पुराने दस्तावेज़ों के बीच मिलीं चार अत्यधिक लोकप्रिय स्क्रिप्ट के बारे में पिछली बार बताया था। फ़िल्मी गीतों को पिरोतीं ये स्क्रिप्ट मैंने आकाशवाणी के सहयोगियों के लिए बारह-तेरह साल पहले लिखी थीं। श्रोताओं ने इन्हें दोबारा सुनाने का अनुरोध कई-कई बार किया था। ‘हवा’ पर आधारित पहली स्क्रिप्ट से आप वाक़िफ़ हैं। आज पेश है ‘बरसात’ पर स्क्रिप्ट। ‘शाम’ और ‘होली’ पर आधारित तीसरी और चौथी स्क्रिप्ट आगे पेश होंगी। इन्हें पढ़िए और बताइए, क्या आपका चुनाव भी उन्हीं गीतों का होता जो हमने आकाशवाणी में उपलब्धता के कारण किया था, या आपकी पसन्द कुछ और है?
बरसात
(प्रसारण अवधि
29 मिनट, प्रसारण समय रात साढ़े नौ के बाद और ग्यारह बजे से पहले)
गर्मी का मौसम
विदा लेने को है। काली घटाओं की चिलमन से झाँक रही हैं वर्षा रानी। वर्षा रानी, तो
बस, वर्षा रानी हैं! उनके आने का अंदाज़ सबसे जुदा है। वो किसी नई-नवेली, शर्माती-सकुचाती,
दुल्हन-जैसी हौले-हौले पग धरती नहीं आतीं। वो तो आती हैं बिजली की आँखें-चुँधियाती
चमक, मेघों की दिल-दहलाती गरज, और मदमस्त पवन के तेज़-तूफ़ानी झोंकों के साथ और कर जाती
हैं सराबोर, बस, पहली-ही मुलाक़ात में। कोई उस अंदाज़ से घबराता है तो घबराता रहे! आपके-मेरे
इसरार पर भी पवन कहाँ मद्धिम करेगी अपनी रफ़्तार!
गीतः कारी बदरिया मारे लहरिया, लता मंगेशकर, आदमी
तपती धरती को
सींचने से पहले-ही बरसात की पहली बूँद अक्सर उड़ जाती है भाप बन कर। जैसे किसी यतीम
की तरफ़ बढ़ा ममता-भरा हाथ यकायक वापस खींच लिया गया हो। उस हाथ का तो, बस, इंतज़ार ही
रह जाता है। किसी बाग़ीचे में पेड़ की शाखों से बँधे झूले में झूल कर देखिए, ये इंतज़ार
कितना खलता है! ठंडी सबा तक नागवार लगने लगती है बदन को।
गीतः सावन के झूले पड़े हैं, लता मंगेशकर, जुर्माना
बरसात में बाग़ीचे
और खेत ही हरे-भरे नहीं हो जाते, विसाले-यार की तड़प भी बुलंदियाँ छूने लगती है। दिल
के जज़बात मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में बयाँ होने लगते हैं। अब देखिए न, उनका साथ, भीगी रात,
मदमाती हवा, प्यारा-सा चंदा, बेहोश-सी कलियाँ—ये भी कोई वक़्त हुआ जीवन की उस अनजानी
कमी के ज़िक्र का?
गीतः ये रात भीगी-भीगी, मन्ना डे - लता मंगेशकर, चोरी चोरी
किसी-भी दिलचस्प
शख़्सियत से मुलाक़ात लम्बे अरसे तक ज़ेहन में बसी रहती है, है न? ओर अगर वो शख़्सियत इतनी
हसीन हो कि पानी की बूँदें उसके फूल-से नाज़ुक गालों पर ठहरने को मचला करें, उसकी रेशमी
ज़ुल्फ़ों से मोती की तरह ढलका करें! उफ़्फ़! वैसी मुलाक़ात तो ज़िंदगी-भर नहीं भुलाई जा
सकती।
गीतः ज़िंदगी-भर नहीं भूलेगी, मुहम्मद रफ़ी, बरसात की रात
उन्हें भुलाना
आपके लिए नामुमकिन है, उधर वो भी आप-ही के ख़यालों में बेचैन हैं। भूलना-भुलाना कैसा?
अब तो जब-जब बरसात आएगी, तन के साथ ही भीगा करेगा बेचारा मन। बरसात प्यार का संदेश
जो लाएगी! हर बरसात के साथ वह मीठी-सी पहली मुलाक़ात याद आनी ही है अब। संकोच छोड़िए,
कह डालिए दिल की वो बात जो होठों तक आकर ठहर जाती है।
गीतः रिमझिम के तराने ले के, मुहम्मद रफ़ी - गीता दत्त, काला बाज़ार
इश्क़ और मुश्क
छुपाए नहीं छुपते। आपके शर्माने, सकुचाने ने ही फ़ाश कर दिया न आपकी मुहब्बत का राज़!
चलिए, अच्छा ही हुआ। अब अगर आपके वो आपसे जुदा होना भी चाहें, तो आप और हमराज़ मिलकर
उन्हें रोक सकते हैं इस प्यार-भरी मनुहार से।
गीतः बरसात में, लता मंगेशकर और साथी, बरसात
हमें उम्मीद है,
बल्कि यक़ीन है, आपने उन्हें रोक भी लिया होगा और उन्हें हर ग़म, हर तक़लीफ़ से महफ़ूज़ रखने
की भी ठान ली होगी। अब उस आलम में देर नहीं, जब घटाओं के गरजने और बिजली के चमकने पर
वे बड़ी मासूमियत से आपके पास सिमट आएँगे।

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