मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

जूते

 


“मीरा के लिए नए जूते ख़रीदने पड़ेंगे। पुरानेवाले बहुत तंग हो गए हैं,” मेरी पुत्रवधु आशा ने ऐलान किया। 

वह ऐसे ऐलान अकाट्य तर्कों की बिना पर करती है, उनमें क़तरब्योंत की लेषमात्र भी गुंजाइश नहीं होती। और जब ऐसे ऐलान उसकी बेटी मीरा के बारे में हों, तो पागल कुत्ते के काटे लोग भी उससे सवालजवाब नहीं करते, मैं भला किस खेत की मूली ठहरा? इसलिए मैंने व्यवस्था का यह प्रश्न नहीं उठाया कि वाक़ई जूते ही तंग हुए हैं या मीरा के पैर बड़े हो गए हैं। घर के बाक़ी सदस्यों ने भी दुम दबाए मेरी शांतिप्रिय कायरता का अनुसरण किया। 

आशा उत्साहित थी, “इस बार आउटलेट मॉल से लेंगे जूते। वहाँ चुनने में आसानी होती है और दाम भी वाजिब होते हैं। देखिए न, वहाँ बढ़िया-से-बढ़िया जूता बस अस्सी दिरहम में मिल जाएगा, जबकि बाक़ी जगहों पर दाम एक सौ बीस – एक सौ तीस से कम होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।“ 

मेरी आस्था सस्ती-से-सस्ती चीज़ ख़रीदने में है। साबुन हो या अनाज, सब्ज़ी हो या मुर्ग़े का गोश्त, इंटरनेट डेटा हो या दाढ़ी बनाने का ब्लेड, मैं वही ख़रीदता हूँ जो सबसे कम पैसों या दिरहम में बिकता है। एक रुपया बचाने के चक्कर में मैं एक बार जिलेट की जगह वी जॉन की दाढ़ी बनानेवाली शेविंग क्रीम तक ख़रीद चुका हूँ, भले ही उसके बाद हर इस्तेमाल के दौरान हज्जामों-जैसी फ़ीलिंग को ख़ामोशी से जज़्ब ही क्यों न करना पड़ा हो। 

हमारे घर से आउटलेट मॉल का फ़ासला कोई तीस किलोमीटर का है। पैसे बचाने के लिए यह दूरी मामूली है, पाजामे के नाड़े की लम्बाई जितनी। गर्मी की दुपहरिया में पैंतालीस मिनट गाड़ी चलाने और उसके बाद दस मिनट पार्किंग खोजने के बाद हम आउटलेट मॉल में दाख़िल हुए। हम, यानी सबसे आगे प्रैम में मीरा, उसके पीछे, प्रैम धकेलती आशा, उससे एक क़दम पीछे मेरी पत्नी महिषी, उससे दो क़दम पीछे मेरा पुत्र अद्भुत, और फ़ैशनपरेड में कमनीय अर्द्धनग्न बालाओं की तरह आख़िर में शो स्टॉपर की तरह मैं। 

हम बड़े उत्साह और लगन से अस्सी दिरहम के जूते की तलाश में लग गए। जूता हमसे छुपन-छुपाई खेलने लगा। दुकान-पर-दुकान छान मारी, पर कहीं नज़र ही नहीं आया कमबख़्त! हर जगह भ्रष्ट नेताओं और पिलपिले अफ़सरों की तरह एक सौ पैंतीस दिरहम से ज़्यादा क़ीमती जूतों की भरमार थी। 

मरता क्या न करता! आशा ने उन्हीं एक सौ पैंतीस दिरहमवाले जूतों में से मीरा के लिए एक जोड़ा पसंद किया। मीरा ने तुरंत मुँह बिचका कर उसे नापसंद कर दिया। 

अब मीरा की बारी थी। उसने एक जूते की ओर इशारा किया। आशा ने मीरा से भी बड़ा मुँह बिचकाया। 

माँ-बेटी लगभग एक घंटा सम्मानित महिलाओं-जैसा बर्ताव करती रहीं, यानी मीरा आशा की पसंद में और आशा मीरा के चुनाव में मीनमेख निकालती रही। आख़िरकार अमरीका-भारत व्यापार समझौते की तरह उनमें भी रज़ामन्दी हो गई और कोयले की खान से हीरा, मेरा मतलब है कि हज़ारों में एक जोड़ी होनहार जूता, दोनों को पसंद आ गया। 

“क्या कहते हो, अद्भुत?” आशा ने सत्तारूढ़ दल की तरह सदन की राय माँगी। 

इतने ज़रूरी मौक़े पर अद्भुत विपक्ष की तरह ग़ायब हो चुका था। उसे एक अदद जूते की अपनी ज़रूरत अचानक याद आ गई थी। 

मैंने उसे ढूँढने के लिए इधर-उधर देखा। सामने ट्रेनर सेक्शन था। 

‘ट्रेनर’ जूते? भला जूते भी किसी को ट्रेनिंग दे सकते हैं? कैसी वाहियात बात है! मैंने मन-ही-मन निर्णय लिया, वक़्त मिला तो मैनेजर को उस सेक्शन का नाम बदलने की ताक़ीद करूँगा। 

लेकिन उससे पहले मुझे अद्भुत को खोजना था, जो चुनावी वायदों की तरह पकड़ में नहीं आ रहा था। 

मैं ट्रेनर सेक्शन से बाहर निकला। अद्भुत एक दूसरे सेक्शन में जूते तलाशता दिखा। 

“मैंने सोचा कि तुम ट्रेनर सेक्शन में होगे।“ मैंने बिलावजह झेंपते और बावजह हाँफ़ते हुए कहा। 

“मुझे ‘रनिंग’ शूज़ चाहिएँ, ट्रेनर्स नहीं। दोनों अलग चीज़ें हैं।“ उसने ऐसी सहजता से समझाया मानो एलजेब्रा और जेब्रा का फ़र्क बता रहा हो। 

‘रनिंग’ शूज़! मतलब, दौड़नेवाले जूते। पर, जूते कहाँ दौड़ते हैं? अगर वे सचमुच दौड़ पाते तो रैक पर सदा वहीं थोड़े ही मिलते जहाँ उन्हें छोड़ा गया हो? क्या ज़माना आ गया है! आदमी तो जहाँ का तहाँ रह गया और जूते इतना आगे बढ़ गए कि कोई ट्रेन करता है, कोई दौड़ लगाता है, और कोई सरकारी कर्मचारी की तरह बिना कुछ किए रैक पर इत्मीनान से पड़ा रहता है। लेकिन मौक़ा इन बातों में और वक़्त ज़ाया करने का नहीं था। पहले ही कई मिनट गुज़र चुके थे, जबकि मीरा का मिज़ाज बदलने के लिए कुछ मिलीसेकेंड ही काफ़ी होते हैं। 

अद्भुत ने मीरा के लिए चुने गए जूतों पर अपनी हामी का ठप्पा लगा लिया। बदले में, आशा ने उन जूतों के लिए हामी भर दी जो अद्भुत ने ख़ुद के लिए पसंद किए थे। 

“सस्ते में मिल गए। पाँच सौ दिरहम से कम में नहीं मिलते कहीं और, पर यहाँ पड़े सिर्फ़ साढ़े तीन सौ के!” क्रेडिट कार्ड स्वाइप करते हुए उसने विजयमुस्कान बिखेरी। 

साढ़े तीन सौ दिरहम, माने, क़रीब नौ हज़ार रुपए! मुझे धक्का लगा—वह रक़म मेरी मासिक कर्मचारी भविष्यनिधि पेंशन से कई गुना ज़्यादा थी। 

दो दिन बाद मेरी बेटी मानसी और मैं महिषी को सहारा सेंटर ले गए, जन्मदिन पर उसकी पसंद के उपहार ख़रीदने के लिए। जूते और कपड़े, दोनों ही उसे बताए बिना लेते तो बड़े-छोटे निकलने पर उन्हें बदलने का झंझट था। 

महिषी को शो केस में सजाई चीज़ें पसंद नहीं आ रही थीं। जो जूते मुझे आकर्षक लगते, वह उन पर नाक-भौं सिकोड़ती—उसे कोई जोड़ा ‘मर्दाना’ लगता, कोई बुढ़ियों के लायक, कोई आजकल की छोकरियों के लिए मुफ़ीद, और कोई बेहूदा रंग का। अगर इनमें से कोई दोष नहीं निकला, तो भी, उसमें ‘वह बात’ नहीं होती! 

“मुझे सादग़ीवाला जूता चाहिए!” वह तंग आ रही थी। तंग तो मैं और मानसी भी आ रहे थे, पर फ़र्क यह था कि हम चुप थे। सिर्फ़ एक सेल्समैन ही था जो बिना तंग आए, बड़े जोशो-ख़रोश से जूते पर जूते दिखाए चला जा रहा था। और करता भी क्या, उस समय दुकान में ग्राहक के नाम पर सिर्फ़ हम ही जो थे। सारे जूते दिखाने के बाद उसने उन्हें दुबारा दिखाना शुरू कर दिया। 

“ऐसे नहीं, पहन कर देखिए, पहन कर,” बोल-बोल कर वह जूतों में शू हॉर्न फँसाता, और सम्मोहित-सी महिषी जूते में पैर डाल देती। 

“अब चल कर देखिए, चल कर,” वह आग्रह करता, और चाभीवाली गुड़िया की तरह महिषी चलने भी लगती। कहना न होगा, तरक़ीब काम आई और सिर्फ़ पंद्रह मिनट की क़वायद के बाद महिषी ने तीन सौ पचहत्तर दिरहम की एक ऐसी जोड़ी पसंद कर ली जिसे पहले वह सिरे से नापसंद कर चुकी थी। 

किराना और घरेलू चीज़ें ख़रीदने के लिए हम अगले दिन सेंचुरी मॉल गए। चाहे कुछ भी लेना हो, महिषी मॉल या स्टोर की परिक्रमा किए बग़ैर सौदा तय नहीं करती। उस दिन भी वही हुआ। वह सबसे पहले किराना से बिलकुल उल्टी तरफ़ वाले छोर पर गई। 

“अरे, यहाँ भी जूते बिकते हैं!” उसने हैरत से कहा। 

बात सच थी—वहाँ सादे और भड़कीले, हर तरह के, जूतों की भरमार थी। वह जूतों में पैर घुसा-घुसा कर चलने लगी। मैं हैरान, अभी कल ही तो इसने मानसी से कितने महँगे जूते ख़रीदवाए थे! मुझे ताकता देख बोली, “तुम भी देखो न कोई अच्छी-सी जोड़ी अपने लिए!” 

उसकी बात में दम था। मेरी सबसे अच्छी जोड़ी के दाएँवाले जूते ने तीन साल के इस्तेमाल के बाद एक छेद से मुझे आँख दिखाना शुरू कर दिया है। डेढ़ साल पहले सेल में ख़रीदे स्नीकर्स अगले हिस्से में मुहल्ले के मोची से काली चिप्पी लगवा कर लज्जा ढाँक रहे हैं, और छः महीने पहले दो सौ रुपयोंवाली जोड़ी के दाएँ जूते के सोल के रिश्तों के बीचोंबीच दरार आ गई है। संक्षेप में, मैं प्रेमचंद की अवस्था में पहुँच चुका था और जल्दी ही हुसैन की तरह नंगे पाँव चलने की नौबत आने का ख़तरा था। 

मैं जूतों के ढेर में सस्ती जोड़ी की तलाश में जुट गया। एक-एक जूते को देखना, उठाना, और सेल्समैन की मदद के बिना पहनना—कितना अच्छा अनुभव था! सेल्समैन तो माथा ख़राब कर देते हैं अपनी बकर-बकर से, “ऐसे पैर डालिए, चल कर देखिए, बैठ कर देखिए … ” जैसे हम जिंदगी में पहली बार जूते पहन रहे हों। हुँह! 

मुझे थोड़ी देर तक जूतों में पैर डालते-निकालते देखने के बाद आशा से रहा नहीं गया, “आप मर्दों के जूते क्यों नहीं ट्राई करते? यह औरतों के जूते हैं।“ 

झेंप मिटाते हुए मैं मर्दोंवाले सेक्शन की ओर लपक लिया और जल्दी ही मेरे हाथों जैकपॉट, यानी तीस दिरहम का एक जूता, लग गया। तबतक महिषी भी ख़ुद के लिए सैंडल पसंद करने के बाद वहाँ पहुँच गई, “ये वाला देखो!” उसके हाथ में जूतों की एक जोड़ी थी। 

“हाँ, यह ज़्यादा अच्छी है,” आशा ने सास की हाँ-में-हाँ मिलाई। 

मैंने जूते पहने। फिर, वापस अपनी पसंदवाले पहने। 

“नहीं, मेरी पसंदवाले ज़्यादा आरामदेह हैं,” कहते हुए मैंने जूते शॉपिंग कार्ट में डाल दिए। उन्हें लेते हुए मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही थी। उनसे मेरा पहनावा तो निखरता ही, मेरी याददाश्त के मज़बूत होने की भी पूरी उम्मीद थी। उन पर ‘मेमोरी फ़ोम’ जो लिखा था।