथ मायके में थी। मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया था और इसी सिलसिले में हमें वहाँ जाना पड़ा था। श्राद्ध-आदि हो जाने के बाद विपिन तो अपनी नौकरी की मजबूरियों के कारण वापस आ गया था, पर मैं कैसे लौटती? मैं अपने माँ-बाप की इकलौती थी और पिताजी के देहान्त के बाद माँ की जो अवस्था थी, उसे देखते हुए लौटना सम्भव नहीं था। सन्तान के नाम पर मैं ही तो थी एक। मैं वहीं रुक गयी और माँ की देख-रेख करने लगी। यों, पिताजी की मृत्यु का मुझे भी बहुत दुःख था, पर पत्नी और पुत्री के प्यार में ज़मीन-आसमान का नहीं, तो दस-बीस का फ़र्क तो होता ही है। मेरे सिर से अभय देनेवाला एक साया उठ गया था, जबकि उनकी पूरी दुनिया लुट गयी थी। ख़ैर, मैं उनके पास लगभग एक महीना रही और मैंने तथा बच्चों ने पिताजी की ओर से उनका ध्यान भरसक अपनी ओर खींचा। पर तभी एक दिन अचानक मेरी तबीयत परेशान हो गयी, मेरा अन्तर बुरी तरह हाहाकार कर उठा, एक दिन भी वहाँ ठहरना मेरे लिए असम्भव हो गया, और शान्ति की खोज में मैं विपिन के पास चली आयी।

पर अब शान्ति कहाँ मिलती मुझे? यदि शान्ति बाहर ही मिला करती, तो अब तक उसकी भी ख़रीद-फ़रोख़्त शुरू न हो गयी होती? मुझे शान्ति नहीं मिली। फलतः मेरे जीवन में आया परिवर्तन भी दूर न हो सका, वह अपनी जड़ें जमाता गया। अब, घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारियाँ तो मैं किसी तरह निभा लेती, पर विपिन का सामना होने पर बुरी तरह परेशान हो उठती। मैं उसके पास जाने से यथासम्भव बचती, घंटों चुपचाप बैठी सोचती रहती, अपनी समस्या का समाधान ढूँढ़ती रहती। पर समाधान क्या मिलता? लाख चक्कर लगाने के बाद मैं जहाँ-की-तहाँ पहुँच जाती। हाँ, इस चिन्तन से यह बात ज़रूर बार-बार उभर कर मेरे सामने आती कि विपिन के साथ अपने व्यवहार में मुझे विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए; उसके साथ पूर्ववत् सहृदयता का व्यवहार करना चाहिए, उसे दुखी नहीं करना चाहिए। तदनुसार ही, मैं उसके साथ मुलायमियत से पेश आने का प्रयत्न करती, पर चंद घंटे बाद ही मैं फिर भड़क उठती, अपनी पुरानी जगह पर वापस आ जाती। काश, पति-पत्नी के सम्बन्धों में सेक्स का इतना महत्वपूर्ण स्थान न होता, प्यार के क्षणों को सेक्स की गोद में विश्राम न मिलता!

मुझे विपिन के साथ घूमने-फिरने में, बातचीत करने में, कोई आपत्ति नहीं थी। इसके विपरीत मुझे उसमें आनन्द मिलता था, उसकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखने में एक अनिर्वचनीय संतोष मिलता था, पर सेक्स? सेक्स से मुझे विरक्ति हो गयी थी। सेक्स को मैं पूरी तरह भूल जाना चाहती थी। पर यह कहाँ सम्भव था? वह सारी दुनिया का चक्कर लगा कर अन्ततः वहीं पहुँच जाता था। और, वह पहुँचता भी क्यों नहीं? उसके सामने तो कोई बाधा थी नहीं। आठ साल से अनवरत-निर्द्वन्द्व बही आ रही धारा को वह अकारण ही क्यों मोड़ देता? उस पर कोई पागलपन तो सवार हुआ नहीं था!

मुझमें आये परिवर्तन से विपिन का परेशान होना स्वाभाविक ही था। वह बार-बार मुझसे पूछता, मेरे साथ पहले से भी अधिक नम्रता का व्यवहार करता, अक्सर इधर-उधर घुमाने ले जाता, ढूँढ़-ढूँढ़ कर मनोरंजन की सामग्रियाँ जुटाता, पर अन्ततः उसके हाथ लगती निराशा। वह मायूस हो जाता, कभी-कभी चिढ़ भी उठता। लेकिन फिर जल्दी ही मेरे प्रति उसका स्नेह उसे निर्बल बना देता और वह मेरी ख़ुशी के लिए प्रयत्नशील हो जाता। और, जब मैं ख़ुश दिखाई देती, तब प्रेम-मयी बातों के बीच घेर कर वह मुझसे पूछता, “क्या बात है? तुम्हें क्या दुःख है? तुम इस तरह उदासीन क्यों हो उठी हो जीवन से? यदि मुझसे कोई भूल हो गयी हो, तो बताओ। तुम्हारे सिर की क़सम, मैं उसे सुधार लूँगा। तुम्हारी ख़ुशी से बढ़ कर मेरे लिए और कोई ख़ुशी नहीं है!”

मैं भी बड़े प्यार से उसे आश्वस्त करती—“मुझे तुम्हारे प्यार पर पूरा भरोसा है। तुमसे क्या भूल हो सकती है भला! तुम व्यर्थ चिन्ता मत करो। पिताजी की मृत्यु से यों ही कुछ उदासीन हो उठा है मन। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। तुम परेशान मत होओ!”

और, सरल-हृदय विपिन को मेरी बात का भरोसा हो जाता। सचमुच, छलने की क्षमता सबसे अधिक विश्वासपात्र में होती है। अपने प्रिय से ही धोखा! कितनी गर्हित बात है! लेकिन मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था, आज भी नहीं है।

इसी तरह लगभग दो महीने बीते और तब एक रात हमारे परस्पर-सम्बन्धों ने एक नया मोड़ लिया। सेक्स के ही कारण हमारी जीवन-धारा ने एक नयी दिशा पकड़ी। उस रात मेरे हठ से विपिन कुछ खीझ-सा गया, बोला—“पिता सबके मरते हैं, पर उसके चलते कोई इस तरह विक्षिप्त नहीं हो जाता। माना कि अपने पिताजी से तुम्हें बड़ा स्नेह था, पर मेरे प्रति भी तो तुम्हारा कुछ कर्तव्य है।“

मुझे उसकी बात का तनिक भी बुरा नहीं लगा। मैं उसकी मनोदशा पूरी तरह भाँप रही थी। उसका कहना निर्विवाद रूप से सही था। फिर भी, मुझे कुछ जवाब तो देना ही था, सो, मैंने बड़ी शान्ति से, स्नेहपूर्वक, कहा—“मैं क्या अपना कर्तव्य नहीं कर रही हूँ तुम्हारे साथ?”

विपिन आवेश में था, बोला—“यही तो है कर्तव्य-परायणता! आख़िर, यह रोज़-रोज़ की टल्लेबाज़ी कब तब चलेगी?”

मेरा स्वर भर्रा गया, बोली—“विपू, बताओ, मैं क्या करूँ? मुझे सेक्स से नफ़रत हो गयी है! तुम समझते क्यों नहीं मेरी दशा?”

“नफ़रत ... नफ़रत ... आख़िर क्यों? सेक्स को ज्ञानी-ध्यानी लोग भले कोसते रहें, पर यह नफ़रत की चीज़ है नहीं। सेक्स न होता, तो उन ज्ञानी-ध्यानियों ने संसार का मुँह भी न देखा होता।!”

“ठीक कहते हो तुम, पर क्या आठ वर्ष कम होते हैं इसके लिए?”—मैंने उसे शान्त करना चाहा।

“आठ वर्ष?”—विपिन लगभग चीख उठा—“इसके लिए आठ जन्म भी कम हैं! ... तुम्हारा मन भर गया हो सेक्स से, तो ठीक है, तुम योगिन बन जाओ; पर मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है। मुझे सेक्स की भूख है और ज़िन्दग़ी-भर रहेगी। तुम इसे नहीं मिटा सकतीं, तो मुझे कोई और उपाय ढूँढ़ना होगा। लेकिन बाद में मुझे दोष मत देना—न ही दूसरी लड़कियों के साथ देख कर तड़पना!”

पर उसकी धमकी का मुझ पर वह असर न हुआ, जिसकी उसने कल्पना की होगी। उल्टे, इस धमकी से मुझे थोड़ी शान्ति मिली। मैंने बड़ी संयत वाणी में उत्तर दिया—“ठीक है, वैसा ही करो। मैं कभी शिकायत नहीं करूँगी। तुम शरीर की भूख जिससे चाहो, मिटाओ; पर एक अनुरोध मानना मेरा—मेरे प्रति अपना स्नेह कम मत होने देना। तुम्हारा स्नेह ही मेरा एकमात्र प्राणाधार है।“

परन्तु उसके बाद भी लगभग एक महीने तक विपिन मुझे बराबर समझाता-बुझाता रहा। स्पष्ट है कि उस नयी राह पर जाना उसे पसन्द नहीं था—वह मेरे सिवा किसी अन्य लड़की के साथ कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहता था। उसने आँखों में आँसू भर कर, भर्राये गले से, कई बार मुझसे अनुरोध किया—“मुझे ग़लत रास्ते पर जाने के लिए विवश मत करो, सुषमी! मुझ पर दया करो—मुझे कर्तव्य-भ्रष्ट मत होने दो!” और, एक दिन उसकी दीन अवस्था ने मुझे विचलित भी कर दिया। मैंने अपने मन पर पत्थर रख कर उसे छूट दे दी, पर वह पत्थर मेरे लिए बहुत भारी साबित हुआ—इतना भारी कि फिर कभी अपने मन पर दबाव डालने का मुझे साहस न हुआ। उधर, पत्थर के भार से दबी-बुझी औरत से विपिन को भी क्या सुख मिला होगा। तभी तो हार कर उसने नयी राह पर कदम बढ़ा दिया।

शुरू-शुरू में विपिन को दफ़्तर से घर लौटने में घंटे-दो-घंटे की देर हुई। फिर वह दफ़्तर से घर आकर क्लब जाने लगा। उसके बाद उसके साथ महिला-मित्र भी आने लगीं। उसके नाम लड़कियों के टेलीफ़ोनों की संख्या बढ़ी। कुछ समय बाद वह शराब के नशे में धुत् रात को ग्यारह-बारह बजे लौटने लगा। और, अब तो वह कभी सवेरे तीन बजे लौटता है, तो कभी चार बजे—किसी-किसी रात तो लौटता ही नहीं। पर विश्वास मानिए, मुझे इस बात से तनिक भी ईर्ष्या नहीं होती कि वह दूसरी लड़कियों के साथ रंगरेलियाँ मनाता है। मुझे चिन्ता होती है केवल तीन बातों की—पहली बात, उसका स्वास्थ्य अन्ततः उसका साथ छोड़ देगा; दूसरी बात, घर की आर्थिक अवस्था दिन-दिन बदतर होती जा रही है; और तीसरी बात, यदि घर से उसकी विमुखता बढ़ती गयी, तो मेरा और बच्चों का क्या भविष्य होगा! पर मैं क्या करूँ? उसे कैसे रोकूँ? रोकने का मुझे क्या अधिकार है? मैंने ही तो उसे इस राह पर बढ़ाया है। वह सुख की खोज में भटक रहा है और दुर्भाग्यवश आन्तरिक सुख अब भी उससे दूर है। मेरे लिए उसका उत्कट प्रेम उसे सुख से दूर रख रहा है—यह मैं भली-भाँति जानती हूँ। वह ऊपर से हँसता-खेलता है, नाचता-गाता है, पर अन्दर से हमेशा रोता रहता है। वह अब भी मेरी वापसी की बाट जोह रहा है।

लेकिन मैं कभी लौटूँगी भी? शायद नहीं! मैंने तरह-तरह से अपने मन को समझाने की चेष्टा की है, पर आशा की झलक कभी नहीं दिखाई पड़ी, कभी नहीं। हालाँकि विपिन की पीड़ा देख कर मेरा हृदय फटता रहता है और अपनों तथा बच्चों के भविष्य पर नज़र जाती है, तो आँखों-तले अँधेरा छा जाता है; फिर भी मैं कुछ कर नहीं पाती। मैं अपने वश में जो नहीं हूँ। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि मेरी वापसी से कहीं एक पत्ता तक नहीं खड़केगा, मेरा कोई अपमान नहीं होगा, फिर भी मैं वापस नहीं लौट सकती। बात ही कुछ ऐसी है! मेरा मन नहीं मानता—जन्मजात संस्कार ने मेरे मन को बुरी तरह जकड़ रखा है। वह बार-बार मुझे आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है, पर विपिन और बच्चों का मोह मुझसे त्यागा नहीं जाता। मेरे अभाव में उनकी क्या दशा होगी, यह सोच कर ही मैं काँप उठती हूँ। मैं मर नहीं पाती—ज़िन्दा भी नहीं हूँ! इसे ही क्या ज़िन्दग़ी कहते हैं?          

काश, मैं पिताजी की मृत्यु का समाचार पाकर अपने मायके न जाती। गयी भी थी, तो मुझे विपिन के साथ लौट आना चाहिए था! तब मेरी यह दशा न होती। रहस्य रहस्य ही बना रहता। उस रहस्य को जान कर मेरा भी उपकार क्या हुआ, उल्टे मैं ज़िन्दा मर गयी। उसी दिन मुझे पता चला कि मेरे माँ-बाप मुझे अपने साथ क्यों नहीं रखते थे, शहर में अच्छे-अच्छे कॉलेजों के होते हुए भी मुझे क्यों बराबर कलकत्ते के एक होस्टल में रख कर पढ़ाया गया, छुट्टियों में घर लौटने पर माँ क्यों छाया की तरह मेरे साथ लगी रहती थीं, किसी भी सगे-सम्बन्धी से अकेले में बातचीत क्यों नहीं करने देती थीं! उफ़्, मेरे साथ कितना क्रूर परिहास किया था नियति ने! परन्तु उससे भी क्रूर परिहास उसने रहस्य का मुझ पर उद्घाटन करके किया। अज्ञान भी एक वरदान है, यह बात आज मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ। वस्तुस्थिति के ज्ञान ने मेरा सारा सुख-चैन छीन लिया—मुझे कहीं का न रखा। इतना बड़ा सदमा और कोई बर्दाश्त कर सकता था, कह नहीं सकती!

उस दिन मैं पिताजी के काग़ज़ात छाँट कर निकाल रही थी, जब रहस्योद्घाटन हुआ। वह एक पत्र था—माँ का पत्र, पिताजी के नाम। काश, पिताजी ने उस पत्र को अपने जीवन-काल में ही नष्ट कर दिया होता! लेकिन तब मुझे अपने अपराध का दंड कैसे मिलता! अपराध? हाँ, अपराध! दूसरों की व्यक्तिगत चिट्ठियाँ चोरी-चोरी पढ़ने का मुझे होस्टल में ही चस्का लग गया था। उसी बुरी लत के कारण मैं माँ-बाप के बीच की व्यक्तिगत चिट्ठियों को पढ़ने का भी लोभ संवरण नहीं कर सकी। पिताजी के काग़ज़ात में माँ की लिखी कई चिट्ठियाँ थीं। उन बुरे दिनों में भी मैंने उन चिट्ठियों को पढा और आश्चर्य, मुझे उनमें रस मिला। पर वह सारा रस ज़हर बन गया, जब मैंने 24 वर्ष पुराने उस पत्र को पढ़ा। उन दिनों पिताजी बम्बई गये हुए थे और माँ ने गोरखपुर से उन्हें वह पत्र लिखा था। यों तो पत्र काफ़ी लम्बा था, पर उसके जिस अंश ने मुझे आकाश से धरती पर ला पटका, वह इस प्रकार थाः

“इस बार भगवान् ने हमारी सुन ली। त्रिवेणी माता ने हमारा सन्तान का अभाव दूर कर दिया। कुम्भ-मेले में जाने से तुम्हें इतनी चिढ़ थी; फिर भी मैं गयी और इस बार सन्तानवती होकर लौटी। ईश्वर ने हमारी मनोव्यथा से पसीज कर हमें एक पुत्री दी है। लड़की लगभग चार साल की है, बड़ी सुन्दर और चन्चल है। अपना नाम विपुला बताती है। बेचारी अकेली भटक रही थी भीड़ में—मुझे मिल गयी। मैंने इधर-उधर इसके माँ-बाप की खोज की, पर सचमुच वे कहीं मिल न जाएँ, इस खयाल से मैंने पुलिस में रिपोर्ट नहीं की और उसी दिन गोरखपुर लौट आयी। इसे तुम पाप कहोगे, लेकिन मुझे अब इसकी परवाह नहीं है। मैं किसी भी तरह इसे छोड़ नहीं सकती। चालीस के बाद अब अपनी सन्तान की क्या आशा हो सकती है! अब तो यही मेरी सन्तान है। मैं नहीं चाहती कि लड़की को कभी असलियत का पता चले, इसलिए अच्छा होगा कि हम गोरखपुर सदा के लिए छोड़ दें। यहाँ रहने से किसी-न-किसी से इसे यह बात मालूम हो ही जाएगी। सभी पुराने नौकरों को भी हम धीरे-धीरे जवाब दे देंगे। अपने नाते-रिश्तेदारों से भी हमेशा सावधान रहना होगा—बच्ची को उनकी छाया से भी दूर रखना होगा। तुम बुरा मत मानना मेरी करनी का। यह मुझे आख़िरी भीख दो—आगे कुछ नहीं माँगूँगी। अपने प्रयत्नों से मैं माँ बनी हूँ, इसमें बाधा मत डालना! मुझे इससे अलग नहीं करोगे न?”

यह कितना बड़ा आघात था मेरे मर्म पर! भला कौन अन्दाज़ लगा सकता है इसका? पर दरअसल, यह उतना बड़ा आघात नहीं था मेरे लिए। असली आघात दूसरा था। विपिन की भी एक चार-वर्षीया बहन, जिसका नाम विपुला था, उसी वर्ष कुम्भ के मेले में लापता हुई थी!

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गुरुवार, 29 अगस्त 2024

दुर्गा की प्रतिमा

बात 1984 की है। या, शायद 1985 या 1986 की हो। बहरहाल, साल उतना अहम नहीं है यहाँ।

            चौड़ी सड़क। मध्यम आकार का मकान। छोटा-सा दरवाज़ा, मकान के पिछवाड़े। दरवाज़े से अंदर दाख़िल हों, तो सामने तंग-सा एक गलियारा पड़ता है। इसी गलियारे में एक कामचलाऊ रसोईघर है। इतना छोटा, कि बाहें फैलाएँ तो दीवारों से टकरा जाएँ। गलियारे से दो सीढ़ी ऊपर एक कमरा है। कोई बारह फ़ुट बाई बारह फ़ुट का होगा।

सुबह साढ़े दस बजे इस कमरे में एक लड़की दिखा करती है। हूर या परी तो नहीं; पर सुतवाँ नाक, घुटना चूमते काले घने बाल, गेहुँआ रंग और हँसमुख चेहरा उसे भीड़ से अलग ज़रूर कर देते हैं। ग़ौर करें, तो कमरे में देखने लायक कुछ है ही नहीं उस लड़की के सिवाय। न मँहगी पेंटिंग, न सजावटी सामान—टेलीविज़न तक नहीं है इस कमरे में।  

फिर भी, लड़की ख़ुश है। हर शाम साढ़े चार बजे मुँह धोने, दाँतों के बीच क्लिप फँसा कर बाल काढ़ने, सजने-सँवरने और बाहर जाने के कपड़े पहनने के बाद वह बेताबी से दीवारघड़ी ताका करती है। घड़ी की टिक-टिक में मोटर साइकिल की धक-धक का पुट आते ही उसकी बाँछें खिल जाती हैं। वह बिजली की तेज़ी से दरवाज़ा खोला करती है। एक लड़का अंदर आता है, ब्रीफ़केस कमरे में रखता है, और पाँच मिनट के अंदर दोनों फुर्र हो जाते हैं। दोनों बाज़ार में घूमते हैं, कुछ खाते हैं, बतियाते हैं, एक-दूसरे की आँखों में ख़्वाब देखते हैं, और लौट आते हैं टीन के दरवाज़ेवाले अपने स्वर्ग में।

लड़के के बाल थोड़े घुंघराले हैं। लड़की को अक्सर उन बालों में उँगलियाँ फिराने का मन होता है। लड़के को बेतरतीब बाल पसंद नहीं। लड़की को लड़के के कंधे पर हाथ रखने में मज़ा आता हैगर्दन की भूरी चमड़ी पर चूड़ियों का रंग निखर आता है।

आज भी लड़की कुछ ऐसा ही नज़ारा देख रही थी कि लड़का बोल उठा, ’’सुमि!’’

’’हूँ ऽऽऽ ... ’’ सौम्या ने जैसे नींद में कहा।

’’मुझे एक जॉब ऑफ़र मिला है। कलकत्ता में। यहाँ से दस हज़ार ज्यादा मिलेंगे हर महीने।’’

’’स ऽऽऽ च?’’ सौम्या की ख़ुमारी हवा हो गई। ’’कब जाना होगा?’’ फिर सँभलते हुए बोली, ’’वैसे तो अब भी कोई तक़लीफ़ नहीं, पर बढ़े हुए दस हज़ार रुपयों का इस्तेमाल तो हो ही जाएगा।’’

लड़का सौम्या के भोलेपन पर मुस्कराया। उसने मन-ही-मन सोचा, ’’काश! जीना उतना आसान होता जितना सौम्या समझती है।’’

उसके लिए सौम्या गुलाब पर गिरी शबनम की मानिंद थी। सूरज की किरण हो या हवा का झोंका, शबनम को सबसे बचा कर रखना पड़ता है। ज़माने की बुराइयों, अनुभवों की खटास—सबका ज़िक्र किए बिना छोटा-सा उत्तर दिया उसने, ’’उनके पास तीन कैंडिडेट हैं। पता नहीं मेरा सेलेक्शन होगा भी या नहीं।’’

उसके सपनों के देवता से कोई बेहतर-भी हो सकता है, यह सौम्या की कल्पना से बाहर था। वह बोली, ’’आप ही का सेलेक्शन होगा, सुमित! अपने को अंडर एस्टिमेट क्यों करते हैं?’’

दूसरे दिन सौम्या ने भगवान की तस्वीर के आगे थोड़ी ज़्यादा देर तक हाथ जोड़े।

 

एक महीना हो गया सौम्या-सुमित को कलकत्ता आए। काली-पीली टैक्सियाँटन-टन करती ट्रामें, हाथ रिक्शे, नुक्कड़ पर एग रोल की दूकान, और कलाई में शंख का कड़ा पहने मकानमालकिन—सौम्या के जीवन में एक नया अध्याय जुड़ गया। बस, शाम को सुमित के साथ घूमना बन्द हो गया। वह सुबह जल्दी जाता और शाम ढले घर लौटता। कभी-कभी तो रात हो जाती। सौम्या खिड़की के पास खड़ी रहती नीचे गली की ओर टकटकी लगाए। कॉरपोरेशन के टिमटिमाते बल्ब के गंदले उजाले में भी उसे सुमित का साया साफ़ नज़र आ जाता। उसे देखते ही सौम्या के चेहरे पर हज़ारों वॉट के बल्ब जैसे एक साथ चमक उठते। वह ज़ीने से दौड़ती हुई नीचे उतरती, दरवाज़ा खोलती। परेशान-सा सुमित अंदर आता। खाना खाने के बाद पति-पत्नी में बातें होतीं। सौम्या के पतंग की डोर से लम्बे सवालों का जवाब सुमित हाँ-हूँ में देता और जल्दी-ही नींद के आगे घुटने टेक देता। सौम्या मुस्कराती, सुमित के बालों में उँगलियाँ फिराती, तनख़्वाह में बढ़े दस हज़ार रुपयों से किश्तों में फ्रि़ज ख़रीदें या टेलीविज़न, सोचती, और सो जाती। 

सौम्या की मुस्कुराहट पूनम के बाद के चाँद की तरह घटती गई। सुमित को सिर्फ़ चार हज़ार रुपयों का फ़ायदा हुआ, क्योंकि कम्पनी की सामर्थ्य उससे अधिक की न थी। चार हज़ार रुपये की बढ़त की बलिवेदी पर सौम्या की मुस्कुराहट ही सती नहीं हुई, सुमित का आराम, चैन और स्वास्थ्य—सब न्यौछावर हो गए। इतवार की छुट्टी गई। रात दस बजे तक, और कभी-कभी रात भर दफ़्तर में सिर ख़पाना आम बात हो गई। तीन महीने पहले तक हमेशा ख़ुश रहने वाला सुमित हमेशा चिड़चिड़ा, परेशान रहने लगा। ख़ाँसी ने उसके ठहाकों को बेदख़ल कर दिया। सौम्या के टेलीविज़न-फ्रि़ज के ख़ुशगवार ख़्वाब परेशानी की भेंट चढ़ गए।

सौम्या अक्सर सोचती, यह तो लेने के देने पड़ गए। सुमित का तेज़ी से गिरता स्वास्थ्य तनख़्वाह में सिर्फ़ चार हज़ार रुपयों की बढ़ोत्तरी से ज़्यादा कचोटता उसे। गर्मी की एक दोपहर छत से लटके पंखे को घूमता देख उसने सोचा, ’’ज़िंदग़ी भी क्या-क्या खेल खिलाती है। आदमी सोचता कुछ और है, और हो जाता है कुछ और!’’ उसे सुमित पर गर्व भी हुआ और प्यार भी आया। आख़िर उसी की ख़ुशी के लिए तो सुमित इतनी ज़द्दोज़हद कर रहा है! अभी, जब वह पंखे की ठंडी हवा में लेटी है, सुमित न जाने किस परेशानी से जूझ रहा होगा। पता नहीं, उसने ठीक तरह से खाना भी खाया होगा या नहीं। उसे एक पल के लिए ही सही, आराम करने की फ़ुर्सत मिली भी होगी या नहीं।

वह खिड़की के पास परेशान-सी खड़ी हो गई। सड़क उसके जीवन की ही तरह सूनी थी, जिस पर लू के थपेड़े साँय-साँय चल रहे थे उसकी मुश्क़िलों की तरह। उसकी निगाह बरबस ही अटक गई तीन बच्चों पर। नीली स्कूल ड्रेस में, कंधे पर बस्ता लटकाए, बच्चे उत्साह में चले जा रहे थे, गर्मी से पिघलती सड़क और लू के थपेड़ों से बेख़बर।

सौम्या के मस्तिष्क में एक विचार कौंधा—क्या मैंने पढ़ाई-लिखाई सिर्फ़ पंखे की हवा खाने या खाना पकाने के लिए की थी? ख़ास करके अब, जब मेरे पति के कंधे गृहस्थी के बोझ से चरमरा रहे हैं, क्या मैं उन्हें थोड़ा-सा सहारा भी नहीं दे सकती? सुमित का गिरता स्वास्थ्य मेरे आत्मसम्मान को भला कैसे गँवारा हो रहा है? आज तो नारी आत्मनिर्भर है। पायलट, वैज्ञानिकसैनिक—नारी हर रूप में मौजूद है आज।

बस, सौम्या ने कमर कस ली। मकानमालकिन के पास गई, पड़ोसियों के पास गई, न जाने किस-किस से क्या-क्या बात की, पर एक सप्ताह बीतते-न-बीतते उसके घर दो बच्चे आने लगे। वह दोपहर में उन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती। सौम्या हँसमुख भी थी, कुशाग्र बुद्धि भी। सौम्या को बच्चे भाए, बच्चों को सौम्या। हफ़्ते-दो-हफ़्ते में छात्रों की संख्या दो से चार और चार से आठ हो गई। सौम्या दो महीनों में पाँच-साढ़े पाँच हज़ार रुपये महीना कमाने लगी।

थोड़ा-थोड़ा ही सही, जैसे-जैसे सौम्या की आमदनी में इज़ाफ़ा होता गया, उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता गया। कलकत्ता की उमस भरी रात में सुमित का बार-बार जाग कर घड़े का पाना पीना सौम्या से देखा न गया। सौम्या ने किश्तों पर फ्रि़ज ख़रीद लिया। उस रात सौम्या ने अच्छे कपड़े पहने, आइसक्रीम जमाई, और बैठ गई सुमित के इंतज़ार में पलक-पाँवड़े बिछा कर। सुमित रोज़ रात की तरह क़रीब दस बजे घर में दाख़िल हुआ। सौम्या को सजी-धजी देख कर चौंका—’’क्या बात है, भाई? कहीं से आ रही हो क्या?’’

सौम्या भला उस छोटे-से घर में फ्रि़ज का क्या सरप्राइज़ दे पाती! नई चीज़ें चमकती भी कुछ ज़्यादा हैं। सुमित की नज़र फ्रि़ज पर पड़ी तो आग बबूला हो उठा—’’अब तुम इतनी मँहगी चीज़ें भी ख़रीदने लगीं बिना पूछे-माते? इधर मेरी नौकरी पर बनी है, और उधर तुम हो कि फ़िज़ूलख़र्ची में पैसे उड़ाए जा रही हो! कैसे भरेंगे इसके पैसे? आख़िर तुम कब समझोगी कि जब दो जून की रोटी को ही लाले पड़े हों, तो ... ख़ैर! छोड़ो। भला तुम समझ भी कैसे सकती हो? तुम्हें सजने-सँवरने से फ़ुरसत मिले, तब तो!’’

सौम्या को काटो, तो ख़ून नहीं! उसका सर कभी अपराघबोघ से झुक जाता, तो कभी अपमान से उसका हृदय सुलग उठता। दाँतों में साड़ी का पल्लू दबाए उसने सिसकियाँ जज़्ब कीं, सुमित के लिए खाना परोसा, और औंधे मुँह निढाल हो गई बिस्तर पर। दिल में कहीं एतबार था कि सुमित हौले-से उसकी पीठ पर हाथ फेरेगा, फुसफुसाते हुए पूछेगा, ’’सो गईं क्या?’’, और तब तक खाना नहीं खाएगा जब तक वह गुस्सा थूक कर मुस्करा न देगी।

लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। सौम्या को लेटे-लेटे ही पता लग गया कि सुमित ने कब खाना खा लिया, और कब वह बिस्तर की दूसरी तरफ़ आ कर लेट गया। कितनी जल्दी नींद भी आ गई उसे!

आघी रात को सौम्या उठी, और आइसक्रीम बहा डाली नाली में। आइसक्रीम के साथ न जाने क्या-क्या और बहा डाला आँसुओं ने। आत्मनिर्भर होने का उसका निश्चय और दृढ़ हो गया।

सौम्या ने उस दिन से पढ़ाने में और ज़्यादा दिल लगाना शुरू कर दिया। पहले सिर्फ़ एक घंटा पढ़ाती थी; अब वह दोपहर तीन बजे से शाम सात बजे तक पढ़ाने लगी। क़रीब तीस बच्चे पढ़ने आते उससे।

उसे वह दिन अब बहुत दूर नहीं लगा जब वह अपना एक छोटा-सा स्कूल चला पाएगी। नन्हे-नन्हे बच्चे रिक्शे में पहुँचेंगे उसके स्कूल। वह उन्हें बहुत प्यार से पढ़ाएगी, उनकी छोटी-से-छोटी ज़रूरत का ख़याल रखेगी।

एक दिन शाम सात बजे वह बच्चों के आख़िरी बैच को विदा कर ही रही थी कि सुमित घर में दाख़िल हुआ। आम तौर पर पत्नी पति को घर जल्दी आया देख कर ख़ुश होती है, लेकिन सौम्या भौंचक रह गई। मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो। सुमित इन दिनों छोटी-छोटी बातों पर उसे झिड़क दिया करता था। आज तो जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा।

’’अच्छा! तो अब दो रुपल्ली का ट्यूशन लेना भी शुरू कर दिया तुमने। तुम्हारे ऐशो-आराम के लिए मेरी तनख़्वाह काफ़ी नहीं, यह जताने का अच्छा तरीक़ा ढूँढा है तुमने!’’

सौम्या में आज पता नहीं कहाँ से इतना आत्मविश्वास आ गया। वह न तो हिचकिचाई, न ही घबराई। बस, इतना बोली, ’’जिस बात के लिए आप आज मुझे ताना दे रहे हैं, एक दिन उसी बात के लिए भगवान् का शुक्र अदा करेंगे।’’

पति-पत्नी के बीच तनाव और गहरा गया। जो दो प्राणी टीन के दरवाज़े के घर में एक-दूसरे की आँखों में स्वर्ग तलाशा करते थे, वे बेहतर सुविधाओं वाले घर में एक-दूसरे से कतराने लगे। सुमित का तो जैसे मन ही उचट गया। रोज़ तड़के दफ़्तर के लिए रवाना होने वाला सुमित अब कभी आठ बजे निकलता तो कभी नौ बजे। कभी-कभी तो साढ़े नौ भी बज जाते। वापसी का भी वही हिसाब। कभी छः बजे लौट आता तो कभी रात के दस भी बजा देता।

सौम्या को धक्का-सा लगा। आदमी अपनी दिनचर्या में इतनी फेरबदल तभी करता है जब किसी को रंगे-हाथ पकड़ना चाहता हो, या किसी से बचना चाहता हो। रंगे-हाथ पकड़ना! ऐसा कौन-सा अपराध कर रही थी सौम्या जो सुमित उसे रंगे-हाथ पकड़ना चाहता था?

सौम्या का मन आक्रोश से भर उठा’’जब ये मेरी जासूसी कर सकते हैं, तो मैं भी वैसा ही करूँगी।’’ पहले वह सुमित की जेब में रखे काग़ज़ के टुकड़ों पर ध्यान न देती थी। पहले सुमित के कपड़े बिना निरीक्षण के धो दिए जाते थे। पहले वह सुमित के हाथ-ख़र्च का ब्यौरा नहीं रखती थी। अब सब बदल गया। अटूट प्रेम के कल्पवृक्ष को संदेह का दीमक चाटने लगा।

सौम्या ने देखा, सुमित की जेब में पड़े बस-ट्राम के टिकट रोज़ एक समान नहीं होते। जेब में अक्सर मूँगफली के छिलके और दानों के टुकड़े मिलते। कभी-कभी उसकी कमीज़-पतलून पर गीली मिट्टी के दाग़ होते। एक दिन घास के टुकड़े भी चिपके मिले।

सौम्या का माथा ठनका। वह समझ गई, सुमित दफ़्तर के अलावा भी कहीं और जाता था! अक्सर किसी बग़ीचे में बैठता-लेटता था। किसके साथ? वह कौन थी जिसकी वजह से सुमित सौम्या से उखड़ा-उखड़ा रहता था?

दशहरे को पाँच दिन बाक़ी थे। सौम्या के छात्रों के दशहरे के दो दिन बाद तक छुट्टी के अनुरोध की वजह से ट्यूशन सात दिनों के लिए बंद था। सुमित की छुट्टी सिर्फ़ दशहरे के दिन थी। वह नौ बजे दफ़्तर के लिए निकला तो सब्ज़ी ख़रीदने के बहाने सौम्या भी झोला लेकर निकल पड़ी।

गली के आगे सुमित बाईं ओर मुड़ा बस-स्टॉप की ओर, और सौम्या दाईं ओर, हाट की तरफ़। दो अलग-अलग रास्तों पर मुड़ते समय पति-पत्नी ने ऐसे हाथ हिलाया जैसे जान छूटी हो।

दस कदम बढ़ कर सौम्या ने पीछे मुड़ कर देखा। सुमित बस स्टॉप की ओर बढ़ा जा रहा था। सौम्या भी पलट कर पेड़ों, गाड़ियों, खोमचों की आड़ में सुमित के पीछे हो ली। सुमित ने दो बार पलट कर देखा, पर सौम्या दोनों बार पकड़े जाने से बाल-बाल बच गई।

सुमित के एक पैर को बिबादी बाग़ की खचाखच भरी बस के पायदान के एक छोटे-से हिस्से पर जगह मिली। दरवाजे़ के हैंडल को पकड़ने की स्पर्धा करते दर्ज़नों हाथों में एक हाथ सुमित का भी था। उसका दूसरा पैर और ब्रीफ़केस वाला हाथ हवा में झूल रहा था।

सौम्या का कलेजा मुँह को आ गया। सोचा, सुमित को बस से उतर कर अगली बस का इंतज़ार करने को कहे, लेकिन वह बस से क़रीब दस फ़ुट दूर थी। जब तक बस के पास पहुँच पाती, बस चल पड़ी।

दफ़्तर जानेवालों की चाल की चुस्ती सुमित की चाल में न थी। प्रेमिका से छुप कर मिलनेवालों की चाल का उमंग भी न था। वह तो बस, उद्देश्यहीन-सा चल रहा रहा था। कभी एक दूकान के आगे ठिठकता तो कभी दूसरी के। इसी तरह पंद्रह-बीस मिनट की चहलकदमी के बाद सुमित एक पार्क में दाख़िल हो गया।

सौम्या ठिठक गई। थोड़ी देर तक सुमित को ताकती रही। सुमित निश्चिंत भाव एक पेड़ से पीठ टिका कर बैठ गया था, शून्य में कुछ तलाशता। सौम्या हैरान थी’’ये आराम से यहाँ क्यों बैठ गए हैं? दफ़्तर क्यों नहीं जा रहे?’’

सौम्या ने पर्स से एक चिट निकाली, सुमित के दफ़्तर का पता पढ़ा, और अनुमान लगाया कि दफ़्तर पास ही कहीं होगा। दस मिनट के अंदर वह सुमित के दफ़्तर के सामने थी। दफ़्तर के दरवाज़े पर पीतल के दो मोटे-मोटे ताले लगे थे। दीवार पर बंगला में नोटिस लगी थी।

’’ओह! तो सुमित के दफ़्तर में भी दशहरा की छुट्टी है, जिसकी नोटिस लगी है। देखो तो! अब सुमित को मेरा इतना-सा साथ भी मंज़ूर नहीं कि छुट्टी घर में बिताएँ।’’

सौम्या सीढ़ियाँ उतरने लगी। तभी ख़याल आया, ज़रा ये भी पता कर लिया जाए कि छुट्टी कब से कब तक है। सीढ़ियाँ दोबारा चढ़ कर वह एक बार फिर दफ़्तर के सामने खड़ी हो गई। बंगला पढ़ना उसे आता न था। सोच ही रही थी कि क्या किया जाए, कि एक आदमी चाय के गिलास लिए गुज़रा। सौम्या को कुछ पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। वह ख़ुद ही बोल उठा, ’’इधर छुट्टी हो गया! खैला सोमाप्तो!’’

’’छुट्टी हो गई? अरे आज ऑफ़िस ख़ुला ही कब जो छुट्टी हो गई?’’

’’ऑपिश पोनोरो दीन थेके बौंदो।’’

’’ऑफ़िस पंद्रह दिनों से बंद है? क्यों? ख़ुलेगा कब?’’

’’क्या जाने कौब खुलेगा, खुलेगा भी कि नेहीं। कोम्पानी का बाबू लोग को भी पाता नेहीं। ओ दैखो, ए बाबू रोज आता है। इसको मालूम होगा।’’ चायवाले ने सीढ़ियाँ चढ़ कर आते सुमित की ओर इशारा किया।

सौम्या सुमित को देख कर मुस्कराई—कुछ वैसे ही जैसे टीन के दरवाज़े वाले घर में मुस्कराया करती थी। हकबकाया-सा सुमित भी मुस्करा उठा। इससे पहले कि कोई कुछ बोल पाता, सौम्या ने सुमित का हाथ थामा और सीढ़ियाँ उतरने लगी।

’’तुम ... यहाँ?’’ सुमित ने झेंपते हुए पूछा।

’’हाँ!’’ छोटा-सा उत्तर दिया सौम्या ने।

’’मैं तुम्हें इस बारे में बताने ही वाला था ... ’’ सुमित सफ़ाई देने लगा।

सौम्या चुप रही।

दोनों बस-स्टॉप की ओर बढ़ने लगे।

’’तुम यहाँ आईं क्यों?’’

’’अपनी गृहस्थी और आपके सम्मान की रक्षा के लिए!’’

सुमित के मुँह में शब्द आने से पहले बस आ गई। बस में ज़्यादा भीड़ नहीं थी। सौम्या महिलाओं वाली सीट पर बैठ गई। सुमित को बस में पीछे सीट मिल गई।

लगभग आधे घंटे की यात्रा के दौरान पति-पत्नी विचारों के झंझावात झेलते रहे। बस से उतरने से लेकर घर पहुँचने तक दोनों चुपचाप रहे। सुमित चुपचाप बैठ गया कोने में। सौम्या कपड़े बदल कर रसोई में घुस गई।

सुमित ने धीरे से कहा, ’’मेरे टिफ़िन का डिब्बा भी है।’’

सौम्या ने सामान्य लहजे में कहा, ’’हाँ, बस थोड़ा-बहुत कुछ और बना लेती हूँ। डिब्बे का खाना भी गर्म कर लूँगी।’’

सुमित के दिल का चोर ऐसे सामान्य व्यवहार के लिए तैयार न था। अगर सौम्या रूठती, या ग़ुस्सा होती, तो सुमित भी आसमान सर पर उठा लेता। बोलता, कि सौम्या के इसी अप्रिय आचरण ने उसे पंद्रह दिनों तक चुप रहने, आफ़िस जाने का नाटक करने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन, सौम्या तो यूँ शान्त थी जैसे कुछ हुआ ही न हो।

सौम्या ने खाना परोसा। दोनों चुपचाप खाते रहे। खाना ख़त्म हुआ। सौम्या ने बर्तन समेटे। सुमित अख़बार पढ़ने का नाटक करने लगा। सौम्या रसोई से बाहर आ कर सुमित के पास बैठ गई। बोली कुछ नहीं, बस, सुमित का हाथ थाम लिया उसने।

सहानुभूति भरा स्पर्श पाते ही सुमित के अन्दर न जाने कब का ज्वार फूट पड़ा। उसकी आँखें छलक उठीं। ’’मैं क्या करता? मेरा क्या दोष है, बोलो? कैसे बताता कि मेरी कम्पनी अचानक बन्द हो गई?’’

सौम्या ने सुमित के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा, ’’कम्पनी के बंद होने में आपका कोई दोष नहीं। आप तो मन लगाकर, ख़ून पसीना एक कर, काम करते रहे। पंद्रह दिन इंतज़ार भी कर लिया कि कम्पनी शायद फिर ख़ुल जाए। अगर ख़ुल गई और नौकरी वापस मिल गई, तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन इसके लिए वहाँ रोज़-रोज़ जाने की क्या ज़रूरत है? एक फ़ोन ही काफ़ी होगा।’’

’’तुम समझती नहीं, सुमि! अगर मैं रोज़ बाहर नहीं जाऊँगा तो मुहल्लेवालों को पता चल जाएगा कि मैं बेकार हूँ। क्या इज़्ज़त रह जाएगी हमारी? मकान मालिक घर ख़ाली करने को कहेगा। दुकानदार सामान देने में हिचकिचाएँगे।’’

’’आपकी बात सोलहों आने सही है। लेकिन काम पर जाने का नाटक आख़िर कब तक चलेगा? सच कभी-न-कभी सामने आ ही जाएगा। तब कितनी भद होगी!’’

’’तो क्या करूँ? दूसरी नौकरी इतनी जल्दी कहाँ मिलेगी? और वह भी इस परदेस में? जब तक नौकरी हाथ में रहती है, दूसरी नौकरी के प्रस्ताव आते रहते हैं। लेकिन हाथ से नौकरी जाते ही सारे प्रस्ताव भी बंद हो जाते हैं। कोई बात करने को तैयार भी होता है तो पिछली तनख़्वाह से कम पैसों पर।’’ सुमित रुआँसा हो गया।

’’बात बिलकुल सच है। हमारी समस्या गम्भीर है। इस अनजान शहर में नौकरी के बिना कितना समय काट लेंगे हम? एक महीना? दो महीने? क्या गारंटी है कि दो महीनों में कम्पनी वापस ख़ुल जाएगी या दूसरी नौकरी मिल जाएगी? किसके आगे हाथ फैलाएँगे? और, कोई देगा भी तो क्यों और कब तक?’’

सुमित ने हाथों में सर थाम लिया। ’’काश! दस हज़ार रुपयों के लालच में मैंने नौकरी न छोड़ी होती। अब तो वह लोग भी जवाब नहीं दे रहे।’’

’’ऐसा नहीं कि कोई रास्ता ही नहीं हमारे आगे। एक रास्ता है।’’

’’कौन-सा रास्ता?’’ सुमित उत्सुक हो गया।

’’बच्चों को पढ़ाने का।’’

’’मैं भला बच्चों को क्या पढ़ाऊँगा? और उससे क्या कमाई हो जाएगी?’’

’’बच्चे मुझसे बहुत सारे विषय पढ़ते हैं, पर कुछ विषय पढ़ने किसी दूसरे के पास जाते हैं। मुझे मालूम है, आपको वे सारे विषय बड़ी अच्छी तरह से आते हैं। और रही पैसों की बात, तो वो कुछ इतने कम भी नहीं।’’

’’देखो! क्या गारंटी है कि बच्चे मुझसे पढ़ेंगे? और कितने पैसे मिल जाएँगे इस माथापच्ची से?’’

’’बच्चों को अभी दो जगहों पर जाना पड़ता है। अगर सारे विषय एक ही छत के नीचे अच्छी तरह पढ़ा दिए जाएँ तो वे कहीं और क्यों जाएंगे? रही कमाई की बात, तो हर बच्चा सात सौ रुपये देता है।’’

’’वही तो! छः-सात बच्चों को पढ़ा भी दिया तो क्या मिलेगा? चार-पाँच हज़ार रुपये?’’

’’बच्चों की संख्या छः-सात नहीं, तीस है। आपने उस दिन सिर्फ़ एक बैच देखा था। जहाँ कुछ नहीं मिल रहा, वहाँ इक्कीस हज़ार रुपए मिल जाएँगे। दफ़्तर जाने का ख़र्च भी बचेगा। हम तो दस हज़ार के लालच में शहर और लगी-लगाई नौकरी छोड़ आए थे! साल बीतते-न-बीतते हमारे पास बहुत से बच्चे आने लगेंगे।’’

’’इक्कीस हज़ार! कहाँ चालीस हज़ार की नौकरी और कहाँ इक्कीस हज़ार की कमाई! ... लेकिन ये कमाई अपनी होगी। आत्मसम्मान की होगी। किसी का भविष्य बनाने की होगी। कम्पनी ख़ुलने या दूसरी नौकरी की उम्मीद में बैठने से कहीं अच्छा है कुछ सार्थक करना। ठीक है!’’ सुमित उत्साहित हो गया।

शाम हो रही थी। सौम्या ने बत्ती जला कर भगवान के आगे हाथ जोड़े। सुमित ने भी हाथ जोड़े। ढाक की आवाज़ और जयजयकार सुनाई दी। दुर्गा की प्रतिमा पंडाल में स्थापित होने जा रही थी।

 

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