लॉ कॉलेज के प्रांगण में
विद्यार्थी
चर्चा कर रहे थे
कभी
इस तो कभी उस धारा पर
कहर
बरपा कर रहे थे
एक
माली बड़ी देर से उन्हें देख रहा था
गंभीरता
से कुछ सोच रहा था
अंत
में वह हिचकता हुआ आया
अपना
नाम बद्री सिंह पांडे बताया
माथा
अंगोछे से पोंछा
धीरे
से पूछा
ऐसे
कौन-से दो जुर्म हैं जिनकी धारा नहीं है
अदालत
में जिनके लिए सज़ा नहीं है
पर
समाज जिनकी भरपूर सज़ा देता है
वह
जुर्म जो ईश्वर की दया से होता है
लड़कों
में सन्नाटा छा गया
ऐसा
बेढब प्रश्न कहाँ से आ गया
फिर
धीरे से एक लड़की बोली
पहला
जुर्म मैं हूँ
और
दूसरा मेरे पिता हैं
इस
देश में लड़की होना या उसका बाप होना
दोनों
गुनाह के समान हैं
दोनों
अपमान झेलते हैं पर मुँह नहीं खोलते हैं
उनका
मुँह तो तभी खुलता है
जब
अंतिम बुलावा आता है
या सब्र का बाँध टूट जाता
है
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