नवदुर्गा के नौ रूपों में वो सृष्टि-जनक कहलाता है
माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन
जीना सिखलाता है
सपनों के महल बनाता है, फिर मन
मूरख घबराता है
थोड़ा-थोड़ा, कम-कम-सा ही, क्यों
सब हो कर रह जाता है
सोचा जो था वो हुआ नहीं, चाहा जिसको
क्यों मिला नहीं
माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन
जीना सिखलाता है
क्यों बाधाएँ तड़पाती हैं, उम्मीद
फिसलती जाती है
मन तृप्त नहीं होता है क्यों, क्यों
उम्र निकलती जाती है
चिंता के दलदल को कैसे आनन्द में
बदला जाता है
माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन
जीना सिखलाता है
गदा, चक्र और धनुष-बाण, माँ के हाथों
में सज्जित हैं
कमल कमन्डल माला भी, माता के हाथ
में शोभित हैं
शौर्य, प्रेम और विद्या से अमृत
का घट भर जाता है
माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन
जीना सिखलाता है
मुस्कान मधुर है बलशाली, मुस्कान
से सृष्टि रच डाली
बुद्धि-विवेक-यश-आयु से, भक्तों
की झोली भर डाली
बैंगनी रंग है प्रिय उन्हें, और
मालपुआ भी भाता है
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