रविवार, 13 सितंबर 2026

अपने हमदम थे

अपने हमदम थे पर अब दूर हुए जाते हैं

लोग मिलते नहीं कतरा के निकल जाते हैं

 

गले तो मिलते हैं पर दिल कहाँ हैं मिल पाते

रंग चेहरे के हमें देख उतर जाते हैं

 

वो जो इंसाँ को हमेशा बचा के रखत था

आज हम उसकी हिफ़ाज़त की क़सम खाते हैं

 

बड़े अरमान से भेजा था जिसे पढ़ने बाहर

बाप अब उसके लिये क़फ़्न लिये आते हैं

ये अलग दौर है ख़ामोश ही रहना अच्छा

सब यहाँ ख़ून के प्यासे ही नज़र आते हैं

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