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बुधवार, 7 अगस्त 2024

दुर्गा रूप 5 - स्कन्दमाता

 स्कन्दमाता की कृपा

स्कन्दमाता की कृपा

हैं धन्य जिन पर हो गई

है स्कन्दमाता की कृपा

 

ना अस्त्र उनके हाथ में

ना शस्त्र उनके पास में

दुर्गा के जननी रूप से

लें स्कन्दमाता की कृपा

 

हैं स्कन्द उनकी गोद में

जो वीर हैं तिहुँ लोक में

है शक्ति में भी सौम्यता

है स्कन्दमाता की कृपा

 

ज्ञानी बना दें मूर्ख को

संयम सिखा दें धूर्त को

इस लोक से उस लोक तक

है स्कन्दमाता की कृपा

 

कदली करें अर्पित उन्हें

साहस हमें हरदम मिले

विश्वास है मिलती रहेगी

स्कन्दमाता की कृपा

दुर्गा रूप 8 - महागौरी

 धवल वर्ण है, धवल वस्त्र हैं, धवल है उनका वाहन

महागौरी के चरणकमल में तन-मन हो जाता पावन

सबका तन-मन हो जाता पावन

 

दुख-दोष, पाप से टकराना, जीवन का ही तो पहलू है

सुख हवा का ठंडा झोंका है, तो दुख भीषण जलती लू है

हो हार-जीत में निर्विकार जो, सफल है बस वो ही जीवन

महागौरी के चरणकमल में तन-मन हो जाता पावन

सबका तन-मन हो जाता पावन

 

पार्वती का वो जप-तप, काली का वो भीषण संग्राम

तन-मन हैं किन्तु वश में और अधरों पर फैली है मुस्कान

महागौरी की शान्त छवि लगती है कितनी मनभावन

महागौरी के चरणकमल में तन-मन हो जाता पावन

सबका तन-मन हो जाता पावन

 

इक हाथ में बाजे डमरू, इक हाथ त्रिशूल महान

इक हाथ अभय है देता, इक हाथ दे वर का दान

श्याम-श्वेत के अनुभव का जीवन में होता प्लावन

महागौरी के चरणकमल में तन-मन हो जाता पावन

सबका तन-मन हो जाता पावन

दुर्गा रूप 4 - कुष्मान्डा

 नवदुर्गा के नौ रूपों में वो सृष्टि-जनक कहलाता है

माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन जीना सिखलाता है

 

सपनों के महल बनाता है, फिर मन मूरख घबराता है

थोड़ा-थोड़ा, कम-कम-सा ही, क्यों सब हो कर रह जाता है

सोचा जो था वो हुआ नहीं, चाहा जिसको क्यों मिला नहीं

माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन जीना सिखलाता है

 

क्यों बाधाएँ तड़पाती हैं, उम्मीद फिसलती जाती है

मन तृप्त नहीं होता है क्यों, क्यों उम्र निकलती जाती है 

चिंता के दलदल को कैसे आनन्द में बदला जाता है 

माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन जीना सिखलाता है

 

गदा, चक्र और धनुष-बाण, माँ के हाथों में सज्जित हैं

कमल कमन्डल माला भी, माता के हाथ में शोभित हैं

शौर्य, प्रेम और विद्या से अमृत का घट भर जाता है

माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन जीना सिखलाता है

 

मुस्कान मधुर है बलशाली, मुस्कान से सृष्टि रच डाली

बुद्धि-विवेक-यश-आयु से, भक्तों की झोली भर डाली

बैंगनी रंग है प्रिय उन्हें, और मालपुआ भी भाता है

माँ कुष्मान्डा का रूप हमें जीवन जीना सिखलाता है

दुर्गा रूप 6 - कात्यायनी

 हर बिटिया की माँ होती है

पर छठे रूप में नवदुर्गा

ख़ुद बिटिया बन कर आई हैं

कात्यायनी जी आई हैं

कात्यायनी जी आई हैं

 

प्यारी बिटिया के जैसी हैं

इक कमल सम्हाले बैठी हैं

इस कृपा लुटाती बेटी ने

सोने जैसी छवि पाई है

कात्यायनी जी आई हैं

 

बिटिया मृदुता की सागर है

बिटिया का करना आदर है

क्रोधित मत करना बिटिया को

उसने तलवार उठाई है

कात्यायनी जी आई हैं

 

करते मधु अर्पित बिटिया को

नारंगी रंग है प्रिय इनको

संसार के झंझावातों से

बिटिया ने मुक्ति दिलाई है

कात्यायनी जी आई हैं

दुर्गा रूप 7 - कालरात्रि

 अपने को मत छोटा समझ

अपने को मत कायर बना

मन की कलुषता को मिटा

भयमुक्त बन, उठ कर दिखा

दुर्गम को संभव है किया

मानव ने ही संसार में

मत हार से तू हार जा

है खड्ग तेरे हाथ में

विश्वास अपने पर जमा

अवगुण को सद्गुण दे बना

माँ कालरात्रि की तरह

शुभ काम कर और जीत जा

शुभ काम कर और जीत जा!

 

माँ की छवि पर ध्यान दे

हैं केश उनके यूँ खुले

धरती को ढँक लेती है ज्यों

मेघों की विस्तृत श्रृंखला

ब्रह्मांड गोचर नेत्र में

ज्वाला धधकती श्वास में

हर पाप का, अज्ञान का

विध्वंस करती हैं सदा

पर हाथ को भी लक्ष्य कर

और अभय हो कर मुस्कुरा

माँ कालरात्रि की तरह

शुभ काम कर और जीत जा

शुभ काम कर और जीत जा!

दुर्गा रूप 3 - चन्द्रघन्टा

 

मुझे धन पा कर ना चैन मिला

मुझे बल पा कर ना चैन मिला

कहने को मुझको रूप मिला

पर मन अक्सर बेचैन मिला!

 

सन्तोष हुआ मन बैरी को

देखा जो रूपसी देवी को

माथे पे चन्द्र, सोने-सा रंग

जैसा ना कभी कहीं और मिला!

 

वो शेर के ऊपर बैठी हैं

काया में अद्भुत ज्योति है

दस हाथ हैं उनके, तीन नयन

मुस्कान है देती कष्ट भुला!

 

निर्भयता, धीरज और करुणा

मानव का है असली गहना

माँ चन्द्रघन्टा को देखा तो

यश से जीने का भेद खुला!

 

मिष्ट्टान्न समर्पित करते हैं

हम सब अब ये प्रण करते हैं

आध्यात्म, आत्मिक प्रगति से

कर देंगे हर प्राणी का भला!

दुर्गा रूप 2 - ब्रह्मचारिणी

 छल कपट लोभ से व्याकुल मन

जब तड़प-तड़प अकुलाता है

माँ ब्रह्मचारिणी का वर्णन

जग आलोकित कर जाता है!

माँ ब्रह्मचारिणी! माँ ब्रह्मचारिणी!

 

वर्षों जिसने उपवास किया

भोजन क्या पानी भी न लिया

बस एक लगन में शंकर की

जिसने जप-तप और त्याग किया

उस ब्रह्मचारिणी के आगे

मस्तक अपना झुक जाता है

माँ ब्रह्मचारिणी! माँ ब्रह्मचारिणी!

 

लम्बा जीवन, सुखमय जीवन

हो लोभहीन सबका जीवन

ये श्वेत वस्त्र, ये जपमाला

जतलाते हैं सात्विक जीवन

माँ तुच्छ भेंट है शक्कर की

तुझको ये ही तो भाता है

माँ ब्रह्मचारिणी! माँ ब्रह्मचारिणी!

दुर्गा रूप 1 - शैलपु़त्री

 हे नवदुर्गा की प्रथम रूप

हे प्रेम रूप, सौहार्द्र रूप

हे शैलपुत्री, हे हेमवती

हे पार्वती, हे प्रेममयी

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

 

इक हाथ में थामे कमल फूल

इक हाथ में थामे हैं त्रिशूल

प्रकृति की हरियाली जिनमें

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

 

हम पथ में बाधा ना पाएँ

बन्धु-ही हमें ना तड़पाएँ

जीवन में हो ख़ुशियों की धूप

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

 

हो व्याधिमुक्त जीवन अपना

हो सत्य प्रेम का हर सपना

चरणों में घृत करते अर्पित

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप

हे नवदुर्गा की प्रथम रूप!

दुर्गा रूप 9 - सिद्धिदात्री

 सिद्धिदात्री की शरण जो आ गया, सो पा गया!

जो आ गया, सो पा गया!

माँ के नौवें रूप का आनन्द सब पर छा गया!

जो आ गया, सो पा गया!

 

सिद्ध क्या, गंधर्व क्या, यक्ष क्या, और देव क्या

मानव-असुर की बात क्या, इस लोक और उस लोक क्या

माँ सिद्धिदात्री की कृपा से शिव में भी बल आ गया

जो आ गया, सो पा गया!

जो आ गया, सो पा गया!

 

हैं सिद्धियाँ जो आठ सारी, माँ के वश में हैं सभी

अर्द्धनारीश्वर हुए भगवान पाकर ये सभी

माँ का स्मरण कर बावला मन बस में अपने आ गया

जो आ गया, सो पा गया!

जो आ गया, सो पा गया!

 

माँ सिद्धिदात्री का करें श्रद्धा से सुमिरन भक्त जन

भय मृत्यु का जाता रहे, टल जाए हर दुर्घटना प्रबल

तिल का किया अर्पण उन्हें, भय मुक्त जीना आ गया

जो आ गया, सो पा गया!

जो आ गया, सो पा गया!