मंगलवार, 23 जुलाई 2024

अहिल्या

 "ई. मृणमय मजुमदार"दीवार पर काले पत्थर की नेम-प्लेट पर सफ़ेद अक्षरों में लिखा था। नाम के नीचे, छोटी इबारत में, इंजीनियरिंग डिग्री और कॉलेज के बारे में जानकारी थी। उनमें नया कुछ भी नहीं था, वह सब मुझे पहले से मालूम था।

वैसे, दीवार पर एक नहीं, दो-दो नेम-प्लेट नुमायाँ थीं। दूसरीवाली लकड़ी की थी। वह दीवार पर कीलों के सहारे टँगी थी। वह प्लेट पत्थरवाली प्लेट से छोटी थी, और उसके ठीक नीचे लगी थी। पत्थरवाली प्लेट लकड़ीवाली प्लेट पर एक तरह से हावी हो रही थी। एक नज़र में ही ख़ुलासा हो जाता था कि लकड़ी की प्लेट वाले का ओहदा पत्थर की प्लेट वाले से यक़ीनन कमतर था।

लकड़ी की प्लेट पर किसी मर्द का नहीं बल्कि एक औरत का नाम लिखा था"डॉ. मुग्धा मजुमदार"। ऊपरवाली प्लेट की ही तरह उस प्लेट पर भी डिग्रियों और कॉलेज के नाम अंकित थे। उस प्लेट में नाम के अलावा मेरे लिए सब कुछ नया था, वह सब मुझे पहले से मालूम नहीं था।

मैं नेमप्लेट वाले दोनों व्यक्तियों को जानता थाआदमी को भी, औरत को भी। नहीं, "जानता था" कहना बढ़ाबढ़ी करना होगा। ऐसे कहना ज़्यादा ठीक होगा कि "वे लोग कौन थे, मुझे पता था"

छब्बीस साल पहले ही मुझे उस आदमी से मिलने में चिढ़ होने लगी थी, और आज भी उससे मुलाक़ात की इच्छा बिलकुल नहीं थी मुझमें। वह काइयाँ था। कोई ऐसा-वैसा नहीं, अव्वल दर्जे का। इच्छा तो वैसे उस औरत से मिलने की भी कोई ख़ास नहीं थी, लेकिन उसके नाम के आगे लगे 'मजुमदार' शब्द ने मुझे ललकार दिया था"इतनी दूर से, इतने साल बाद, ऐसे ही, दरवाज़े से पलट जाने के लिए आए थे? पता नहीं लगाओगे कि उसका सरनेम क्यों नहीं बदला? उसका पति भी 'मजुमदार' ही है या कोई और? या, उसने शादी ही नहीं की है? अगर शादी नहीं की, तो क्यों?"

छब्बीस साल ख़ासा लम्बा अरसा होता है। हो सकता है, वह आदमी अब तक मर-ख़प गया हो। अगर ज़िन्दा भी होगा तो इतना बूढ़ा तो हो ही गया होगा कि जल्दी सोने चला जाता होगा। मैंने घड़ी की ओर देखासात बजे थे। इतनी जल्दी कौन-सा बूढ़ा सोता है? कई बूढ़े तो देर रात तक जाग कर बकबकाते रहते हैं।

मृणमय से मुझे इतनी चिढ़ शुरु से नहीं थी। पहली मुलाक़ात में वह मुझे बड़ा सहृदय आदमी मालूम हुआ था, घर के बुज़ुर्ग़-जैसा। मैं चौबीस साल का था, और वह पचास के क़रीब रहा होगा। मुझे रहने के लिए एक आशियाने की तलाश थी, और मृणमय का दो कमरों का एक सेट तब ताज़ा-ताज़ा बना था। इतना ताज़ा, कि दीवारों से रिसती चूने की गंध मद्धिम भी नहीं हुई थी। दो कमरे, रसोईघर, ग़ुसलख़ाना, और एक कमरे के बराबर ख़ुली जगह। उस ख़ुली जगह से दूर-दूर तक खेत, झोंपड़ियाँ, नदी, वगैरह दिखते थे। पहली मंज़िल पर बने उस सेट तक जाने के लिए एक सँकरा ज़ीना था। वह सेट बाक़ी बँगले से सटा, पर अलग, था। जो वहाँ रहेगा, वही उस ज़ीने और ख़ुली जगह का इस्तेमाल करेगा।

इतनी स्वाधीनता! मुझे भला और क्या चाहिए था?

किराये की बात करते समय मृणमय की पत्नी ने हल्के-से ताक़ीद कर दी थी। उनके तीन बच्चों में सबसे बड़ी लड़की मेडिकल कॉलेज में पढ़ती थीकोई ऐसी-वैसी बात नहीं होनी चाहिए। वह तो अकेले कुँवारे लड़के को घर किराये पर देने के पक्ष में ही नहीं थीं, पर उन्हें अपने पति की इच्छा के आगे समर्पण करना पड़ा था। दूसरी तरफ़, मृणमय मेरे इंजीनियर होने और अमरीकी कम्पनी में काम करने से बड़ा मुतमइन था। फिर, मेरा नाम भी मजुमदार होने की वजह से उसकी स्नेह-सरिता का कलकल प्रवाह और अधिक प्रबल हो गया था।

"मैं सप्ताह में एक दिन ही घर पर रह पाता हूँ, शेष दिन दौरों में निकल जाते हैं। कल भी जा रहा हूँ।"मैंने श्रीमती मजुमदार को आश्वस्त किया था।

मैंने झूठ नहीं कहा था। मैं रेलगाड़ी और टैक्सी से इतने दौरे करता था कि शरीर को हरदम हिलते रहने की आदत हो गई थी, पैर हमेशा थरथराते रहते थे। मेरी एक दिलचस्प रेलयात्रा का विवरण 15 अप्रैल 2020 के 'साहित्य कुंज' में 'आँखों की कहानी' नाम से शाया भी हो चुका है। लेकिन, उस रेलयात्रा का इस क़िस्से से कोई लेना-देना नहीं है। उसका ज़िक्र तो मैंने यूँ ही कर दिया। लेखकों, कवियों, की आदत होती है न, दूसरों को अपना लिखा पढ़ा-सुना कर परेशान करने की!

"आप खाने-पीने का क्या करेंगे? हफ़्ते में एक दिन ही रहते हैं, तो यहीं खा लिया करिएगा।"

"नहीं, मेरे आने-जाने का कोई ठीक नहीं। यह मेरे परिचित मेरी मदद कर देंगे उस मामले में," मैंने अपने साथ आए महतोजी की ओर इंगित किया था। वे बगल के मुहल्ले में दसेक साल से रह रहे थे और सरकारी कर्मचारी थे। महतोजी ने ही मुझे उस घर का पता दिया था, और उन्हीं के भरोसे पर वह घर मुझे मिल रहा था।

किराया ज़्यादा था, पर मैंने हुज्जत नहीं की थी। नौ महीने होटल में रहने और कई मकानमालिकों का इन्कार झेलने के बाद मेरा विवेक उसकी सलाह नहीं दे रहा था। समझदारी इसी में थी कि मृणमय का इरादा बदलने से पहले ही मैं तीन महीने का एडवान्स देकर बात पक्की कर दूँ।

फिर क्या था? मैंने वैसा ही किया।

एक घण्टे में महतोजी और मैं सूटकेस लेकर घर आ गए। थोड़ी देर बाद हाथ-पैर धोने की ज़रूरत महसूस हुई तो देखा, ग़ुसलख़ाने के दोनों नलों से पानी नहीं आ रहा। पानी की छोड़िए, नल, पानी बन्द होने पर, जैसे "सू-सू" की आवाज़ करते हैं, वैसी आवाज़ भी नहीं कर रहे थे। पूरा सन्नाटा था।

रसोईघर के नल की हालत भी कोई अलहदा नहीं थी। शायद पानी के वैल्व की चाभी बन्द थी। मैंने पाइपलाइन के साथ चल कर वैल्व तक पहुँचने की कोशिश की, पर वह ज़ीने की दीवार से कुछ दूर तक सटी रहने के बाद बँगले की ओर कहीं ग़ायब हो गई थी। 

मैंने महतोजी से मृणमय को कहला भेजा। उन्होंने वापस आकर बताया, सेट पर पानी की टन्की जल्दी ही लगने वाली है। शायद एक हफ़्ते में ही लग जाए। तब तक मैं बँगले का ग़ुसलख़ाना इस्तेमाल कर सकता हूँ, या अहाते के नल से दो-दो बाल्टी पानी सुबह-शाम लेकर काम चला सकता हूँ।

"छिः! बँगले जाकर कौन नहाएगा? और आदमी सिर्फ़ नहाने के लिए ही तो बाथरूम नहीं जाता न!"

महतोजी मेरे विचार से सहमत थे। मैंने दो बाल्टियाँ ख़रीदीं, और काम चलाने लगा। दिन हफ़्तों में बदले, और हफ़्ते-बीत महीना पूरा हुआ। मैं मृणमय के पास गया। उसने बड़ी आवभगत की, हमदर्दी जताई, ग़ुसलख़ाना इस्तेमाल करने का न्यौता दोहराया, टैंक न लगवा पाने पर अफ़सोस जताया, देरी की वजह बताई, और अगले हफ़्ते टैंक ज़रूर लगवा देने का वायदा भी किया। मैं चिढ़ गया, उसके रोकने पर भी झटके से उठ कर चला आया। दो बाल्टियों के राशन ने मुझे पागल कर डाला था। मुझे लगा, मृणमय मेरी भलमनसाहत का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा था, मेरे सब्र का जबरन इम्तहान ले रहा था। 

मैंने वापस आकर ग़ुस्से पर क़ाबू पाने की कोशिश की, मेंहदी हसन की ग़ज़ल बजा कर लेट गया।

"देखो तो दिल कि जाँ से उठता है, ये धुआँ-सा कहाँ से उठता है" के बोलों में डूबते-उतराते अचानक एहसास हुआ, कोई जालीवाला मुख्यद्वार खटखटा रहा है।

महतोजी के खाना लाने में तो मेरे हिसाब से अभी एक घण्टा बाक़ी था। "आज इतनी जल्दी आ गए?" सोचता मैं बाहर निकला तो हैरान रह गया! जाली के उस पार बढ़ी दाढ़ीवाले महतोजी नहीं, मकानमालिक की लड़कियाँ खड़ी थीं। तेरह-चौदह साल की छोटी लड़की ऐसे हिल-हिल कर इठला रही थी जैसे सिर्फ़ उसी उम्र की लड़कियाँ इठला सकती हैं। सतरह-अठारह साल की बड़ी लड़की ने शरमाते हुए रुमाल से ढँकी एक प्लेट मेरी ओर बढ़ाई"माँ ने भेजी है। आप तो इतनी जल्दी उठ कर चले आए कि ..."

"क्या है यह?" मैंने उसकी ओर देखा। शाम के धुँधलके में भी उसके सर की सफ़ेद ओढ़नी और बदन पर सफ़ेद चूड़ीदार पाजामा-कुर्ता बेसाख़्ता नमूदार थे।

"आप ख़ुद ही देख लीजिए न!" वह हौले से मुस्कुराई।

दरवाज़ा खोले बिना प्लेट लेना मुमक़िन न था, और उन्हें वापस भेज देना बदतमीज़ी होता।

दरवाज़ा खुलते ही छोटी लड़की बोली, "आप ये गाना ख़ूब सुनते हैं। आपके यहाँ से गाने की आवाज़ आते ही हमलोग समझ जाते हैं कि आप घर आ गए, और दीदी और हम छत पर आ जाते हैं। बहुत अच्छा लगता है।"

"चुप रह!" बड़ी बहन ने आँखें तरेरीं।

मेरी समझ में नहीं आया, क्या कहूँ। एक तरफ़ तो उसकी माँ ने "ऐसी-वैसी बात" नहीं होने की चेतावनी दी थी, और दूसरी तरफ़ उसी माँ ने शाम-ढले बेटियों के हाथ खाने का सामान भिजवाया था।

"भाई कहाँ हैं आपके?" मैं पूछ बैठा।

"भैया पढ़ रहा है। उसका इम्तिहान है," छोटी लड़की बोली।

"तू जा तो! बहुत बकबक करती है!" बड़ी बहन ने उसे झिड़का, फिर मुझसे बोली, "पकौड़े ठण्डे हो जाएँगे। मैंने बनाए हैं।"

चौबीस साल के आदमी को खाना खाने के लिए ज़्यादा न्यौता नहीं देना पड़ता। वह हर समय खा सकता हैखाना खाने से पहले भी, खाना खाने के बाद भी, और शायद खाना खाने के दौरान भी।

मैंने लड़की के हाथ से प्लेट ले ली। उस पर बिछे सफ़ेद रुमाल के कोने पर गुलाबी धागे से अंग्रेज़ी के दो अक्षर, "एम एम", कढ़े थे।

"ये दीदी का रुमाल है। आपस में गुम न जाए, इसलिए अपना नाम काढ़ दी हैमुग्धा मजुमदार।" छोटी बहन बोल पड़ी।

"और तुम्हारा नाम क्या है?" न चाह कर भी मैं मुस्कुरा उठा था।

"हमारा नाम मालती है।"

"तो यह रुमाल तुम्हारा भी तो हो सकता है?"

"नहीं, सिर्फ़ दीदी के रुमाल पर ही कढ़ाई रहती है।"

मैंने मुग्धा को देखा। वह मुस्कुराई, और मेरे कुछ बोलने से पहले ही "हम जाते हैं" कहती, सकुचाती, चली गई।

मैंने चैन की साँस ली। दरवाज़े पर ताला जड़ा, और पकौड़े खाते-खाते सोचा, "ग़ुस्सा जताने का असर अच्छा हुआ। इसकी माँ ने पकौड़े भिजवा दिए, अब इसका बाप पानी भिजवाएगा!"

पकौड़े गर्म भी थे और नर्म भी। मेरा रवैया भी ऐसा ही होना चाहिए, मैंने सोचा।

अगली सुबह महतोजी के इंतज़ार में बाहर देखा, तो निगाह के कोने में बँगले की छत आ गई। मुँडेर से कुछ पीछे हट कर मुग्धा खड़ी थी। वह मुझे देख कर मुस्कुराई।

"पकौड़े खा लिए थे?" उसने इशारों में पूछा।

"हाँ, खा लिए थे," मैंने भी इशारों में जवाब दिया।

"कैसे लगे?" उसका अगला इशारा हुआ।

मुश्किल यह थी कि उसे नीचे से नहीं देखा जा सकता था, पर मेरी हर गतिविधि बँगले से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर थी। मेरे छत की ओर इशारे कोई भी देख सकता था, अर्थ का अनर्थ बना सकता था।

"बढ़िया थे," बता कर मैं खिड़की से पीछे हट गया। थोड़ी देर में महतोजी आ गए और उनके हाथों मैंने प्लेट और रुमाल वापस भिजवा दिया।

उस सप्ताह के अंत में दौरे से लौटने पर मुझे ज़ीने के पास ईंटों का ढेर दिखा। सुबह मज़दूर और राजमिस्त्री आ गए और ज़ीने के ऊपर पानी का टैंक बनाने का काम शुरू हो गया। एक घण्टे में मृणमय अपने तीनों बच्चों के साथ काम का मुआयना करने आया।

"अब आपका पानी का प्रॉब्लेम सॉल्व हो जाएगा। गर्मी में थक कर वापस आएँगे और शावर के नीचे पाँच मिनट ही खड़े हो जाएँगे, तो कितना रिलीफ़ मिलेगा!" उसने कहा।

उस सुखद कल्पना से मेरे होठों पर मुस्कान आ गई, और मुझे मुस्कुराते देख पापा के पीछे छुपी मुग्धा भी मुस्कुरा उठी। मृणमय ने ताड़ लिया कि मैं उसकी बेटी को देख रहा हूँ, बोला, "यह तो पीछे पड़ गई हैअभी टंकी बनवाओ, अभी पानी लगवाओ! एक महीने से हम इधर थे ही नहीं, कल फिर चले जाएँगे आफ़िस के प्रोजेक्ट में," वह फिर सफ़ाई देने लगा। अन्त में बोला, "देखिए, ये सब काम बिना किसी के सुपरविज़न के होता नहीं है। ऐसा करिएगा, अपनी टेबिल-चेयर यहीं बाहर छोड़ दीजिएगा। मानस यहीं बैठ कर एक्ज़ाम की तैयारी भी करता रहेगा और काम पर भी नज़र रख लेगा। क्यों बेटा?"

उसके बेटे, मानस, ने गर्दन हिलाई। वह मुग्धा से साल-दो साल छोटा रहा होगा।

मैंने भी हामी भरी। और चारा भी क्या था? थोड़ी देर बाद मृणमय तीनों बच्चों के साथ ज़ीना उतरने लगा। मुग्धा सबसे पीछे हो गई। उसने उतरते-उतरते मेरी ओर एक मुस्कान उछाली। मैं भी मुस्कुरा दिया। एक हफ़्ते में पानी जो आने वाला था! महतोजी भी आह्लादित हुए, "सुबह-शाम चार-चार बाल्टी पानी चढ़ा-चढ़ा कर कंधा दर्द कर जाता था," उन्होंने पहली बार अपने दिल का भेद खोला।

टैंक उस सप्ताह बन कर तैयार हो गया। पर टैंक बनना एक बात होती है, उससे पानी आना दूसरी। जब तक टैंक की क्योरिंग न हो जाए और पम्प फ़िट न कर दिया जाए, उससे पानी नहीं आ सकतामुझे कठोर वास्तविकता का पता लगा।

"बाबा के प्रोजेक्ट से वापस लौटने पर उन्हें पम्प लगवाने को कहेंगे," मुग्धा का कथन था। मुझे गम्भीर होते देख बोली,"आप जब नहीं होते हैं, तो न आपके गाने की आवाज़ आती है, न आपके टेप की। उधर बाबा नहीं, इधर आप नहीं। बड़ा सूना-सूना लगता है!" फिर कुछ सोचती हुई बोली, "आपकी गानों की पसन्द कितनी अलग है! इतना अच्छा कैसे गा लेते हैं आप? हर सिंगर की आवाज़ मिला लेते हैं! आपको 'निकाह' के गाने आते हैं? पता है, हमको लोग सलमा आगा कहते हैं कॉलेज में। हम क्या सचमुच सलमा आगा जैसे दिखते हैं?" उसने बड़ी मासूमियत से मेरे चेहरे पर दृष्टि टिका दी।

"'निकाह' की सलमा आग़ा में मुझे बड़ा नक़लीपन लगता है। दुखी औरत को मेकअप करने की परवाह होती है? हो सकती है? और सलमा आग़ा की ही बात क्यों करें, क्या सचमुच कोई जेलर 'शोले' के असरानी-जैसा बेवक़ूफ़ हो सकता है? क्या तीन लोगों का ब्लड एक साथ कलेक्ट कर उसी समय रेसिपियेन्ट को चढ़ाया जा सकता है, जैसे 'अमर अकबर एन्थनी' में दिखाया गया है? 'तोहफ़ा' के जीतेन्द्र की तरह सफ़ेद पैंट पहन कर कितनी देर कीचड़ में नाचा जा सकता है? इक्का-दुक्का को इग्नोर करो, तो यह फ़िल्में हमें झूठ परोसती हैं, और हम उस झूठ की छाया अपनी ज़िन्दग़ी में तलाशने लगते हैं, उसकी झलक पाकर ख़ुश होने लगते हैं ..." मैं बोलता गया और मुग्धा हैरत-भरी मुस्कान के साथ मेरा मुँह ताकती रही।

मुझे वहाँ रहते तीन महीने गुज़र चुके थे। वैसे तो मैं दौरों पर ही रहता, पर जो एक-दो दिन भी वहाँ गुज़ारता, उनमें मुग्धा मेरे पास ज़रूर आती। वह मेडिकल कॉलेज के पहले वर्ष में थी। कभी-कभी मेडिकल साइंस के बारे में बताती। मेरे पल्ले कुछ न पड़ता। मैंने उसे बता दिया कि मेरी माँ भी मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थीं, लेकिन मुझे ख़ून से खेलने की जगह ग्रीज़ से खेलना, और उससे भी ज़्यादा स्याही से खेलना, पसन्द था।

"लेकिन आप इतना टूर क्यों करते हैं? मुश्किल से एक दिन रह पाते हैं घर में!" उसकी जिज्ञासा थी।

"भाई काम है, तो काम तो करना पड़ेगा न?"

"क्यों, आपके बॉस इतने स्ट्रिक्ट हैं?"

"बॉस तो बाद में देखेगा, पहले तो मैं ही देखता हूँ न? कोई भी काम करो तो इतनी अच्छी तरह से करो कि उससे बढ़िया करना पॉसिबल ही न हो। अगर फ़र्श पर पोंछा मारना हो तो ऐसे मारो, कि लोग कहें, 'वाह! क्या पोंछा मारा है!' अगर कपड़े धोओ तो ऐसे धोओ कि लोग कहें, 'वाह! क्या कपड़े धुले हैं।' इलाज करो तो ऐसे करो कि लोग कहें, 'वाह! क्या डॉक्टर है!' टाल-मटोल करना ठीक नहीं।"

"शादी करो तो ऐसे करो कि लोग कहें, 'वाह! क्या शादी की है!'" बोल कर वह हँसती-हँसती भाग गई। 

दिन बीतते गए। आख़िर एक दिन पम्प भी लग गया और टैंक में पानी गिरने की मधुर छटकार भी सुनाई पड़ी। उस दिन नहाने में इतना आनन्द आया कि क्या बताऊँ! बाहर निकले दो मिनट भी नहीं हुए होंगे कि मुग्धा आ धमकी। मुहल्ले में किसी शादी में लाउडस्पीकर पर बज रहे गीत की आवाज़ आ रही थी, "एक राधा, एक मीरा"

मुग्धा बोली, "यह गाना गाना आसान नहीं।"

मैंने हामी भरी। वैसे मेरे विचार में उस गाने को बेवजह क्लिष्ट बना दिया गया था। अगर तानें और मुरकियाँ कम डाली गई होतीं, तो गाना ज़्यादा कर्णप्रिय हो सकता था।

"आप क्या सोचते हैं? राधा और मीरा के प्यार में क्या अन्तर है?"

"देखो, राधा सचमुच थीं या कोरी कल्पना की उपज हैं, मुझे नहीं पता। अलबत्ता, मीरा सचमुच इस दुनिया में थीं! कल्पना और वास्तविकता की तुलना करना ठीक नहीं।"

"मीरा मैरिड थी, फिर भी अपने हसबैण्ड को इग्नोर करके 'कृष्ण-कृष्ण' कहती रहती थी। यह न कृष्ण के लिए ठीक था, न उसके हसबैण्ड के लिए, और न ही मीरा के लिए।"

"मैरिड होने से पहले मीरा इंसान थीं। इंसान को भले बाँध लें, उसके मन को नहीं बाँध सकते।"

"लेकिन पति के होते किसी और से प्यार ..."

"हम बड़ी जल्दी मन की लगन को प्यार की अलग-अलग कैटेगरी में डाल देते हैं। 'यह' प्यार ठीक है, 'वह' प्यार ग़लत! इसीलिए प्यार छुपाया जाता है, जबकि नफ़रत का ढिंढोरा पीटा जाता है।"

मुग्धा मुझे बड़े घ्यान से देख रही थी, जैसे मेरा एक शब्द भी न सुनने से उसका भारी नुकसान हो जाएगा। बोली, "लेकिन, प्यार तो अलग-अलग ही होता है न! भाई का प्यार अलग है, माँ का अलग ..."

"क्यों? प्यार को कैटेगराइज़ किए बिना काम नहीं चलेगा? यह प्यार की कमज़ोरी नहीं है, हमारी अपराध-भावना है। जानवरों से प्यार करने पर तो हम नहीं कहते कि हम 'इसे' कुत्ते की तरह प्यार करते हैं और 'उसे' बिल्ली की तरह? फिर आदमियों को प्यार करने पर यह लिमिटेशन क्यों आ जाती है? प्यार तो प्यार होता है। मीरा ने वही किया। लोगों ने उसे ग़लत-सही ठहरा दिया।"

"हूँ ..."

वह कुछ कहती, उससे पहले मैंने उसे इशारे से रोक कर आगे कहा, "शायद अपराध-भावना इसलिए आती है कि आदमी की नीयत ठीक नहीं होती। वह पहले से ही एक एंड-रिज़ल्ट सोच कर, एक टाइम-फ़्रेम लेकर, चलता है। उसे सच्चा प्यार होता ही नहीं! अगर किसी से सच्चा प्यार है तो उसकी कल्पना करो। फिर यह कल्पना करो कि वह बदसूरत हो गया है या हो गई है, उसके कपड़े फट चुके हैं, उसके बाल झड़ गए हैं। क्या तब भी तुम्हें उससे उतना ही प्यार है? और आगे बढ़ो। उसके शरीर से चमड़ी हटा दो। जगह-जगह लाल-लाल माँस दिखने दो, ख़ून रिसने दो। अगर तुम्हारे प्यार में कमी होती है तो वह प्यार था ही नहीं। अब अगली स्टेज पर आओ। उस आदमी को सिर्फ़ हड्डियों का ढाँचा, कंकाल-भर, रह जाने दो। क्या अब भी तुम्हें उससे प्यार है? अगर है, तो शायद तुम्हारा प्यार सच्चा है। लेकिन आख़िरी स्टेज अभी बाक़ी है। अब उस आदमी को ही ग़ायब कर दो। जो प्यार उस समय भी तुम्हें मदहोश रखे, वहीं सच्चा प्यार है। बाक़ी सब ढोंग है।"

मुग्धा चुपचाप मेरी ओर देखती रही, कुछ बोली नहीं। फिर धीरे से उठी और चली गई। मैं भी महतोजी के आने का इंतज़ार करने लगा। भूख जो लग आई थी।

टैंक के पानी से नहाने का मेरा सुख गर्म रेत पर ओस की बूँद-जैसा अल्पजीवी निकला। नल फिर सूख गए और महतोजी को बाल्टियाँ भर-भर कर लाने की क़वायद दोबारा शुरू करनी पड़ी। मृणमय ने इस बार भी सफ़ाई दी, पर मेरा मन पूरी तरह खट्टा हो चुका था। मैंने महतोजी को दूसरा घर तलाशने को कहा, भले ही उसका किराया दोगुना ही क्यों न हो।

दौरे से वापस लौटने पर महतोजी ने ख़ुशख़बरी दी। घर मिल गया था। अगले दिन ही मैंने घर बदल लिया। मृणमय ने कोई झंझट नहीं किया।

दस दिनों के बाद दफ़्तर में मुग्धा की चिट्ठी मिली। उसने मेरे यूँ अचानक चले जाने पर दुःख प्रकट किया था। कहा था कि उसका मन किसी चीज़ में नहीं लग रहा, पढ़ाई में भी नहीं, और इस वजह से क्लास में कई बार उसका मज़ाक़ बनाया जा चुका है। मैंने पत्र का उत्तर नहीं दिया। एक झूठे और मक्कार बाप की बेटी से मैं सम्बन्ध नहीं रखना चाहता था। उसका फ़ोन भी आया ऑफ़िस में एक-दो बार, पर मैं हमेशा बाहर ही था। हमारी बात न हो सकी।

हमारा सम्पर्क टूट गया।

मैं मुग्धा को हरग़िज़ याद न करता, अगर मेरे एक मित्र ने उसका ज़िक्र न छेड़ दिया होता। वह डॉक्टर है। कुछ महीने पहले मैं उसके पास बैठा था। बातचीत के दौरान उसने कहा, "एक दिन मुझे तुम्हारी रचना इतनी अच्छी लगी कि मैंने अपनी कलीग को भी उसके कुछ हिस्से सुना दिए। वह बड़ी सीरियस टाइप की है, लेकिन लिटरेचर और म्यूज़िक में इंटरेस्ट है उसका तुम्हारी तरह। बातों-बातों में पता लगा, वह तो तुम्हें जानती है। शादी से पहले तुम जिस घर में रहते थे, उसी के मकानमालिक की लड़की है वह!"          

"अच्छा! क्या नाम है उसका?" मैंने पूछा।

"मुग्धा मजुमदार!"

"मजुमदार? मजुमदार तो उसके बाप का नाम था!"

"शादी नहीं हुई है उसकी। हम डॉक्टर तुम इंजीनियरों की तरह थोड़े ही हैं कि फटाफट शादी कर लें!"

बात सच थी। डॉक्टरों को व्यवस्थित होने में ज़्यादा समय लगता था उन दिनों। मेरा मित्र मेरी उम्र का था पर सतरह-अठारह साल पहले ही गृहस्थी जमा सका था, जबकि मैं दो बच्चों का बाप बन चुका था, कई शहरों में काम कर चुका था, और पाँच नौकरियाँ बदल एक ऊँचे ओहदे पर पहुँच चुका था।

आज सुबह मैं मुग्धा के शहर आया था एक सेमिनार में प्रेज़ेन्टेशन देने। सेमिनार चार बजे समाप्त हो गया, और मेरी वापसी का प्लेन अगले दिन दोपहर बारह बजे था। अपने पुराने दफ़्तर गया तो पता चला, वह ब्रांच बन्द हो चुकी है। टहलते-टहलते मैं अपना पुराना घर देखने चला आया। रास्ते में बहुत कुछ बदला दिखा। परचून की दुकानें, चाय के टप्पर, ऑटो स्टैण्डसब की जगह बड़े-बड़े स्टोर खुल गए थे। लेकिन, मुख्य-सड़क अब भी वही पुरानी थी, कई मकानों ने अब भी चोला नहीं बदला था। हाँ, मेरे पुराने घर के सामनेवाले अहाते में एक पाँच-मंज़िला मकान बन गया था जिसकी वजह से वह घर अब सड़क से दिखाई नहीं देता था। बगल में ऊँची इमारत बन जाने से मृणमय का बँगला बौना दिखने लगा था। उसके दरवाज़े के पास दो नेमप्लेट लग गई थीं जिनका ज़िक्र मैं पहले ही कर चुका हूँ।

हिचक पर किसी तरह क़ाबू पाकर मैंने कॉलबेल का स्विच दबाया। दरवाज़ा खुलते ही मैं अचकचा गया। मेरे सामने मानस खड़ा था। वही पंद्रह-सोलह साल का मानस, जो कभी टैंक कन्सट्रक्शन का सुपरविज़न करने के लिए मेरे घर की खुली जगह में बैठा करता था, बाद में जिसने दोपहर में वहाँ बैठने की आदत बना ली थी पर जो मेरे घर लौटने से पहले भाग जाया करता था, जो वहाँ टॉफ़ियों के रैपर बिखरा के चला जाता था।

"मानस?" मेरे मुँह से निकल पड़ा।

"पापा से काम है आपको?" वह निश्चय ही मानस का बेटा था।

अपने को सँभालते हुए मैंने कहा, "दरअसल, मैं डॉक्टर मुग्धा से मिलने आया हूँ।"

"बुआ मरीज़ नहीं देखतीं।"

"ओह! पर मैं मरीज़ नहीं हूँ।"

"सर्टिफ़िकेट चाहिए आपको?" उसने मुझे ग़ौर से देखा।

"अरे नहीं, बेटा। उनसे कहो कि गौतम मजुमदार आए हैं।"

"अच्छा! आप यहीं रुकिए," कह कर, 'गौतम मजुमदार, गौतम मजुमदार' दोहराता वह अन्दर चला गया। मैं बाहर सीढ़ियों पर खड़ा इन्तज़ार करने लगा। अगल-बगल से बच्चों के खेलने की आवाज़ें आ रही थीं। बीच-बीच में उनकी माँओं का अस्पष्ट स्वर सुनाई पड़ता। कहीं टेलिविज़न भी चालू था। छब्बीस वर्षों ने आवाज़ों को कितना बदल दिया था! न लाउडस्पीकर पर गाने सुनाई दे रहे थे, न फेरीवाले हाँक लगा रहे थे, और न ही मवेशियों की पुकार सुनाई दे रही थी।

तीन-चार मिनट बाद उस लड़के ने आकर दरवाज़ा खोला।

"आइए," वह मुझे बैठक से सटे एक छोटे-से कमरे में ले जाकर बोला, "बैठिए, बुआ आ रही हैं।"

उसने ट्यूबलाइट का स्विच ऑन किया, और समय व्यर्थ किए बिना बाहर निकल गया।

ज़ाहिर है कि वह कमरा कभी मरीज़ों की जाँच करने के काम में आता होगा, पर अब उसका इस्तेमाल ग़ैर-ज़रूरी बातों के लिए किया जा रहा था। कमरे में डॉक्टर की मेज़ तो थी, पर उसके पीछे की रिवॉल्विंग कुर्सी नदारत थी। दूसरी ओर लकड़ी की दो कुर्सियाँ पड़ी थीं। मरीज़ की काउच पर कपड़ों का गट्ठर रखा था। आलमारी में दवाओं के डब्बों और मेडिकल औज़ारों के साथ अधफटा लूडो और पुराने फ़ोन दिख रहे थे। कमरे के कोने में क्रिकेट का बल्ला पड़ा था। दीवार पर लटके मेडिकल चार्ट पर बच्चे के हाथ से खींची आड़ी-तिरछी रेखाएँ नज़र आ रही थीं। ट्यूबलाइट के पास एक छिपकली सो रही थी। न जाने किस दिन या रात तीन बज कर सात मिनट तक समय दिखाने के बाद दीवार घड़ी पस्त होकर बन्द हो चुकी थी।

मुग्धा चुपचाप अन्दर दाख़िल होकर एक कुर्सी पर धप्-से बैठ गई। उसने कुर्सी के हत्थे इतनी मजबूती से थाम लिए जैसे सहारा हटते ही वह गिर पड़ेगी। थोड़ी देर फ़र्श की ओर देखती रही, फिर धीरे से सिर उठा कर पूछा, "आप यहाँ कैसे?"

छब्बीस साल में इन्सान इतना थक सकता है कि उसका अंग-प्रत्यंग शिथिल हो जाए, उसकी आवाज़ में रत्तीभर खनखनाहट भी बाक़ी न रहे, उसकी आँखों में जाले उतर आएँ, और उसे मामूली-से-मामूली हरक़त के लिए भी इतनी मशक्कत करनी पड़े? मैं दंग रह गया। यह मुग्धा उस मुग्धा की परछाँई भी नहीं थी जो गिलहरी की तरह बिना आवाज़ किए ज़ीने की सोलह सीढ़ियाँ एक साँस में चढ़ जाती थी, जिसके होंठ ही नहीं आँखों के कोने भी मुस्कुराते थे, जिसकी छल्लेदार बातों का अन्त ही नहीं होता था, जिसकी रग-रग से उम्मीद और ज़िन्दग़ी छलकती थी। 

ख़ुद पर क़ाबू पाने में मुझे कुछ समय लगा। मैंने दूसरी कुर्सी पर पड़ी किताबें मेज़ पर रखीं, कुर्सी को थोड़ा दूर खिसकाया, उस पर बैठने में सामान्य से अधिक समय लिया, और इतना कुछ करने के बाद ही उसे दोबारा देखने की हिम्मत जुटा पाया, "एक सेमिनार में आया था।"

"हो गया?" उसकी मुट्ठियाँ ढीली हुईं।

"हाँ! कल वापस जा रहा हूँ।"

थोड़ी देर चुप्पी रही। मैं अपने नाख़ूनों का मुआयना करता रहा, मुग्धा कुर्सी के हत्थों पर तर्जनी फिराने लगी।

"अचानक आना हुआ, सो ख़ाली हाथ चला आया," मैंने सफ़ाई दी।

"आप पहले ही कब कुछ लाते थे?" उसकी आँखों के जाले साफ़ होने लगे, दाहिना हाथ कुर्सी के हत्थे की ग़िरफ़्त से आज़ाद हो गया। "मंगल की शादी में पैकेट लेकर आए और वापस ले गए। सब समझे गिफ़्ट देना भूल गए, पर हम जानते थे, पैकेट में आपका लंच-बॉक्स था," उसने चिर-परिचित अंदाज़ में हाथ हिलाया।

बात सच थी। मंगल मेरेवाले सेट के नीचे बने कमरों में रहता था। उससे मेरी मामूली जान-पहचान तक नहीं थी। मुग्धा के इसरार की वजह से मैं शादी में बस बधाई देकर चला आया था। मुझे जाते देख उसने रोका था, पर मैंने मुग्धा की एक न सुनी थी।

मैंने झेंप मिटाने को प्रतिवाद किया, "तुमने भी पकौड़ों के सिवाय कब कुछ खिलाया?"

"आप जब भी घर आते थे, हमारी बनाई चाय ही पीते थे।"

"मैं समझता था कि वह चाय तुम्हारी नौकरानी बनाती थी!"

"वह बड़ी फीकी चाय बनाती थी। वह जो आपके वहाँ आते थे न ... क्या नाम था उनका ... जो खाना लाते थे ... " उसने मेरे चेहरे पर एक पल नज़रें गड़ाईं, और फिर झुका लीं। 

"महतोजी?"

"हाँ, महतोजी से पता चल गया था कि आप टप्परवाली उबली, कड़क, चाय पीते हैं। राधा को समझाने से बेहतर था, कि हम ख़ुद ही बना दें। आपके साथ बाबा भी कड़क चाय पी लेते थे, वर्ना उनकी चाय हमेशा पतली होती थी। बड़े ज़िद्दी आदमी थे, सिर्फ़ हमारी सुन लेते थे कभी-कभी। अम्मा भी डरती थीं उनसे। अब तो दोनों ही नहीं रहे।" उसकी आवाज़ दोबारा धीमी हो गई।

मैं थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोला, "यह लड़का ... मानस का है न?"

"हाँ! मानस अभी घर पर नहीं है। साढ़े-सात पौने-आठ तक आएगा।" वह बाएँ हाथ की तर्जनी पर दुपट्टे का छोर लपेटने लगी।

"और मालती?"

"नाम सबके याद हैं आपको! मालती शादी कर के पूना चली गई। दो बच्चे हैं उसके," उसने कुर्सी के हत्थे फिर जकड़ लिए।

"वाह! नाम कैसे नहीं याद होंगे। मालती अमिया कुतर-कुतर कर छिलके घर के सामने बिखेर जाती थी, और मानस टॉफ़ी के रैपर फेंक जाता था।"

वह अप्रत्याशित रूप से हँस पड़ी, "मानस और मालती बड़ी अच्छी नक़ल उतारते थे आपकी। मालती डिट्टो आप-जैसे चलती थी, और मानस आपकी तरह चश्मा लगा कर दूर ताकते हुए अंग्रेज़ी में कुछ-कुछ बोलता था। माँ मज़ा भी लेती थी, फिर डाँट भी देती थी। माँ को बहुत पसन्द थे आप। 'दस मिनट मिल कर आजा,' बोल कर भेज दिया करती थी आपके पास, और फिर देर होते ही ख़ुद ही घबराने लगती थी'इतनी देर क्यों लगा दी? क्या कर रही थी?' एक-एक बात खोद-खोद कर पूछे बिना चैन नहीं पड़ता था उसे। हमें भी मज़ा आता था। उसी बहाने हर पल को दोबारा जी लेते थे।"

"और बाबा?"

"वे आप से बहुत इम्प्रेस्ड रहते थे। मानस को बोलते थे, 'देखो! ऐसे डिसिप्लिन से रहना चाहिए। बेचारा अकेला रहता है, अच्छा कमाता है, लेकिन मज़ाल है कि सिगरेट-शराब को हाथ भी लगाए? लड़कियाँ ताके? घर आता है तो दाएँ-बाएँ देखता तक नहीं। ठीक नौ बजे दफ़्तर चला जाता है, और टूर पर तो सुबह छः बजे ही निकल जाता है। आई आई टी ऐसे ही क्लियर नहीं होती! तपस्या करनी पड़ती है, तपस्या!'" बोलते-बोलते मुग्धा हँस पड़ी।

"वह जितना लेक्चर देते, मानस उतना ही चिढ़ता, लेकिन उन्हें पलट कर जवाब देने की हिम्मत नहीं थी उसमें। हम मन-ही-मन ख़ुश होते। अगली बार आपके घर जाते, तो आपके पास आने की कोशिश करते। लेकिन आपको तो जैसे करेंट लगता था हमसे, दो फ़ुट का डिस्टेंस हमेशा बनाए रखते थे। एक उँगली तक नहीं छुई!" उसके स्वर में गर्व और हताशा, हर्ष और विषाद, सब का पुट एकसाथ था।

"एक बार तुम वापस जाने का नाम ही नहीं ले रही थीं। शायद उस रात तुम्हारे माँ-बाबा किसी शादी में गए हुए थे ..."

"... और हम पेट-दर्द का बहाना कर घर में रुक गए थे।" मुग्धा ने बात काटी। "हमने सोचा था कि आपसे ख़ूब सारी बात करेंगे, पर आपका तो जैसे दस मिनट बाद अलार्म चालू हो गया था, "घर जाओ, घर जाओ!' हमने बताया भी कि कोई जल्दी नहीं है, पर आप काहे को समझते?"

"हाँ, आख़िर में तुम्हारे कंधे थाम कर वापस भेजना पड़ा था उस शाम, और फिर भी तुमने जाने में टाइम लिया था!" मैंने बात पूरी की।

मुग्धा का मुँह रक्तिम हो गया, सिर और झुक गया। दो क्षण की ख़ामोशी के बाद उसके होंठ काँपे, "बस, उस एक बार ही आपने हमें छुआ। अच्छा था कि हमारा मुँह दूसरी तरफ़ हो गया था, वरना आप पता नहीं क्या समझते! पूरा बदन गनगना गया था हमारा, चक्कर-सा आ गया था।" उसकी बाहों पर रोंए खड़े हो गए, पर वह बोलती गई, "दो घण्टे बाद माँ लौटी तो भाँप गई, कुछ हुआ है। जब हमने सच-सच बताया तो पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ, फिर ठठा कर हँसते हुए बोली, 'तुम लोग तो अशोक कुमार-देविका रानी के भी दादा-दादी निकले!' उसने दूसरे दिन बड़ी सीरियसनेस से कहा था, 'ऐसे लड़के भाग्य से ही मिलते हैं।'"

उसकी आँखों के जाले साफ़ हो चुके थे, उनकी गहराई नज़र आने लगी थी। ओढ़नी लपेटते-खोलते हुए उसने बात जारी रखी, "बाबा भी आपका मन टटोलने एक बार दो लोगों के साथ आपके वहाँ गए थे। आपने साफ़ कह दिया था कि आपकी शादी आपके माँ-बाप की मर्ज़ी से होगी। यह बात सुन कर बाबा बहुत ख़ुश हुए थे। 'कितना संस्कारी है!' बोले थे। लेकिन जब माँ ने आपके माँ-बाप से बात चलाने के लिए कहा, तो उन्होंने झड़प दिया था। उनका ख़याल था कि हमारी वजह से आप घर नहीं छोड़ेंगे, एक-न-एक दिन महतोजी बाल्टियों में पानी ले जाने से इन्कार कर देंगे, थक-हार कर आप हमारा बाथरूम इस्तेमाल करने पर मजबूर हो जाएँगे, और फिर वे अपने मन-मुताबिक़ हमारी शादी करवा देंगे। हमने बहुत मना किया, पर वह हमसब पर हावी हो जाते थे, सुनते ही नहीं थे, समझना ही नहीं चाहते थे। अंत में, जिसका हमको डर था, वहीं हुआ। आप चले गए, बिना बोले, बिना बताए।"

उसने एक पैर के अँगूठे को दूसरे पैर के अँगूठे से कुरेदा, ललाट से बाल हटाए, और मेरी आँखों में झाँक कर बोली, "हमारी छोड़िए, माँ भी टूट गई। मालती और मानस गुमसुम रहने लगे। हमने बाबा से बातचीत बन्द कर दी। एक बार सोचा कि आपके बॉस से बात करें, पर माँ ने मना कर दिया। बोली, 'अगर उसके दिल में तेरे लिए थोड़ी-सी भी जगह होगी तो एक-न-एक दिन ज़रूर लौट आएगा तेरे पास।' पर वह दिन नहीं आया। हम जीते-जी मर गए। इन्द्र की वजह से अहिल्या पत्थर बन गई थी, बाबा की वजह से हम अहिल्या बन गए। बाबा ने हमारा ब्याह तय करने की कोशिश की, पर हम मीरा नहीं बनना चाहते थे। जब मन-ही-मन आपको अपना लिया, तो किसी दूसरे के लिए जगह कैसे बनाते? आप कहते थे न, कोई भी काम करो तो ऐसे करो कि उससे अच्छी तरह करना पॉसिबल ही न हो। बेगारी कैसे टालते? बाबा ने जब बहुत ज़ोर डाला तो हमने अल्टिमेटम दे दिया हिस्टरेक्टमी करवाने का।"

मुग्धा का प्रेम इतना गहरा होगा, मुझे पता न था। काश! मैंने उसे पहले ही समझा दिया होता। लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी थी। बात साफ़ थी कि वह डिप्रेस्ड थी। मुझसे मिल कर इतना कुछ बोल पा रही थी, वही बहुत था। मैं सोच में डूब गया।

"आप किस सोच में पड़ गए? आज इतने साल बाद मिले हैं, हम आपके लिए टप्परवाली चाय लाते हैं।" वह जल्दी-से बाहर निकल गई। मैं हैरान था! बीस मिनट में ही उसकी चाल में ज़मीन-आसमान का फ़र्क आ गया था।

"दीदी, तुम रसोई घर में क्या कर रही हो? डॉक्टर ने अकेले रसोईघर में जाने से मना किया है न?" एक पुरुष स्वर उभरा। शायद मानस घर आ गया था। बाहर से दबी-दबी आवाज़ें आती रहीं, और फिर मुग्धा चाय की ट्रे लेकर मुस्कुराती हुई अन्दर आई।

"मानस आ गया है। आपसे मिलना चाह रहा था। हमने कहा, पहले हाथ-मुँह तो धो ले," उसने चाय का प्याला पकड़ाते हुए कहा।

चाय टप्परवाली ही थी। वैसी ही, जैसी वह छब्बीस साल पहले बनाती थी।

"तुम नहीं लोगी?" मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।

वह खड़ी रही, "हम कहाँ चाय पीते हैं!" फिर आवाज़ धीमी करते हुए कातर स्वर में बोली, "यह तो नहीं कह सकते कि आप हमारे कन्धे एक बार फिर छुएँ, पर, टु बी फ़ेयर, हमको भी तो आपको छूने का मौक़ा एक बार मिलना चाहिए न?" कहते-कहते वह मेरी बगल से होते हुए पीछे चली गई। उसने मेरी गर्दन को स्पर्श किया। सिहरने की बारी अब मेरी थी। मैंने चाय का प्याला दोनों हाथों से सम्भाल लिया। मेरी गर्दन पर ठंडक के साथ चुभन-सी हुई।

"दीदी, ये क्या किया तुमने?" मानस ने अंदर प्रवेश करते हुए कहा।

"डर मत, हम इनका कुछ बुरा कर सकते हैं भला?"

मेरी आँखें मुँद रही थीं, पर गूँजती ध्वनियाँ अब भी सुनाई पड़ रही थीं।

"तो यह सब क्या है?"

"तुम हमारा मज़ाक़ उड़ाते थे न कि हमारे पति हमें भूल चुके हैं? देखो, छब्बीस साल बाद भी ये हमें नहीं भूले। आज इनके हाथ से अपनी माँग भर कर सबका मुँह हमेशा के लिए बन्द कर देंगे। हाँ, हमारे भी पति हैं, हम भी ब्याहता हैं। हम अहिल्या नहीं हैं, हम मीरा नहीं हैं, हम भी एक गृहस्थ औरत हैं ..."

"यह क्या कर रही हो दीदी? जानती हो, यह जुर्म है। होश आने के बाद अगर इसने पुलिस में रिपोर्ट कर दी तो हम सब अंदर हो जाएँगे।"

"तुम इन्हें नहीं जानते। हमने ऐसे ही इनका व्रत नहीं लिया। इनमें अपार धैर्य है। ये विष पीकर चुप रहनेवाले शिव हैं। बर्दाश्त कर लेंगे पर मर्यादा नहीं लाँघेंगे। सुन, हमने नींद की दवा खा ली है, सोने जा रहे हैं। बीस मिनट में इन्हें पूरा होश आ जाएगा। चाय गर्म कर के पिला देना, और बाथरूम ले जाने के बाद होटल छोड़ देना।"

मुझे होश आने के बाद मानस ने वैसा ही किया जैसा उससे कहा गया था। मैंने बाथरूम में जाकर देखा, मेरी उँगलियों में सिंदूर लगा था। मैंने एक पेपर नैपकिन में उँगली अच्छी तरह पोंछी, और नैपकिन फेंकने की बजाय जेब में सम्भाल कर रख लिया। उसी सिंदूर से तो अहिल्या ने अपना उद्धार किया था!

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अपंग की होली

    होली है परसों, फिर माँ को जल्दी उठना होगा

सेठ दुअन्नीमल के घर पर फिर एक जलसा होगा

 

सुबह की निकली माँ जब अपने घर वापस आएगी

उसके मैले कपड़ों से मेहनत की बू आएगी

 

घर के टूटे छप्पर में से चाँद झलकता होगा

ढिबरीवाला आला फिर से धुआँ उगलता होगा

 

माँ खोलेगी डब्बा, देगी जूठा भात, कढ़ी, सब्ज़ी,

टुकड़ा एक पुए का जिसमें रमता होगा देसी घी

 

पाँव घिसटता मैं चौकी के कोने तक आऊँगा

माँ की आँखों में देखूँगा, उसके हाथों से खाऊँगा

 

अगर हाथ चलते मेरे तो मैं भी माँ कुछ करता

और नहीं कुछ तो माँ आख़िर अपना पेट तो भरता

 

पाँव सलामत होते तो मैं भी कुछ कर पाता

वज़न उठाता, हाँक लगाता, कारीगर बन जाता

 

रंगों की दो पुड़ियाँ होली पर चुपके से लाता

पीछे से आ कर माँ मैं तुझको सराबोर कर जाता

 

अपनी भी होली में अम्मा होती ख़ूब ठिठोली

                                   मन मसोस कर न रहता कि ये होली भी हो ली

आमंत्रण

 घर छोटा था।

न, घर कहाँ छोटा-बड़ा होता है? वह छोटा या बड़ा हो ही नहीं सकता! आकार तो स्थूल चीज़ों का होता है, और घर भी भला कोई स्थूल वस्तु है? वह तो एक विचार है, एक मान्यता है, एक कल्पना है। आदमी चाहे, तो दिल-जैसे छोटे से अंग में भी घर बना-बसा सकता है; न चाहे, तो विशालयकाय हवेली में भी अकेला महसूस कर सकता है। निपट अकेला।

तो, शुरुआत ही ग़लत हो गई। चलिए, फिर से शुरू करते हैं।

मकान छोटा था।

हाँ, यही ठीक रहेगा। वैसे, मकान-भी क्या था, बस दो कोठरियों, आँगन, रसोईघर-भंडार-वगैरह को एक जगह इकट्ठा कर देने की ऐसी जुगत थी, जैसे अधमँजे कलाकार पाँच मिनट की अल्पावधि में ही आलाप, जोड़, झाला, गत वगैरह सब प्रस्तुत कर खिसक लेते हैं। वर्षों से छत का बोझ सँभाले बूढ़ी दीवारों में जगह-जगह टपके पलस्तर ने छिपकलियों के लिए आश्रयस्थलियाँ रच दी थीं, सड़े पाइप पानी में ज़ंग की सुर्ख़ी मिला कर अपना दुख बयान किया करते थे, दरवाज़ों-खिड़कियों के पल्ले चौखट पर जड़े ख़स्ताहाल क़ब्ज़ों से चमगादड़ों की तरह झूलते थे, और हर बरसात में आँगन की हरी-काली काई में मेंढ़क उछलते और केंचुए रेंगते रहते थे।

हालात हमेशा ऐसे नहीं थे। बारह वर्ष पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद मुकुन्द बड़ी उम्मीद के साथ अपने इस पुश्तैनी मकान में आ जमे थे। उन्हें और उनकी पत्नी, लीला, को यहाँ आकर बड़ा आनंद मिला था। बसने से पहले जमा-पूँजी का एक अहम हिस्सा न्योछावर कर उन्होंने हर संभव मरम्मत करवाई थी, रंग-रोगन से हर कोने को चमकाया था, “स्वर्गादपि गरीयसी” की अवधारणा को जामा पहनाया था, और जीवन के आख़िरी पड़ाव का अंतिम घर बसाया था। उस समय उन्होंने यह नहीं सोचा था कि पचास-साल पुराने मकान के रखरखाव पर हर महीने-दो महीने हज़ार-दो हज़ार रुपए ख़र्च न किए जाएँ, तो वह बिगड़ैल कर्मचारी की भाँति हाथ-से-बाहर हो जाता है।

मुकुन्द भी बिगड़ैल कर्मचारी से कम थे क्या? उनमें अकड़ न होती, यदि उन्होंने लोक-व्यवहार और मान-मर्यादा के निर्वहन पर ज़रा-सा भी ध्यान दिया होता, अगर उन्हें अपनी सफलता की रत्ती-भर भी चिन्ता होती, तो क्या उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने पर मजबूर किया जा सकता था? वे कुशल अघिकारी थे, दो-चार सेवा-विस्तार तो चुटकी बजाते पा सकते थे। ऊपरवालों की कृपा रहती, तो सत्तर-पचहत्तर बरस तक नौकरी में टिके रहना भी क्या मुश्किल था? लेकिन वे तो बने ही अलग मिट्टी से थे। ऊपर पैसे पहुँचाना तो दूर, मंत्रियों-नेताओं का झूठा गुणगान तक उन्हें नागवार लगता था। हरिश्चन्द्र के बाद सत्य-धर्म निभाने का ठेका सीधा उन्हीं की झोली में आकर गिरा था जैसे। नीचे के पदों पर उनका यह अनुशासनहीन रवैया ढँका-छुपा रहा, पर सचिव बनने के बाद भी जारी उदासीनता एक दिन उन्हें मंत्रीजी के निजी कार्यालय के कठघरे तक खींच ले गई थी। उनकी ईमानदारी की प्रशंसा करने की औपचारिकता के बाद उनसे अर्थशास्त्र का ज्ञान साझा किया गया था, दलगत वित्तीय आवश्यकताओं की चर्चा की गई थी, देश की आज़ादी के बाद निजी आर्थिक स्वाधीनता की महत्ता पर ज़ोर दिया गया था, और अंत में स्पष्ट शब्दों में चालचलन सुधारने या नौकरी छोड़ने की धमकी दी गई थी।

मुकुन्द चिकने घड़े थे, चालचलन क्या सुधारते! आदर्शों को सूली पर लटकाने की कोई मजबूरी भी नहीं थी उनके सामने। दोनों लड़के पढ़ाई पूरी कर विदेशों में बस चुके थे। पत्नी और ख़ुद की गुज़र-बसर के लिए उनकी पेंशन काफ़ी होती। ऊपर से, वे एक ऐसी रक़म बैंक में जमा कर चुके थे जो उन्हें बेटों की मदद के बिना भी छोटी-बड़ी परेशानियों से उबारने के लिए पर्याप्त होती। सेवा विस्तार में उनकी दिलचस्पी न थी, नौकरी के बचे-खुचे तीन वर्षों में वे हर वह साधन जुटाने वाले थे जो सादा किंतु सम्माननीय बुढ़ापा काटने के लिए ज़रूरी होता।

लेकिन उनकी इच्छा उनके मन में ही दबी रह गई थी। परिस्थितियाँ ऐसी विकट होती गईं कि मुकुन्द ने साधन एकत्रित करने की योजना ताक पर रख स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आलिंगन कर लिया था। उन्हें आकस्मिक सेवानिवृत्ति से कोई शिकायत नहीं हुई थी, बल्कि आत्मसम्मान अक्षुण्ण रख पाने की सफलता से प्रफुल्लित पति-पत्नी जीवन के उस नए खंड का भरपूर आनंद लेने की चेष्टा में संलग्न हो गए थे।

पर वह आनंद एक-दो महीने में ही सीले पटाखे की तरह फुस्स हो गया था। मुकुन्द की पेंशन इंद्रजाल का रहस्य बन गई थी। काग़ज़ी तौर पर तो सबकुछ दुरुस्त था, सम्बन्धित अधिकारी तरह-तरह के आश्वासन भी देते थे, पर न जाने वह कौन-सा राहु था जो मुकुन्द की पेंशन मिलने की हर संभावना को अंतिम क्षण में ग्रस लिया करता था। बारह साल बाद भी वे ग्रहों की प्रतिकूल दशा का प्रतिकार नहीं कर सके थे, और बैंक खाते से उपजे मामूली ब्याज पर निर्भर थे। रोज़मर्रा के ख़र्च के लिए बेटों से मदद लेना उनके स्वभाव में नहीं था, न ही उनके घर जाकर बसना उनकी ग़ैरत को मन्ज़ूर था। इस सबका नतीजा वही था जो आपको पहले से ही मालूम है: वे उस टूटते घर में जीवन काटने को मजबूर थे।

सहकर्मी तो उनके कार्यकाल में ही कतराने लगे थे, धीरे-धीरे सम्बन्धियों और पुराने मित्रों ने भी मुकुन्द और लीला को उनके हाल पर छोड़ दिया था। अलबत्ता, चित्रा ने नाता नहीं तोड़ा था उतनी जल्दी। एक ही तो बहन थी उनकी। वे मुकुन्द, अर्थात कृष्ण थे, तो उनकी छोटी बहन थी चित्रा, यानी सुभद्रा। छोटी भी ऐसी-वैसी नहीं, पूरे दस बरस का अन्तर था भाई-बहन की उम्र में। उसके ब्याह और गृहस्थी बसाने में मुकुन्द और लीला ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। बाद में, उन्हीं दोनों ने उसका इलाज करवाया था, देखभाल की थी। फलस्वरूप, चित्रा बत्तीस वर्ष की उम्र में माँ बन सकी थी। उसकी बेटी का नाम मुकुन्द ने ही सुझाया था – देविका।

देविका बारह-तेरह साल की रही होगी जब चित्रा उनके इस घर में पहली बार आई थी। तब तक पेंशन की अनिश्चितता से त्रस्त मुकुन्द-लीला जीवन-शैली बदल चुके थे। अब घर में वही सब्ज़ियाँ आतीं जो हाट बंद होने से पहले औने-पौने दामों में बिका करती थीं। नई चप्पलों की बजाय टूटी चप्पलें सिलवा कर काम चलाया जाने लगा था। सवारी लेने की जगह पैदल चलने और बर्तन-कपड़ों और घर की सफ़ाई महरी से करवाने की बजाय स्वयं करने का स्वास्थ्य-सम्मत विकल्प अपनाया जा चुका था। मुकुन्द रोज़ दो पैकेट सिगरेट और हफ़्ते में दो पेग शराब पीने की लत छोड़ चुके थे। दोनों जन अलग-अलग फ़ोन रखने की जगह एक से काम चला रहे थे। सोने से पहले दिनभर का ख़र्च डायरी में दर्ज करना और बची रक़म गिनना उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका था।

जहाँ पाई-पाई का हिसाब रखा जाता हो, वहाँ रुपये ख़र्च करना बड़ा भारी लगता है। मुकुन्द गंभीर स्वर में बोले थे, “कल चित्रा आ रही है।“

उनके बोले बिना ही लीला समझ गई थी, वे कहना क्या चाहते हैं। दोनों पति-पत्नी चित्रा को हर बार एयरपोर्ट से लाया करते थे। अगर कभी मुकुन्द को समय न मिलता, तो लीला अकेली चली जाती थी उसे लाने। एयरपोर्ट पर गले मिलने, हँसी-ठिठोली पर पाँच-दस मिनट गुज़ारने के बाद ही चित्रा गाड़ी में बैठा करती थी।

लेकिन अब बात और थी। गाड़ी बिक चुकी थी।

लीला बुदबुदाई थी, “टैक्सी से एयरपोर्ट जा तो सकते हैं, पर हज़ार-बारह सौ स्वाहा हो जाएँगे।“

“हज़ार-बारह सौ क्यों? वापसी का किराया भी तो हमें ही देना होगा।“ मुकुन्द सोच में डूब गए थे।

“बाप रे! मतलब दो-ढाई हज़ार रुपये! उतना पैसा कहाँ है हमारे बजट में? फिर वह आएगी तो दूध-फल-सब्ज़ी-अनाज का ख़र्च भी तो बढ़ जाएगा।“ लीला का स्वर कातर था।

“देविका को कोई गिफ़्ट देनी होगी, फिर जाते समय पैसे भी देने होंगे। रसोई गैस, बिजली की ख़पत बढ़ जाएगी, सो अलग।“ मुकुन्द का स्वर दयनीय हो चला था।

दोनों थोड़ी देर एक-दूसरे का मुँह देखते रहे थे, फिर लीला ने पूछा था, “आने से मना कर दें उसको?”

“क्या बहाना बनाएँगे? क्या कहेंगे? वह भी, आने से ठीक एक दिन पहले मना करना कैसा लगेगा? वह क्या जवाब देगी मनोज को?” मुकुन्द खिन्न हो गए थे।

“बता देंगे सच-सच।“ लीला ने कहा था।

“हूँ, हम सच-सच बता देंगे और वह सच-सच मान लेगी कि उसका भाई, जो चार महीने पहले सेक्रेटरी था, इतनी जल्दी ऐसी हालत में पहुँच गया है कि इकलौती बहन पर ख़र्च करने के लिए उसके पास दस हज़ार रुपये भी नहीं बचे हैं? और अगर चित्रा मान भी ले, तो क्या गारंटी है कि मनोज भी मान लेगा? वह यह नहीं समझेगा कि हम चित्रा से न मिलने का बहाना तलाश रहे हैं? और फ़र्ज़ करो कि मनोज भी मान गया, तो भी, हमें अपनी दुर्दशा का ढिंढोरा पीट कर मिलेगा क्या? वह मुझे बेवकूफ़ नहीं समझेगा? मेरे सिद्धान्तों की खिल्ली नहीं उड़ाएगा? बिज़नेसमैन ठहरा, हमें पैसे कमाने की दस उल्टी-सीधी तदबीरें नहीं सिखाने लगेगा?” मुकुन्द तैश में आ गए थे।

“लेकिन चित्रा पर दस हज़ार ख़र्च करके हमें मिलेगा क्या? कोई मामूली अमाउन्ट नहीं है, बीस दिनों का बजट है वह! क्या करेंगे उसके जाने के बाद? भूखे मरेंगे?” लीला आवेश में आई थी, फिर सम्भलते हुए बोली थी, “और, यहाँ रहने पर उसे असलियत का पता नहीं चलेगा?”

“समझेंगे, बीमारी में ख़र्च हो गए।“ मुकुन्द ने लम्बी साँस ली थी, “स्थिति का यहाँ आकर पता चलना, और फ़ोन पर उसके बारे में जानना – दोनों में बड़ा फ़र्क है।“

कुछ देर दीवार की ओर ताकने के बाद लीला चुपचाप चली गई थी। मुकुन्द ने भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की थी। धीरे से उठे थे और खिड़की के बाहर देखने लगे थे। सामने पेड़ की कोटर में गौरैया का घोंसला था। इतना बड़ा कि उनकी दो हथेलियों में आसानी से समा जाता! मुकुन्द का विचार था कि घोंसला बनाने में सारा श्रम चिड़े ने किया था, चिड़िया ने सिर्फ़ अंडे दिए थे। अंडों से बच्चे निकल चुके थे। मुकुन्द और लीला उनके लिए अक्सर खिड़की के बाहर दाने या रोटी के टुकड़े बिखेर दिया करते थे। चिड़ा-चिड़िया गर्दन टेढ़ी कर उन्हें देखते और जल्दी से खाद्य-सामग्री चोंच में भर कर घोंसले में वापस बैठ जाते थे। बच्चे उन्हें देख बेचैन हो जाते, चूँ-चूँ चीं-चीं के शोर के बीच माता-पिता बड़ी सावधानी से अपनी बड़ी चोंच से उनकी नन्ही-सी चोंच में चुग्गा डालते। मुकुन्द बड़े कौतुक से वह दृश्य देखा करते थे। लीला मन-ही-मन ईश्वर को स्मरण कर लिया करती थी।

एयरपोर्ट पर मुकुन्द को अकेला आया देख चित्रा को हैरानी हुई, “भाभी नहीं आईं? तबीयत तो ठीक है उनकी?”

“काश! यह बहाना कल दिमाग़ में आया होता!” मुकुन्द ने अपने-आप को उलाहना दिया, फिर बात टाल दी थी, “नहीं-नहीं, लीला ठीक है। तुम्हारे लिए अपने हाथों से कुछ बना रही है।“

“वाऊ! बहुत दिनों बाद भाभी के हाथों का कुछ मिलेगा। हर बार तो आपकी मेड कुछ बनाती थी और भाभी एयरपोर्ट आती थीं। जानकी नाम था न उसका? देखा, अब भी याद है मुझे! अभी वही है, कि मेड बदल ली आपने?” चित्रा जोश में बोले जा रही थी, “यह एयरपोर्ट हर कुछ महीनों में कितना बदल जाते हैं! अब इसकी पार्किंग कहाँ है? देविका, सी, मामाजी विल टेक अस होम इन हिज़ कार।“

दोपहर शाम में गुम हुई और शाम ढल कर रात का बाना ओढ़ने जा रही थी। इन पाँच घंटों में मुकुन्द-लीला के बदले तेवर से चित्रा का सर भिन्ना चुका था। क्या-क्या सोच कर आई थी वह! क्या-क्या प्रॉमिस किया था उसने देविका से – मामा ये करेंगे, मामा वो करेंगे, मामी ऐसे घुमाने ले जाएँगी, मामी वैसे रेस्त्राँ में खिलाएँगी – पर वहाँ जैसे मातम छाया था। कोई ख़ुशी ही नहीं थी उनके आने की। बेचारी देविका शाम सात बजे खाना खाकर सो गई थी। ऐसा क्या कर दिया था उसने? कहीं मनोज ने तो कुछ उल्टा-सीधा नहीं कह दिया था?

उसने बाहर आकर मनोज को फ़ोन लगाया था। रात के पहले प्रहर में मनोज की शराब की महफ़िल सजा करती थी। उन महफ़िलों में व्यवसाय की उलझनें इतनी आसानी से सुलझा करती थीं, मानो उनका कभी वजूद ही नहीं था। शराब के तीसरे-चौथे दौर के साथ हर कानून की काट और हर मर्ज़ की दवा बोतल से निकले जिन्न की भाँति नमूदार हो जाती थी मनोज के आगे।

जब तक मनोज ख़ुद न बुलाए, उन महफ़िलों में उसके पास जाना या उससे घरेलू बात करना वर्जित होता था। उस अघोषित नियम का उल्लंघन गृह शांति के लिए कितना घातक था, वह चित्रा अच्छी तरह जानती थी। फिर भी, उसने फ़ोन लगाया। मीठी-मीठी दो बातें करने के बाद बोली, “भैया से तो आपकी इधर कोई बातचीत नहीं हुई होगी। मैं अभी घर के बाहर हूँ, वरना बात कराती।“

“अरे कोई बात नहीं। तुम अपना ख़याल रखो। बाई!” मनोज ने बात ख़त्म कर गिलास की ओर हाथ बढ़ाया था।

“मुकुन्द से बात! हुँह!” – उसने कड़वा घूँट भरा था। एक साल से उसके और मुकुन्द के बीच कोई बात नहीं हुई थी। शादी तय होते समय उसने और उसके माता-पिता ने सोचा था कि मुकुन्द की सहायता से उसका व्यापार चल निकलेगा, दिन दूनी-रात चौगुनी तरक़्क़ी होगी, पर हुआ था ठीक उल्टा। क्लर्क और सेक्शन ऑफ़िसर मुकुन्द से ज़्यादा रसूख़ रखते थे। मुकुन्द का नाम लेने पर सरकारी कर्मचारियों के तेवर बदल जाते थे, बना बनाया काम बिगड़ जाता था। वह पागल तो था नहीं कि उतना कुछ होने पर भी मुकुन्द से गाहे-बगाहे बात करता। बस, जन्मदिनों और त्योहारों पर औपचारिकता निभा दिया करता था दो शब्द बोल कर।

“वह पट्ठा भी ऐसा अकड़ू है कि अपनी तरफ़ से एक कॉल भी नहीं करता!” – मुकुन्द के प्रति उसके हृदय में रोष का अलाव सदा सुलगता रहता था। उससे अच्छी तो लीला थी जो चित्रा को विदा करते समय मनोज को याद रखती थी, उसके लिए कुछ-न-कुछ भिजवाती थी।

चित्रा समझ गई थी कि मनोज ने कुछ नहीं किया। या तो भैया-भाभी उससे नाराज़ थे, या कुछ और हुआ था। पर क्या?

रात का सादा खाना गले से उतारते-उतारते चित्रा से रहा नहीं गया, बोल ही बैठी थी, “आप लोगों को हमारा आना अच्छा नहीं लगा?”

मुकुन्द का कौर गले में फँस गया था। लीला उनके गिलास में पानी भर कर बोली थी, “ऐसे क्यों कह रही हो? ऐसा तो कुछ भी नहीं।“

“कैसे कुछ नहीं? हर बार मैं आती थी तो हम बाहर जाते थे, घूमते-फिरते थे, रेस्त्राँ में खाते थे, सेलिब्रेशन होता था, और आज? आज, पहले तो, आप एयरपोर्ट नहीं आईं। भैया ने कहा कि हमारे लिए कुछ बना रही हैं। अच्छा भाई, मान लिया। पर बनाया क्या आपने? चिकन करी और हलवा! सचमुच, क्या इतनी-सी चीज़ बनाने के लिए आपका घर में रुकना ज़रूरी था? कौन खाता है हलवा? देविका ने एक चम्मच लेकर छोड़ दिया और … अगर आप नहीं चाहते थे कि मैं आऊँ तो पहले क्यों नहीं बता दिया कि ‘बहन, मत आया कर यहाँ! अब इस घर में कोई जगह नहीं बची तेरे लिए’।“ चित्रा की आवाज़ रुँध गई थी।

लीला स्तब्ध होकर उसे देखती रह गई थी। कुछ बोलने का प्रयास किया, पर ज़बान सूख गई थी।

मुकुन्द गिलास को ध्यान से देखते रहे, मानो चित्रा की बात का जवाब देने की ज़िम्मेदारी उसी की थी।

 

कमरे से देविका का अस्पष्ट स्वर सुनाई दिया था और चित्रा आधा खाना प्लेट में छोड़ कर उठते हुए चेतावनी देती गई थी, “अगर हमारा आना पसन्द नहीं है तो कल जल्दी-से-जल्दी हम वापस चले जाएँगे।“

कमरे का दरवाज़ा धड़ाम से बन्द हो गया था। लीला सन्न रह गई थी। मुकुन्द को भी जैसे साँप सूँघ गया था। टेबिल साफ़ कर लीला बर्तन धोने लगी, और मुकुन्द खिड़की से बाहर देखने लगे थे। रात के अँधेरे में आसमान में छिटके सितारों के नीचे अकेला खड़ा पेड़ उन्हें अपनी ओर घूरता मालूम हुआ था।

आधे घंटे बाद लीला आ गई थी। दोनों थोड़ी देर चुप रहे थे, फिर एकसाथ बोल पड़े थे, “यह अच्छा नहीं हुआ।“

दोनों ने माना था कि सबकुछ इतनी जल्दी हुआ कि उन्हें सफ़ाई देने का मौक़ा ही नहीं मिला। दोनों इस बात पर भी एकमत थे कि चित्रा को अगले दिन जाने नहीं देना चाहिए।

कल उसे समझाएँगे कि हमारे साथ क्या घट रहा है – दोनों तय कर सोने की चेष्टा करने लगे थे।

चित्रा का मुँह सुबह भी फूला हुआ था। उसने चाय पीते-पीते ऐलान किया था, “हम कल जाएँगे, चौबीस घंटे के अंदर लौटा देख मनोज न जाने क्या समझें।“

पति-पत्नी ने संतोष की साँस ली थी। लीला बोली थी, “ठीक किया।“

मुकुन्द ने कहा था, “तुम समझ रही हो कि हमारे बीच कुछ ख़राब हो गया है। लेकिन ये तुम सिर्फ़ अपनेआप के बारे में सोच कर समझ रही हो। ज़रा हमारी ओर भी देखो! क्या हम उसी तरह रह रहे हैं जैसे पहले रहते थे? नहीं! उस समय अच्छी-ख़ासी सैलरी आती थी, जी खोल कर ख़र्च करते थे …”

“तो अब अच्छी-ख़ासी पेंशन आती होगी। ऐसा तो सबके साथ होता है। रिटायर होते ही आदमी क्या खाना-पीना छोड़ देता है?” चित्रा तपाक से बोली थी।

“हमें पेंशन नहीं मिल रही, और न ही उसके जल्दी मिलने की उम्मीद है,” लीला धीरे से बोली थी।

“यह मैं नहीं मान सकती कि एक रिटायर्ड सेक्रेटरी को उसकी पेंशन नहीं मिलेगी। अरे, देर-सबेर हो रही होगी।“ चित्रा ने ढिढाई से कहा था।

“लीला ठीक कह रही है, चित्रा। मेरी पेंशन मिलेगी कि नहीं, कोई नहीं कह सकता। मिनिस्टर के लेवेल से इंस्ट्रक्शन हैं मुझे परेशान करने के। शुक्र मनाओ कि सीबीआई नहीं लगाई गई है मेरे पीछे।“ मुकुन्द गंभीरता से बोले थे।

“सीबीआई क्या लगाएगा कोई आपके पीछे? आपकी रेप्युटेशन ही इतनी क्लीन है!” चित्रा नर्म तो पड़ी, लेकिन आगे बोली थी, “भैया, आपको रिलेशन्स मेनटेन करने चाहिएँ। बातचीत करके, या जैसे भी हो, पेंशन रिलीज़ करवा लेनी चाहिए।“

“इतना आसान नहीं है। पता नहीं कहाँ किस ऑर्डर पर बैकडेटेड साइन करने पड़ें …“ मुकुन्द बोल ही रहे थे कि देविका उनके पास आ गई थी। चित्रा उससे कुछ बोलने लगी, लीला नाश्ता बनाने में जुट गई और मुकुन्द खिड़की के सामने खड़े हो गए थे।

दूसरे दिन जाते-जाते चित्रा लीला की मुट्ठी में चुपके से दस हज़ार रुपए थमा गई थी। लीला ने कुछ बोलना चाहा, तो उसे आँखों से धमकी देकर चुप करा गई थी चित्रा।

जाने के बाद चित्रा महीने-दो महीने पर फ़ोन करती रही, फिर धीरे-धीरे सम्पर्क का वह सूत्र भी सूख गया था। याद नहीं, उससे बात हुए दस महीने गुज़रे थे या एक साल पूरा हो गया था। बात करते भी तो क्या? हर सवाल और जवाब ज़बानी याद हो चुका था सबको।

मुकुन्द खिड़की के सामने बैठे थे। अब वे ज़्यादा देर खड़े नहीं रह पाते थे, घुटनों में असहनीय दर्द होने लगता था। घोंसला सूना था, चिड़ियाँ जा चुकी थीं, लेकिन पेड़ की फुनगियों पर हलचल हो रही थी। पक्षियों का कलरव उन्हें अब भी आह्लादित करता था। चिड़ियों को देख-सुन वे सबकुछ भूल जाते थे। चहचहाहट के बीच एक और स्वर उभर रहा था, पर उन्हें कोई चिड़िया नहीं दिखी।

थोड़ी देर बाद वही स्वर दोबारा उभरा। धत् तेरे की! यह तो उनका फ़ोन बज रहा था। चश्मा लगा कर फ़ोन उठाने में इतनी देर हो गई कि रिंग बन्द हो गई। तब तक लीला भी वहीं आ गई।

“दो बार रिंग आई। देखिए, किसका है? पेंशन-रिलीज़ की तो कोई ख़बर नहीं?” लीला की आशावादिता सराहनीय थी।

“देख रहा हूँ,” स्क्रीन का मुआयना करते हुए मुकुन्द चौंके, “अरे! ये तो चित्रा के कॉल हैं। हे भगवान, क्या हो गया? सब ठीक तो है?”

“घबराते क्यों हैं, फ़ोन करके देख लीजिए।“

“हाँ, देखता हूँ। एक साल से उसने कॉन्टैक्ट नहीं किया। अब आज अचानक दो-दो कॉल कर दिए।“ उन्होंने चित्रा का नम्बर मिलाया।

चित्रा के घर सब ठीक था। सब ठीक क्या था, बहुत अच्छा था। वह बोली, “भैया, पंद्रह तारीख़ को देविका की शादी है। हो सके तो आपलोग आइएगा।“

“अरे, देविका इतनी बड़ी हो गई? क्यों नहीं आएँगे चित्रा, ज़रूर आएँगे। क्या नाम है लड़के का? क्या करता है?” मुकुन्द प्रश्नों की झड़ी लगाने वाले थे कि चित्रा ने उन्हें रोक दिया, “भैया, कई जगह फ़ोन करना है, बहुत काम बाक़ी हैं। आज ज़्यादा बात नहीं कर पाऊँगी, प्लीज़। कार्ड में सब लिखा है, पढ़ लीजिएगा। आप दोनों को आमंत्रण है! ठीक है? फिर बाद में बात करते हैं, बाई!”

लीला उन्हें सवालिया निगाहों से ताक रही थी, “देविका की शादी है?”

“हाँ!” मुकुन्द ने भ्रमित-से स्वर में उत्तर दिया।

लीला ख़ुशी से बोली, “बड़ी अच्छी ख़बर है। कब है शादी?”

“पंद्रह को,” उत्तर मिला।

“पंद्रह को? इसी पंद्रह को? आज पाँच है। बस, दस दिनों में?” लीला को विश्वास नहीं हो रहा था।

“हूँ … महीना तो उसने नहीं बताया, पर अगर किसी और महीने में शादी होती तो वह भी बताती न! कहा कि कार्ड भेजा है।“ मुकुन्द थोड़े गम्भीर हो गए।

“तब तो शादी इसी महीने है। और क्या कह रही थी?”

“कह रही थी कि ‘हो सके तो आइएगा’। ऐसा क्यों बोली वह? ‘हो सके’ का क्या मतलब है? सीधे नहीं बुला सकती थी?” मुकुन्द ने व्यग्रता से कहा।

“अरे, बोल भी दिया तो क्या गुनाह कर दिया? उसे क्या मालूम नहीं कि हम कितनी तंगी में दिन काटते हैं। याद नहीं दस साल पहले उससे क्या बात हुई थी, यहाँ क्या-क्या हुआ था?” लीला ने समझाया।

“वह तो ठीक है लेकिन शायद उसने सिर्फ़ फ़र्ज़ निभाने के लिए फ़ोन किया था। वरना ये क्यों कहती कि ‘आपदोनों को आमंत्रण है’? आमंत्रण तो फ़ॉर्मल होता है। स्टेज पर बुलाने के लिए कवियों को आमंत्रण दिया जाता है। अपनों को तो निमंत्रण दिया जाता है।“ मुकुन्द की चिन्ता बरक़रार थी।

“ये तो बाल की ख़ाल निकालनेवाली बात हुई! उसने मज़ाक में एक भारी लफ़्ज़ इस्तेमाल कर लिया होगा। वह आपकी तरह हिन्दी लिटरेचर थोड़े-ही पढ़ती है कि आमंत्रण और निमंत्रण में फ़र्क जाने। फिर, पूजा-पाठ में देवी-देवताओं को आमंत्रण ही दिया जाता है, निमंत्रण नहीं।“

लीला का तर्क अकाट्य था। मुकुन्द चुप हो गए। लीला उनका मुँह ताकती रही। जब ख़ामोशी बर्दाश्त से बाहर हो गई तो आक्रोश से बोली, “मैं जानती हूँ, आप क्यों चुप हैं। ख़र्चा! शादी में जाएँगे तो पैसे ख़र्च हो जाएँगे। बारह साल में हम कहाँ गए हैं? कहीं नहीं! ख़र्चा हो जाएगा। बारह साल में हमारे घर कौन आया है? सिवाय एक बार चित्रा को छोड़ कर कोई नहीं! क्यों नहीं बुलाते हम किसी को? ख़र्चा हो जाएगा। कोई नहीं पूछता हमें। मर जाएँगे तो भी किसी को पता नहीं चलेगा जब तक लाश की सड़ाँध से तंग आकर मुहल्लेवाले दरवाज़ा न तुड़वाएँ।“

मुकुन्द उसे देखते रहे, पर फिर भी कुछ न बोले। लीला भुनभुनाती हुई दीवार की ओर मुँह कर लेट गई। मुकुन्द सूने घोंसले को देख न जाने क्या सोचते रहे।

शाम की चाय का कप लेते हुए मुकुन्द बोले, “तुम ठीक कहती हो। देविका का जन्म हमारी कोशिशों का ही नतीजा है। हम उसके माँ-बाप नहीं हैं, लेकिन हम ऑर्डिनरी रिलेटिव भी नहीं हैं। फिर चित्रा मेरी इकलौती बहन है और देविका उसकी इकलौती बेटी। जाना चाहिए शादी में।“

लेकिन उतनी देर में लीला का विचार बदल चुका था, “जाना चाहिए तो ज़रूर, पर जाएँगे कैसे? शादी की डेट कोई आज तो फ़िक्स हुई नहीं होगी। वह हमें पहले बता सकती थी। दस दिनों में शादी है और आदमी कम-से-कम दो दिन पहले तो जाएगा। आज का दिन तो निकल ही चुका है। यानी रफ़ली सिर्फ़ एक हफ़्ते का टाइम दिया है उसने। इतनी शॉर्ट नोटिस पर कहाँ मिलेगी ट्रेन में जगह? ईवेन, प्लेन में भी बहुत मँहगीवाली सीट ही मिलेगी। कहाँ जाना है ये भी नहीं पता। कार्ड पता नहीं कब मिलेगा। हो सकता है न भी मिले।“

“कह रही थी कि बहुत बिज़ी है,” मुकुन्द बोले।

“कितनी भी बिज़ी हो, अगर उसे सचमुच बुलाना होता तो पहले बुलाती। और ये कैसा बुलाना कि मनोज ने बात ही नहीं की?” लीला ने शंका ज़ाहिर की।

“अब, मनोज तो पहले भी कहाँ बात करता था? जहाँ तक चित्रा का सवाल है, हो सकता है उसे हमारे आने के बारे में डाउट हो और उसलिए उसने पहले फ़ोन नहीं किया,” मुकुन्द ने स्पष्टीकरण दिया।

“तो बात वही हुई न, कि हमें बुलाया तो है पर मन से नहीं। अब ऐसे बेमन के बुलावे पर हम पचास हज़ार ख़र्च कर दौड़े चले जाएँ या इग्नोर कर दें?”

“इग्नोर कैसे करेंगे? मैं उसे कह चुका हूँ कि हम ज़रूर आएँगे। फिर तुम ख़ुद भी कहती हो कि हम सबसे अलग-थलग ऐसे जी रहे हैं कि क्राइसिस में कोई पूछनेवाला भी नहीं होगा। न! जाना ही ठीक होगा।“ मुकुन्द का मतिभ्रम छँट चुका था।

“ओ के! तो लेट अस प्रिप्रेयर ए टू-डू लिस्ट विथ द कॉस्ट इनवॉल्व्ड!” लीला ने डायरी पर क़लम टिका दी और मुकुन्द लैपटॉप पर रेलगाड़ी में बर्थ तलाशने लगे।

तेरह तारीख़ को उन्होंने चित्रा को फ़ोन किया, “चित्रा! हम कल आ रहे हैं। बड़ी मुश्किल से अभी एसी टू टीयर में जगह मिली है, ‘तत्काल’ कोटे में।“

“वेरी गुड, भैया। आप दोनों आ रहे हैं न? अकेले तो मुझसे संभल ही नहीं रहा। आप आएँगे तो बड़ी हेल्प हो जाएगी।“ बोलते-बोलते वह किसी और से बात करने लगी। स्पष्ट था कि वह बहुत व्यस्त थी।

“हाँ चित्रा, हम दोनों आ रहे हैं।“

“ओके भैया, कल बात होगी। सॉरी, बहुत बिज़ी हूँ …” वह फिर किसी से बात करने लगी और सम्बन्ध कट गया।

“ये बताने की क्या ज़रूरत थी कि हम एसी टू टीयर में आ रहे हैं?” लीला ने पूछा।

“अरे, वह नहीं बताऊँगा तो वह रिसीव करने कैसे आएगी?” मुकुन्द चिढ़े।

“आप भी न! आपसे दो मिनट फ़ोन पर बात करने का समय तो मिलता नहीं उसे, और वह आएगी आपको स्टेशन पर रिसीव करने? अगर ऐसा ही होता तो ट्रेन का नाम नहीं पूछती वह?”

लीला का व्यावहारिक ज्ञान मुकुन्द के फ़लसफ़े पर भारी पड़ा, उन्हें स्टेशन पर लेने कोई नहीं आया। दोनों रिक्शा कर, पूछते-पाछते, मनोज की हवेली पर पहुँचे, तो दंग रह गए। चहारदीवारी पर लगे लोहे के नक़्क़ाशीदार दरवाज़े की जालियों से उस दो-मंज़िला मकान के आगे फैली हरी घास के बाग़ीचे में महलनुमा तम्बू लगता दिख रहा था। बाग़ीचे के चारों ओर क्यारियों में तरह-तरह के गुलाब खिले थे। दरवाज़े से लगता ड्राइव-वे कहीं अंदर, ख़ूबसूरत घने पेड़ों के पीछे, गुम हो रहा था।

संतरी को परिचय देने से पहले ही उन्हें किसी ने कैमरे की मदद से अंदर देख लिया और दरवाज़े खुल गए।

चित्रा उन्हें देखकर खिल गई। गले मिल कर बोली, “भैया, आज ‘संगीत’ है। गाना गाना होगा आपको भी।“ मनोज भी आदर से मिला। देविका रूप-सज्जा कराने गई हुई थी, सो उससे मुलाकात न हो सकी।

मुकुन्द एक मर्मस्पर्शी गीत लिख कर लाए थे। उसमें देविका के जन्म से उनके सम्बन्ध का सांकेतिक विवरण था। गीत की धुन भी बढ़िया थी। वैसे तो गाना उन्हें कंठस्थ हो चुका था, पर फिर भी कमरे में जाकर उन्होंने गायन का एक अभ्यास और कर लिया।

लेकिन, गाना गाने की नौबत नहीं आई। चित्रा ने लीला को मेहमानों की औपचारिक आवभगत का ज़िम्मा सौंप दिया था। मुकुन्द अकेले क्या करते, वे भी लीला के साथ हो लिए। पाँच मिनट भी नहीं गुज़रे होंगे कि मनोज उनके पास आकर मुस्कुराया, “भैया, आप कहाँ इस पचड़े में पड़ गए?” फिर पीछेवाली पंक्ति की एक टेबल इंगित कर बोला, “आप वहाँ आराम से बैठ कर ड्रिंक्स-स्नैक्स लीजिए न।“ हँस कर कहता गया, “यहाँ सरकारी लोग आपको देख कर कॉन्शस हो रहे हैं।“

मुकुन्द का चेहरा स्याह हो गया। आसपास के अतिथियों को देख कृत्रिम रूप से मुस्कुराते, पेय की चुस्कियाँ लेते, और फूहड़ गानों और बेहूदा नृत्यों पर ताली बजाते हुए वे चार घंटे उन्होंने कैसे काटे, वे ही जानते थे। एक बार लीला ने पास आकर कहा, “सब लोग नाच-गा रहे हैं। आप क्यों नहीं जा रहे? जाइए!” शोर- शराबे में उनका उत्तर लीला के कानों तक पहुँचने से पहले ही गुम हो गया, और वह मुस्कुराती हुई वापस चली गई।

रात में उसे मुकुन्द के गीत की याद आई, “आपने गाना क्यों नहीं गाया?”

मुकुन्द अनमने से बोले, “वैसे ही! मन नहीं हुआ।“

लीला ने पूछा, “किसी ने कुछ कहा क्या?”

मुकुन्द मौन रहे। वे जानते थे कि उनके विपरीत, लीला की शाम अच्छी बीती थी, उसे इतना आनन्द आया था कि वह समारोह के दौरान मुकुन्द को भूल-सी गई थी। बेचारी को इतने सालों के बाद ख़ुशी मिली थी, उसका मज़ा क्यों ख़राब किया जाए?

वे छत देखते हुए छटपटाते रहे। फिर सोचा, क्यों न बता ही दें उसे। उन्होंने लीला के कन्धे पर हाथ रखा। वह सुगबुगाई तक नहीं। लीला के मंद-मंद खर्राटे उसकी थकावट का सबूत दे रहे थे। मुकुन्द करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगे।

अगली सुबह हल्दी का उबटन लगाने की रस्म के दौरान बहुत हँसी-ठठ्ठा हुआ। लीला को उतना आनंदित पहले कब देखा था, मुकुन्द भूल चुके थे। वे दीवार के सहारे कुर्सी लगा कर बैठे रहे। वैसे भी, महिलाओं के उस कार्यक्रम में मर्दों की भूमिका न के बराबर थी।

रात में बारात के स्वागत से मुकुन्द दूर ही रहे। एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ कर तब तक सारा कार्यक्रम देखते रहे, जब तक दूल्हा-दुल्हन के साथ फ़ोटोग्राफ़ के लिए उन्हें स्टेज पर नहीं बुलाया गया। उनका दम घुटने लगा था। एक-दो-बार बाहर गए, पर जी बहलने की बजाय बाहर सड़क पर सरकारी गाड़ियों की क़तार देख कर उनका मिज़ाज और चिड़चिड़ा गया। ज़ाहिर है, वे उन अधिकारियों की गाड़ियाँ थीं जो शादी में आए थे। उन्हें सरकारी सहूलियत के बेजा इस्तेमाल से परहेज़ ही नहीं था, नफ़रत भी थी।

अतिथियों का भोजन समाप्त होने पर दूल्हा-दुल्हन और क़रीबी रिश्तेदारों के लिए टेबिलें सजीं। मुकुन्द देविकावाली टेबिल के पास जा ही रहे थे कि चित्रा उनके पास आकर फुसफुसाई, “भैया, वे लोग इतने हैं कि कोहनी-से-कोहनी टकराने की नौबत आ गई है। प्लीज़, आप इस बगलवाली टेबिल पर बैठ जाइए।“

“हाँ, हाँ, नो इश्यूस,” कह कर लीला ने उन्हें इंगित टेबिल पर बैठा दिया। उस टेबिल पर अन्य लोग भी थे। कोई ज़्यादा-से-ज़्यादा बातें करने में व्यस्त था, तो कोई अधिक-से-अधिक पकवान खाने में।

मुकुन्द की रुचि न खाना खाने में थी, न बातचीत करने में। उन्हें गुमसुम देख लीला बोली, “कुछ खा नहीं रहे हैं। तबीयत तो ठीक है न आपकी? आज देर तक जागना है विदाई के लिए, और रात में ट्रेन भी पकड़नी है।“

“मैं ठीक हूँ, बस थोड़ी हरारत-सी हो गई है,” उन्होंने पीछा छुड़ाया। पचास साल में उन्हें पहली बार कहीं बैठने से रोक दिया गया था – यह बात समझने की थी, बताने की नहीं।

देविका की विदाई के बाद वे देर तक सोते रहे। दोपहर के खाने के समय उनकी गंभीरता को देविका की विदाई की पीड़ा समझ लीला चुप रही। चित्रा से थोड़ी बात हुई, पर मनोज से उतनी भी नहीं।

अंत में जाने का समय आ गया। चित्रा ने ना-ना करने पर भी बहुत-से पकवान बँधवा दिए। मनोज ने एक ड्राइवर से उन्हें स्टेशन छोड़ आने को कहा। घर से निकलते-निकलते चित्रा फिर गले मिली। आश्चर्य! मनोज भी गले लगा। बोला, “सरकारी लोगों में आज भी आपकी चर्चा होती है। चीफ़ सेक्रेटरी मलहोत्रा बोले कि आप जैसा ईमानदार अफ़सर न पहले कभी आया था और न उसके कभी भविष्य में आने की उम्मीद है। कह रहे थे कि आज भी वहाँ आपकी ट्रांसपेरेंसी और एफ़िशियेंसी के एक्ज़ाम्पल दिए जाते हैं। मैंने भी कह दिया, ‘तो क्या इसी लिए उनकी पेंशन नहीं दी जा रही, कि कोई दूसरा उनके जैसा ईमानदार न बने?’ तिलमिला गए! बोले, ‘मुझे तो पता ही नहीं था। अभी रिलीज़ करवाता हूँ मनडे को’।“

मुकुन्द को सुखद आश्चर्य हुआ। मनोज का हाथ थाम फीकी हँसी हँस कर बोले, “अब तक न जाने कितने मनडे आकर गुज़र चुके हैं।“

“मेरे मलहोत्रा से स्पेशल टर्म्स हैं। जब उन्होंने ख़ुद ही कहा है, तो पीछे नहीं हटेंगे।“

दूसरे दिन सुबह मुकुन्द ने खिड़की के सामने खड़े होकर पेड़ की ओर देखा। घोंसला अब सूना नहीं था। वहाँ गौरैया का एक नया जोड़ा मँडरा रहा था।

लीला कमरे में शादी के पकवान लेकर दाख़िल हुई, “आज इन्हीं का नाश्ता कर लेते हैं। दोपहर से प्रॉपर खाना बनाऊँगी।“

पति-पत्नी व्यंजनों का रस ले-लेकर नाश्ता करने लगे।

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