बुधवार, 3 जून 2026

अब, उनका क्या करें!


पाँच काउंटर्स का छोटा-सा एक बैंक। एक छोर पर कैश लेने-देने वाले बाबुओं के केबिन थे, जिनका निचला हिस्सा लकड़ी का और ऊपरी भाग शीशे का था और जिनसे बाबुओं के मुँह और बाहें साफ़ दिखाई देती थीं । उसके बाद तीन बाबुओं के बैठने की जगह थी और दूसरे छोर पर मैनेजर का कमरा था। मैनेजर के कमरे की खिड़की पर पर्दा लगा था और बेइंतहा गर्मी के बावजूद उसका दरवाज़ा बन्द था। हर दस मिनट पर बहुत-से काग़ज़ और रजिस्टर लिए एक कर्मचारी दरवाज़ा खटखटा कर एक-दो मिनट के विलम्ब के बाद उस कमरे में प्रवेश करता और दो मिनट में साहब के दस्तख़त करवा कर लौटता। उसके बाहर निकलते ही दरवाज़ा स्वतः बन्द हो जाता था। बैंक का सारा तामझाम मात्र ढाई सौ वर्ग फ़ुट में समाहित था और ग्राहकों के लिए डेढ़ सौ वर्ग फ़ुट की अपार जगह छोड़ दी गई थी।

            बैंक के इर्द-गिर्द पाँच किलोमीटर तक आबादी का नामोनिशान न था। बैंक, जैसे, साथ लगे आर्मी कैम्प और एक बेहद सफल स्कूल की सहूलियत के लिए ही बनाया गया था। बैंक से बाहर निकलते ही युद्ध में जीता दुश्मनों का एक टैंक दीखता, फ़ौलादी ज़ंजीरों से घिरा, अकेला, झेंपा हुआ-सा। अक्सर सैनिकों की क़वायद की आवाज़ भी सुनाई देती।

यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल फ़ोन पर तस्वीर उतारने की गुंजाइश नहीं थी, जब फ़िज़ा में इलाहाबाद का नाम बदलने का ज़िक्र तक न था, और जब वहाँ पच्चीस पैसे में गर्मागर्म समोसा मिला करता था। अगर आप यह समझ रहे हैं कि इलाहाबाद के एक कोने में छुपे उस बैंक में बड़ी शांति का वातावरण रहता होगा, चैन की वंशी बजती होगी, तो बात सरासर ऐसी नहीं है। वहाँ इतनी चिल्लपों मचती थी, इतना सिर-फुटव्वल होता था, कि क्या बताऊँ! कभी-कभी तो नौबत हाथापाई तक उतर आती। याद नहीं कि वह कौन-सा साल था और कौन-सा महीना, पर इतना दुरुस्त है कि तारीख़ सोलह थी। इतनी भीड़ थी बैंक में, कि लोगों की क़तार मुख्य दरवाज़े से दस फ़ुट बाहर तक पहुँच गई थी। गर्मी का उमस भरा मौसम। उस पर सूरज इस ज़िद पर अड़ा था शायद, कि कल चाहे दिन भर बादलों के नर्म बिस्तर पर सुस्ताऊँ, पर आज तो अपनी तपिश से सबको झुलसा कर ही दम लूँगा।

सिर पर चमकता सूरज, पैरों के नीचे धूल-मिट्टी-कंकड़ का शहरी कालीन, और साँस लेने को आसपास के खेतों से आती लू-मिश्रित-धूल। रही-सही कसर पसीने की अविरल धार ने पूरी कर दी थी। भीड़ के पसीने की मात्रा देख कॉर्पोरेशन के नल को इन्फ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स हो जाता। ललाट, बाल, गर्दन, बाहें और गंजों के सर पसीने में यूँ चिपचिपाए हुए थे जैसे तेल में भुँजे बैंगन को कड़ाही से निकले घंटे-दो-घंटे बीत चुके हों।

ज़ाहिर है, लोगों के तन पर कपड़े गीले ज़्यादा थे, सूखे कम। दिल्ली होती, तो तीन-तीन रुपयों में नारियल की एक सरीखी कटी गरी बेचने वाला आ जाता। कलकत्ता के झालमूढ़ीवाले और भिखारी इस बिज़नेस ऑपरच्यूनिटी को एक्सप्लॉइट करते। मुंबई में सींगदाना और रेनबो सैंडविच की फेरी लगानेवाले चक्कर लगा लेते। लेकिन, इलाहाबाद इलाहाबाद था; दिल्ली, कलकत्ता या मुंबई नहीं। साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था इलाहाबाद एक ज़माने में। यह अलहदा बात है कि उस समय तक साहित्य नाममात्र को बचा था वहाँ; अलबत्ता कारें ज़रूर ज़्यादा हो गई थीं।

इलाहाबाद के उसी गौरवशाली अतीत से प्रभावित होकर, या टार्गेट पूरा करने की मजबूरी से परेशान होकर; न जाने कब एक नौजवान भीड़ के पास पहुँच गया। उसके जूतों के ऊपरी चमड़े स्वस्थ सोल का मोह त्याग चुके थे। आमतौर पर वैसे जूते कबाड़ीवाले या कूड़ेदान की शरणस्थली में चिरनिद्रा में लीन हो जाया करते हैं, पर वहाँ तो बात ही कुछ और थी। धागे की सिलाई और कीलों की वहृद व्यूह रचना नौजवान के जूतों की आत्मरक्षा कर रही थी। उसके काले पैंट पर पसीने की सूखी लकीरों ने सफ़ेद धारियों का डिज़ाइन बना दिया था। मटमैली कमीज़ औेर उसके ऊपर गहरे नीले रंग की टाई, जिसकी नॉट के पास का हिस्सा मैल से काला हो चुका था, नौजवान की ख़स्ताहाली खुले शब्दों में बयान कर रही थीं। नौजवान ने हैट भी लगाया हुआ था—गर्मी से बचने के लिए या किसी लोकप्रिय फ़िल्मी हीरो की नक़ल उतारने के लिए, निश्चय करना मुश्किल था। पर एक बात तो थी! उसकी इस वेशभूषा  ने हर किसी का ध्यान आकृष्ट कर लिया था।

कवि बच्चन कहते थे कि हिन्दी फ़िल्मों में तीन घंटे में पोइटिक जस्टिस मिल जाता है, लेकिन असली ज़िंदगी में या तो बहुत देर से मिलता है या फिर मिलता ही नहीं। फ़िल्में अलग हैं, यथार्थ अलग। तो, हमारे इस नौजवान का इस्तिक़बाल किसी फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं हुआ। कुछ लोगों ने उसे ऐसे घूरा मानो वह शीशे का बना हो और उसके आरपार देखा जा सकता हो। कुछ ने उससे नज़रें चुराईं। कुछ ने उसे शक़ की निगाहों से देखा। कुछ डरे हुए भी मालूम पड़े, मानो नौजवान एड्स का वायरस लिए घूम रहा हो।

नौजवान को इस रूखे अंदाज़ की शायद लत पड़ चुकी थी। वह लोगों के आक्रोश, असुविधा और असहयोग को नकार एक-एक व्यक्ति के पास जाने लगा। हर नए शख़्स के पास जाकर वह मुस्कुराता, सर थोड़ा झुकाता, और कहने लगता, “सर! आप अपने बच्चे की फ़ीस जमा करने के लिए खड़े हैं। आपके बच्चे के लिए हमारी कम्पनी ने प्रोमोशन के तौर पर यह इन्साइक्लोपीडिया निकाला है। दाम है सिर्फ़ चार सौ पचास रुपया। यही इन्साइक्लोपीडिया बाज़ार में नौ सौ रुपए में मिलता है। और भी बुक्स हैं। दिखाऊँ, सर?”

यह मोनोलॉग बड़ी अच्छी तरह रटा हुआ था उसे। हर नए आदमी के आगे सर झुकाते ही जैसे कहीं कोई बटन दब जाता उसके अंदर, और रिकॉर्ड बज उठता। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि हर आम हिंदुस्तानी क़तार की तरह उस क़तार में भी ऊबे-परेशान लोग एक-दूसरे के इतने पास खड़े थे कि किसी का जूता किसी की चप्पल पर टिका था, किसी की कोहनी किसी की पसलियों में घुसी जा रही थी, कोई अपने पीछे खड़े व्यक्ति की साँसें अपनी गर्दन पर महसूस कर रहा था, और किसी का ब्रीफ़केस आगेवाले के टखनों से बारबार टकरा रहा था।

नौजवान का मोनोलॉग मुझे विविधभारती की विभिन्न सभाओं की तरह कम-से-कम पाँच बार सुनाई पड़ चुका था। सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने बात पूरी सुने बिना हथेली यूँ हिलाई, जैसे मक्खी उड़ा रहा हो। दूसरा व्यक्ति साइकिल और इन्साइक्लोपीडिया के बारीक अंतर को समझे बिना बोला, “नौ सौ रुपय्ये की चीनी साइकिल फेल है बाज़ार में। बच्चा एक्को दिन चढ़ नहीं पाएगा।“

हर आदमी की फ़ितरत अलग, प्रतिक्रिया अलग! धीरे-धीरे नौजवान एक सफ़ारी सूटधारी सज्जन के पास पहुँच गया। नौजवान कुछ बोल पाता, उसके पहले ही सफ़ारी सूटवाले सज्जन बोल उठे, “अरे, जाओ!”

बात थोड़ी ज़्यादा ही रुखाई के साथ कही गई थी। नौजवान के अहम को ठेस लगी। उसने कुछ कहने की कोशिश की। सफ़ारी सूटवाले सज्जन न जाने किस गंभीर समस्या से ग्रस्त थे। उनका पारा आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने आव देखा न ताव, नौजवान को धकेला, उसका कॉलर पकड़ लिया, और एक धौल जड़ दिया उसके पेट में। नौजवान लड़खड़ाया। उसकी किताबें गिर पड़ीं।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन पहली सफलता के उत्साह में नौजवान पर फिर झपटे। सब लोग इस मुफ़्त तमाशे को दिलचस्पी से देखने लगे। आख़िर यह सब किसी फ़िल्म के मुफ़्त ट्रेलर से कम थोड़े-ही था! इससे पहले कि सफ़ारी सूट वाले सज्जन अपनी युद्ध कला का एक-आध नमूना और पेश करते, एक ज़नाना आवाज़ गूँजी, “यह क्या कर रहे हैं आप?”

जब सब हाथापाई से लुत्फ़ंदोज़ हो रहे थे तभी चालीस साल के आसपास की एक महिला का पदार्पण हुआ। सफ़ेद साड़ी, सफ़ेद ब्लाउज़, दोनों पर सफ़ेद कढ़ाई, और धूप से बचने को काला चश्मा, जो आँखों की बजाय उसके माथे की शोभा बढ़ा रहा था—कोई भी कह सकता था कि वह महिला आभिजात्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती थी, किसी बड़े आदमी की पत्नी थी या ख़ुद किसी ज़िम्मेदारीवाले पद पर आसीन थी, और उस लकड़बघ्घों के झुंड में अचानक सिंहनी-समान प्रकट हो गई थी।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन सकपकाए, नौजवान लड़खड़ाता हुआ अपनी टाई ठीक करने लगा, और बाक़ी लोग सकते में आ गए।

एक मनचले ने चुटकी ली, “यह तो अमरीका-इराक़ युद्ध हो गया!”

सफ़ारी सूटधारी सज्जन को सुपरपावर से अपनी तुलना एक न भाई। वे पराजित साँढ़ की तरह चिंघाड़े, “जानता नहीं मैं कौन हूँ?”

महिला ने कहा, “आपके व्यवहार से आपका परिचय पहले ही मिल चुका! चलिए, उठाइए इस लड़के की किताबें!”

अब तक बैंक मैनेजर भी बाहर आ गया था। उसके पीछे-पीछे लिप्स्टिक लगे होठों से मधुर मुस्कान बिखेरती बैंक की महिला चपरासी भी बाहर आ गई थी। बैंक मैनेजर अपनी तोंद सँभालते हुए बोला, “मैडम! आप वहाँ क्यों खड़ी हैं? उधर जाइए! औरतों के लिए अलग लाइन है।“

फिर महिला चपरासी से मुख़ातिब होता हुआ बोला, “ले जाइए इनको उधर।“

महिला चपरासी मैनेजर को अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी। उसने बिना हिलेडुले एक बार साड़ीवाली महिला को देखा, एक बार मैनेजर को। साड़ीवाली महिला को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था। वह रौबदार आवाज़ में बोली, “सुना नहीं आपने? उठाइए इस लड़के की किताबें!”

सफ़ारीवाले साहब ढिढाई पर उतर आए। गुटके से काले दाँतो को भन्नाए कुत्ते की तरह दिखा कर बोले, “काहे उठाएँ? आप हैं कौन? सरोजिनी नायडू? कि झाँसी की रानी?”

“कि रजनी?” मनचले ने फिर फ़ब्ती कसी।

मैंने बीचबचाव करने की सोची, पर उससे पहले ही महिला दृढ़ता से बोली, “मैं महिषी हूँ। और कुछ पूछना हो तो बाद में पूछना, पहले उठाओ इनकी किताबें!”

लोगों की सोच और भैंसों की चाल में कोई ख़ास फ़र्क नहीं होता। जहाँ पहली भैंस मुड़ी, बाक़ी भी मुड़ जाती हैं। वहाँ भी कुछ वैसा ही हुआ। एक सज्जन बोले, “मैडम का नाम-पता जान कर क्या करेगा? उठा किताब!”

बस, बाक़ी लोग भी बोल उठे, “उठाओ किताब!”

मैनेजर शांति बहाली की सफलता पर संतुष्ट होकर लौटने लगा। महिला चपरासी उससे चुंबक-सी सटी चल पड़ी। तभी महिषी ने कहा, “एक मिनट! हमलोग कब तक ऐसे खड़े रहेंगे?”

मैनेजर अपनी तोंद का विस्तार लिए एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाते हुए घूम गया। महिला चपरासी भी सवालिया शक़्ल लिए घूम गई। मैनेजर पर दाग़े गए सवाल को उसने झेला, “आपको तो पहले ही कहा कि आपकी लाइन अलग है। जाइए, लगिए!”

महिषी किसी दूसरी ही मिट्टी की बनी थी। बोली, “नहीं! अलग लाइन क्यों? दो-दो घंटे से लोग खड़े हैं लाइन में यहाँ। कोई औरत आ जाए और उसका काम जल्दी हो जाए, उससे बाक़ी लोगों को क्या फ़ायदा होगा?”

मैनेजर ख़फ़ा हो गया, “तो क्या करें? लगा तो हुआ है आदमी!”

महिषी बोली, “एक आदमी काफ़ी नहीं तो और लोग लगाइए काम पर। दो-दो घंटे आदमी अगर सिर्फ़ फ़ीस देने के लिए खड़ा रहे, तो बाक़ी कामों में कितना हर्ज़ होता है, पता भी है आपको? अगर आपके आदमी ठीक से काम करना नहीं जानते तो दूसरे आदमी लगाइए काम पर! कमरे की खिड़की से पर्दा हटा कर बैठिए। देखिए, कौन-क्या कर रहा है। और अगर आपसे ये प्रॉब्लम हल नहीं होती, तो हमें बताइए। आपके जनरल मैनेजर के पास इसका हल होगा ... “

मैनेजर बड़बड़ाया, “अब कैसे करें? लोग तो बस हुक़्म चलाने लगते हैं!”

महिषी फिर बोली, “तो ठीक है! हम सब लोग चलते हैं स्कूल के प्रिंसिपल के पास। उन्हें बताएँगे कि उन्होंने ग़लत बैंक का चुनाव किया है। स्कूल का करोड़ों का अकाउंट किसी अच्छे बैंक में ट्रांसफ़र कराएँ। और आपके जनरल मैनेजर को भी बता देते हैं कि उन्होंने ग़लत आदमी को मैनेजर की जगह बिठा दिया है।“

क़तार के बाक़ी लोग भी उत्तेजित हो गए, “मैडम ठीक कहती हैं ... मैं तो बहुत पहले से ही ये करना चाहता था ... “ वगैरह-वगैरह।

घोषणाओं की झड़ी लग गई, तो मैनेजर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, “अच्छा, चलिए! कोई व्यवस्था करते हैं।“ उसने कमरे की खिड़की से पर्दे हटा दिए। दस्तावेज़ों पर बारह-तेरह मिनट की बजाय दो-तीन मिनट में दस्तख़त होने लगे, तो फ़ीस जल्दी जमा होने लगी। जहाँ पहले और आधा घंटा खड़ा रहने का अंदेशा था, वहीं अब पाँच मिनट में फ़ीस जमा कर मैं गाड़ी में बैठ गया।

“तुमने कहा था कि बस पाँच मिनट में अद्भुत की फ़ीस जमा कर आ जाओगे, और मुझे तपती गाड़ी में चालीस मिनट बिठा दिया,” महिषी ने शिकायत की।

“सॉरी! मुझे क्या पता था कि आज यहाँ कामचोरी के रेकार्ड टूटनेवाले हैं।“ मैंने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा।

“मैं न आती तो अभी और न जाने कितनी देर खड़े रहते!”

“हाँ, तुम्हारी वजह से सबका काम बन गया,“ मैंने गाड़ी आगे बढ़ाते हुए कहा, “सिवाय एक के!”

“सिवाय एक के?” महिषी ने एयरकंडीशनर का फ़्लो एडजस्ट करते हुए पूछा।

“हाँ, उस लिप्स्टिकधारी चपरासी का काम तो बिगाड़ दिया न तुमने!” मैं शरारत से मुस्कुराया।

“ओह, वो!” महिषी मुस्कुराई, फिर धीरे से बोली, “अब, उनका क्या करें!”

मैंने गाड़ी घर की ओर बढ़ा दी। हमारी बेटी के स्कूल से लौटने का समय होने वाला था।

सोमवार, 1 जून 2026

धमक

मेरे बिलकुल सामने बैठी लड़की की सुर्ख़ मिनी स्कर्ट से आबनूसी जांघें ताक रही थीं। हम दोनों सोलह बरस के आसपास के थे। लड़कियाँ सोलह की होते-होते लगभग वयस्क हो जाती हैं, जबकि लड़के अर्द्धवयस्क से अघिक नहीं हो पाते। उसका बदन विकसित हो चुका था, मेरी मूँछों को दाढ़ी उभरने की प्रतीक्षा थी। वह अपने पिता के साथ आई थी। ज़ाहिर है, मेरे माँ-बाप भी मेरे पास बैठे थे। पिछले साल माध्यमिक परीक्षा में राज्य-भर में ऊँचा स्थान हासिल कर मैंने झण्डे गाड़ दिए थे और उस मध्यमवर्गीय सरकारी मुहल्ले का हर बाशिन्दा अपने बच्चे की अनोखी प्रतिभा का हमसे लोहा मनवाने की जुगत में भिड़ गया था।

लड़की आशा भोंसले का गाया गीत, उन्हीं के अंदाज़ में, हर खटके और मुर्की के साथ गा रही थी, “तुम्हीं रहनुमा हो, मेरी ज़िन्दगी के …” हवा से पर्दे हिल रहे थे, और उसकी आवाज़ से मेरा दिल के तार झनझना रहे थे। सबको उसका गीत इतना अच्छा लगा कि उससे एक और गीत गाने की फ़र्माइश की गई और उसने सुनाया, “आपके कमरे में कोई रहता है।“ वह गाना मेरी माँ ने पहली बार सुना था और उन्हें बहुत पसंद आया। आज भी जब वे गीत सुनता हूँ, वह शाम याद आ जाती है।

मेरी पसंद का संगीत थोड़ा अलग था। पन्नालाल घोष की बाँसुरी पर राग पीलू, बेगम अख़्तर की गाई ग़ज़ल, “ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया”, और तलत महमूद का गाया लगभग हर गीत मुझे मंत्रमुग्ध किया करता था। फिर भी, उसकी गायकी मुझे पसंद आई। उसका परीक्षाफल बहुत अच्छा नहीं था और उसके पिता आगे की पढ़ाई के बारे में हमसे सलाह लेने आए थे।

वे लोग हमारी इमारत के पीछेवाली क़तार में रहते थे। तो मेरी प्रसिद्धी वहाँ तक पहुँच गई थी! हमारी इमारत के निचले तल पर रह रहे लोगों को मेरी मार्कशीट याद हो चुकी थी। उसमें स्नातकोत्तर अध्ययन कर रहे दो लड़के अपनी बड़ी बहन, छोटे भाई, और माँ-बाप के साथ रहते थे।

इमारत के सबसे ऊपरी तल पर राय साहब रहते थे। वे सबसे अलग-थलग दिखते थे। और उसमें ग़लत भी क्या था? राय साहब ने इंगलैण्ड में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी और वे हवाई जहाज़ों की देखभाल करते थे। उनके सिगार की महक हमें घर बैठे मिल जाती थी। उनकी चमकती लम्बी स्टूडेबेकर कमांडर गाड़ी के आगे मुहल्ले की बाक़ी सभी गाड़ियाँ पानी भरती थीं। थोड़े भारी शरीर के राय साहब धूप का चश्मा लगाए बिना बाहर नहीं निकलते थे। उनकी पत्नी सिर के ऊपर जूड़ा बना कर ऊँचाई में सात-आठ सेंटीमीटर का इजाफ़ा किया करती थीं। उनका एक ही बच्चा, टीटू, मुझसे चारेक साल छोटा रहा होगा।

उनके घर में बजता संगीत बड़े-बड़े सिनेमाघरों की टक्कर का होता था। संगीत उनके घर की खिड़कियों से छन कर तो बहता ही था, दीवारों में भी उसका कम्पन साफ़ पता चलता था। वे कभी विदेशी संगीत बजाते, तो कभी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत। तबले की धमक और सितार का टिम्बर, यह दोनों जितने स्पष्ट सुनाई देते थे, बाद में सिर्फ़ आकाशवाणी के स्टूडियो में ही उतनी साफ़ आवाज़ सुनाई पड़ी।

एक दिन पिताजी दफ़्तर जा रहे थे और राय साहब एरोड्रोम से लौट रहे थे। माँ और मैं उन्हें ऊपर बालकनी से देख रहे थे। दोनों ने हाथ जोड़ कर नमस्कार किया, थोड़ी देर बात की, मुस्कुराए, और फिर नमस्कार कर अपनी-अपनी राह चल दिए। माँ को उत्सुकता हुई, आख़िर दोनों क्या बात कर रहे थे।

उन्होंने पिताजी को फ़ोन किया, पूछा, “क्या बोल रहे थे राय साहब?”

पिताजी दफ़्तर के काम में व्यस्त हो सब भूल-भाल चुके थे। उन्होंने पलट कर पूछा, “कौन राय साहब?”

माँ ने याद दिलाया तो उन्होंने बताया कि राय साहब ने हमसब को शाम को उनके घर चाय पीने का निमंत्रण दिया था।

माँ हैरान थीं। “देखो तो, अगर हम नहीं पूछते तो फ़जीहत ही हो जाती। ऑफ़िस से सात बजे घर लौट कर कहते, ‘चलो ऊपर’। रात का खाना कौन बनाता, तैयार कब होते, उससे कोई सरोकार है इनको?”

एक तल ऊपर जाने में कौन सी बड़ी भारी तैयारी करनी होगी, बात मेरी समझ से बाहर थी। यह सब चीज़ें माध्यमिक परीक्षा के पाठ्यक्रम में कहाँ होती हैं! और फिर, जो गुत्थी मेरे पिता नहीं सुलझा पाए थे, वह भला मैं कैसे हल कर सकता था? मुझे बड़ी ख़ुशी हुई। राय साहब के स्टीरियो को क़रीब से देखने-सुनने का मौक़ा जो मिलने वाला था।

दोपहर बाद दीदी कॉलेज से आईं।

“मम्मी, क्या पहन कर जाएँ? पहली बार जा रहे हैं आख़िर!” सोलह सीढ़ियाँ चढ़ ऊपर के तल पर जाना उनके लिए भी मामूली बात नहीं थी। उन दिनों हमलोग जया भादुड़ी को सभ्य-सुसंकृत महिलाओं का आदर्श मानते थे और दीदी उन्हीं की तरह दाँत में जीभ टिका कर हँसा करती थीं।

ख़ैर, शाम हुई और हम चारों ने राय साहब के घर धावा बोल दिया। पिताजी और राय साहब बात करने लगे और थोड़ी देर में श्रीमती राय अंदर चली गईं। माँ ने बैठे-बैठे ही दबी आवाज़ में उनके ड्राइंग रूम के फ़र्नीचर, सजावटी सामान, पर्दों, वगैरह का आर्थिक विश्लेषण शुरू कर दिया। उनकी फुसफुसाहट पर दीदी रुमाल की तहें खोलती-बंद करती मुस्कुरा-मुस्कुरा कर ऐसे सिर हिलाने लगीं मानो वे हिमालय की तराई में किसी युवा संतूरवादक से राग पहाड़ी की कोई मनमोहक धुन सुन रही हों।

हर बंगाली की तरह राय साहब के घर भी बेंत के मूढे़ थे और उन पर कपड़ों का कवर लगा था। दो मूढ़े, दोनों की बगल में लकड़ी का एक-एक स्पीकर, और बीच में स्टीरियो ऐम्प्लीफ़ायर। वह तीनों हल्की भूरी लकड़ी से बने थे। स्पीकरों के आगे गाढ़ा कत्थई खुरदुरा कपड़ा जड़ा था। ऐम्लीफ़ायर के ऊपर लगे हल्के भूरे रंग के एक्रिलिक कवर से टर्नटेबल नज़र आ रही थी।

शाम ढलती गई, और नाश्ते-चाय के बीच गपशप का दौर चलता रहा। राय साहब बातें दिलचस्प करते थे। उस एक-डेढ़ घंटे में ही उन्होंने रूसी महिलाओं के सूखा भात खाने, दरवाज़े पर पेलिकन की खटखटाहट को भूत-लीला समझने, और एक अजनबी द्वारा उनके घर में छोड़े बेंत के बक्से में चाकू से लैस डाकू के पाए जानेजैसे कई वाक़िए बयान कर दिए। मेरी मिस्त्रीगीरी के शौक़ के बारे में जानकर वे हर्षित हुए। वे भी कुछ वैसा-ही शौक़ रखते थे। बोले, “देखो, ये स्टीरियो हाम खूद बानाया हाय।“

मेरा निचला जबड़ा अचानक भारी हो गया और मुँह खुल कर लटक गया। मैंने अचरज से कहा, “लेकिन ये तो दुकानों में बिकनेवाले म्यूज़िक सिस्टम जैसा है।“

“आरे नाहीं। दोकान में ऐसा सिन्क्रोनाइज़ेशन नहीं होता हाय। इतना ट्रू रिप्रोडाक्शान भी नहीं होता है। एहाँ सूनोगे तो मालुम पोरेगा कि सामने बोइठ के बाजा राहा हाय। सुनो!” और उन्होंने बीटल्स तथा रविशंकर के एल पी बजाए। वाक़ई, मैं क्या, हम चारों उस संगीत में डूब गए।

उस शाम के बाद हम हर चार-पाँच दिनों में राय साहब के घर जाने लगे। वे हर बार प्रेम से मिलते। संगीत सुनाते। उनके घर जा-जा कर मुझ पर भी म्यूज़िक सिस्टम बनाने की धुन सवार हुई। मैं उससे पहले सफलतापूर्वक टूटे माउथ ऑर्गन से बर्गलर अलार्म बना चुका था, साइकिल की सर्विसिंग कर लेता था, और अपने नवनिर्मित मकान में पानी के पाइप का लेआउट बना चुका था। स्टीरियो भी शायद बना ही लेता, अगर एक अड़चन न होती।

वह अड़चन दो दुर्लभताओं के संगम का परिणाम थी। पहली दुर्लभता यह थी कि मेरे पिताजी सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद ईमानदार थे। घूस कमाना तो दूर, झूठे टी ए बिल भी नहीं भरते थे। दूसरी दुर्लभता पहली दुर्लभता का नतीजा थी। हमारे घर में पर्याप्त पैसे कभी होते ही नहीं थे, बीस तारीख़ आते-आते हम ठन-ठन गोपाल हो जाते थे। महीने के आख़िरी सप्ताह हम बस भाड़े और रिक्शे के किराये की किल्लत के बीच अटक-अटक कर साँस लेते थे।

स्टीरियो बनाने में कम-से-कम दो हज़ार रुपयों का ख़र्च तो आता। राधा रानी नौ मन तेल के बिना भी शायद नाच लेतीं, पर दो हज़ार रुपये लगाये बग़ैर स्टीरियो कैसे बनता? मैंने माँ-पिताजी से उस बारे में कभी बात नहीं की। जिस गली जाना नहीं, उसका पता क्या पूछना? वैसे भी, ग़ुस्से में पिताजी दुर्वासा मुनि का किरदार निभाने लगते थे। मैं उनके हाथों बड़े-बड़ों को पिटता देख-देख कर बड़ा हुआ था। इनमें मेरे भाई से लेकर दफ़्तर के निकम्मे कर्मचारी और सार्वजनिक क्षेत्र में बदतमीज़ी करने वाले शोहदे शामिल थे। सौभाग्य से मैं तब तक उनके चरण पादुका और वरद हस्त प्रहार से वंचित रह सका था, और अपना रिकॉर्ड ख़राब नहीं करना चाहता था।

लेकिन हमारी लोकल जया भादुड़ी, यानी दीदी, ने मेरा ख़ामोश-सा अफ़साना पढ़ लिया। बोलीं, “बड़े पहाड़ चढ़ने के लिए पहले छोटी पहाड़ियाँ पार करनी पड़ती हैं।“

मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा। भाई-बहन के बीच ऐसी सांकेतिक बातों के कई मतलब हो सकते हैं। मामला आलमारी के सबसे ऊपरी ताखे पर रखे बोयाम से आम का अचार चुराने जैसी मामूली बात से लेकर बड़े-बूढ़ों को किसी अप्रिय निर्णय लेने पर मजबूर करने तक, कुछ भी हो सकता था। मैंने उनकी ओर तटस्थता से देखा।

“तुम स्टीरियो बनाना चाहते हो न? पर डैडी उसके लिए पैसे देंगे नहीं। और दें भी कैसे? एक तो उनके पास उतने सारे पैसे होंगे नहीं, दूसरे, तुमने पहले कोई छोटा-मोटा म्यूज़िक सिस्टम भी नहीं बनाया। तालाब-और नदी में तैरे बिना तो मिहिर सेन ने भी समंदर पार नहीं किए थे।“

मिहिर सेन की तालाब और नदी में तैराकी के बारे में मुझे ठीक-ठीक इल्म न था। शायद दीदी को पता रहा हो, या उन्होंने बात में वज़न लाने के लिए तुक्के में मिहिर सेन का दामन थाम लिया था। फिर भी, वे संकेत क्या करना चाह रही थीं, मेरी समझ में नहीं आया।

“मतलब?” मैंने पूछा।

“देखो, बाबू! तुम सब कुछ नया-नया ख़रीदने की बजाय हमारे रेडियो के स्पीकर को मॉडिफ़ाई क्यों नहीं करते?”

रेडियो! पिताजी को उस रेडियो पर बड़ा गर्व था। एक बार उन्होंने कहा था, “यह कोई ऐसा-वैसा रेडियो नहीं है। आर सी ए है। आर सी ए मतलब, रेडियो कॉरपोरेशन ऑफ़ अमेरिका।“ उन्होंने ‘अमेरिका’ पर ख़ासा ज़ोर डाला था, और वाक्य ख़त्म करते-करते उनकी आवाज़ दिलीप कुमार से पृथ्वीराज कपूर जैसी हो गई थी। उस रेडियो में चार नॉब थे। ऊपर के बाँए नॉब को दाँए-बाँए घुमा कर उसे ऑन-ऑफ़ किया जाता था और आवाज़ तेज़-धीमी की जाती थी। उसी तरफ़ के निचले नॉब से ट्रेबल कन्ट्रोल होता था। दाहिनी तरफ़ के ऊपरी नॉब से एक मीडियम वेव तथा दो शॉर्ट वेव सेट होती थी तथा उसके नीचेवाले नॉब से ट्यूनिंग की जाती थी। कुछ ऊपर लगी मैजिक आई में ‘विस्मयादिबोधक चिन्ह’ का अवतरण सही रिसेप्शन का संकेत होता था। रेडियो में कई वॉल्व थे, जिनके आधा-एक मिनट में गर्म होने के बाद उससे आवाज़ निकलती थी। आवाज़ ठीक-ठाक ही थी, लेकिन राय साहब के स्टीरियो से उसकी तुलना करना सूरज को दीपक दिखाने के समान था।

“लेकिन डैडी?”

“डैडी को पता कैसे चलेगा। उनके ऑफ़िस जाने के बाद कर देना मॉडिफ़ाई।“ उन्होंने बड़े इत्मीनान से कहा। फिर चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में बोलीं, “तुमको पता है न कि क्या करना है? वरना अगर वे रात में ‘हवामहल’ सुनने बैठे और रेडियो से आवाज़ ही नहीं निकली … “

“नहीं-नहीं, हमको पता है क्या करना है।“ मेरे बुझे चेहरे पर रौनक़ दौड़ गई।

दूसरे दिन पिताजी के दफ़्तर जाते ही मैंने रेडियो का बैक-पैनेल खोल कर स्पीकर की लम्बाई-चौड़ाई का अंदाज़ ले लिया। माँ के देखने से पहले ही पैनेल वापस कस कर मैं जुट गया सामग्री जुटाने में। एक-दो दिन में ही मैंने सारा सामन इकट्ठा कर लिया। माँ-पिताजी से नज़र बचा कर दीदी रोज़ मुझसे प्रोजेक्ट की प्रगति का हालचाल लेती रहीं।

और एक दिन मैंने स्पीकर को रेडियो से अलग कर लकड़ी के एक डब्बे में फ़िट कर दिया। डब्बा तो डब्बा ही था। उसमें राय साहब के स्टीरियो-जैसी, या हमारे रेडियो-जैसी ही, फ़िनिश कहाँ से आती! उसे रेडियो के बगल में रखना मलमल के पर्दे पर टाट के पैबन्द समान लगा। जिस टेबिल पर रेडियो रखा था, मैंने उसी के नीचे स्पीकर का डब्बा लगा दिया।

दीदी ने रेडियो ऑन कर दो-चार स्टेशन लगाए। मैं उनका मुँह उसी उत्सुकता से ताकने लगा जिससे कोई पहली बार खाना बनाने के बाद खानेवालों का मुँह ताकता है। दीदी ने पहले तो आदतन “वाह!” कहा, फिर गंभीर होकर बोलीं, “इसमें वह बात नहीं आ रही।“

“बज तो रहा है,” मैंने अपराधी-स्वर में आत्मरक्षा की।

“नहीं, नहीं, बज तो रहा ही है। उसमें कोई बात नहीं। राय साहब के स्टीरियो-जैसा नहीं बज सकता, वह भी मालूम है। लेकिन धमक अगर थोड़ी और बढ़ जाती … “

“अंकल ने धमक बढ़ाने के लिए रूई भरने को कहा था, सो हमने भर भी दी थी।“ राय साहब मेरे गुरु थे, मैं उनका नाम कैसे ले सकता था।

“देखो, जितना गुड़ डालोगे उतना मीठा होगा। रूई और भर कर देखो।“ दीदी ने सलाह दी।

स्पीकर न हुआ, गुलगुला हो गया! लेकिन दीदी की बात में दम था। मैंने सोचा, लगे हाथ स्पीकर के डब्बे में थोड़ी रूई और भर दूँ, पर तब तक माँ के दोपहर की नींद पूरी कर उठने का समय हो चुका था। मैंने बाक़ी का काम अगले दिन पर मुल्तवी कर दिया।

शाम को पिताजी आए तो फ़ोन पर ही उलझे रहे। वे सुप्रीम कोर्ट के किसी फ़ैसले के बाद की संभावित गतिविधि पर चर्चा कर रहे थे। उस फ़ैसले ने हाई कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया था जिसमें इंदिरा गांधी का चुनाव ख़ारिज कर दिया गया था। पिताजी और उनके-जैसे केन्द्रीय सरकार के उच्चाधिकारियों का सोचना था कि चूँकि अदालत ने अपील पर फ़ैसला होने तक श्रीमती गांधी को पद पर बने रहने की मोहलत दे दी थी, इसलिए वे कोई अप्रत्याशित क़दम भी उठा सकती थीं। दूसरी ओर, दीदी-जैसे युवा दो खेमों में बँटे थे। एक का कहना था कि श्रीमती गांधी कोई-न-कोई रास्ता निकाल ही लेंगी, और दूसरे के अनुसार उन्हें जेल जाने, और शायद सूली पर लटकने से, अब कोई नहीं रोक सकता था। मेरा ध्यान इंदिरा जी के चुनाव से ज़्यादा स्पीकर की आवाज़ को धमकदार बनाने पर अटका था।

सुबह होते ही दिल्ली से ट्रंक कॉल आने लगे। कुछ पक रहा था। स्थानीय अधिकारियों के भी कई फ़ोन आए। जैसे ही आठ बजने को हुए, पिताजी ने रेडियो ऑन कर दिया। वे सूचना और प्रसारण मंत्रालय में थे, और वैसे भी अक्सर सुबह आठ और रात पौने नौ बजे से हिन्दी और अंगरेज़ी की बुलेटिन सुनते थे। मैं उनके पास आ गया। वे असमंजस में थे। आवाज़ पूरी तरह तेज़ करने और स्पीकर की पुरानी जगह पर कान सटाने के बाद भी उन्हें समाचार अपेक्षित तीव्रता से सुनाई नहीं पड़ रहे थे। उनके चेहरे पर झुंझलाहट की लकीरें उभरने लगीं। दुर्वासा-रूप धारण करने का वह पहला चरण होता था उनका। मैं घबराया। होम करते हाथ जलेंगे, कभी सोचा न था। मैंने उन्हें रेडियो से कान हटा कर टेबिल के नीचे कान लगाने को इशारा किया। देश में आपातकाल की घोषणा के समाचार ने उन्हें इतना अभिभूत कर दिया था कि उन्होंने, “अच्छा, यहाँ” कह कर नीचे कान लगा कर हिन्दी और अंगरेज़ी की बुलेटिन सुनी और मुझसे स्पीकर के मॉडिफ़िकेशन के बारे में कुछ न कहा। जल्दी तैयार होकर उस दिन वे समय से पहले ही दफ़्तर चले गए।

दोपहर में मैंने डिब्बे में रूई ठसाठस भर दी। काम होते ही मैंने दीदी को पुकारा जो उस दिन कॉलेज नहीं गई थीं। रेडियो ऑन करने पर बड़ी निराशा हुई। उसकी आवाज़ मरणासन्न बिल्ली की मिमियाहट जैसी हो गई थी।

“यह क्या हो गया?” हम दोनों घबरा गए। इतना तय था कि पिताजी हर समाचार बुलेटिन सुनने की कोशिश ज़रूर करेंगे, और समाचारवाचक के मनुष्य से मार्जार रूपान्तर पर रूपान्तरकार की, यानी मेरी, ख़ाल उधेड़ने में तनिक भी कोताही नहीं करेंगे।

दीदी ने चेतावनी दी, “सब कुछ पहले-जैसा कर दो, वरना हम भी नहीं बचा पाएँगे।“

मरता क्या न करता! मैंने स्पीकर रेडियो में लगा दिया और डिब्बे, तार, रूई, वगैरह को मन ही मन श्रद्धांजलि अर्पित की। रेडियो ऑन किया तो स्पीकर को गुलगुला समझने का ख़मयाज़ा शीशे में बाल की तरह सामने आ गया। मैंने बैक-पैनेल दोबारा खोला। रूई भरने के दबाव से स्पीकर का कोन कई जगह से फट गया था। मैंने गोंद और टेप से फटी जगहों को जोड़ने की कोशिश की, पर स्पीकर तो जैसे मुझसे बदला लेने पर उतारू था। मेरा हर यत्न बेकार गया।

पिताजी उस शाम भी फ़ोन पर ही व्यस्त रहे। दूसरे दिन सुबह उनके रेडियो के पास आते ही मैं भी वहाँ पहुँच गया। उन्होंने रेडियो ऑन कर टेबिल के नीचे कान लगाया ही था कि मेंने उन्हें रेडियो के सामने कान लगाने को संकेत कर वॉल्यूम थोड़ा कम कर दिया ताकि फटे कोन की फरफराहट कम सुनाई दे। पिताजी ने हैरत से मेरी ओर देखा और समाचार सुनने में तल्लीन हो गए। हिन्दी और अंगरेज़ी दोनो बुलेटिनें सुनने के बाद वे कोई राजनीतिक टिप्पणी करते हुए चले गए। मैं बाल-बाल बच गया।

उस दिन के बाद मैंने रेडियो को दोबारा नहीं छेड़ा। हाँ, स्पीकरों की धमक बढ़ाने के प्रयोग करता रहा और कुछ में सफल भी हुआ, पर अपना अलग घर बनाने के बाद। उन प्रयोगों की चर्चा फिर कभी।