बुधवार, 24 जून 2026

हवा


आलमारी में दस्तावेज़ तलाश करते हुए आज कुछ ऐसा हाथ आ गया जिसमें आपकी भी दिलचस्पी होगी—चार स्क्रिप्ट जो मैंने आकाशवाणी के सहयोगियों के लिए लिखी थीं। बारह-तेरह साल पहले फ़िल्मी गीतों को पिरोती ये स्क्रिप्ट इतनी लोकप्रिय हुईं कि श्रोताओं ने इन्हें दोबारा सुनाने का अनुरोध कई-कई बार किया था। पहली स्क्रिप्ट ‘हवा’ पर आधारित थी, दूसरी ‘बरसात’ पर, तीसरी ‘शाम’ पर, और चौथी का आधार है ‘होली’। पहली स्क्रिप्ट प्रस्तुत है नीचे, शेष आगे पेश होंगी। इन्हें पढ़िए और बताइए, क्या आपका चुनाव भी उन्हीं गीतों का होता जो हमने आकाशवाणी में उपलब्धता के कारण किया था, या आपकी पसन्द कुछ और है?

हवा

(प्रसारण अवधि 29 मिनट, प्रसारण समय रात साढ़े नौ के बाद और ग्यारह बजे से पहले)

गर्मी की उमस-भरी दोपहर, लू के थपेड़े, पसीना, ज़िन्दगी की जिद्दोजहद, और उस जिद्दोजिहद में थका इन्सान! इस आपाधापी का, सच मानिए, एक अलग लुत्फ़ है। देखिए, इसमें आप-हम ही नहीं थकते! सूरज भी थक जाता है अपने ताप से, और जा छिपता है रात के आग़ोश में। सूरज की जगह ले लेते हैं ढेर सारे टिमटिमाते तारे। बस, ज़रा-सा इंतज़ार और करिए-पुरवाई का झोंका आते ही छत पर बिछी सफ़ेद चादर ठंडी लगने लगेगी।

गीतः दिल ढूँढ़ता है, भूपेन्द्र, मौसम

सच, गर्मी में पुरवाई रिसते घाव पर मरहम से कम सुकून नहीं देती! आज कहाँ है किसी के पास इतना समय कि आपके पास आकर बैठे, दो बातें कहे, दो बातें पूछे, और आपके लड़खड़ाते क़दमों को सहारा दे? ऐसे में, इस पुरवाई को सहेली बना लेने को जी चाहता है।

गीतः सुन री पवन, लता मंगेशकर, अनुराग

जीवन एक परीक्षा ही तो है! इस परीक्षा में, कभी-न-कभी, हम बिलकुल तनहा होते हैं। उस दौरान जाने अनजाने बन जाते हैं और हम अपनों के बीच बेगाने हो जाते हैं। जैसे, अपने-ही देश में परदेसी हो गए हों। अगर आप भी ऐसे-ही हालात से गुज़र रहे हैं, तो परेशान न हों! कोई आपका नहीं, तो न सही। लिख भेजिए हवा पर एक सलाम-शायद आपका मीत मिल जाए! 

गीतः हवाओं पे लिख दो, किशोर कुमार, दो दूनी चार   

तो आपका पैग़ाम पहुँच ही गया उनके पास, जिन्हें आप बेताबी से तलाश रहे थे! चलिए, आपका ग़म बाँटनेवाला कोई तो मिला। मीत को ग़म से संजीदा तो कर लिया, अब अपनी ख़ुशियों से सराबोर भी तो कीजिए! ऐसा करिए, उन्हें ले जाइए ऐसी जगह जहाँ वो हों, आप हों, ख़ुश्बू हो, और हो ठंडी-ठंडी हवा, ताकि आपदोनों सारे ग़म भुलाकर बहक उठें।

गीतः बलमा खुली हवा में, आशा भोंसले, कश्मीर की कली

वैसे, ठंडी हवा बरसात में और भी मदमाती हो जाती है। बहकना बन्द कर ख़ामोशी से सुनिए इस प्रीत-भरी रात की सदा, जिसमें है झींगुरों की चीकी-मीकी और एक प्यार-भरा संदेश, जो हवा दे रही है।

गीतः आजा रिमझिम के ये प्यारे-प्यारे गीत लिए, लता मंगेशकर - तलत महमूद, उसने कहा था

कितना प्यारा होता है वो अहसास जब कोई आपका बन जाता है, सिर्फ़ आपका। छोटी-से-छोटी ख़ुशी और बड़े-से-बड़े दर्द में उसका साथ जिंदगी को हसीन बना देता है। बहार आ जाती है सूने जीवन में। जी चाहता है, उस पर सबकुछ निसार दें।

गीतः ये हवा ये रात ये चाँदनी, तलत महमूद, संगदिल

दुख, दर्द, ख़ुशी, प्यार, मुहब्बत—जीवन का चक्र नहीं थमता । एक के बाद एक नए रंग आते हैं और पुराने मिट जाते हैं। जो मिलता है, बिछुड़ता ज़रूर है एक दिन। आँखों में आँसू की लकीर छोड़कर, अपनी याद छोड़कर! बस, रह जाती है हवा में उसकी महक। हम कहते ही रह जाते हैं, अभी तो आए थे, ऐसी भी क्या जल्दी है जाने की? 

गीतः अभी न जाओ छोड़कर, मुहम्म्द रफ़ी, आशा भोंसले, हम दोनों  

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