सोमवार, 29 जून 2026

होली

 

पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं फ़िल्मी गीतों को पिरोतीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट में से ’हवा, ’बरसात और ’शाम पिछले सप्ताह आपकी नज़र हो चुकी हैं। आज पेश है वह स्क्रिप्ट जो 18 मार्च, 2003 को प्रसारित हुई थी। आज की स्क्रिप्ट में गीतों का स्थान रिक्त है, ताकि आप अपनी पसन्द का उपयुक्त गाना वहाँ रख सकें।

 

होली

(प्रसारण अवधि 44 मिनट, प्रसारण समय संध्या पाँच के बाद और आठ बजे से पहले)

 

(गुनगुनाते हुए) यूँ तो हमने लाख हँसी देखे हैं, तुमसा नहीं देखा! … अजी, चौंकिए नहीं, ये गीत हम आप ही के लिए गुनगुना रहे हैं। ज़रा ग़ौर कीजिए, आज कितनी बार रंग से सराबोर हुए, कितनी बार दूसरों को भिगोया, रंग कभी आँखों में घुसा तो कभी कानों में, पर मानना पड़ेगा! थक कर चूर होने की बजाय आप खिसक आए हैं रेडियो के क़रीब। ये चाहत ही तो है आपकी जो हमें बार-बार खींच लाती है आपके पास और जिसकी वजह से होली के इस होली-होली ऐटमस्फ़ीयर में हम हो लिए हैं आपके साथ ‘शीर्षक संगीत’ के चंद नग़मे और ढेर सारी बधाइयाँ लेकर। आज तो, भाई, होली पर ही गीत बजते रहने चाहिएँ। क्यों, क्या ख़याल है?

 

गीत 1:

होली के हुड़दंग से भला कौन बच सका है? हमने ऐसे बहुत से महारथी देखे हैं जो महीना-भर पहले ढिंढोरा पीटते हैं कि वे होली नहीं खेलेंगे, पर होली के दिन दोपहर बारह बजते-न-बजते रंगों में ऐसे सने-पुते नज़र आते हैं कि पहचान में ही नहीं आते। एक कान हरा तो दूसरा लाल, दाँत काले तो बाल जामुनी! ऐसे टेक्नीकलर बन जाते हैं कि ईंट से घिस-घिस कर रंग छुड़ाया जाए तो भी शायद एक सप्ताह तो गुज़र ही जाए उनकी असली रंगत नुमायाँ होने में। और, तन से भले ही छूट जाए, मन से कहाँ मिट पाता है होली का रंग!

गीत 2:

एक बात सच-सच बताइएगा! आज आपने किस-किसके साथ होली खेली? मेरा मतलब है, मौक़ा देखकर कहीं किसी ख़ास के साथ छुप कर तो होली नहीं खेली? अरे, शरमाइए नहीं, घबराइए भी नहीं, हम किसी को बताने थोड़े-ही जा रहे हैं! बस, आपकी चोरी पकड़ रहे थे और पकड़ भी ली! चलिए, माफ़ किया इस गीत के साथ।

गीत 3:

अरे, आपका चुपके से होली खेलनेवाला राज़ क्या खोल दिया, आप तो एक्स्ट्रा लाल हो गए! चलिए, आप भी क्या याद करेंगे, हम भी अपना एक राज़ ज़ाहिर किए देते हैं सिर्फ़ आपके आगे। वैसे तो हम डायटिंग करते हैं, रोज़ अपना वज़न तौलते हैं, पर आज पता नहीं कौन-सा कीड़ा काट गया कि हमने सुबह से इतने सारे पापड़, गुझिया, चिप्स, दही बड़े, गुलाब जामुन और मालपुए खा डाले हैं कि भूखी भैंस भी शर्मा कर, रंभा कर, और खाने से इन्कार कर देती। लेकिन हम नहीं माने। आप से बतियाने से पहले दो गिलास ठंडई और ढाल आए हैं कि गला तर रहे। अब अगर आपने ठंडई नहीं पी तो हम क्या करें? चलिए, ये गाना सुन लीजिए। इसमें भी ठंडई का मज़ा है।

गीत 4:

आज लोगों का होली खेलने का अलग-अलग स्टाइल देखने को मिला। कोई बड़ी मेहनत से टेसू के फूलों का रंग निकाल रहा था तो कोई मेंहदी घोल रहा था, किसी का दिल एनामेल पेन्ट पर क़ुर्बान हो रहा था तो कोई विशुद्ध कीचड़ का प्रयोग कर धन्य हो रहा था। अब हमें ये तो नहीं पता कि होली खेलने का आपका स्टाइल कौन-सा है, पर हमारा स्टाइल भी बड़ा स्पेशल था। बताएँ? अच्छा, बताते हैं। हमने सिर पर शावर कैप पहना, चेहरे और हाथों पर लोटा-भर सरसों का तेल मला, और ढेर सारा सूखा रंग रख दिया टेबिल फ़ैन के आगे। जैसे ही कोई पास आता, हम चुपके से फ़ैन चला देते, और रंग की परत ऐसे चढ़ जाती कि स्प्रे पेंट करनेवाले भी दंग रह जाएँ। आज का दिन तो गुज़र गया लेकिन देखिए, होली कल भी है। इस समझदारी से खेलिएगा कि भीगनेवाले के मुँह से वाह निकले, आह नहीं। 

गीत 5:

आप भी हैरान होंगे, आज हमें हो क्या गया है! क्या करें, होली का माहौल ही ऐसा है। लेकिन होली में इतना बावला भी नहीं होना चाहिए कि होश ही गुम हो जाएँ। न ही इतना भीगना-भिगोना चाहिए कि बुख़ार चढ़ जाए। अब देखिए न, इन्हीं दिनों आसपास इधर-उधर रिंकी-पिंकी, चुन्नू-मुन्नू, सबके इम्तहान भी तो चल रहे हैं! होली तो हर साल आएगी, पर इस साल का इम्तहान दोबारा देने की नौबत नहीं आनी चाहिए। पर्चा ऐसे मज़े में निकलना चाहिए जैसे मज़े में ये गाना गाया जा रहा है।  

गीत 6:

भला देखिए तो, आधे घण्टे से ज़्यादा हो गया आपकी कम्पनी में और पता ही नहीं चला! ये तो अच्छा हुआ कि मच्छर उड़ाने के चक्कर में घड़ी पर नज़र पड़ गई वरना हम न जाने कब तक बकर-बकर करते रहते। आज शाम कितने सारे लोग घर आने वाले हैं, हमको कितने लोगों से मिलने जाना है, गिले-शिक़वे भुला कर मुस्कुराहटें बिखेरनी हैं। तो चलें? बस ये वायदा लिए जा रहे हैं कि आप भी आज से सिर्फ़ मुस्कुराहटें बिखेरेंगे, शिक़वे भुला देंगे, और याद रखेंगे आज की ये शाम जिसे आपकी [नाम] ने सजाया था कुछ बेहतरीन नग़मों से। फ़िल्में थीं …..। और जाते-जाते नज़र करते हैं फ़िल्म … का यह गीत 

गीत 7:


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