बुधवार, 30 सितंबर 2026

ग्लानि


यूँ तो कलकत्ता इतनी भीड़-भाड़वाला शहर है कि सियालदह, हावड़ा, बड़ाबाज़ार-जैसे इलाक़ों में पैदल चलने पर चमड़े-से-चमड़ा छिलने का भय रहता है तथा इतने शोरशराबेवाला शहर भी है कि अलसुबह फेरीवालों की पुकार से नींद खुलने के बाद दिन मोटरगाड़ियों के भोंपू, आंदोलनकारियों की नारेबाज़ी और फ़ुटबॉल खिलाड़ियों के समर्थकों के शोर से गुंजायमान रहता है और रवीन्द्र संगीत, टेलिविज़न कार्यक्रम, तथा औरतों के गला फाड़-फाड़ कर बच्चों को घर वापस बुलाने के कोलाहल में शाम होती है; लेकिन उसी कलकत्ता में कुछ ऐसे रिहाइशी मुहल्ले भी हैं जहाँ आराम से साँस ली जा सकती है और जहाँ चलने-फिरने में दूसरों की प्राइवेसी भंग करने का अंदेशा नहीं होता। वैसे, यह बात मैं पच्चीस-तीस साल पुराने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ, हो सकता है कि अब हालात बदल गए हों और कलकत्ता के सारे मुहल्ले खुले-खुले हो गए हों या एक भी मुहल्ला शांत-स्वच्छ न बचा हो।

बहरहाल, तो जैसा कि मैं पहले ही अर्ज़ कर चुका हूँ, यह वाक़या कोई पच्चीस-तीस साल पुराना तो होगा ही। उन दिनों कलकत्ता के लेक गार्डन्स में क़रीने से बनी साफ़-सुथरी लेकिन सँकरी सड़कों के दोनों तरफ़ तीन-चार मंज़िले मकानों में मध्यम वर्ग के लोग रहते थे जिन्हें आम बंगाली भद्रलोग कहते हैं। मेरा दफ़्तर वहीं एक रिहाइशी मकान की निचली मंज़िल पर था और उससे सात-आठ सौ मीटर दूर एक मकान में मेरा घर था। घर के ठीक पीछे सब्ज़ी और रोज़ की ज़रूरतों के सामान का बाज़ार था। बच्चों की स्कूल बस घर से सौ मीटर दूर उन्हें ले-छोड़ जाती थी।

ग़रज़ यह, कि अपने ठाठ थे। सुबह उठे, चाय पी, तैयार हुए, नाश्ता किया, और ख़रामा-ख़रामा टहलते हुए दस बजे दफ़्तर पहुँच गए। डेढ़-दो बजे घर में गर्म-गर्म खाना खाकर और दफ़्तर में सात-साढ़े सात तक काम करने के बाद फिर घर में! हफ़्ते में तीन-चार दिन ग्राहकों से मिलने उनके दफ़्तर जाने के बावजूद मेरी दिनचर्या में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था। अब उसी ग्राहक से हर हफ़्ते-पंद्रह दिन में मिलने से कुछ हासिल होने वाला तो नहीं था, बल्कि उसके काम में बाधा पड़ने का ही डर था। दूसरे, हर शनिवार या सोमवार किसी-न-किसी हड़ताल की वजह से कलकत्ता में कामकाज ठप रहता था।

दफ़्तर के काम से बाहर जाते समय मेरा सहयोगी भी साथ होता था और हम टैक्सी लिया करते थे। इस चक्कर में होता यह था कि मेरी मोटरगाड़ी चुपचाप खड़ी-खड़ी मुँह बिसूरती रहती थी। मुझे चिन्ता होती, इस्तेमाल में न आने से कहीं उसके अस्थि-पंजर ढीले न हो जाएँ, बैटरी न बैठ जाए। लेकिन एक तो घर से दफ़्तर या बाज़ार के बीच मोटरगाड़ी चलाने लायक दूरी और सड़क का अभाव और दूसरे कलकत्ता पुलिस का ग़ैर-बंगाली नम्बरप्लेटवाले वाहनों को दण्ड देने का चलन मुझे मोटरगाड़ी से वैसे ही दूर रखता था जैसे मधुमेह का रोगी चाह कर भी गर्मागर्म जलेबी नहीं खाता।

बंगाल में गाड़ी के पंजीकरण के लिए आवेदन दिए तीन महीने से ऊपर हो चुके थे, किन्तु वहाँ के ऑटोमोबाइल असोसिएशन के अधिकारियों के हिसाब से ऐसे कामों में वक़्त लगता ही है। उन्होंने सलाह दी थी कि पंजीकरण होने तक मैं दुर्गा के नाम का जाप करता हुआ मुहल्ले में ही मोटर चलाऊँ, क्योंकि वहाँ ट्रैफ़िक पुलिसवाले पर नहीं मारते। मरता क्या न करता! उनकी सलाह आत्मसात कर मैं हफ़्ते-दस दिन में एक बार मोटरगाड़ी सुबह सात के क़रीब निकालता और उसे आधा घंटा इधर-उधर की हवा खिला कर वापस आ जाता।

उस दिन भी मैं मोटरगाड़ी को मुहल्ले की सैर करा कर घर लौट रहा था। जब आप एक ही मोटरगाड़ी को कई साल चला चुके हों और रास्ता जाना पहचाना हो, तो गाड़ी चलाने में कोई ख़ास कोशिश नहीं करनी पड़ती। वह ख़ुद-ब-ख़ुद तेज़-धीमी होती है, दाएँ-बाएँ मुड़ कर गड्ढों से बच लेती है, और गंतव्य पर पहुँच कर रुक जाती है। तो, मोटरगाड़ी अपनेआप चल रही थी और मैं सामने पड़े दिन के कामकाज की योजना बना रहा था। मेरे आगे एक साइकिलरिक्शा जा रहा था। मेरे हाथ ने अपनेआप हार्न बजा दिया। अगर वह सड़क की बाईं तरफ़ हो जाता तो मैं गाड़ी आगे निकाल सकता था। लेकिन रिक्शे पर कोई असर न हुआ, वह पाँच किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से ख़ाली सड़क छेंक कर रेंगता ही रहा। मैंने फिर थोड़ा लम्बा हॉर्न बजाया, लेकिन रिक्शावाले के कानों पर जूँ तक न रेंगी। मैंने बेसब्री में बार-बार हॉर्न बजाना शुरू किया पर नतीजा ढाक के उन्हीं तीन पात से अधिक कुछ न निकला। सड़क के दोनों ओर की इमारतों की बालकनियों से भद्रलोग और भद्रमहिलाएँ नीचे ताकने लगे और मैं चींटी की रफ़्तार से चल रहे रिक्शे के पीछे सिसकती मोटर में झींकता रहा।

मामला दो-चार मिनट बदस्तूर जारी रहने के बाद मुझे रिक्शावाले की हिमाक़त पर ग़ुस्सा आ गया। माना कि बंगाल में साम्यवादी शासन था, पर उसका मतलब यह तो नहीं था कि हर मोटरकार के लिए किसी-न-किसी रिक्शे के पीछे चलना ज़रूरी था। एक स्थान पर सड़क जैसे ही ज़रा चौड़ी हुई, मैंने तेज़ रफ़्तार से गाड़ी लहराई और रिक्शे के दाहिने मडगार्ड को घिसते हुए उसके आगे ऐसे ब्रेक मार कर रोक दी जैसे सिनेमा में  पुलिसवाले करते हैं। बिजली की तेज़ी से बाईं तरफ़ का शीशा नीचे कर मैंने आग्नेय नेत्रों से रिक्शे की ओर देखा। रिक्शेवाला रिक्शे से उतर घबराहट में काँपने लगा। वह छरहरे बदन का था। उसकी उम्र अठारह-उन्नीस साल रही होगी। उसका रंग कभी गोरा रहा होगा, पर धूप और धूल-धक्कड़ में मशक्कत ने उसका रंग ताँबई कर दिया था। उसका चेहरा लाल पड़ चुका था। वह गिड़गिड़ा कर मुझसे ऐसे इशारों में माफ़ी माँगने लगा, जैसे गूँगे-बहरे मरीज़ करते हैं।

मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया। मैंने उसे नमस्कार किया और चुपचाप गाड़ी आगे बढ़ा ली। वह घटना जब भी याद आती है, मुझे ग्लानि का बोध सताता है। आर्थिक-सामाजिक मजबूरियाँ किस तरह लोगों को अपनी और दूसरों की जान दाँव पर लगा देने को मजबूर कर देती हैं! रिक्शे पर मोटरगाड़ी की प्रभुता कैसे एक इंसान को दूसरे का दमन करने का हक़ दे देती है!

कोई टिप्पणी नहीं: