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मंगलवार, 8 सितंबर 2026

पंद्रह अनूदित लघुकथाएँ



1 - जूते

लेखक: (संभवतः) अर्नेस्ट हैमिंग्वे

 

घर के पुराने सामान में बिकाऊ हैं नवजात शिशु के जूते (जो कभी इस्तेमाल न हो सके)

 

2 - चूक

लेखक: (संभवतः) ओ हेनरी

 

चालक होठों में सिगरेट दबाए गाड़ी में पेट्रोल जाँचने लगा। मृतक तेईस वर्ष का था।

 

3 - कौन?

लेखक: (संभवतः) फ्ऱेडरिक ब्राउन

 

सृष्टि का अंतिम व्यक्ति कमरे में बैठा था। किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

 

4 - आपबीती

लेखकः अज्ञात

 

कभी मेरे कपड़ों पर सिलवटें और चेहरे पर चमक थी। अब उसका उल्टा हो गया है।

 

5 - हत्यारा

लेखिका: (संभवतः) जेन ओरविस

 

रीता की नृशंस हत्या के बाद कार्टर की दुनिया खिड़की के पार सिमट कर रह गई है। टेलिविज़न, किताबों, और पत्रों की छोड़िए, उसे तो इसकी भी परवाह नहीं कि उसका भोजन कौन पहुँचाता है और ख़र्च कैसे चलता है। गाड़ियाँ आती-जाती रहती हैं, लोग चहलक़दमी करते रहते हैं, मौसम बदलते रहते हैं, मगर रीता की याद में मग्न कार्टर कमरे से बाहर ही नहीं निकलता। वह तो यह भी महसूस नहीं कर पाता कि उसके कारावास में खिड़की है ही नहीं।

 

6 - दुर्घटना

लेखक: अज्ञात

 

पुराने सामान में बिकाऊ है बिना इस्तेमाल हुआ पैराशूट (जिस पर थोड़े दाग़-धब्बे लगे हैं)।

 

7 - बचने की क़ीमत

लेखक: (संभवतः) ऑगस्ट सालेमी

 

आँख-चुँधियाती हेडलाइट, टकराहट की कर्कश ध्वनि, होश भुला देनेवाली पीड़ा, और उन सबके बाद ऊष्ण नीला प्रकाश। ऊर्जा स्रोत की ओर बढ़ते जॉन को मुक्ति, नवजीवन, तथा असीम सुख का आभास होने लगा था; लेकिन अँधेरा और उत्कंठा लौट आईं। उसने पलकें मिचमिचाईं। नलियों, पट्टियों और प्लास्टर के बीच उसके दोनों पैर कट चुके थे।

पत्नी ने सुबकते हुए कहा, “उन्होंने तुम्हें बचा लिया, प्रियतम!”

 

8 - सहयात्री

लेखक: अज्ञात

 

“क्या आप भूत-प्रेतों में विश्वास रखते हैं?” सहयात्री ने घंटों की निस्तब्धता भंग की।

“नहीं,” डिब्बे में सवार एकमात्र दूसरा व्यक्ति किताब से आँखें हटाए बिना भुनभुनाया।

“मैं भी नहीं करता,” कहते हुए सहयात्री हवा से तेज़ रफ़्तार से चलती गाड़ी से ऐसी सहजता से नीचे उतर गया, मानो वह रुकी हुई हो।

 

9 - तिरस्कार

लेखिका: (संभवतः) लरिसा कर्कलैण्ड

 

हम दो प्रेमियों के बीच दो वर्षों से तीसरा कोई नहीं था। शानदार रेस्त्राँ में उस चाँदनी रात झिलमिलाती मोमबत्तियों के बीच भोजन के दौरान उसके मनमोहक लिबास, रेशम-सी नर्म ज़ुल्फ़ों, नशीली निगाहों, और दबी-दबी मुस्कान ने इंगित कर दिया, वही सबसे बेहतर मौक़ा था। लोगों की परवाह न करते हुए मैंने शैम्पेन मँगाई, एक घुटना ज़मीन पर टिकाया, तथा जेब से हीरे की अँगूठी निकाल मुस्कुराते अधरों और काँपते स्वर में प्रेमयाचना कर ही डाली।

वह बोली, “पागल हो गए हो क्या? हर्ग़िज़ नहीं!”

 

10 - काया परिवर्तन

लेखक: (संभवतः) चार्ल्स एनराइट

 

हादसा होते ही मैं पत्नी को सूचना देने घर भागा, लेकिन उसने मुझे देखकर भी नहीं देखा, रोज़मर्रा के काम करने और टीवी देखने में ही उलझी रही।

फ़ोन की घंटी बजी। बात करते-करते उसका चेहरा उतर गया, आँसू बहने लगे।  

11 - मुफ़लिसी का संतोष

लेखक: (संभवतः ऐनड्र्यू ई हन्ट)

 

भीख में मिले कम्बल ओढ़ते ही उसके कन्धों में ठंड लगनी बन्द हो गई थी। सुबह कूड़ेदान में मिले जूते उसके पैरों की नाप के ही थे। सड़क पर जलती बत्तियाँ हाड़-कँपकँपाती ठंड में गर्मी का अहसास दिला रही थीं। पार्क की बेंच की गोलाई उसकी थकी पीठ को नर्म सहारा दे रही थी। उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया। ज़िन्दगी में भला और क्या चाहिए!

 

12 - सौदा

लेखक: (संभवतः) ब्रायन नीवेल

 

शैतान का साया दूर हो रहा था, पर दोनों लड़के उसकी चुभती नज़र अब तक महसूस कर रहे थे।

“क्यों? आख़िर वह क्या चाहता था तुझसे?”

“मेरी आत्मा! और, तुझसे?”

“पे-फ़ोन के लिए सिक्का। उसको तुरन्त फ़ोन करना है कहीं।“

“भूख लग रही है। कुछ ख़रीद कर खा लें?”

“भूख तो मुझे भी लग रही है, पर सारे पैसे तो वह ले गया।“

“फ़िक़्र मत कर, मेरे पास सिक्के-ही-सिक्के हैं।“  

 

13 - मौत का शिकंजा

लेखक: (संभवतः ऐलन ई मेयर)

 

हल्का-हल्का होश आया। मेरा हर अंग दर्द से टूट रहा था। बिस्तर के पास खड़ी नर्स ने कहा, “मिस्टर फ़ूजिमा, आप भाग्यशाली हैं जो दो दिन पहले हिरोशिमा की बमबारी में ज़िन्दा बच निकले। अब आप चिकित्सालय में पूर्ण सुरक्षित हैं।“

बेहोशी में डूबता-उतराता मैं फुसफुसाया, “मैं कहाँ हूँ?”

“नागासाकी में,” उसका उत्तर था।

 

14 - असमंजस

लेखक: (संभवतः जे रिप)

 

क्रोध और प्रेम के जाल में किंकर्तव्यविमूढ़ हम प्रेमी युगल ने अपने भविष्य का फ़ैसला सिक्के की उछाल पर छोड़ दिया—हेड आने पर विवाह, टेल आने पर सम्बन्धविच्छेद।

सिक्का उछला, नाचा, झूमा, और हेड पर थम गया।

हम दोनों ने असमंजस से देखा और एकसाथ कहा, “तीन में से जो दो बार आए, उसे मानना ठीक रहेगा।“

 

15 - सच्चाई

लेखक: (संभवतः रॉबर्ट टॉम्पकिन्स)

 

उसकी सच्चाई की खोज एक सुदूर गाँव की टूटी-फूटी झोंपड़ी में जाकर पूरी हुई। बुझते अलाव के सामने फटे-पुराने वस्त्रों में बैठी सच्चाई उसकी कल्पना से भी अधिक वृद्ध और कुरूप थी। 

“क्या आप ही सच्चाई हैं,” उसने पूछा।

सच्चाई ने सिर हिलाकर हामी भरी।

“जगत के लिए आपका क्या संदेश है? लोगों से आपके बारे में क्या कहूँ?”

“उन्हें बताओ, कि मैं कितनी जवान और ख़ूबसूरत हूँ!”

बुधवार, 3 जून 2026

अब, उनका क्या करें!


पाँच काउंटर्स का छोटा-सा एक बैंक। एक छोर पर कैश लेने-देने वाले बाबुओं के केबिन थे, जिनका निचला हिस्सा लकड़ी का और ऊपरी भाग शीशे का था और जिनसे बाबुओं के मुँह और बाहें साफ़ दिखाई देती थीं । उसके बाद तीन बाबुओं के बैठने की जगह थी और दूसरे छोर पर मैनेजर का कमरा था। मैनेजर के कमरे की खिड़की पर पर्दा लगा था और बेइंतहा गर्मी के बावजूद उसका दरवाज़ा बन्द था। हर दस मिनट पर बहुत-से काग़ज़ और रजिस्टर लिए एक कर्मचारी दरवाज़ा खटखटा कर एक-दो मिनट के विलम्ब के बाद उस कमरे में प्रवेश करता और दो मिनट में साहब के दस्तख़त करवा कर लौटता। उसके बाहर निकलते ही दरवाज़ा स्वतः बन्द हो जाता था। बैंक का सारा तामझाम मात्र ढाई सौ वर्ग फ़ुट में समाहित था और ग्राहकों के लिए डेढ़ सौ वर्ग फ़ुट की अपार जगह छोड़ दी गई थी।

            बैंक के इर्द-गिर्द पाँच किलोमीटर तक आबादी का नामोनिशान न था। बैंक, जैसे, साथ लगे आर्मी कैम्प और एक बेहद सफल स्कूल की सहूलियत के लिए ही बनाया गया था। बैंक से बाहर निकलते ही युद्ध में जीता दुश्मनों का एक टैंक दीखता, फ़ौलादी ज़ंजीरों से घिरा, अकेला, झेंपा हुआ-सा। अक्सर सैनिकों की क़वायद की आवाज़ भी सुनाई देती।

यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल फ़ोन पर तस्वीर उतारने की गुंजाइश नहीं थी, जब फ़िज़ा में इलाहाबाद का नाम बदलने का ज़िक्र तक न था, और जब वहाँ पच्चीस पैसे में गर्मागर्म समोसा मिला करता था। अगर आप यह समझ रहे हैं कि इलाहाबाद के एक कोने में छुपे उस बैंक में बड़ी शांति का वातावरण रहता होगा, चैन की वंशी बजती होगी, तो बात सरासर ऐसी नहीं है। वहाँ इतनी चिल्लपों मचती थी, इतना सिर-फुटव्वल होता था, कि क्या बताऊँ! कभी-कभी तो नौबत हाथापाई तक उतर आती। याद नहीं कि वह कौन-सा साल था और कौन-सा महीना, पर इतना दुरुस्त है कि तारीख़ सोलह थी। इतनी भीड़ थी बैंक में, कि लोगों की क़तार मुख्य दरवाज़े से दस फ़ुट बाहर तक पहुँच गई थी। गर्मी का उमस भरा मौसम। उस पर सूरज इस ज़िद पर अड़ा था शायद, कि कल चाहे दिन भर बादलों के नर्म बिस्तर पर सुस्ताऊँ, पर आज तो अपनी तपिश से सबको झुलसा कर ही दम लूँगा।

सिर पर चमकता सूरज, पैरों के नीचे धूल-मिट्टी-कंकड़ का शहरी कालीन, और साँस लेने को आसपास के खेतों से आती लू-मिश्रित-धूल। रही-सही कसर पसीने की अविरल धार ने पूरी कर दी थी। भीड़ के पसीने की मात्रा देख कॉर्पोरेशन के नल को इन्फ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स हो जाता। ललाट, बाल, गर्दन, बाहें और गंजों के सर पसीने में यूँ चिपचिपाए हुए थे जैसे तेल में भुँजे बैंगन को कड़ाही से निकले घंटे-दो-घंटे बीत चुके हों।

ज़ाहिर है, लोगों के तन पर कपड़े गीले ज़्यादा थे, सूखे कम। दिल्ली होती, तो तीन-तीन रुपयों में नारियल की एक सरीखी कटी गरी बेचने वाला आ जाता। कलकत्ता के झालमूढ़ीवाले और भिखारी इस बिज़नेस ऑपरच्यूनिटी को एक्सप्लॉइट करते। मुंबई में सींगदाना और रेनबो सैंडविच की फेरी लगानेवाले चक्कर लगा लेते। लेकिन, इलाहाबाद इलाहाबाद था; दिल्ली, कलकत्ता या मुंबई नहीं। साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था इलाहाबाद एक ज़माने में। यह अलहदा बात है कि उस समय तक साहित्य नाममात्र को बचा था वहाँ; अलबत्ता कारें ज़रूर ज़्यादा हो गई थीं।

इलाहाबाद के उसी गौरवशाली अतीत से प्रभावित होकर, या टार्गेट पूरा करने की मजबूरी से परेशान होकर; न जाने कब एक नौजवान भीड़ के पास पहुँच गया। उसके जूतों के ऊपरी चमड़े स्वस्थ सोल का मोह त्याग चुके थे। आमतौर पर वैसे जूते कबाड़ीवाले या कूड़ेदान की शरणस्थली में चिरनिद्रा में लीन हो जाया करते हैं, पर वहाँ तो बात ही कुछ और थी। धागे की सिलाई और कीलों की वहृद व्यूह रचना नौजवान के जूतों की आत्मरक्षा कर रही थी। उसके काले पैंट पर पसीने की सूखी लकीरों ने सफ़ेद धारियों का डिज़ाइन बना दिया था। मटमैली कमीज़ औेर उसके ऊपर गहरे नीले रंग की टाई, जिसकी नॉट के पास का हिस्सा मैल से काला हो चुका था, नौजवान की ख़स्ताहाली खुले शब्दों में बयान कर रही थीं। नौजवान ने हैट भी लगाया हुआ था—गर्मी से बचने के लिए या किसी लोकप्रिय फ़िल्मी हीरो की नक़ल उतारने के लिए, निश्चय करना मुश्किल था। पर एक बात तो थी! उसकी इस वेशभूषा  ने हर किसी का ध्यान आकृष्ट कर लिया था।

कवि बच्चन कहते थे कि हिन्दी फ़िल्मों में तीन घंटे में पोइटिक जस्टिस मिल जाता है, लेकिन असली ज़िंदगी में या तो बहुत देर से मिलता है या फिर मिलता ही नहीं। फ़िल्में अलग हैं, यथार्थ अलग। तो, हमारे इस नौजवान का इस्तिक़बाल किसी फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं हुआ। कुछ लोगों ने उसे ऐसे घूरा मानो वह शीशे का बना हो और उसके आरपार देखा जा सकता हो। कुछ ने उससे नज़रें चुराईं। कुछ ने उसे शक़ की निगाहों से देखा। कुछ डरे हुए भी मालूम पड़े, मानो नौजवान एड्स का वायरस लिए घूम रहा हो।

नौजवान को इस रूखे अंदाज़ की शायद लत पड़ चुकी थी। वह लोगों के आक्रोश, असुविधा और असहयोग को नकार एक-एक व्यक्ति के पास जाने लगा। हर नए शख़्स के पास जाकर वह मुस्कुराता, सर थोड़ा झुकाता, और कहने लगता, “सर! आप अपने बच्चे की फ़ीस जमा करने के लिए खड़े हैं। आपके बच्चे के लिए हमारी कम्पनी ने प्रोमोशन के तौर पर यह इन्साइक्लोपीडिया निकाला है। दाम है सिर्फ़ चार सौ पचास रुपया। यही इन्साइक्लोपीडिया बाज़ार में नौ सौ रुपए में मिलता है। और भी बुक्स हैं। दिखाऊँ, सर?”

यह मोनोलॉग बड़ी अच्छी तरह रटा हुआ था उसे। हर नए आदमी के आगे सर झुकाते ही जैसे कहीं कोई बटन दब जाता उसके अंदर, और रिकॉर्ड बज उठता। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि हर आम हिंदुस्तानी क़तार की तरह उस क़तार में भी ऊबे-परेशान लोग एक-दूसरे के इतने पास खड़े थे कि किसी का जूता किसी की चप्पल पर टिका था, किसी की कोहनी किसी की पसलियों में घुसी जा रही थी, कोई अपने पीछे खड़े व्यक्ति की साँसें अपनी गर्दन पर महसूस कर रहा था, और किसी का ब्रीफ़केस आगेवाले के टखनों से बारबार टकरा रहा था।

नौजवान का मोनोलॉग मुझे विविधभारती की विभिन्न सभाओं की तरह कम-से-कम पाँच बार सुनाई पड़ चुका था। सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने बात पूरी सुने बिना हथेली यूँ हिलाई, जैसे मक्खी उड़ा रहा हो। दूसरा व्यक्ति साइकिल और इन्साइक्लोपीडिया के बारीक अंतर को समझे बिना बोला, “नौ सौ रुपय्ये की चीनी साइकिल फेल है बाज़ार में। बच्चा एक्को दिन चढ़ नहीं पाएगा।“

हर आदमी की फ़ितरत अलग, प्रतिक्रिया अलग! धीरे-धीरे नौजवान एक सफ़ारी सूटधारी सज्जन के पास पहुँच गया। नौजवान कुछ बोल पाता, उसके पहले ही सफ़ारी सूटवाले सज्जन बोल उठे, “अरे, जाओ!”

बात थोड़ी ज़्यादा ही रुखाई के साथ कही गई थी। नौजवान के अहम को ठेस लगी। उसने कुछ कहने की कोशिश की। सफ़ारी सूटवाले सज्जन न जाने किस गंभीर समस्या से ग्रस्त थे। उनका पारा आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने आव देखा न ताव, नौजवान को धकेला, उसका कॉलर पकड़ लिया, और एक धौल जड़ दिया उसके पेट में। नौजवान लड़खड़ाया। उसकी किताबें गिर पड़ीं।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन पहली सफलता के उत्साह में नौजवान पर फिर झपटे। सब लोग इस मुफ़्त तमाशे को दिलचस्पी से देखने लगे। आख़िर यह सब किसी फ़िल्म के मुफ़्त ट्रेलर से कम थोड़े-ही था! इससे पहले कि सफ़ारी सूट वाले सज्जन अपनी युद्ध कला का एक-आध नमूना और पेश करते, एक ज़नाना आवाज़ गूँजी, “यह क्या कर रहे हैं आप?”

जब सब हाथापाई से लुत्फ़ंदोज़ हो रहे थे तभी चालीस साल के आसपास की एक महिला का पदार्पण हुआ। सफ़ेद साड़ी, सफ़ेद ब्लाउज़, दोनों पर सफ़ेद कढ़ाई, और धूप से बचने को काला चश्मा, जो आँखों की बजाय उसके माथे की शोभा बढ़ा रहा था—कोई भी कह सकता था कि वह महिला आभिजात्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती थी, किसी बड़े आदमी की पत्नी थी या ख़ुद किसी ज़िम्मेदारीवाले पद पर आसीन थी, और उस लकड़बघ्घों के झुंड में अचानक सिंहनी-समान प्रकट हो गई थी।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन सकपकाए, नौजवान लड़खड़ाता हुआ अपनी टाई ठीक करने लगा, और बाक़ी लोग सकते में आ गए।

एक मनचले ने चुटकी ली, “यह तो अमरीका-इराक़ युद्ध हो गया!”

सफ़ारी सूटधारी सज्जन को सुपरपावर से अपनी तुलना एक न भाई। वे पराजित साँढ़ की तरह चिंघाड़े, “जानता नहीं मैं कौन हूँ?”

महिला ने कहा, “आपके व्यवहार से आपका परिचय पहले ही मिल चुका! चलिए, उठाइए इस लड़के की किताबें!”

अब तक बैंक मैनेजर भी बाहर आ गया था। उसके पीछे-पीछे लिप्स्टिक लगे होठों से मधुर मुस्कान बिखेरती बैंक की महिला चपरासी भी बाहर आ गई थी। बैंक मैनेजर अपनी तोंद सँभालते हुए बोला, “मैडम! आप वहाँ क्यों खड़ी हैं? उधर जाइए! औरतों के लिए अलग लाइन है।“

फिर महिला चपरासी से मुख़ातिब होता हुआ बोला, “ले जाइए इनको उधर।“

महिला चपरासी मैनेजर को अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी। उसने बिना हिलेडुले एक बार साड़ीवाली महिला को देखा, एक बार मैनेजर को। साड़ीवाली महिला को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था। वह रौबदार आवाज़ में बोली, “सुना नहीं आपने? उठाइए इस लड़के की किताबें!”

सफ़ारीवाले साहब ढिढाई पर उतर आए। गुटके से काले दाँतो को भन्नाए कुत्ते की तरह दिखा कर बोले, “काहे उठाएँ? आप हैं कौन? सरोजिनी नायडू? कि झाँसी की रानी?”

“कि रजनी?” मनचले ने फिर फ़ब्ती कसी।

मैंने बीचबचाव करने की सोची, पर उससे पहले ही महिला दृढ़ता से बोली, “मैं महिषी हूँ। और कुछ पूछना हो तो बाद में पूछना, पहले उठाओ इनकी किताबें!”

लोगों की सोच और भैंसों की चाल में कोई ख़ास फ़र्क नहीं होता। जहाँ पहली भैंस मुड़ी, बाक़ी भी मुड़ जाती हैं। वहाँ भी कुछ वैसा ही हुआ। एक सज्जन बोले, “मैडम का नाम-पता जान कर क्या करेगा? उठा किताब!”

बस, बाक़ी लोग भी बोल उठे, “उठाओ किताब!”

मैनेजर शांति बहाली की सफलता पर संतुष्ट होकर लौटने लगा। महिला चपरासी उससे चुंबक-सी सटी चल पड़ी। तभी महिषी ने कहा, “एक मिनट! हमलोग कब तक ऐसे खड़े रहेंगे?”

मैनेजर अपनी तोंद का विस्तार लिए एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाते हुए घूम गया। महिला चपरासी भी सवालिया शक़्ल लिए घूम गई। मैनेजर पर दाग़े गए सवाल को उसने झेला, “आपको तो पहले ही कहा कि आपकी लाइन अलग है। जाइए, लगिए!”

महिषी किसी दूसरी ही मिट्टी की बनी थी। बोली, “नहीं! अलग लाइन क्यों? दो-दो घंटे से लोग खड़े हैं लाइन में यहाँ। कोई औरत आ जाए और उसका काम जल्दी हो जाए, उससे बाक़ी लोगों को क्या फ़ायदा होगा?”

मैनेजर ख़फ़ा हो गया, “तो क्या करें? लगा तो हुआ है आदमी!”

महिषी बोली, “एक आदमी काफ़ी नहीं तो और लोग लगाइए काम पर। दो-दो घंटे आदमी अगर सिर्फ़ फ़ीस देने के लिए खड़ा रहे, तो बाक़ी कामों में कितना हर्ज़ होता है, पता भी है आपको? अगर आपके आदमी ठीक से काम करना नहीं जानते तो दूसरे आदमी लगाइए काम पर! कमरे की खिड़की से पर्दा हटा कर बैठिए। देखिए, कौन-क्या कर रहा है। और अगर आपसे ये प्रॉब्लम हल नहीं होती, तो हमें बताइए। आपके जनरल मैनेजर के पास इसका हल होगा ... “

मैनेजर बड़बड़ाया, “अब कैसे करें? लोग तो बस हुक़्म चलाने लगते हैं!”

महिषी फिर बोली, “तो ठीक है! हम सब लोग चलते हैं स्कूल के प्रिंसिपल के पास। उन्हें बताएँगे कि उन्होंने ग़लत बैंक का चुनाव किया है। स्कूल का करोड़ों का अकाउंट किसी अच्छे बैंक में ट्रांसफ़र कराएँ। और आपके जनरल मैनेजर को भी बता देते हैं कि उन्होंने ग़लत आदमी को मैनेजर की जगह बिठा दिया है।“

क़तार के बाक़ी लोग भी उत्तेजित हो गए, “मैडम ठीक कहती हैं ... मैं तो बहुत पहले से ही ये करना चाहता था ... “ वगैरह-वगैरह।

घोषणाओं की झड़ी लग गई, तो मैनेजर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, “अच्छा, चलिए! कोई व्यवस्था करते हैं।“ उसने कमरे की खिड़की से पर्दे हटा दिए। दस्तावेज़ों पर बारह-तेरह मिनट की बजाय दो-तीन मिनट में दस्तख़त होने लगे, तो फ़ीस जल्दी जमा होने लगी। जहाँ पहले और आधा घंटा खड़ा रहने का अंदेशा था, वहीं अब पाँच मिनट में फ़ीस जमा कर मैं गाड़ी में बैठ गया।

“तुमने कहा था कि बस पाँच मिनट में अद्भुत की फ़ीस जमा कर आ जाओगे, और मुझे तपती गाड़ी में चालीस मिनट बिठा दिया,” महिषी ने शिकायत की।

“सॉरी! मुझे क्या पता था कि आज यहाँ कामचोरी के रेकार्ड टूटनेवाले हैं।“ मैंने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा।

“मैं न आती तो अभी और न जाने कितनी देर खड़े रहते!”

“हाँ, तुम्हारी वजह से सबका काम बन गया,“ मैंने गाड़ी आगे बढ़ाते हुए कहा, “सिवाय एक के!”

“सिवाय एक के?” महिषी ने एयरकंडीशनर का फ़्लो एडजस्ट करते हुए पूछा।

“हाँ, उस लिप्स्टिकधारी चपरासी का काम तो बिगाड़ दिया न तुमने!” मैं शरारत से मुस्कुराया।

“ओह, वो!” महिषी मुस्कुराई, फिर धीरे से बोली, “अब, उनका क्या करें!”

मैंने गाड़ी घर की ओर बढ़ा दी। हमारी बेटी के स्कूल से लौटने का समय होने वाला था।

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

नीरव नीड़


 बरसात के दिनों में बाहर निकलते ही मैं आसमान की ओर ऐसे ताकता हूँ जैसे रेलगाड़ी में बिना-टिकट यात्री पकड़े जाने के अंदेशे से बार-बार इधर-उधर देखता है और भूत-प्रेत-चोर के डर की मारी युवती पलंग के नीचे, दरवाज़े के पीछे, और हर परछाईं के इर्द-गिर्द घूरती है। उस दिन भी यही हुआ। दूर ही सही, पर आसमान के कोने में भूरे बादल वैसे ही घुमड़ रहे थे जैसे शादी के तम्बू के बाहर ग़रीब बच्चे कुछ पा लेने के लालच में जमा होने लगते हैं। अगर तुरन्त न निकला गया, तो हवाई-अड्डे तक पहुँचने से पहले बारिश में फँसने की पूरी
आशंका थी।

            “छाते ले लें?” मैंने सवाल कम पूछा, मंतव्य ज़्यादा ज़ाहिर किया।

            बुज़ुर्ग गृह-स्वामी की वही बातें समझी जाती हैं जिनसे परिवार के शेष सदस्यों की योजना में ख़लल पड़ने का ख़तरा हो, बाक़ी पुरोहित के संस्कृत श्लोक की तरह सिर्फ़ सुन कर दरकिनार कर दी जाती हैं। दक्ष पुरोहित और सफल गृह-स्वामी इस उपेक्षा के अभ्यस्त होते हैं।

लेकिन सदा फ़ेल होनेवाला बच्चा भी प्रभुकृपा से कभी-न-कभी पास हो ही जाता है, जैसे पुराने ज़माने में अंधे के हाथ बटेर लग जाती थी। उस दिन भी वैसा ही हुआ। मेरी पत्नी महिषी झटपट वापस मुड़ी और तपाक से दो छाते ले आई। गाड़ी के बूट में बैग और दोनों छाते रखने के बाद भी इतनी जगह पर्याप्त बची थी कि दो सूअर समा जाते। ये बात मैंने सिर्फ़ कहने के लिए कह दी, बूट में सूअरों को सवारी कराने का मेरा कोई इरादा न था। चार पैर के हों या दो के, खाने की मेज़ पर हों या बैठक की, मैं सूअरों से कन्नी काटता हूँ। चाहे कितने भी पैरों के हों, मुझे कीचड़ में लिपटे सूअरों की आँखों में सदा मुक़ाबला करने की चुनौती दिखती है। मैंने बूट बन्द कर गाड़ी स्टार्ट कर दी।

जैसे आइंस्टाइन को सापेक्षवाद और मार्क्स को साम्यवाद के बारे में हर बात मालूम थी, वैसे ही मेरी पत्नी महिषी और मेरी पुत्रवधु आशा सिनेमाजगत की रग-रग से वाक़िफ़ हैं। थोड़ी देर में उनका चिंतन-मनन आरम्भ हो गया। विषय था, अमुक विज्ञापन में जिस आदमी की एक झलक दिखती है, वह रणबीर कपूर है या नहीं। महिषी उसके रणबीर कपूर होने के बारे में तर्क-पर-तर्क दे रही थी, और आशा यह साबित करने पर तुली थी कि उस व्यक्ति के रणबीर कपूर होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता था। मुझे दोनों की बातों में दम लग रहा था, किन्तु एक तो उस वाद-विवाद में मेरी भूमिका भीष्म पितामह से अधिक की नहीं थी, और दूसरे, मेरे टेलिविज़न दर्शन का औरांग-उटान की कलाबाज़ियों और बन्दरों की उठाईगीरी तक सीमित होना कोढ़ में खाज ही पैदा कर सकता था।

“शुरू हो गई!” अद्भुत बुदबुदाया।

“शुरू “हो” गईं? अरे, ये दोनों तो पिछले पाँच मिनटों से रणधीर कपूर या रणबीर सिंह के बारे में बात कर रही हैं जो शायद बाप-बेटे हैं और जिनमें जो बेटा है उसने ऑटिस्मवाली फ़िल्म में उस लड़की के साथ काम किया था जिसकी कलाई पर उसके पिता के नाम का गोदना है … “ मैंने हैरत से उसे देखा।

अद्भुत ने सामने के शीशे की ओर इंगित किया। वैसे गाड़ी चलाते समय मैं सामने ही देखता हूँ, बेहद ध्यान से देखता हूँ, और कहीं और नहीं देखता, फिर भी न जाने कैसे बॉनेट और शीशे पर हल्की-हल्की गिरती बूँदें मेरी नज़रों को धोखा देने में कामयाब हो गई थीं। हो सकता है कि दैत्याकार खुदाई मशीनों, विशालकाय ट्रकों, मधुमक्खी-सी चलायमान अन्य गाड़ियों और छुट्टा घूमते आवारा मवेशियों से बच कर निकलने की जुगत में मैं इतना मशगूल हो गया था कि पानी की नन्ही बूँदों पर ध्यान ही नहीं गया। बड़ों के आगे छोटों की क्या बिसात?

बरसात अपनी उपेक्षा से ख़फ़ा हो गई। शीशे और बॉनेट पर ’पटापट-पटापट’ की लय के साथ समोसे के आकार की बूँदें गिरने लगीं। बेचारा वाइपर नाच-नाच कर उनकी सेवा में जुट गया, लेकिन उसका प्रयास सांत्वना पुरस्कार से अधिक का हक़दार नहीं था। कुछ देर पहले का मस्त हाथी की तरह झूमता ट्रैफ़िक अब चींटी की क़तारों में सड़क पर नवनिर्मित नदी-नालों के इर्दगिर्द रेंगने लगा। बेशक, कुछ वीर ऐसी हालत में भी तेज़ रफ़्तार से आसपास जल का मुफ़्त छिड़काव कर गालियों का पुण्य बटोर रहे थे। कोई और दिन होता तो मैं मौसम का भरपूर मज़ा लेता, पर आज बात दूसरी थी—फ़्लाइट छूट जाने का डर था। लिहाजा, मैं पचहत्तर किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से गाड़ी चलाता रहा।

पार्किंग टिकट की मशीन को कचरेवाले काले पॉलिथीन का घूँघट उढ़ा कर सादग़ी के सौंदर्य को नया आयाम प्रदान किया गया था। उसकी बगल में तैनात कर्मचारी से टिकट लेकर हम ’प्रस्थान’ की ओर बढ़े। बारिश लगभग थम गई थी, फिर भी छातों की ज़रूरत तो थी ही, भीगी हालत में हवाई जहाज़ का सफ़र करवा कर अद्भुत और आशा को बीमार थोड़े-ही करना था! हमसे विदा लेकर वे हवाईअड्डे में दाख़िल हो गए। हम प्रवेशद्वार के पास एक ख़ाली काउंटर के सामने खड़े हो गए। वहाँ से अन्दर साफ़ दिखाई दे रहा था। क़रीब पाँच मिनट चेक-इन काउंटर के आगे खड़े रहने के बाद अद्भुत और आशा ने बोर्डिंग पास लिए और प्रवेशद्वार की ओर देखा। ज़ाहिर है, उन्हें हम नहीं दिख सकते थे, फिर भी हमने हाथ हिलाया और उनकी तरफ़ तब तक ताकते रहे जब तक वे एस्केलेटर से ऊपर जाकर किसी ऐसी जगह नहीं चले गए जहाँ से उनका और दिखाई पड़ना मुमक़िन न रहा।             

हवाईअड्डे से रौनक़ ग़ायब हो चुकी थी। मेरा शरीर शिथिल-सा हो गया, हाथ-पाँव में जान न रही। मैंने महिषी को देखा। आसमान के बादल न जाने कब उसकी आँखों में उतर आए थे। एक पल मुझे देख वह बुदबुदाई, “चले गए!” उसके माथे पर उम्र, थकावट, और मायूसी की लकीरें उभर आई थीं। एक-दूसरे का हाथ थामे, कंधे झुकाए, भारी मन हम पार्किंग की ओर बढ़े। थोड़ी-सी देर में कितना बदल गया था सबकुछ!

शाम ढले बग़ैर अँधेरा घिर आया। निर्माणाधीन फ़्लाईओवर, आधी बनी दीवारों और पिलर तथा इधर-उधर बिखरी इस्पात की छड़ों और पानी से भरे गड्ढों के बीच मैं यन्त्रवत गाड़ी चलाता रहा। महिषी अब मेरी बगल में थी पर हम दोनों ख़ामोश थे।

बादलों का गर्जन-तर्जन पुनः आरम्भ हो गया। इस बार बारिश का ताण्डव भयावह था। वाइपर का होना-न-होना एक बराबर था। ऊपर से, शीशे पर जगह-जगह बन गए अपारदर्शी सफ़ेद धब्बों ने मुश्किल और बढ़ा दी। सड़क पर लैम्पपोस्ट थे ही नहीं। अक्सर पता ही नहीं चलता कि गाड़ी सही तौर पर सड़क पर है या बहक रही है। स्टीयरिंग की मामूली सी चूक गंभीर दुर्घटना का सबब बन सकती थी। गाड़ी का डिवाइडर पर चढ़ कर पलटना और सड़क के किनारे बनी दीवार से टकरा कर चूर-चूर हो जाना, दोनों में से कुछ भी जानलेवा हो सकता था। सड़क पर रुक भी नहीं सकते थे, उसमें पीछे से आनेवाले वाहनों की टक्कर लगने का डर था।

आधे घंटे तक क़हर बरपाने के बाद मौसम का मिज़ाज कुछ नर्म पड़ा। हमारा सही-सलामत घर लौटना किसी चमत्कार से कम नहीं था, लेकिन हमें उसका कोई ख़याल न था। बच्चों के बिना कौन माता-पिता सही-सलामत रहना चाहते हैं? नीड़ नीरव हो चुका था!

हमने घड़ी की ओर देखा, फिर एक-दूसरे को।

’’एक घंटे बाद बच्चों को फ़ोन करेंगे। तब तक वे लैंड कर चुके होंगे।’’ दोनों की ज़ुबान से एकसाथ निकला।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2025

रक्षक


 “ओSSSओSSSओSSS ऊSSSऊSSSऊSSS ईSSSईSSSईSSS”

माँ का भयातुर चीत्कार रात के निस्तब्ध हृदयपटल में सिद्धहस्त शल्यचिकित्सक के धारदार चाकू की तरह उतर गया। उनके मुख से अनजाने ही निकला, “सर्वनाश!” चौखट पर खड़ी धर्मभीरू माँ के पैर अदृश्य बेड़ी से जकड़ गए, शरीर मिर्गी के दौरे की तरह काँपने लगा, आँसुओं से दृष्टि धूमिल हो गई, और काँपते होंठों से अस्फुट शब्द निकलने लगे, “हे माँ, रक्षा करो! … हे माँ, रक्षा करो! … हे माँ, रक्षा करो!”

दुर्गा पूजा बीते कुछ ही दिन हुए थे। दीवाली आने वाली थी। माँ रोज़ की तरह ब्रह्म मुहूर्त में उठी थीं, इकलौती संतान, दुधमुँही बच्ची, को स्नेह से थपथपा कर तकियों की दीवारों के बीच सुलाया था, और स्नेहसिक्त नेत्रों से उसे तब तक निहारती रही थीं जब तक वह कुनमुनाना बिसरा कर शान्ति से सो नहीं गई थी। पिताजी के काम से लौटने में समय था। वे पत्रकार थे। रात खाना खाकर अख़बार के दफ़्तर जाते, तो भोर आठ बजे के बाद ही लौटते थे। उनके वापस आने से पहले माँ एक कमरे का घर साफ़ करतीं, रसोई बनातीं, और पास के कुएँ से दो घड़ों में पानी लाकर एक कोने में रख देतीं। उनकी पूरी कोशिश रहती कि पिताजी घर वापस आकर कम-से-कम तीन घंटे आराम की नींद सो सकें।

हिन्दी अख़बार के उपसम्पादक को पटना के मीठापुर जैसे निम्नमध्यमवर्गीय इलाक़े में टूटी खपरैल की छत के नीचे एक कोठरी, अहाते के भीतर कुआँ, तीन किरायेदारों के साझा उपयोग के लिए एक पाख़ाना और एक स्नानघर की राजसी सुविधा मिलना लगभग असम्भव था, ख़ासकर जब उसे तीन-चार महीनों में एक बार ही वेतन मिल पाता हो और कमरे के किराये का भुगतान भगवान-भरोसे रहता हो। पिताजी ने महीना-भर कई मुहल्लों में सर छुपाने की जगह खोजी थी, लेकिन तीन महीने के किराये के अग्रिम भुगतान के बग़ैर सीढ़ी के नीचे के स्थान की भी मनाही हो जाने पर उनका आत्मविश्वास ताश के महल की तरह धराशायी हो गया था।

माँ-पिताजी की विपन्नता रेगिस्तानी बवंडर में फँसे बटोही की तरह उजागर होने को ही थी जब भवानी बाबू ने उनका उद्धार किया था। भवानी बाबू, यानी भवानी सहाय, कोठरी के मालिक। उनकी पत्नी स्कूल में शिक्षिका थीं। अक्खड़ स्वभाव ने भवानी बाबू को नौकरी करने या व्यवसाय चलाने के योग्य न छोड़ा था। वे कट्टर आर्यसमाजी और आदर्शवादी थे। पिताजी का अन्तर्राज्यीय विवाह, नौकरी करने के बावजूद उनका पढ़ाई जारी रखना, पत्रकारिता-जैसा सम्माननीय काम करना, और माँ के वंशवृक्ष में विवेकानन्द और सुभाष बोस जैसी महान विभूतियों की उपस्थिति—इतने गुणों के आगे वे समय पर किराया न मिलने जैसे कष्ट को सहर्ष स्वीकार कर लेते थे। इतना ही नहीं, उनकी पत्नी माँ की ‘माताजी’ बन चुकी थीं, वे स्वयं पिता-समान हो गए थे, और उनका जवान बेटा मुन्नू भाई-जैसा बन गया था।

माँ दरवाज़े पर जड़वत खड़ी थीं। चौखट के सामने था सिंदूर में सना नरमुंड, एक लाल कपड़ा, पत्तों की पोटली, कुछ काले दाने, भभूत, फूल, तेल, दिया, और न जाने क्या-क्या। स्पष्ट था कि उस अनुष्ठान को करनेवाला भलीभाँति जानता था कि सभी निवासियों में माँ सबसे पहले उठ कर बाहर निकलती थीं। संभवतः उसे यह अनुमान भी था कि छोटी बच्ची को मुँहअँधेरे घर में अकेली छोड़ कर बाहर निकलती माँ की दृष्टि फ़र्श की बजाय कुएँ की जगत की ओर गड़ी होती थी। शीघ्रातिशीघ्र घड़े भरने की उतावली में उनके पैर का उस सामग्री पर पड़ना स्वाभाविक होता। लेकिन वैसा हुआ न था; रात के अँधेरे में माँ ने उस सामग्री को आवारा कुत्ता जान क़दम रोक लिए थे। दूसरे ही पल उन्हें असलियत का भान हुआ था और उनके मुख से बरबस चीख निकल गई थी।

नरमुंड के सामने रखा दिया टिमटिमा कर माँ को चिढ़ा रहा था। उन्होंने संयम बटोरने की चेष्टा की, किन्तु वह तो मुट्ठी से रेत की तरह कब का फिसल चुका था! ओसारे पर नज़र दौड़ाई तो पाया कि दाहिनेवाली दोनों कोठरियों के दरवाज़ों के सामने भी जादू-टोने का सामान रखा था, बस नरमुंड नहीं थे वहाँ। वही हाल बाईं ओर की कोठरी का भी था जिसमें भवानीबाबू स्वयं रहते थे। उसके दरवाज़े की साँकल उतरी, भड़भड़ा कर किवाड़ खुले, और बिखरे बालों तथा उनींदी आँखों से तहमद बाँधते भवानी बाबू ने प्रश्नवाचक दृष्टि से माँ की ओर देखा। कोई सवाल-जवाब नहीं हुआ उनके बीच। माँ की कातर मुद्रा और भूमि पर पड़ी सामग्री की चुनौती से उनका पौरुष बिफर उठा, “तू किवाड़ बन्द कर अन्दर जा बेटी, हम अभी ठिकाने लगाते हैं इस स्साले खोपड़ को! बहुत फुटबॉल खेला है जवानी में, आज फिर खेलेंगे एक बार!”

पर माँ पर तो जैसे किसी ने जादू कर दिया था। वे वहीं सम्मोहित-सी खड़ी देखती रहीं। भवानी बाबू ने लात मार कर खोपड़ी को ओसारे से बाहर उछाला, फिर ठोकर मार-मार कर नाले में लुढ़का दिया। वापस आकर उन्होंने हर दरवाज़े के सामने से जादूटोने की सामग्री उठा कर एक टोकरी में डाली, और उसे भी बहते नाले को सुपुर्द कर आए। अंत में वे ओसारा धोने लगे। हाँलाकि सुबह की पहली किरण के फूटने में देर थी, लेकिन तब तक शेष कोठरियों के निवासी जाग कर अपने-अपने दरवाज़े पर आ गए थे। माँ भवानी बाबू की सहायता करने को उद्यत हुईं तो माताजी का स्वर उभरा, “नहीं, बेटी! तुम बाहर मत निकलो। जाओ, अपनी बच्ची के पास रहो।“

माँ ने यह आपबीती मुझे कई साल पहले सुनाई थी। मैंने पूछा था, “फिर हमलोगों को कोई बड़ी परेशानी हुई थी क्या?”

“नहीं, भवानी बाबू ने हमें बचा लिया!” माँ ने कहा था।

“और उनको कोई प्रॉब्लेम हुआ?”

माँ थोड़ी देर सोचती रहीं, फिर बोलीं, “उनके साथ बहुत-कुछ घटा। अब इस वजह से कि किस वजह से, पता नहीं, लेकिन उनका ऐक्सिडेंट हो गया। ज़िंदगी-भर लाठी के सहारे चलते रहे बेचारे। मुन्नू भी शायद किसी पुलिस केस में फँस गया। ठीक से पता नहीं, क्योंकि उस घटना के कुछ ही दिन बाद तुम्हारे पिताजी की नौकरी लग गई थी बम्बई में, और हमने वह घर हमेशा के लिए छोड़ दिया था।“

“और वो जंतर-मंतर जिसने किया था, उसका पता चला?”

“शायद!” माँ के रोंगटे खड़े हो गए थे और उनकी आँखों में भय उतर आया था। “जाने दो, उतनी पुरानी बात याद करने का क्या फ़ायदा?” कह कर वे चुप हो गई थीं।

शायद आप पूछें कि मैं आज उस सत्तर-बहत्तर साल पुरानी घटना का ज़िक्र क्यों कर रहा हूँ।

बात यह है, कि इस समय भी दुर्गा पूजा और दीवाली के बीच का काल चल रहा है और आज सुबह मुझे दुबई के पुराने मुहल्ले, बरदुबई, के एक चौराहे पर वैसा ही जादूटोना किया दिखाई पड़ा है। अफ़सोस, भवानी बाबू मौजूद नहीं हैं मेरी रक्षा को आज!