उसकी याद आती है और दर्द
उभर आता है
धड़कनें बढ़ती हैं और चेहरा उतर जाता है
जिसको गोदी में खिलाया कभी मैंने बरसों
अब वो बच्चा मेरे पास आने में घबराता है
कभी आओ न इधर घर मेरा ये कहता है
इस बियाबान में अब कोई नहीं आता है
वो चमन भी कभी गुलज़ार हुआ करता था
जिसकी शाख़ों पे यूँ फैला हुआ सन्नाटा है
थक रही नब्ज़ का ख़ूँ सर्द हुआ जाता है
बेशरम दिल है धड़कता ही चला जाता है
कौन समझा नहीं और किसने हमें छोड़ दिया
ऐसी बातों में ही अब वक़्त गुज़र जाता है

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