अपने हमदम थे पर अब दूर हुए जाते हैं
लोग मिलते नहीं कतरा के निकल जाते हैं
गले तो मिलते हैं पर दिल कहाँ हैं मिल पाते
रंग चेहरे के हमें देख उतर जाते हैं
वो जो इंसाँ को हमेशा बचा के रखत था
आज हम उसकी हिफ़ाज़त की क़सम खाते हैं
बड़े अरमान से भेजा था जिसे पढ़ने बाहर
बाप अब उसके लिये क़फ़्न लिये आते हैं
ये अलग दौर है ख़ामोश ही रहना अच्छा
सब यहाँ ख़ून के प्यासे ही नज़र आते हैं
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