पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट के बारे में पिछली बार बताया था। फ़िल्मी गीतों को पिरोती ये स्क्रिप्ट मैंने आकाशवाणी के सहयोगियों के लिए बारह-तेरह साल पहले लिखी थीं। श्रोताओं ने इन्हें दोबारा सुनाने का अनुरोध कई-कई बार किया था। ‘हवा’ और ‘बरसात’ पर आधारित स्क्रिप्ट से आप वाक़िफ़ हैं। आज पेश है ‘शाम’ पर स्क्रिप्ट। ‘होली’ पर आधारित स्क्रिप्ट आगे पेश होगी। इन्हें पढ़िए और बताइए, क्या आपका चुनाव भी उन्हीं गीतों का होता जो हमने आकाशवाणी में उपलब्धता के कारण किया था, या आपकी पसन्द कुछ और है? एक बात और, स्क्रिप्ट का एक भी शे‘र मेरा नहीं है। प्रोग्राम पेश करनेवाले तारतम्य भंग होने के डर से शायरों का नाम नहीं बताते, और मेरे नोट्स ग़ायब हो चुके हैं। अगर आप शायरों के नाम बता सकें, तो मेहरबानी होगी।
शाम
(प्रसारण अवधि
29 मिनट, प्रसारण समय रात नौ के बाद और ग्यारह बजे से पहले)
मुझे पूछने का हक़ दे कि ये एहतिमान [रवायत] क्यों है?
मेरे साथ प्यास क्यों है, तेरे पास जाम क्यों है?
जिसे मेरी तीरा-बख़्ती [बदनसीबी] से फ़रोग [चमक] मिल रहा था
वही सुबह पूछती है, मेरे घर में शाम क्यों है?
शाम साँवली से
काली होकर रात बन चुकी है। सैंकड़ों-हज़ारों सितारे उसकी माँग में झिलमिला उठे हैं। ऐसे
में आप हैं, हैं ’सदाबहार दस नग़मे’, और मैं, [नाम]! लेकिन हमारे साथ कुछ ऐसा भी है जिसका ज़िक़्र लबों
तक पहुँचने से पहले-ही सहम कर ख़ामोश हो जाता है।
गीतः ये शाम की तनहाइयाँ ऐसे में तेरा ग़म, लता मंगेशकर, आह
उनके ग़म की टीस का कोई मुक़ाबला नहीं। जब वो पास होते थे, सारा ज़माना
ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो जाता था।
ख़ुदा जाने तुम्हारे
नाम से कैसी मुहब्बत है
किसी का नाम लेता हूँ, तुम्हारा नाम आता है
गीतः फिर वही शाम, वही ग़म, वही तनहाई है, तलत महमूद, जहाँआरा
दर्द में डूबा फ़साना चाहिए
और सुनने को ज़माना चाहिए
दोस्त-दुश्मन सब अयादत [मिज़ाजपुर्सी] कर चुके
वो न आए जिनको आना चाहिए
गीतः लो आ गई उनकी याद, वो नहीं आए, लता मंगेशकर, दिल एक मन्दिर
अब्र [बादलों] में छुप रहा है चाँद
चाँदनी छन रही है शाख़ों से
जैसे खिड़की का आधा पट खोले
झाँकता हो कोई सलाखों से
गीतः तुम पुकार लो, तुम्हारा
इन्तज़ार है, हेमन्त कुमार, ख़ामोशी
नक़ाब तुमने जो उलटा है मुस्कुरा के कभी
फ़लक [आसमान] के चाँद-सितारों को शर्म आई है
गीतः चौदहवीं का चाँद हो,
मुहम्म्द रफ़ी, चौदहवीं का चाँद
’सदाबहार दस नग़मे’ आपकी ख़िदमत में पेश कर रही है, आपकी [नाम] ।
गीतः ये रात ये चाँदनी फिर
कहाँ, हेमन्त कुमार - लता मंगेशकर, जाल
सहारा ढूँढ़ लाया हूँ मैं ज़िन्दगी के लिए
इक अजनबी की ज़रूरत है, अजनबी के लिए
बुरा न मानो तो मैं तुमसे एक बात कहूँ
तुम्हारी मुझे ज़रूरत है ज़िन्दगी के लिए
गीतः फैली हुई हैं सपनों की
बाहें आजा चल दें कहीं दूर, लता मंगेशकर, घर नम्बर 44
कहकशाँ [तारामण्डल] रस्ते-रस्ते बिखर जाएगी
चाँदनी मेरे आँगन उतर जाएगी
आज आने का वादा है, आएँगे वो
आज झोली मुरादों की भर जाएगी
गीतः तुम आए तो
आया मुझे याद गली में आज चाँद निकला, अलका याग्निक, ज़ख़्म
वो आएँगे और चाँदनी रात होगी
न ये बात होगी, न वो बात होगी
कटी उम्र सारी इसी कश्मकश में
अगर वो मिलेंगे तो क्या बात होगी
गीतः तेरा मेरा
प्यार अमर, फिर क्यों मुझको लगता है डर, लता मंगेशकर, असली-नक़ली
शायद ये सच है कि हर किसी के पास दिलक़श अंदाज़े-बयाँ नहीं होता, पुरअसर
आवाज़ नहीं होती, लेकिन
ये बात और है कि पत्थर में न ढल सकें लेकिन
हर जवाँ दिल में कई ताजमहल होते हैं
तो रुख़सत होती है [नाम] इस वायदे के साथ
गीतः जो वादा
किया हो, निभाना पड़ेगा, मुहम्मद रफ़ी - लता मंगेशकर, ताजमहल

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