बुधवार, 3 जून 2026

अब, उनका क्या करें!


पाँच काउंटर्स का छोटा-सा एक बैंक। एक छोर पर कैश लेने-देने वाले बाबुओं के केबिन थे, जिनका निचला हिस्सा लकड़ी का और ऊपरी भाग शीशे का था और जिनसे बाबुओं के मुँह और बाहें साफ़ दिखाई देती थीं । उसके बाद तीन बाबुओं के बैठने की जगह थी और दूसरे छोर पर मैनेजर का कमरा था। मैनेजर के कमरे की खिड़की पर पर्दा लगा था और बेइंतहा गर्मी के बावजूद उसका दरवाज़ा बन्द था। हर दस मिनट पर बहुत-से काग़ज़ और रजिस्टर लिए एक कर्मचारी दरवाज़ा खटखटा कर एक-दो मिनट के विलम्ब के बाद उस कमरे में प्रवेश करता और दो मिनट में साहब के दस्तख़त करवा कर लौटता। उसके बाहर निकलते ही दरवाज़ा स्वतः बन्द हो जाता था। बैंक का सारा तामझाम मात्र ढाई सौ वर्ग फ़ुट में समाहित था और ग्राहकों के लिए डेढ़ सौ वर्ग फ़ुट की अपार जगह छोड़ दी गई थी।

            बैंक के इर्द-गिर्द पाँच किलोमीटर तक आबादी का नामोनिशान न था। बैंक, जैसे, साथ लगे आर्मी कैम्प और एक बेहद सफल स्कूल की सहूलियत के लिए ही बनाया गया था। बैंक से बाहर निकलते ही युद्ध में जीता दुश्मनों का एक टैंक दीखता, फ़ौलादी ज़ंजीरों से घिरा, अकेला, झेंपा हुआ-सा। अक्सर सैनिकों की क़वायद की आवाज़ भी सुनाई देती।

यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल फ़ोन पर तस्वीर उतारने की गुंजाइश नहीं थी, जब फ़िज़ा में इलाहाबाद का नाम बदलने का ज़िक्र तक न था, और जब वहाँ पच्चीस पैसे में गर्मागर्म समोसा मिला करता था। अगर आप यह समझ रहे हैं कि इलाहाबाद के एक कोने में छुपे उस बैंक में बड़ी शांति का वातावरण रहता होगा, चैन की वंशी बजती होगी, तो बात सरासर ऐसी नहीं है। वहाँ इतनी चिल्लपों मचती थी, इतना सिर-फुटव्वल होता था, कि क्या बताऊँ! कभी-कभी तो नौबत हाथापाई तक उतर आती। याद नहीं कि वह कौन-सा साल था और कौन-सा महीना, पर इतना दुरुस्त है कि तारीख़ सोलह थी। इतनी भीड़ थी बैंक में, कि लोगों की क़तार मुख्य दरवाज़े से दस फ़ुट बाहर तक पहुँच गई थी। गर्मी का उमस भरा मौसम। उस पर सूरज इस ज़िद पर अड़ा था शायद, कि कल चाहे दिन भर बादलों के नर्म बिस्तर पर सुस्ताऊँ, पर आज तो अपनी तपिश से सबको झुलसा कर ही दम लूँगा।

सिर पर चमकता सूरज, पैरों के नीचे धूल-मिट्टी-कंकड़ का शहरी कालीन, और साँस लेने को आसपास के खेतों से आती लू-मिश्रित-धूल। रही-सही कसर पसीने की अविरल धार ने पूरी कर दी थी। भीड़ के पसीने की मात्रा देख कॉर्पोरेशन के नल को इन्फ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स हो जाता। ललाट, बाल, गर्दन, बाहें और गंजों के सर पसीने में यूँ चिपचिपाए हुए थे जैसे तेल में भुँजे बैंगन को कड़ाही से निकले घंटे-दो-घंटे बीत चुके हों।

ज़ाहिर है, लोगों के तन पर कपड़े गीले ज़्यादा थे, सूखे कम। दिल्ली होती, तो तीन-तीन रुपयों में नारियल की एक सरीखी कटी गरी बेचने वाला आ जाता। कलकत्ता के झालमूढ़ीवाले और भिखारी इस बिज़नेस ऑपरच्यूनिटी को एक्सप्लॉइट करते। मुंबई में सींगदाना और रेनबो सैंडविच की फेरी लगानेवाले चक्कर लगा लेते। लेकिन, इलाहाबाद इलाहाबाद था; दिल्ली, कलकत्ता या मुंबई नहीं। साहित्यकारों का गढ़ हुआ करता था इलाहाबाद एक ज़माने में। यह अलहदा बात है कि उस समय तक साहित्य नाममात्र को बचा था वहाँ; अलबत्ता कारें ज़रूर ज़्यादा हो गई थीं।

इलाहाबाद के उसी गौरवशाली अतीत से प्रभावित होकर, या टार्गेट पूरा करने की मजबूरी से परेशान होकर; न जाने कब एक नौजवान भीड़ के पास पहुँच गया। उसके जूतों के ऊपरी चमड़े स्वस्थ सोल का मोह त्याग चुके थे। आमतौर पर वैसे जूते कबाड़ीवाले या कूड़ेदान की शरणस्थली में चिरनिद्रा में लीन हो जाया करते हैं, पर वहाँ तो बात ही कुछ और थी। धागे की सिलाई और कीलों की वहृद व्यूह रचना नौजवान के जूतों की आत्मरक्षा कर रही थी। उसके काले पैंट पर पसीने की सूखी लकीरों ने सफ़ेद धारियों का डिज़ाइन बना दिया था। मटमैली कमीज़ औेर उसके ऊपर गहरे नीले रंग की टाई, जिसकी नॉट के पास का हिस्सा मैल से काला हो चुका था, नौजवान की ख़स्ताहाली खुले शब्दों में बयान कर रही थीं। नौजवान ने हैट भी लगाया हुआ था—गर्मी से बचने के लिए या किसी लोकप्रिय फ़िल्मी हीरो की नक़ल उतारने के लिए, निश्चय करना मुश्किल था। पर एक बात तो थी! उसकी इस वेशभूषा  ने हर किसी का ध्यान आकृष्ट कर लिया था।

कवि बच्चन कहते थे कि हिन्दी फ़िल्मों में तीन घंटे में पोइटिक जस्टिस मिल जाता है, लेकिन असली ज़िंदगी में या तो बहुत देर से मिलता है या फिर मिलता ही नहीं। फ़िल्में अलग हैं, यथार्थ अलग। तो, हमारे इस नौजवान का इस्तिक़बाल किसी फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं हुआ। कुछ लोगों ने उसे ऐसे घूरा मानो वह शीशे का बना हो और उसके आरपार देखा जा सकता हो। कुछ ने उससे नज़रें चुराईं। कुछ ने उसे शक़ की निगाहों से देखा। कुछ डरे हुए भी मालूम पड़े, मानो नौजवान एड्स का वायरस लिए घूम रहा हो।

नौजवान को इस रूखे अंदाज़ की शायद लत पड़ चुकी थी। वह लोगों के आक्रोश, असुविधा और असहयोग को नकार एक-एक व्यक्ति के पास जाने लगा। हर नए शख़्स के पास जाकर वह मुस्कुराता, सर थोड़ा झुकाता, और कहने लगता, “सर! आप अपने बच्चे की फ़ीस जमा करने के लिए खड़े हैं। आपके बच्चे के लिए हमारी कम्पनी ने प्रोमोशन के तौर पर यह इन्साइक्लोपीडिया निकाला है। दाम है सिर्फ़ चार सौ पचास रुपया। यही इन्साइक्लोपीडिया बाज़ार में नौ सौ रुपए में मिलता है। और भी बुक्स हैं। दिखाऊँ, सर?”

यह मोनोलॉग बड़ी अच्छी तरह रटा हुआ था उसे। हर नए आदमी के आगे सर झुकाते ही जैसे कहीं कोई बटन दब जाता उसके अंदर, और रिकॉर्ड बज उठता। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि हर आम हिंदुस्तानी क़तार की तरह उस क़तार में भी ऊबे-परेशान लोग एक-दूसरे के इतने पास खड़े थे कि किसी का जूता किसी की चप्पल पर टिका था, किसी की कोहनी किसी की पसलियों में घुसी जा रही थी, कोई अपने पीछे खड़े व्यक्ति की साँसें अपनी गर्दन पर महसूस कर रहा था, और किसी का ब्रीफ़केस आगेवाले के टखनों से बारबार टकरा रहा था।

नौजवान का मोनोलॉग मुझे विविधभारती की विभिन्न सभाओं की तरह कम-से-कम पाँच बार सुनाई पड़ चुका था। सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने बात पूरी सुने बिना हथेली यूँ हिलाई, जैसे मक्खी उड़ा रहा हो। दूसरा व्यक्ति साइकिल और इन्साइक्लोपीडिया के बारीक अंतर को समझे बिना बोला, “नौ सौ रुपय्ये की चीनी साइकिल फेल है बाज़ार में। बच्चा एक्को दिन चढ़ नहीं पाएगा।“

हर आदमी की फ़ितरत अलग, प्रतिक्रिया अलग! धीरे-धीरे नौजवान एक सफ़ारी सूटधारी सज्जन के पास पहुँच गया। नौजवान कुछ बोल पाता, उसके पहले ही सफ़ारी सूटवाले सज्जन बोल उठे, “अरे, जाओ!”

बात थोड़ी ज़्यादा ही रुखाई के साथ कही गई थी। नौजवान के अहम को ठेस लगी। उसने कुछ कहने की कोशिश की। सफ़ारी सूटवाले सज्जन न जाने किस गंभीर समस्या से ग्रस्त थे। उनका पारा आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने आव देखा न ताव, नौजवान को धकेला, उसका कॉलर पकड़ लिया, और एक धौल जड़ दिया उसके पेट में। नौजवान लड़खड़ाया। उसकी किताबें गिर पड़ीं।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन पहली सफलता के उत्साह में नौजवान पर फिर झपटे। सब लोग इस मुफ़्त तमाशे को दिलचस्पी से देखने लगे। आख़िर यह सब किसी फ़िल्म के मुफ़्त ट्रेलर से कम थोड़े-ही था! इससे पहले कि सफ़ारी सूट वाले सज्जन अपनी युद्ध कला का एक-आध नमूना और पेश करते, एक ज़नाना आवाज़ गूँजी, “यह क्या कर रहे हैं आप?”

जब सब हाथापाई से लुत्फ़ंदोज़ हो रहे थे तभी चालीस साल के आसपास की एक महिला का पदार्पण हुआ। सफ़ेद साड़ी, सफ़ेद ब्लाउज़, दोनों पर सफ़ेद कढ़ाई, और धूप से बचने को काला चश्मा, जो आँखों की बजाय उसके माथे की शोभा बढ़ा रहा था—कोई भी कह सकता था कि वह महिला आभिजात्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती थी, किसी बड़े आदमी की पत्नी थी या ख़ुद किसी ज़िम्मेदारीवाले पद पर आसीन थी, और उस लकड़बघ्घों के झुंड में अचानक सिंहनी-समान प्रकट हो गई थी।

सफ़ारी सूटवाले सज्जन सकपकाए, नौजवान लड़खड़ाता हुआ अपनी टाई ठीक करने लगा, और बाक़ी लोग सकते में आ गए।

एक मनचले ने चुटकी ली, “यह तो अमरीका-इराक़ युद्ध हो गया!”

सफ़ारी सूटधारी सज्जन को सुपरपावर से अपनी तुलना एक न भाई। वे पराजित साँढ़ की तरह चिंघाड़े, “जानता नहीं मैं कौन हूँ?”

महिला ने कहा, “आपके व्यवहार से आपका परिचय पहले ही मिल चुका! चलिए, उठाइए इस लड़के की किताबें!”

अब तक बैंक मैनेजर भी बाहर आ गया था। उसके पीछे-पीछे लिप्स्टिक लगे होठों से मधुर मुस्कान बिखेरती बैंक की महिला चपरासी भी बाहर आ गई थी। बैंक मैनेजर अपनी तोंद सँभालते हुए बोला, “मैडम! आप वहाँ क्यों खड़ी हैं? उधर जाइए! औरतों के लिए अलग लाइन है।“

फिर महिला चपरासी से मुख़ातिब होता हुआ बोला, “ले जाइए इनको उधर।“

महिला चपरासी मैनेजर को अकेला छोड़ना नहीं चाहती थी। उसने बिना हिलेडुले एक बार साड़ीवाली महिला को देखा, एक बार मैनेजर को। साड़ीवाली महिला को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया था। वह रौबदार आवाज़ में बोली, “सुना नहीं आपने? उठाइए इस लड़के की किताबें!”

सफ़ारीवाले साहब ढिढाई पर उतर आए। गुटके से काले दाँतो को भन्नाए कुत्ते की तरह दिखा कर बोले, “काहे उठाएँ? आप हैं कौन? सरोजिनी नायडू? कि झाँसी की रानी?”

“कि रजनी?” मनचले ने फिर फ़ब्ती कसी।

मैंने बीचबचाव करने की सोची, पर उससे पहले ही महिला दृढ़ता से बोली, “मैं महिषी हूँ। और कुछ पूछना हो तो बाद में पूछना, पहले उठाओ इनकी किताबें!”

लोगों की सोच और भैंसों की चाल में कोई ख़ास फ़र्क नहीं होता। जहाँ पहली भैंस मुड़ी, बाक़ी भी मुड़ जाती हैं। वहाँ भी कुछ वैसा ही हुआ। एक सज्जन बोले, “मैडम का नाम-पता जान कर क्या करेगा? उठा किताब!”

बस, बाक़ी लोग भी बोल उठे, “उठाओ किताब!”

मैनेजर शांति बहाली की सफलता पर संतुष्ट होकर लौटने लगा। महिला चपरासी उससे चुंबक-सी सटी चल पड़ी। तभी महिषी ने कहा, “एक मिनट! हमलोग कब तक ऐसे खड़े रहेंगे?”

मैनेजर अपनी तोंद का विस्तार लिए एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाते हुए घूम गया। महिला चपरासी भी सवालिया शक़्ल लिए घूम गई। मैनेजर पर दाग़े गए सवाल को उसने झेला, “आपको तो पहले ही कहा कि आपकी लाइन अलग है। जाइए, लगिए!”

महिषी किसी दूसरी ही मिट्टी की बनी थी। बोली, “नहीं! अलग लाइन क्यों? दो-दो घंटे से लोग खड़े हैं लाइन में यहाँ। कोई औरत आ जाए और उसका काम जल्दी हो जाए, उससे बाक़ी लोगों को क्या फ़ायदा होगा?”

मैनेजर ख़फ़ा हो गया, “तो क्या करें? लगा तो हुआ है आदमी!”

महिषी बोली, “एक आदमी काफ़ी नहीं तो और लोग लगाइए काम पर। दो-दो घंटे आदमी अगर सिर्फ़ फ़ीस देने के लिए खड़ा रहे, तो बाक़ी कामों में कितना हर्ज़ होता है, पता भी है आपको? अगर आपके आदमी ठीक से काम करना नहीं जानते तो दूसरे आदमी लगाइए काम पर! कमरे की खिड़की से पर्दा हटा कर बैठिए। देखिए, कौन-क्या कर रहा है। और अगर आपसे ये प्रॉब्लम हल नहीं होती, तो हमें बताइए। आपके जनरल मैनेजर के पास इसका हल होगा ... “

मैनेजर बड़बड़ाया, “अब कैसे करें? लोग तो बस हुक़्म चलाने लगते हैं!”

महिषी फिर बोली, “तो ठीक है! हम सब लोग चलते हैं स्कूल के प्रिंसिपल के पास। उन्हें बताएँगे कि उन्होंने ग़लत बैंक का चुनाव किया है। स्कूल का करोड़ों का अकाउंट किसी अच्छे बैंक में ट्रांसफ़र कराएँ। और आपके जनरल मैनेजर को भी बता देते हैं कि उन्होंने ग़लत आदमी को मैनेजर की जगह बिठा दिया है।“

क़तार के बाक़ी लोग भी उत्तेजित हो गए, “मैडम ठीक कहती हैं ... मैं तो बहुत पहले से ही ये करना चाहता था ... “ वगैरह-वगैरह।

घोषणाओं की झड़ी लग गई, तो मैनेजर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, “अच्छा, चलिए! कोई व्यवस्था करते हैं।“ उसने कमरे की खिड़की से पर्दे हटा दिए। दस्तावेज़ों पर बारह-तेरह मिनट की बजाय दो-तीन मिनट में दस्तख़त होने लगे, तो फ़ीस जल्दी जमा होने लगी। जहाँ पहले और आधा घंटा खड़ा रहने का अंदेशा था, वहीं अब पाँच मिनट में फ़ीस जमा कर मैं गाड़ी में बैठ गया।

“तुमने कहा था कि बस पाँच मिनट में अद्भुत की फ़ीस जमा कर आ जाओगे, और मुझे तपती गाड़ी में चालीस मिनट बिठा दिया,” महिषी ने शिकायत की।

“सॉरी! मुझे क्या पता था कि आज यहाँ कामचोरी के रेकार्ड टूटनेवाले हैं।“ मैंने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा।

“मैं न आती तो अभी और न जाने कितनी देर खड़े रहते!”

“हाँ, तुम्हारी वजह से सबका काम बन गया,“ मैंने गाड़ी आगे बढ़ाते हुए कहा, “सिवाय एक के!”

“सिवाय एक के?” महिषी ने एयरकंडीशनर का फ़्लो एडजस्ट करते हुए पूछा।

“हाँ, उस लिप्स्टिकधारी चपरासी का काम तो बिगाड़ दिया न तुमने!” मैं शरारत से मुस्कुराया।

“ओह, वो!” महिषी मुस्कुराई, फिर धीरे से बोली, “अब, उनका क्या करें!”

मैंने गाड़ी घर की ओर बढ़ा दी। हमारी बेटी के स्कूल से लौटने का समय होने वाला था।

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