रविवार, 28 जून 2026

रेलगाड़ी

                                                      बाहर दालान था

पीछे खलिहान था

पेड़ थे, चिड़ियाँ थीं

ताल था, मछलियाँ थीं

 कोस-भर दूर से रेल गुज़रती थी

सोंधी भाप घर उतरती थी

क्षितिज पर सियाह लकीर खिंच जाती

बहन उसे देखने बाहर आ जाती

 

’लेलगाली’, वह तुतलाती

’रेलगाड़ी’, दादी समझातीं

दादा बहलाते, रेलगाड़ी देखने चलोगे?

उस पर चढ़ोगे?

 

मैं झिझकता, मन तो करता है

पर, दादाजी, दिल डरता है

रेल पर चढ़ूँ और वो ऐसी चले

कि फिर रोकने से भी न रुके

 

फिर क्या होगा?

तब तो मैं बहुत पछताऊँगा

आप-सब को

दोबारा कैसे देख पाऊँगा?

 

दादा मुस्कुराते

ऐसा कैसे हो जाएगा?

तेरा दादा

तुझे बचाएगा

 

घर-खलिहान में आग लगी

न दादा बचे, न दादी बचीं

हम रात-रात जागे

खेत-खेत भागे

 

बाबूजी ने काँधे पर उठाया

खिड़की से अन्दर पहुँचाया

मन बहुत घबराया

पर मैं कुछ न बोल पाया

 

भीड़ में सैंकड़ों दब गए

बहन-माँ नीचे रह गए

बस, इतनी तसल्ली थी दिल को

बाबूजी रेल पर चढ़ गए

 

रेल चलते ही तलवारें चलने लगीं

हर तरफ़ रक्त की धार बहने लगी

मैं लाशों के गट्ठर तले छुप गया

                                                            
                                                              
                                                              मैं नौ साल की उम्र में मर गया

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