शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

बेशरम दिल है

 

उसकी याद आती है और दर्द उभर आता है
धड़कनें बढ़ती हैं और चेहरा उतर जाता है

जिसको गोदी में खिलाया कभी मैंने बरसों
अब वो बच्चा मेरे पास आने में घबराता है

कभी आओ न इधर घर मेरा ये कहता है
इस बियाबान में अब कोई नहीं आता है

वो चमन भी कभी गुलज़ार हुआ करता था
जिसकी शाख़ों पे यूँ फैला हुआ सन्नाटा है

थक रही नब्ज़ का ख़ूँ सर्द हुआ जाता है
बेशरम दिल है धड़कता ही चला जाता है

कौन समझा नहीं और किसने हमें छोड़ दिया
ऐसी बातों में ही अब वक़्त गुज़र जाता है


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